शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

 अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

साहिबान कहते हैं कि इस दुनिया में अच्छा-बुरा समय सबका आता है।
अब यही देख लीजिये कि हिटलर के चरमोत्कर्ष के दिनों में किसने सोचा होगा कि उसे एक दिन अपने अत्यधिक सुरक्षित बंकर में खुद को गोली मार कर खत्म करना पड़ सकता है।

(फोटो साभार―गूगल)

नाजियों ने वर्ष 1933 से 1945 के कालखंड में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे। उस अमानवीय वीभत्स हत्याकांड को 'होलोकॉस्ट' कहा जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि हिटलर का मकसद दुनिया से यहूदियों का पूरी तरह खात्मा करना था।
उस युद्ध के समाप्त होने के बाद पकड़े गये नाजियों के अमानवीय कुकर्मों के लिए उन पर जर्मनी के शहर न्यूरेम्बर्ग में मुकदमा चलाया गया जो 'न्यूरेम्बर्ग ट्रायल' कहलाता है। 20 नवबर,1945 से 1 अक्तूबर,1946 तक करीब 2018 दिन चले ट्रायल में हिटलर के अत्यंत विश्वसनीय सहयोगी हरमन गोइरिंग, रुडॉल्फ हेस, होआचिम वॉन रिबेनट्रॉप और 18 उच्चस्तरीय़ नाजियों पर मुकदमा चला जिसमें कई सौ लोगों ने गवाही दी।
इसमें अमेरिकी वकील रॉबर्ट जैकसन और उनके साथियों ने जर्मनों की साजिश को दुनिया के सामने लाने का काम किया। सुनवाई पूरी होने पर 1 अक्टूबर, 1946 को हिटलर के 11 साथियों को मौत की सजा दी गई। जबकि हरमन गोइरिंग ने एक दिन पहले ही जहर खाकर जान दे दी थी।
हिटलर की आत्महत्या के कुछ ही घंटों बाद झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल बुनने के लिए कुख्यात उसके प्रोपेगैंडा मंत्री डॉ. जोसेफ गोएबेल्स और उसकी पत्नी मैग्डा ने अपने 6 बच्चों को मार कर अपने-आप को खत्म कर लिया था।
इसी तरह भारत में आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर मुख्य न्यायाधीश जसटिस जेसी शाह की अध्यक्षता में मार्च 1977 में आयोग का गठन किया। जस्टिस शाह द्वारा 11 मार्च, 1978 को तत्कालीन सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इंदिरा गांधी के कुछ सलाहकारों और अफसरों को ज्यादतियों के लिए दोषी माना। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इन लोगों ने नियमों से परे जाकर अपने पद और शक्तियों का गलत ढंग से इस्तेमाल किया।
हालांकि दिल्ली हाइकोर्ट ने बाद में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
शाह आयोग की रिपोर्ट में इंदिरा सरकार में रक्षा मंत्री बंसीलाल, सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला, इंदिरा के निजी सचिव आरके धवन, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर कृष्ण चंद, उनके सचिव नवीन चावला, दिल्ली पुलिस में डीआइजी पीएस. भिंडर को दोषी बताया गया था।
आपातकाल के दौरान दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर रहे कृष्ण चंद पर विपक्ष के तमाम नेताओं को जबरन जेल भेजने और बेतुके फैसले करने के आरोप थे। कहा जाता है कि उन दिनों जब दिल्ली में बड़े पैमाने पर लोगों के घर और व्यावसायिक जगहों की तोड़फोड़ हुई तो वह सब कृष्ण चंद के आदेशों से हुआ था। हालांकि चंद ने शाह आयोग के सामने कहा कि वे कमजोर आदमी थे। उन्हें जैसा आदेश ऊपर से मिलता था, वे वैसा ही करते थे।

(फोटो साभार―इंडिया टुडे)

शाह आयोग के सामने हुई पेशियों से कृष्ण चंद को अनिष्ट की आशंका हुई तो उन्होंने 09 जुलाइ, 1977 की रात दक्षिण दिल्ली के एक 60 फुट गहरे परित्यक्त कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली। उनके दो सुसाइड नोट मिले, एक उनकी पत्नी सीता के नाम उनके बेडरूम में छोड़ दिया गया था और दूसरा उनके जूतों के साथ कुएं की कंक्रीट पर मिला।
इसलिए समझदारी इसीमें है कि सत्ता, पद, अधिकार, शक्ति मिलने पर अच्छे दिन लाने की चाह में जरूरी नहीं कि वे ही आयेंगे, बुरे दिन भी आ सकते हैं, यह सोचकर अन्याय, उत्पीड़न और मनमानी करने से बचना चाहिये।

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