सोमवार, 23 अगस्त 2021

अफगानिस्तान में हुकूमत पर तालिबानी कब्जे के निहितार्थ

 अफगानिस्तान में हुकूमत पर तालिबानी कब्जे के निहितार्थ

अफगानिस्तान की हुकूमत पर लंबी लड़ाई के बाद अंतत: तालिबान का पूरी तरह कब्जा हो ही गया है। तालिबान वहां इतनी तेजी से अपना नियंत्रण स्थापित कर लेगा, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा। अधिकतर गवर्नरों ने बिना जंग के ही तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। तालिबान के काबुल पहुंचते ही राष्ट्रपति अशरफ गनी भी मुल्क छोड़कर भाग गये। राजधानी काबुल में अफरा-तफरी का माहौल है। काबुल से उड़ने वाले सभी विमान भरे हुए हैं। लोग वहां से भागकर पड़ोसी देशों में जहां भी जगह मिले, जाना चाहते हैं।
भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जर्मनी, नॉर्वे, तुर्की, कतर, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान सहित संयुक्त राष्ट्र कह चुके हैं कि वे अफगानिस्तान की तालिबानी सत्ता को मान्यता नहीं देंगे। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से दुनिया के देश चिंतित हैं लेकिन माना जा रहा है कि इससे चीन और पाकिस्तान उतने असहज नहीं हैं। चीन ने तो इस बात के भी संकेत पहले ही दे दिए थे कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में आता है तो वह मान्यता देने के लिए तैयार है।
चीन के लिए मध्य एशिया तक पहुंचने का अफगानिस्तान सबसे बेहतर जरिया है। चीन अपनी महत्वाकांक्षी दीर्घकालिक वन बेल्ट एंड वन रोड एनीशिएटिव के तहत अफगानिस्तान में निवेश करने की तैयारी में है। पाकिस्तान में चीन की सबसे महत्वाकांक्षी चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी की सुरक्षा के लिए भी तालिबान का साथ चीन के लिए अहम है।
चीन ने इसी महीने तालिबान नेताओं के साथ मुलाकात की है और तालिबान प्रवक्ता सुहैल शाहीन पहले ही कह चुके हैं कि अगर चीन अफगानिस्तान में निवेश करता है तो तालिबान उसकी सुरक्षा की गारंटी देगा। चीन के विदेश मंत्री वांग यी से जब तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल मुलाकात के लिए पहुंचा था तो उन्होंने तालिबान को अफगानिस्तान की महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य ताकत करार दिया था।
ताबिलान के प्रवक्ता सुहैल ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के बाद अफगानिस्तान में सबसे बड़े निवेशक चीन के साथ बातचीत करना जरूरी था। हम अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास के लिए स्वागत करते हैं।
जबकि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने चीन से कर्ज लेने से इनकार कर दिया था क्योंकि वे जानते थे कि चीन पर आर्थिक निर्भरता उन्हें महंगी पड़ सकती है। चीन की नजर अफगानिस्तान की समृद्ध खनिज संपदा पर है।
इधर, चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह अफगानिस्तान के तालिबान के साथ दोस्ताना सम्बंध बनाना चाहता है। चीन के पीपुल्स डेली के मुताबिक अफगानिस्तान में मौजूद चीनी दूतावास अभी भी काम कर रहा है। दुनिया में सिर्फ पाकिस्तान और चीन दो ही ऐसे देश हैं जिन्होंने अभी तक खुले तौर पर तालिबान के प्रति नरम रुख अपनाया है।
चीन को अफगानिस्तान में अपने मकसद को हासिल करने में पाकिस्तान की भी मदद मिल रही है। अफगानिस्तान से अमेरिका के वापस जाने के बाद खाली स्थान को चीन पाकिस्तान की मदद से भरने की कोशिश में है। इससे उसे मध्य एशिया में बढ़त मिलने में मदद भी मिल जाएगी।
हालांकि चीन के लिए स्थितियां उतनी आसान नहीं हैं, जितनी कि लग रही हैं। सिर्फ आर्थिक निवेश से तालिबान को साधना संभव नहीं है। पहले भी अमेरिका जैसे देशों की यह कोशिश कामयाब नहीं हो पाई है।
हालांकि अपुष्ट खबरों के अनुसार भारतीय विदेश मंत्री तथा उनके मंत्रालय के अधिकारियों की पिछले दिनों दुबई और कतर में मुलाकातें हुई हैं लेकिन राष्ट्रीय हित में वे कितनी असरदार साबित होंगी अभी कहना मुश्किल है। फिर भी यह अंदाजा लगाना बिल्कुल भी कठिन नहीं है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान में चीन, पाकिस्तान और रूस की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। ऐसी स्थिति में कश्मीर में आतंकवाद के चरम पर पहुंचने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। बल्कि यह भी हो सकता है कि चीन-पाक धुरी कश्मीर को भारत से अलग-थलग करने में कामयाब हो जाये।

क्या अमेरिकी प्रभुत्व खत्म हो रहा है?

