शनिवार, 2 दिसंबर 2023

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव 


वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया। उसके 1,30,000 वर्ष तक वह अन्य पशुओं की तरह जीवनयापन करता रहा। फिर इस दीर्घ कालखंड के आखिरी वर्षों यानी अब से करीब 70,000 साल पहले उसमें चीजों और घटनाओं को गहराई से सोचने तथा भविष्य के लिए योजनाएं बनाने की क्षमता व कलाएं विकसित हुईं। जिससे मिस्र, मेसोपोटामिया (3000 से 600 ई. पू.), सिंधु घाटी (3,000-1900 ईपू), मध्य अमेरिका में माया व एजटेक दक्षिण में इंका (2600-1500 ईपू), बेबीलोन (2,500 ईपू.), फारस (550 से 330 ईपू.), आर्मीनियाई, चीनी आदि विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का विकास हुआ।

बौद्धिक विकास के बाद मनुष्य के भीतर दार्शनिक विचारों का सिलसिला चालू हुआ तो उसने बाहर-भीतर दोनों ही के रहस्यों को जानने का प्रयास किया। इसी क्रम में वैदिक धर्म का विकास हुआ। इसकी उत्पत्ति पूर्वकालीन आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. मध्य एशिया से हिमालय तक फैले हुए थे, इसमें भी वैज्ञानिकों में मतभेद हैं। 

प्रारंभिक वैदिक काल (4500–1100 ईपू.) माना जाता है, लेकिन संभवतः इसकी जड़ें मध्य एशियाई ऐंड्रोनोवो संस्कृति (20,000-9000 ईपू.), सिंधु घाटी की सभ्यता (2600-1900 ईपू.) और उसके बाद सिंतश्ता संस्कृति (2200-1800 ई.पू.) में भी हैं।

कहते हैं कि आर्यों की ही एक शाखा ने अविस्तक धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमशः यहूदी मत (2000 ई.पू), जैन मत (600 ईपू), बौद्ध मत (500 ईपू), ईसाई मत सिर्फ 2000 वर्ष पहले और इस्लाम तो आज से केवल 1400 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ।

इस तरह मोटे तौर पर मनुष्य की इतनी सुदीर्घ जीवन-यात्रा के बाद दार्शनिक विचारों का उद्भव करीब 7,000 वर्ष पहले हुआ। 


बोधिसत्व ही विष्णु और शिव!



जहां तक सनातन से हिंदुत्व में बदल गई संस्कृति और विचारधारा का प्रश्न है इसका वर्तमान स्वरूप बौद्ध मत का ही आधुनिकीकरण है। इसमें अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के दो रूप बन गए हैं। जो शताब्दियों बाद लोक में विष्णु और शिव के रूप में पूजित हो गये। इन्हीं से वैष्णव और शैव मत बने। 

DrSanjay Jothe के अनुसार वैष्णव परम्परा की पुरानी मूर्तियों में अवलोकितेश्वर की छाप बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। बल्कि कई जगह तो अवलोकितेश्वर की मूर्ति को ही विष्णु बना दिया गया है। जबकि बौद्ध स्तूप आगे चलकर शिवलिंग बना, यह भी सिद्ध हो चुका है।

वज्रयान परम्परा में बोधिसत्व तारा और बोधिसत्व/बुद्ध का संवाद बताया गया है। तांत्रिक ग्रंथ 'विज्ञान भैरव तंत्र' में शिव-पार्वती संवाद मिलता है। बोधिसत्व और तारा ही बाद में शिव-पार्वती बन जाते हैं। मजे की बात यह है कि 'विज्ञान भैरव तंत्र' में ध्यान/समाधि की 108 विधियों में से शुरुआती 16 से ज्यादा विधियां आनापान (श्वांस) पर आधारित हैं। इसी से सिद्ध होता है कि यह बौद्ध ग्रंथ है। इसीलिए स्वयं शैव और वैष्णव भी इस ग्रंथ का उल्लेख नहीं करते। उनकी मंडलियों में लोग इस ग्रंथ की ज्यादा बात नहीं करते, बस भगवद्गीता और उपनिषदों को दोहराते रहते हैं।

वैष्णव परम्परा जिन उपनिषदों को आधार बनाती है वे खुद श्रमणों के ग्रंथ हैं। उपनिषद स्वयं वेदों के हिंसक यज्ञ, कर्मकांड और बलि के विरोध में खड़े हैं। उपनिषदों में मुख्य भूमिका राजा/क्षत्रिय ज्ञानियों की है, वहां ब्राह्मण शिष्य बनकर क्षत्रियों से सीख रहा है। राजपुरुष के मुनि, तीर्थंकर या बुद्ध बनने की परम्परा जैनों और बौद्धों की है। दिनकर ने 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखा है कि उपनिषद ब्राह्मणों के ग्रंथ नहीं हैं।

महायान और योगाचार सहित शून्यवाद से जन्मा ध्यान योग ही गौड़पाद, गोविंदपाद और आदिशंकर में नजर आता है। यही मायावाद बन जाता है। बौद्ध वज्रयान का तंत्र अभिनवगुप्त में नजर आता है। तिब्बत में यह खूब फैलता है। हिमालय से नीचे उतरते हुए यह सिलसिला गोरखनाथ से बहता हुआ कबीरदास, रैदास और नानक तक आता है। अवलोकितेश्वर ही इन सबके मूल में हैं।

अब ये बातें सामान्य भारतीयों को पता चलने लगी हैं। इसीलिए वर्णाश्रम व्यवस्था पर बहुत बड़ी चोट हो रही है। अब विशेष रूप से ओबीसी, दलित और जनजातीय समाज में श्रमण परम्परा के पक्ष में नई लहर पैदा हो रही है। अब बुद्ध और धम्म को समझने का सही समय आ रहा है। अगले कुछ दशकों में यह स्थापित हो जाएगा कि वर्तमान में प्रचलित हिंदू धर्म असल में महायान और वज्रयान का ही विकृत रूप है।

सत्ताधारी दक्षिणपंथियों द्वारा भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन और इसके उलट-फेर के प्रयासों के बीच लोक में इसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पक्ष की खुदाई भी साथ ही साथ चल रही है। इस दिशा में उठती धीमी आवाजें अब त्वरित गति पकड़ती जा रही हैं। हालांकि ये दोनों धाराएं राजनीति प्रेरित अधिक हैं लेकिन जो शुरुआत हुई है, वह आगे चलकर संख्याबल के आधार पर संगठित हुई तो उसके बड़े दूरगामी परिणाम सामने आएंगे।

मंगलवार, 26 सितंबर 2023

क्या संघ का हृदय-परिवर्तन हो गया है?

 क्या संघ का हृदय-परिवर्तन हो गया है?



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भगवत ने कल 26 सितंबर, 2023 को लखनऊ में एक कार्यक्रम में कहा "मुस्लिम भी हमारे ही हैं, संघ का कोई पराया नहीं, बस उनकी पूजा पद्धति बदल गई है। यह देश उनका भी है वे भी यहीं रहेंगे। आलोचना करने वाले हिंदू धर्म को नहीं जानते।" 

उन्होंने कहा कि जातिप्रथा, भेदभाव जैसी सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए समाज को एकजुट करना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन कोई धर्म नहीं बल्कि संस्कृति है।

मोहन भागवत के उपरोक्त वक्तव्य के आलोक में कुछ पीछे की ओर देखने से पता चलता है कि उनके ये शब्द संघ के वैचारिक प्रमुख और संघ संस्थापक  केशव राव बलीराम हेडगेवार के उत्तराधिकारी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की उस विचारधारा के एकदम विपरीत हैं जो मुसलमानों को भारत का शत्रु मानते रहे। उनके उक्त विचारों के कारण ही संघ दशकों से मुसलमानों के विरुद्ध विष-वमन करता रहा है, उन्हें अपनी घृणा व हिंसा का शिकार बनाने के बहाने पैदा करता रहा है। 

यह कितना हास्यास्पद है कि मोहन भागवत 'सनातन धर्म' की पीढ़ियों से प्रचलित एक सर्वमान्य परिभाषा के इतर इसकी मनघढ़ंत व्याख्या कर रहे हैं। जबकि यथार्थत: 'हिंदू' कोई 'धर्म' है ही नहीं। इस विषय में लंबी बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि यह एक जीवन-पद्धति है, न कि धर्म। 

मतलब मोहन भागवत को स्वयं यह नहीं मालूम कि 'धर्म' और संस्कृति क्या है। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि धर्म मनुष्य की अंतश्चेतना को वैश्विक विराट परमचैन्य से सम्पृक्त करने के लिए अंत:करण और बाह्य कर्मों के द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ है, जबकि संस्कृति का गठन रहन-सहन, रीति-रिवाज, परंपरा, त्यौहार, बोली-भाषा, वेश-भूषा, आचार-व्यवहार आदि पर निर्भर करता है। सारत: जीवन जीने की कला ही संस्कृति है। 