 क्या अमेरिकी प्रभुत्व खत्म हो रहा है?

'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि अमेरिका आज एक ऐसी स्थिति में फंस गया है, जहां से वह न तो खुद को संभाल सकता है और न ही उबर सकता है। अफगानिस्तान के संदर्भ में रणनीतिकार और 'न्यूयॉर्क टाइम्स' जैसे अखबार भी यही मानते हैं कि पूरी अमेरिकी कवायद ने अपनी अहमियत ही खो दी।
शासक अक्सर नुकसान को बहुत कम कर आंकते हैं। इराक, लीबिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, सोमालिया, लेबनान तक लंबी फेहरिस्त है, जहां अमेरिका को नुकसान झेलना पड़ा है। ईरान से चिली तक बगावतें हुई हैं। कोलंबिया, इक्वाडोर, ग्वाटेमाला, लाओस, होन्डुरास, अल सल्वाडोर हर देश मे हिंसा हुई है। सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान तक ने अमेरिकी मकसद को नुकसान पहुंचाया है। सवाल यह है कि क्या अमेरिकी हस्तक्षेप से कोई मकसद हासिल हुआ या हिंसा में कमी आयी? जवाब है―नहीं। अफगानिस्तान में लंबा वक्त गुजार चुकीं एक पत्रकार लिजे पूछती हैं―“कोई ऐसा युद्ध है जहां हम हारे न हों?"
ईरान, वियतनाम हर जगह अमेरिका सटीक अनुमान लगाने में विफल रहा। वहीं पुतिन के नेतृत्व में रूस ने खुद को भूमध्यसागर क्षेत्र तक प्रभावशाली बनाए रखने में सफलता हासिल की है। सोवियत संघ के पतन के बाद चीन ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को प्रभावहीन करके वह मध्य एशिया तक जा पहुंचा है और अफ़ीकी महाद्वीप तक जल्दी ही पहुंचने वाला है।
लेखक इस ओर भी इशारा करते हैं कि आज हर देश का कारोबार अमेरिका के मुकाबले चीन के साथ ज्यादा है। अमेरिका, जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया क्वाड के कम से कम दो देश—भारत और ऑस्ट्रेलिया आर्थिक और सामरिक नजरिए से चीन की तपिश के शिकार हैं। भारत के लिए तो यह चुनौती आगे अभी और भयावह रूप में सामने आ सकती है।
भारत वैश्विक स्तर पर हर क्षेत्र में निरंतर कमजोर होता गया है और सत्ताधारी वर्ग इस सबसे लापरवाह बना हुआ है। उसे गांव की रामलीला कमेटी व ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव को युद्ध की तरह जीत लेने की खब्त सवार है। असहमति या विरोध की एक आवाज उठते ही उसे कुचले को पूरी ताकत झौंक दी जाती है, देशहित जाये भाड़ में।
'अबकी बार ट्रंप सरकार' जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मूर्खता ने भारत को कहीं का नहीं छोड़ा। ऐसे में यदि चीन के साथ सीमाओं पर तनाव बढ़ता है तो विश्व-बिरादरी में हमारे साथ कौन खड़ा होगा यह आज कोई नहीं कह सकता। क्या ऐसी स्थिति पहले भी कभी आई थी?