इस्रायली यहूदियों से हिंदू बने चितपावनों के वंशज गोलवलकर-सावरकर की जोड़ी ने पहले तो सनातन धर्म की सहस्राब्दियों पुरानी मानवीय सद्गुणों की पोषक अवधारणा को अपने 'हिदुत्व' की वैचारिकी से भ्रष्ट कर लोगों का मतिहरण करने का प्रयास किया जिसका मूल गैर-सनातनियों के प्रति घृणा व हिंसा है। यह सर्वविदित है कि उनका यह विचार हिटलर के नाजीवादी तथाकथित शुद्ध रक्त और जर्मन राष्ट्रवाद तथा मुसोलिनी के फासिज्म के अलावा मानताविरोधी मनुस्मृति से प्रेरित है।

संघ के सभी लोग मुसलमानों को सारे नागरिक अधिकारों से वंचित और किसी भी तरह की मांग या इच्छा न रखने की शर्त पर गुलामों की तरह ही भारत में रहने देने की बातें कहने वाले माधवराव सदाशिवराव को एक आध्यात्मिक ज्ञानी और 'परमपूज्य गुरुजी' कहते हैं। तो यहां प्रश्न उठता है कि क्या कोई आध्यात्मिक ज्ञान-सम्पन्न व्यक्ति दूसरों के प्रति ऐसा घृणित भाव रख सकता है? हिंदुओं का ऐसा कौन-सा धर्मग्रंथ है जिससे ऐसी निकृष्ट सोच विकसित होती है, मनुस्मृति की बात छोड़िये क्योंकि वह अधर्म का पृष्ठपोषण करती है न कि धर्म का।  

यही कारण है कि मनुस्मृति और उसमें प्रतिपादित वर्ण-व्यवस्था को आदर्श सामाजिक संरचना मानने वाले संघ में पिछले अठानबे वर्षों में एक भी दलित, महिला और आदिवासी को न तो सरसंघचालक बनाया गया और न ही इन्हें संगठन में किसी उच्च पद पर आसीन किया गया। तिस पर भी उत्तर प्रदेश के एक क्षत्रिय राजेन्द्र सिंह उर्फ 'रज्जू भैय्या' के अतिरिक्त सारे संघ-प्रमुख ब्राह्मण ही बनाये गये। ऐसा भेदभाव क्यों?

दलितों, आदिवासियों, महिलाओं के प्रति पीढ़ियों से पोषित घृणा और तज्जनित उपेक्षात्मक भाव अब संघ के डीएनए स्तर तक पैठ गया है। इसी कारण देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नये संसद भवन के शिलान्यास, उद्घाटन और उसमें बुलाये गये पहले संसद-सत्र में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। जबकि अनेक फिल्मी तारिकाओं को आमंत्रण दिया गया था। 

यही नहीं समाज के पिछड़े वर्गों का जीवन-स्तर उठाने और निर्णय लेने में उनकी भी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के बजाय संसद की उक्त बैठक में लाये गये महिला आरक्षण बिल में इस वर्ग की महिलाओं को जानबूझकर छोड़ दिया गया।  

क्या मोहन भागवत बतायेंगे कि उन्होंने कल जिस तरह लखनऊ में "मुस्लिम भी हमारे ही हैं, संघ का कोई पराया नहीं" कहा है, उसके अनुसार संघ का हृदय-परिवर्तन हो गया है? क्या वे अपने 'परमपूज्य गुरुजी' माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर और वैचारिकी के शिखर पुरुष विनायक दामोदर सावरकर की मुस्लिमविहीन हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को पीछे छोड़कर इस देश में सबके लिए खुले दिल से जगह बनाने को तैयार हैं? क्या संघ इसकी शुरुआत अपने संगठन में सरसंघचालक समेत सभी उच्च पदों पर हिंदू समाज के अभिन्न अंग वैश्यों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं को बैठाकर करेगा? क्या आने वाले समय में हम संघ को खुले मन से सर्वसमावेशी स्वरूप में देख पायेंगे? 

इन प्रश्नों के उत्तर मोहन भागवत को देने होंगे। अन्यथा तो संघ मनुस्मृति पर आधारित समताविहीन अमानवीय समाज की वकालत करने वाला मानवता-विरोधी संगठन ही बना रह जायेगा, जो इस देश की मूल आत्मा के विरुद्ध और गिरगिट की तरह परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदलने के अलावा कुछ नहीं है। ♦

गुरुवार, 22 जून 2023

वेदों में विज्ञान कुछ विचारणीय बिन्दु

वेदों में विज्ञान कुछ विचारणीय बिन्दु


कभी-कभी कुछ लोग वेदों में विज्ञान वाली बात से जनता को गुमराह करने की कोशिश करते रहते हैं, उनका कहना है कि वैदिक काल में विज्ञान उन्नत अवस्था में था और आज से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं था। क्या यह सही है?
दरअसल, जब से मानव धरती पर आया तभी से वह तमाम प्राकृतिक घटनाओं को देखकर अपना निष्कर्ष निकालने की कोशिश करता रहा है। ऐसा वैदिक काल में भी हुआ होगा। उदाहरण के लिए सूर्योदय और सूर्यास्त का प्रतिदिन होना। मौसम का बदलाव एक अंतराल के बाद होना। जैसे जाड़ा, गर्मी और बरसात का एक निश्चित समय पर आना। वर्षा से ही वर्ष की अवधारणा बनी।
वैदिक काल में 366 दिन का एक वर्ष माना जाता था। ऐतरेय ब्राह्मण (7.17) में तो 360 दिन का ही वर्ष माना गया है। आजकल यह संख्या 365.24219 दिन की है लेकिन यह बहुत बड़ा अंतर है। इस वैदिक काल गणना के अनुसार एक सौ साल में 75 दिनों का अंतर आ जायेगा। इस अंतर को वैदिकजन कैसे समायोजित करते होंगे, इसकी जानकारी नहीं है क्योंकि बिना समायोजन के वेध के अनुसार वर्षारंभ के समय उक्त गणना तपती गर्मी बता रही होगी क्योंकि गणना 75 दिन पीछे का समय बता रही होगी। कोई न कोई विधि इस स्थिति से निपटने के लिए अवश्य रही होगी।
स्पष्ट है कि पुराकालीन मानव समाज गणना एवं वेध का काम तो कर रहा था परन्तु वैदिक काल में इतनी सूक्ष्मता से गणना नहीं की जाती रही है। अब इसी तरह की कुछ और बातों पर चर्चा कर लेना ठीक रहेगा। वास्तव में विज्ञान निरन्तर अन्वेषण करता रहता है। वैदिक जन भी कुछ प्रयास करते रहे होंगे परंतु तब विज्ञान आज की तरह सुव्यवस्थित नहीं था।
2. वेदों में पृथ्वी खड़ी है—
ऋग्वेद-2.12.2 में कहा गया है कि हे मनुष्यो, जिसने कांपती हुई पृथ्वी को स्थिर किया, वह इन्द्र है।
इसी तरह यजुर्वेद 32/6 में कहा गया है कि जिस देवता ने पृथ्वी को स्थिर किया;
और भी अनेक रूपों वाली विस्तृत और अचल भूमि की इन्द्र रक्षा करता है (अथर्ववेद-12.1.17)।
आज भी संस्कृत और हिन्दी के शब्दकोशों में पृथ्वी का एक नाम 'अचला' (स्थिर या गतिहीन) है। इन सब बातों से स्पष्ट हो रहा है कि उस समय के लोग पृथ्वी को गतिहीन मानते थे लेकिन आधुनिक विज्ञान से यह सिद्ध है कि पृथ्वी गतिशील है। पृथ्वी को गतिशील सिद्ध करने के लिए वेदों में विज्ञान खोज निकालने वालों ने ऋग्वेद के एक दूसरे मंत्र का सहारा लिया है जो निम्नलिखित है—
या गौर्वर्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः।
सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते॥ (ऋग्वेद-10.65.6)॥
वेदों से विज्ञान निकालने वालों ने इसका अर्थ किया है—
पृथ्वी निरंतर अन्नरस आदि से प्राणियों को पूर्ण करती हुई तथा अपने नियम का पालन करती, ईश्वरीय महिमा का उपदेश करती, दानी,श्रेष्ठजन और विद्वानों को सुख देती हुई, अपनी कक्षा में सूर्य के चारों और घूमती है।
सोचने की बात है कि मूल पाठ में ऐसा एक भी शब्द नहीं है जिसका अर्थ 'अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमती है' बनता हो।
दरअसल यह मंत्र पृथ्वी विषयक है ही नहीं। प्रस्तुत मंत्र में दूध देने और आहुतियों की सामग्री जुटाने वाली गाय है। अतः विद्वानों ने इस मंत्र का ठीक तौर पर अर्थ ऐसे किया है—