मंगलवार, 17 अगस्त 2021

संसद में बहस पर बहस

संसद में बहस पर बहस



संसद में सिर्फ 15 मिनट की बहस के बाद रक्षा विधेयक सहित आठ विधेयक बिना बहस कराये ही पारित घोषित कर दिये गये। इस पर देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एन.वी. रमना ने संसद में उचित बहस न होने पर खेद जताते हुए संसद के कामकाज की कड़ी आलोचना की है। मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि कानून बनाने की प्रक्रिया का ठीक-ठीक पालन नहीं किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में जो कानून बनाये जा रहे हैं उनमें अस्पष्टता रहती है। इस कारण मुकदमों में वृद्धि और नागरिकों को असुविधा होती है। 

देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित कार्यक्रम में देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एन.वी रमना ने संसदीय व्यवधानों तथा सदन में कानूनों पर बहस के समय में कटौती पर चर्चा की। उन्होंने पहले के समय से आज की तुलना करते हुए कहा, "हमारे स्वतंत्रता सेनानियों में से कई कानूनी बिरादरी से भी थे। पहली लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य वकीलों के समुदाय से भरे हुए थे।" 

उन्होंने आगे कहा, "अब हम सदनों में जो देख रहे हैं वह दुर्भाग्यपूर्ण है…। तब सदनों में बहस बहुत रचनात्मक थी। मैंने कई वित्तीय विधेयकों पर भी बहस देखी हैं, जब बहुत रचनात्मक बिंदु बनाये गये थे। तब कानूनों पर चर्चा की गई और गहन विचार-विमर्श किया गया था। तब बहस के बाद उस कानून पर हर किसी के पास स्पष्ट तस्वीर होती थी।" 



मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा, "संसद में उचित बहस न होना दुखद है। एक मुख्य न्यायाधीश को रिटायरमेंट के बाद इनाम देना और एक मुख्य न्यायाधीश का यह कहना कि कानूनों की कोई स्पष्टता नहीं है। हम नहीं जानते कि कानून का उद्देश्य क्या है। यह जनता के लिए हानिकारक है। यह तब हो रहा है, जब सदनों में वकील और बुद्धिजीवी नहीं हैं।"

उनकी इस अत्यंत गंभीर टिप्पणी पर सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अलबत्ता केंद्रीय मंत्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के उपाध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू से मुलाकात कर विपक्ष के कुछ सदस्यों के खिलाफ राज्यसभा में किये गये उनके व्यवहार को आपत्तिजनक मानते हुए कार्रवाई की मांग की है। 

सत्ता पक्ष के दोहरे मानक क्यों?—
यह बड़ी अजीब स्थिति है कि एक तरफ आज का सत्ताधारी वर्ग जब विपक्ष में था तो कहता था कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है लेकिन अब जब वे सत्तासीन हैं तो खुद यह उत्तरदायित्व नहीं निभा रहे हैं और उल्टा दोषी विपक्षियों को ठहरा रहे हैं। और, विपक्षियों का आरोप है कि विपक्षी सांसदों को बाहर से गुंडे बुलाकर उन्हें संसद के अंदर पिटवाया गया। ऐसा होना या आरोप लगाना दोनों ही स्थितियां अभूतपूर्व हैं।

शालीनता और मर्यादाओं से कभी का पल्ला झाड़ चुकी यह सरकार इस पर कोई प्रतिक्रिया तो दूर, उन विपक्षी सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही है जो सदन में चर्चा की मांग करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

इस तरह देखा जाये तो सरकार के खिलाफ 'पापड़ी चाट की तरह कानून बनाने' का विपक्षी आरोप सही है। इस तरह आनन-फानन मनमाने कानून लादने का नतीजा सामने है लेकिन सरकार की मोटी चमड़ी पर कोई असर नहीं है।

बिना पर्याप्त विचार-विमर्श तैयार किये गये सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66-A को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द चुका है क्योंकि इसके तहत पुलिसकर्मियों को अपने विवेक से 'आक्रामक' या 'खतरनाक' या 'असुविधाजनक' या 'बाधा' आदि को परिभाषित करने की छूट दी गई थी।

उधर बॉम्बे हाइकोर्ट ने सरकार द्वारा तैयार नये आइटी नियम 9 के क्रियान्वयन पर यह कहते हुए रोक लगा दी है—"हम प्रथम दृष्टया इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह नियम 9 क़ानून के अनुरूप नहीं है, अर्थात् आइटी अधिनियम के साथ-साथ यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत दी गई गारंटी के मौलिक अधिकारों में घुसपैठ है।" हाइकोर्ट ने इस पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। 

मौजूदा कानूनों के अनुपालन में जब ट्विटर ने केंद्रीय मंत्री का ही अकाउंट बंद कर दिया तो सरकार ने उसे दुरुस्त करने की बजाय ट्विटर के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और फिर ऐसे आरोप में विपक्ष के नेताओं के ट्विटर अकाउंट बंद करा दिये जो वे पहले खुद करते रहे थे।

क्या यह मनमानी नहीं है? ऐसे दोहरे मानक क्यों? यह साधारण बात नहीं है!

राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि उनका ट्विटर अकाउंट बंद करके देश की राजनीति को प्रभावित किया जा रहा है और मुख्य न्यायाधीश कहते हैं कि प्रभावित राजनीति जनहित में नहीं है। 

कमाल तो यह कि राहुल गांधी पर जिस कानून के उल्लंघन का आरोप है उसके लिए सरकारी स्तर पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने का जो आरोप उन पर लगाया गया था, उससे पीड़ित परिवार सहमत नहीं है और परिवार को राहुल गांधी के ट्वीट पर कोई आपत्ति नहीं है। इससे स्पष्ट है कि कोई अपराध हुआ ही नहीं है और अगर हुआ भी माना जाये तो भी ट्विटर पर कार्रवाई का दबाव बनाने के अलावा सरकार ने कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। 

'अपराध' का संज्ञान पुलिस-प्रशासन की बजाय विदेशी कंपनी ने लिया—
क्या देश का आइटी कानून ऐसा हो सकता है कि नागरिकों पर विदेशी कंपनियां तो ऐसे 'अपराध' के लिए कार्रवाई करें जिसके लिए पुलिस-प्रशासन ने कोई संज्ञान लेने की जरूरत ही नहीं समझी? कोई बतायेगा कि देश में इस तरह की मनमानी क्यों हो रही है? इससे तो साफ पता चलता है कि सत्ताधारी वर्ग विदेशी पूंजीपतियों से सांठगांठ करके कानून के समानान्तर वयवस्था लागू कर अपने नागरिकों के अधिकारों का हनन और उनका उत्पीड़न कर रहा है?  

राहुल गांधी का ट्विटर अकाउंट बंद होना ऐसा ही मामला है। क्या यह आदर्श स्थिति हो सकती है? क्या ऐसा होना चाहिए? अगर राहुल गांधी का अकाउंट अकारण बंद हो सकता है तो आम आदमी की क्या बिसात? विपक्ष मांग कर रहा है कि संसद में पर्याप्त चर्चा हो लेकिन उन्हें संसद में पिटवाने और संसद का कार्यकाल समय से पहले खत्म कर दिए जाने का आरोप है। 

सरकार इस पर कोई जवाब नहीं दे रही है और मंत्री मांग कर रहे हैं कि जनहित में संसद में बहस की मांग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो! यह बड़ी विडंबना है लेकिन पूंजीपतियों का सरकार द्वारा संचालित मीडिया विपक्ष को ही दोषी साबित करने का नैरेटिव सैट करने में लगा है ताकि कार्रवाई होने पर जनता को गलत नहीं लगे। यह संघ-भाजपा की राजनीति है। 

शायद भारत भी अफगानिस्तानी तालिबानियों की राह चल पड़ा है। जिसके देर-सबेर वैसे ही परिणाम सामने आयेंगे जैसे आज अफगानिस्तान की जनता को भोगने पड़ रहे हैं। आखीरकार अपना बोया तो काटना ही पड़ता है न ! 

सोमवार, 16 अगस्त 2021

उत्तराखंड के जंगली पौधे घिंगारू का अध्ययन तथा औषधीय उपयोग

उत्तराखंड के जंगली पौधे घिंगारू का अध्ययन तथा औषधीय उपयोग

                                    

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र विशिष्ट जैव विविधता के लिए विख्यात हैं। जंगली फलों का तो यहां समृद्ध संसार ही है। परंपरागत रूप से यह फल यात्रियों और चरवाहों की क्षुधा शांत करते थे लेकिन समय परिवर्तन के साथ ही लोगों को इनका महत्व समझ में आया तो ये लोकजीवन का हिस्सा बन गए। ये जंगली फल औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं तो स्थानीय पारिस्थितिकी-तंत्र में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। 

इन्हीं वन्य वनस्पतियों में शामिल है—घिंघारू। जिसे वानस्पतिक नाम पैइराकैंथा क्रेनुलाटा (Pyracantha crenulata) अन्य प्रजातियों में Pyracantha coccinea तथा Nepalese White Thorn, Nepalese firethorn, Indian Hawthorne आदि नामों से भी संसार में जाना जाता है। इसके अतिरक्त इसे हिमालयन फायर थोर्न, ह्वाइट थोर्न तथा स्थानीय कुमाऊंनी बोली में घिंगारू और नेपाल में घंगारू कहा जाता है। घिंगारू पादप रोजेसी (Rosaceae) कुल का बहुवर्षीय कांटेदार झाड़ीनुमा पौधा है।