जो गाय स्वयं पवित्र स्थान यज्ञ में आती है, वह दूध देते हुए यज्ञ कर्म को सम्पन्न करती है। मेरी इच्छा है कि वह गाय दाता वरुण और अन्यान्य देवों को होमीय द्रव्य (दूध और घी आदि) दे और मुझ देवसेवक की रक्षा करे।
एक दूसरे मंत्र (यजुर्वेद-अ॰ 3 मं॰ 6) का भी इस काम के लिए सहारा लिया जाता है—
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन् मातरं पुरः। पितरञ्च प्रयन्त्स्वः॥
वेदों से विज्ञान निकालने वाले इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं—
यह पृथ्वी जल को प्राप्त होकर अर्थात् जल सहित अंतरिक्ष में आक्रमण करती है अर्थात् अपनी धूरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर घूमती है।
इस अर्थ की गलती कोई भी पकड़ सकता है। आक्रमण का अर्थ 'अपनी धूरी पर घूमती है' किसी तरह भी सिद्ध नहीं होता है। मंत्र में ऐसा कोई शब्द नहीं है जिसका अर्थ 'सूर्य के चारों ओर घूमती है' होता हो।
इस मंत्र का देवता अग्नि होने के कारण अग्नि की स्तुति की गई है जबकि विज्ञान निकालने वालों के अर्थ में अग्नि का नाम भूल से भी नहीं आया है। उबट और महीधर के भाष्य भी विज्ञान निकालने वालों की बात की पुष्टि नहीं करते। उक्त दोनों वेद-भाष्यकर्ताओं ने इस मंत्र का अर्थ इस प्रकार किया है—
इस यज्ञसिद्धि के अर्थ यजमान के घर आने-जाने वाले श्वेतरक्त आदि बहु प्रकार की ज्वालाओं से युक्त अग्नि ने सब ओर से आह्वनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि के स्थानों में अतिक्रमण किया। पूर्व दिशा में पृथ्वी को प्राप्त किया और सूर्य रूप होकर स्वर्ग में चलते अग्नि ने स्वर्ग लोक को प्राप्त किया।
3. वेदों में सूर्य का घूमना—
सूर्य प्रकाशमान है और सारे प्राणियों को जानता है। सूर्य के घोड़े उसे सारे संसार में दर्शन के लिए ऊपर ले जाते हैं (ऋ-1.50.1)। दीप्तिमान और सर्वप्रकाशक सूर्य, हरित नाम के सात घोड़े रथ में तुम्हें ले जाते हैं (ऋ-1/50/8)।
सूर्य ने रथवाहिका सात घोड़ियों को रथ में लगाया, उन घोड़ियों के द्वारा सूर्य गमन करता है (ऋ-1.50.9)।
सूर्य के कल्याणकारी हरि नाम के विचित्र घोड़े इस पथ से जाते हैं। वे सब के स्तुतिभाजन हैं। हम उन को नमस्कार करते हैं। वे आकाश के पृष्ठ देश में उपस्थित हुए हैं। वे घोड़े तुरंत ही आकाश और पृथ्वी के चारों ओर परिभ्रमण कर डालते हैं अर्थात् वे पृथ्वी के चारों ओर जल्दी ही चक्र लगा देते हैं (ऋ-1.115.3)।
जिस समय सूर्य अपने रथ से हरित नामक घोड़े को खोलता है, उस समय सारे संसार में रात्रि अंधकार फैला देती है (ऋ-1.115.4)।
सात अश्वों का अधिपति सूर्य हम लोगों के सम्मुख उपस्थित हो, क्योंकि उसे एक कठिन रास्ते से बहुत दूर जाना होगा। वह श्येन (बाज) पक्षी की तरह
शीघ्रगामी होकर हमारे द्वारा दी गई आहुति को लेने आता है (ऋ-5.45.9)।
पानी बरसाने वाले, देवों को आनंद देने वाले, दीप्तिमान और द्रुतगामी सूर्य के रथ ने पूर्व दिशा में प्रवेश किया। तत्पश्चात स्वर्ग के मध्य में निहित विभिन्न वर्ण और सर्वव्यापी सूर्य अंतरिक्ष के दोनों भागों की ओर बढ़ गया और जगत की रक्षा की (ऋ-5.47.3)।
सूर्य देव, जिस समय तुम वेगशाली घोड़े को रथ में जोतकर आकाश मार्ग से जाते हो, तब कोई भी जीव तुम्हारे पास नहीं आने पाता तुम्हारी प्राचीन ज्योति दूसरी है जो तुम्हारे साथ रहती है जब तुम जाते तो, तब तुम्हारी ज्योति भिन्न होती है (ऋ-10.37.3)।
उक्त वेद मंत्रों के अनुसार वे कभी सूर्य के घोड़ों की बात करते हैं, कभी रथ की कभी यह कहते हैं कि सूर्य के अस्त हो जाने पर सारे लोकों में (अर्थात् सारी दुनिया में) रात्रि हो जाती है और कभी यह कहते हैं कि सूर्य की पुरानी रोशनी भिन्न किस्म की है तथा जब वह शाम को अस्त होता है तब उसके पास और रोशनी होती है। कभी उसे सर्वव्यापी कहते हैं।
ये सारी बचकानी बातें इस बात की सूचक है कि वेदों में सूर्य के विषय में जरा भी वैज्ञानिक ज्ञान नहीं है। उन्होंने केवल अनर्गल कल्पनाएं ही की हैं।
4. सूर्य की आकर्षण शक्ति—
ऐसी वस्तुस्थिति होने पर भी वेदों में विज्ञान सिद्ध करने के दीवाने वेदों के ऐसे मंत्र पेश करते हैं जिनमें उनके मुताबिक न केवल सूर्य विषयक उसकी आकर्षण शक्ति विषयक भी ज्ञान है जो अद्यतन ज्ञान से पूरी तरह मेल खाता है। इस उद्देश्य से यजुर्वेद का यह मंत्र दिया जाता है—
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ (यजु-33.43)
इस मंत्र का अर्थ वेदों में विज्ञान निकालने वाले स्वामी दयानंद ने निम्न प्रकार किया है—
हे मनुष्यो, जो रमणीय स्वरूप से, आकर्षण से परस्पर संबद्ध लोकमात्र के साथ अपने भ्रमण की आवृत्ति करता हुआ सब लोकों को दिखाता हुआ प्रकाशमान सूर्यदेव जल व अविनाशी आकाशादि और मरणधर्मा प्राणी मात्र को अपने-अपने प्रदेश में स्थापित करता हुआ 'उदयास्त समय में आता-जाता है' सो ईश्वर का बनाया सूर्य लोक है।
इस मंत्र का अर्थ करते हुए यद्यपि स्वामी दयानंद ने 'आ कृष्णेन' का अर्थ 'आकर्षण' किया है तथापि शेष मंत्र का अर्थ करते हुए उन्होंने सूर्य के आने-जाने का स्पष्ट उल्लेख किया है, जो उनके वेदों को वैज्ञानिक सिद्ध करने का उपहास है। दूसरे, इस अर्थ के विषय में एक और उल्लेखनीय बात यह है कि स्वामी दयानंद ने प्राय: सब जगह सविता का अर्थ परमात्मा किया है और वेदों में किसी भी देवता का अस्तित्व नहीं स्वीकारा है लेकिन यहां सूर्य की आकर्षण शक्ति का वेदों में वर्णन दिखाने के उद्देश्य से उन्होंने यहां सविता का अर्थ न केवल सूर्य किया है बल्कि सूर्यदेव लिख दिया।
ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति ने इस मंत्र से आकर्षण शक्ति के साथ-साथ सूर्य का अपनी धुरी के गिर्द घूमना सिद्ध किया है, क्योंकि स्वामी दयानंद कृत अर्थ से सूर्य से आना-जाना सिद्ध होता था जो विज्ञान से एकदम विपरीत था। उक्त महाशय ने अर्थ किया है—
प्रकाश स्वरूप सूर्य आकर्षण के साथ लोक-लोकान्तरों को अपनी कक्षा में स्थिर करता हुआ और सब में किरण द्वारा प्रवेश करता हुआ, पृथ्व्यादि लोकों को प्रकाशित करता हुआ घूमता है लेकिन यहां अर्थ-परिवर्तन का प्रयास बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देता है। मूल में शब्द है—'याति' इसका अर्थ होता है—जाता है।इसका अर्थ 'धुरी पर घूमता है' कदापि नहीं बन सकता। 'कृष्ण' का अर्थ होता है काला, अंधकार, रात्रि। इसका मतलब आकर्षण नहीं हो सकता है परन्तु सूर्य के आकर्षण को सिद्ध करने के लिए जबरदस्ती आकर्षण अर्थ किया गया है। उबट और महीधर ने इसका अर्थ किया है—
सविता देवता अर्थात् सूर्य स्वर्णमय रथ पर सवार होकर अंधकारपूर्ण अंतरिक्ष के मार्ग में विचरण करने वाले देवताओं और प्राणियों को अपने-अपने कर्म में लगाते हुए संपूर्ण लोकों को देखता हुआ आता है।
5. चंद्रमा—
चंद्रमा के विषय में ऋग-1.105.1 में कहा गया है—
चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि। अर्थात् चंद्रमा जलमय अंतरिक्ष में दौड़ता है।
वेदों से विज्ञान निकालने वाले निम्नलिखित मंत्र प्रस्तुत करते हैं—
त्वं सोम पितृभि: संविदानोsनु द्यावापृथिवीsआ तंतथ।
तस्मै त इंदो हविषा विधेम वयं स्याम् पतयो रयीणाम्॥ (ऋ-8.48.13)
और कहते हैं कि इस मंत्र में यह बात है कि चंद्रलोक पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। कभी-कभी वह सूर्य और पृथ्वी के बीच में भी आ जाता है।
दरअसल, इस सूक्त के सारे मंत्र सोम नामक पौधे के गुणों का वर्णन करते हैं और इस मंत्र में भी सोम का जिक्र है—"हे सोम, तुम पितरों के साथ मिलकर द्यावा (पृथ्वी) को विस्तृत करते हो। सोम, हवि के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करेंगे। हम धनपति होंगे।"