यह बहुत ही बहुमूल्य औषधीय पौधा दक्षिण एशिया के मध्य-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में भारत के उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश के अलावा नेपाल, भूटान व तिब्बत (चीन) में भी पाया जाता है। यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में समुद्रतल से 1700 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर खुली ढलानों, जंगलों, चरागाहों, सड़कों, पैदल रास्तों, खेतों, झरनों व नदी-नालों के किनारे तथा पहाड़ी घाटियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली इस छोटी और कंटीली झाड़ी का विशेषज्ञों के अनुसार स्थानीय पारिस्थितिकी-तंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। यह भूस्खलन को रोकने में काफी मददगार होती है।

                           

घिंगारू के औषधीय उपयोग—

उपेक्षित घिंगारू का पारम्परिक रूप से उपयोग घरों में छोटे-मोटे घरेलू उपचार में किया जाता रहा है क्योंकि यह औषधीय गुणों से भरपूर है, हालांकि ग्रामीण लोग इसकी गुणवता से अनजान हैं। यह हृदय को स्वस्थ रखने में सक्षम है। यह फल पाचन क्रिया के लिए बहुत ही लाभदायक होता है। अब तो रक्तवर्द्धक औषधि के रूप में इसका जूस भी तैयार किया जाने लगा है। इसमें विटामिन्स और एंटी ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा है। इसके इन्हीं औषधीय गुणों की खोज रक्षा जैव ऊर्जा अनुसंधान संस्थान पिथौरागढ़ ने विशेष रूप से की है। संस्थान ने इसके फूलों के रस से ’हृदय अमृत’ नामक औषधि बनाई है। 

इसके फलों के रस में रक्तवर्धक गुण पाये जाते हैं। 

चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार घिंघारू के फलों में कार्डियोटोनिक, कोरोनरी वैसोडिलेटर और हाइपोटेंशियल गुण होते हैं। इसका उपयोग कार्डियक फेल्योर, पेरोक्सिस्मल टैचीकार्डिया, मायोकार्डिअल दुर्बलता, उच्च रक्तचाप, धमनीकाठिन्य और बर्गर्स रोग (एन.एस. चौहान—1999) के लिए किया गया है। इसके फलों को सुखाकर तैयार किये गये चूर्ण का उपयोग दही के साथ टोबैकोडी (खूनी) पेचिश (मैनन्डर, एनपी, 2002) तथा मधुमेह के उपचार में किया जाता है।

इसकी पत्तियों में पाया जाने वाला पदार्थ त्वचा को जलने से बचाने से यह एंटी सनबर्न प्रभावी है। इसकी पत्तियों से अनेक एंटी ऑक्सीडेंट सौंदर्य प्रसाधन और कॉस्मेटिक्स तैयार किये जाते हैं। इसकी पत्तियां हर्बल चाय बनाने में इस्तेमाल की जाती हैं। 

घिंगारू की छाल का काढ़ा स्त्री रोगों के निवारण में लाभदायी होता है। एक्जिमा के उपचार के लिए भी घिंगारू से तैयार टॉनिक का प्रयोग किया जाता है। दही के साथ फलों से तैयार पाउडर एवं सूखे फलों का प्रयोग खूनी पेचिश का उपचार करने में किया जाता है। इसके फलों में पर्याप्त मात्रा में शर्करा पायी जाती है जो शरीर को तत्काल ऊर्जा प्रदान करती है। 

घिंगारू के फल में फ्लेवोनोइड्स और ग्लाइकोसाइड्स होने के कारण इसमें बेहतरीन सूजनरोधी (Anti-inflammatory) गुण होते हैं। 

इसकी पतली डंडियों का प्रयोग दातून के रूप में भी किया जाता है जिससे दांत दर्द में भी लाभ मिलता है। पारम्परिक रूप से बीते समय में स्थानीय लोग घिंगारू की चटनी बनाकर खाते थे। 

घिंगारू के फूलों से मधु-मक्खियों द्वारा बनाया गया शहद औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह शहद रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए शुगर के मरीजों के लिए लाभदायक होता है। सामान्यत: शारीरिक लाभ के लिए घिंगारू के फलों का प्रयोग किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है। घिंगारू के ताजा फलों का प्रयोग पूर्णत: सुरक्षित है।