यदि सोम का अर्थ चंद्रमा भी करें तब भी इसमें इस बात का सूक्ष्म संकेत तक नहीं है कि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है व कभी-कभी सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है।
6. ग्रहण—
वेदों में सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण का उल्लेख मिलता है। सूर्य ग्रहण के बारे में ऋग्वेद का कहना है कि सूर्य को स्वर्भानु नामक असुर आ दबोचता है और अत्रि व अत्रिपुत्र उसे उस असुर से मुक्त कराते हैं, तब ग्रहण समाप्त होता है (ऋग-5.40.5,5.40.9)।
इसी प्रकार चंद्रग्रहण करने वाला राहु असुर बताया गया है (अथर्ववेद-19..9.10)।
7. वेदों की मूल प्रति विदेशियों द्वारा चुराना—
ऐसे लोग भी हमारे यहां हैं जो यह कहते नहीं थकते कि वेदों की मूल प्रतियां विदेशी ले गये। वहां उन लोगों ने इसे पढ़कर विज्ञान में इतनी प्रगति कर ली है। यह बात सही नहीं है।
उज्बेकिस्तान निवासी एक फारसी विद्वान लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक अल-बयरुनी ‘अलबरुनी’ (973-1048) अपनी मातृभाषा फारसी के अलावा तीन और भाषाओं—सीरियाई, संस्कृत, यूनानीका ज्ञाता था। वह भारत और श्रीलंका की यात्रा पर 1017-20 के मध्य आया था। वह भारत पर कई बार आक्रमण करने वाले गजनी के महमूद के कई अभियानों में सुल्तान के साथ था। अलबरुनी को भारतीय इतिहास का पहला जानकार कहा जाता था। वह एक मशहूर गणितज्ञ, भूगोलवेत्ता, कवि, रसायन वैज्ञानिक और दार्शनिक भी था। उसने ही धरती की त्रिज्या नापने का एक आसान फामूर्ला पेश किया था। बरुनी ने यह भी साबित किया कि प्रकाश की गति (वेग) ध्वनि की गति (वेग) से अधिक होती है। अल-बिरुनी ने अरबी में लिखे अस्सी अध्यायों में विभाजित अपने एक महत्वपूर्ण ग्रंथ—'किताब-उल-हिन्द' में भारतीय धर्म, दर्शन, त्योहार, खगोल-विज्ञान, रीति-रिवाज, प्रथाओं, सामाजिक-जीवन, कानून आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की है।
इसका अर्थ है कि अलबरुनी के भारत आने (1017-20) से पहले हमारे शास्त्रों का ज्ञान पूर्णतया हम तक ही सीमित था और हम ही इन शास्त्रों के ज्ञाता, व्याख्यता व भाष्यकार थे। तब उक्त कालखड 1017-20 ई. से पहले भारतीयों ने वैज्ञानिक क्षेत्र में प्रगति क्यों नहीं की? यदि मान लिया जाए कि विदेशियों ने हमारे शास्त्रों से विज्ञान ग्रहण किया तो इन शास्त्रों का अध्ययन तो हमसे ही किया होगा। हमसे अध्ययन करके उन्होंने दो सदियों में इतना विज्ञान खोज निकाला और हम हजारों वर्षों में कुछ क्यों नहीं निकाल पाए? जैसा कि डॉ. वी. राघवन ने भी अपनी पुस्तक—'इंडोलाजिकल स्टडीज इन इंडिया' में लिखा है कि आधुनिक युग में विदेशियों द्वारा भारतीय साहित्य आदि के अध्ययन की शुरुआत विलियम जोन्स के द्वारा 1784 ई में की गई। तो उससे पहले यानी मुगलों के आने से भी पहले तक इतने विशाल भारत में वैदिक ज्ञान आधारित अनुसंधान कार्य उपेक्षित क्यों रहा?
अपने यहां ऐसे-ऐसे लोग रहे हैं जिनको वेद कंठस्थ थे और वे लिखित प्रतियों में हुई अशुद्धियां तक निकाल देते थे। ऐसे में यह कहना कि वेदों की मूल प्रतियां विदेशों में है, एकदम गलत है।
अतः यह कहा जा सकता है कि वेदों के जो अर्थ हजारों वर्षों से यहां के ऋषि, मुनि और विद्वान करते और लोगों को समझाते आए हैं, वही ठीक अर्थ है। आज उनमें विज्ञान का अस्तित्व जबरदस्ती ढूंढना और उनके अर्थ तोड़-मरोड़ कर पेश करना न केवल बौद्धिक बेईमानी है, बल्कि वेदों से ज्यादती करना भी है। आज वेदों से विज्ञान निकालने वालों की संख्या काफी है। सबकी बातों का विश्लेषण कर पाना आसान नहीं है। फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि वेदों में आधुनिक विज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। ■
(डॉ. गोरख प्रसाद की पुस्तक—'भारतीय ज्योतिष का इतिहास' पर आधारित)