प्रोटीन के भरपूर घिंघारू—

वन अनुसंधान केंद्र ने अपनी नर्सरी में घिंगारू का सफल संरक्षण किया है। इससे वहां पौधों पर फूल व फल दोनों आ चुके हैं। घिंघारू में प्रोटीन की काफी मात्रा होती है। इसके औषधीय गुणों को लेकर अनुसंधान कार्य जारी है।

यह ध्यान रखना चाहिये कि किसी भी प्रकार से घिंगारू के औषधीय प्रयोग से पूर्व किसी विशेषज्ञ आयुर्वेदाचार्य अथवा चिकित्सक की सलाह अनिवार्यत: ली जाये। यदि इस सलाह के बाद भी कोई व्यक्ति घिंगारू का प्रयोग एक औषधि के रूप में करता है और इससे उसे किसी प्रकार की हानि होती है तो सम्बंधित व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होगा।

घिंगारू के अन्य उपयोग—

घिंगारू की लकड़ी काफी मजबूत होने से इसकी लाठियां, हॉकी स्टिक, कृषि उपकरणों के हत्थे आदि बनाने में काम आती है। इसकी कांटेदार झाड़ियों की बाड़ को पार करना पशुओं के लिए काफ़ी मुश्किल होने से कहीं-कहीं पर किसान अपने खेतों की बाड़ के लिए इसकी झाड़ियों को संरक्षित भी करते हैं। इसके पत्तों और फलों को भेड़-बकरी जैसे छोटे मवेशी बड़े चाव से खाते हैं जिस कारण बारिश के दिनों में इन मवेशियों का यह काम चलाऊ आहार माना जाता है। इसकी टहनियों में कांटे होने के कारण बड़े पशु इसकी पत्तियां व फलों को अपेक्षाकृत नहीं खा पाते हैं।

घिंगारू का तना काफ़ी गठीला, लचीला और मजबूत होता है। इससे इसकी लकड़ी काफी मजबूत मानी जाती है। इसीलिए स्थानीय स्तर पर इससे विभिन्न घरेलू व कृषि उपकरणों के हत्थे आदि बनाये जाते हैं। व्यावसायिक स्तर पर भी इसके तने की मजबूत लकड़ियों का इस्तेमाल लाठी (वॉकिंग स्टिक) तथा हॉकी स्टिक बनाने में भी किया जाता है। महानगरों में कुछ परिवारों द्वारा घिंगारू पौधे का प्रयोग ड्राइंग रूम में सजावट के लिए डेकोरेटिव बोन्साई प्लांट के रूप में भी किया जा रहा है।

घिंगारू के फूलने-फलने का समय—

घिंगारू में प्रतिवर्ष मार्च-अप्रैल माह के बीच काफी सारे गुच्छों की शक्ल में सफेद रंग के फूल आते हैं। फूल के परिपक्व होने के बाद मई-जून तक इसमें छोटे-छोटे हरे रंग के दाने लगते हैं, जो पकने पर गुलाबी, नारंगी, लाल या गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। इन पके फलों से इसकी झाड़ियां छोटे-छोटे लाल रंग के फलों से झूल जाती हैं। यह जंगली फल आकृति में सेव की तरह लेकिन बहुत छोटा (मटर के दाने बराबर) और स्वाद में हल्का खट्टा-मीठा होता है। इसके फलों को बंदर, लंगूर आदि जंगली पशु और पक्षी बड़े चाव के खाते हैं। स्थानीय बच्चे इसे छोटा सेव कहते हैं और काफी पसंद करते हैं। 

हिमालय के पारिस्थितिकी-तंत्र में घिंगारू का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि इसकी जल तथा मृदा संरक्षण व वन भूमि की उर्वरता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है। इधर देखा गया है कि आधुनिकीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण इस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है क्योंकि आबादी में वृद्धि के कारण इसके प्राकृतिक आवास वाली बंजर भूमि निरंतर कम होती जा रही है। जंगलों में प्रतिवर्ष लगने वाली आग ने इसे बहुत नुकसान पहुंचाया है। 

सरकार तथा अन्य लोगों के प्रयास से उत्तराखंड के इस जंगली फल को बाजार से जोड़कर यहां की आर्थिकी संवारने का जरिया बनाया जा सकता है। इससे न केवल स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि यहाँ प्रतिवर्ष आने वाले लाखों पर्यटक भी घिंगारू के औषधीय तथा अन्य उत्पादों का लाभ ले सकेंगे।

#एकदा_जंबूद्वीपे

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