बुधवार, 10 मई 2023

'हिंदू' : एक विवेचन

'हिंदू' : एक विवेचन
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भारत में फिरंग रोग (सिफलिस) लाने वाले अंग्रेज़ों को यहां घृणावश फिरंगी कहा जाने लगा, ठीक इसी तरह फारस की खाड़ी तथा मध्य एशिया से आने वाले आक्रान्ता सिंधु नदी के इस तरफ रहने वालों को 'हिंदू' कहते थे। चूंकि उनके पास 'स' को अभिव्यक्त करने वाला वर्ण था ही नहीं तो इसीलिए वे यहां के निवासियों को हिंदू तथा इस देश को हिंदुस्तान कहते थे। वे बड़ी हिकारत से हिंदू शब्द का प्रयोग काफिर, काला, रहजन (बटमार), चोर, लुटेरा, असभ्य, जंगली, पराजित लोग और गुलाम के अर्थ में प्रयोग करते थे। आगे चलकर हिंदू शब्द संकुचित अर्थ में एक धार्मिक संप्रदाय के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
जैसा कि ईस्वी सन 1030 में मोहम्मद गजनवी के साथ भारत आये फारसी इतिहासकार अल-बरूनी ने पहली बार हिंदू शब्द का लिखित रूप में प्रयोग करते हुए अनेक जगहों पर लिखा है—'तब देहाती हिन्दुओं के एक गिरोह नें हमें घेर लिया...।' या 'वे जंगली हिंदू शोर मचा कर हमारी ओर बढ़े। वे निर्वस्त्र और गंदे थे...' आदि।
अल-बरूनी से पहले वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भागवत, मनुस्मृति आदि कहीं भी हिन्दू शब्द का उल्लेख किसी भी ग्रंथ, बोली-भाषा अथवा लिखित दस्तावेज में नहीं मिलता‌ क्योंकि इनके रचनाकाल में कोई हिंदू था ही नहीं। उस दौर में कोई भारतीय व्यक्ति हिंदू के नाम से नहीं बल्कि जाति के नाम से पहचाना जाता था। देसी समाज में वर्ण व्यवस्था चालू थी और उस व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उसके नीचे सभी अधिकारों से वंचित शूद्र थे। जिसका कार्य उच्च वर्णों की सेवा करना था। अर्थात उनका दास था।
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12वीं सदी में भारत आये मुसलमानों की बोली और लिपि परशियन यानी फारसी थी। उन्होंने अपने विजित भारतीयों को हिंदू की संज्ञा दी तब से यह हिंदू शब्द प्रचलित हुआ। तब हिंदू शब्द धर्मवाचक न होकर समूहवाचक था। हिंदू शब्द, दो भिन्न-भिन्न शब्दों—हीन और दुन के योग से बना है। जिसमे हीन का मतलब है—तुच्छ, गंदा, नीच और दुन का मतलब—लोक, प्रजा, जनता आदि।
12वीं सदी के पहले हिंदू-शब्द किसी भी ग्रंथ, बोली-भाषा अथवा लिखित दस्तावेज में नहीं मिलता‌ क्योंकि यह शब्द वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, भागवत, ज्ञानेश्वरी, मनुस्मृति, दासबोध और अभंगवाणी आदि किसी में भी हिंदू धार्मिक ग्रंथों में नहीं है।
ईस्वी सन 1325 में मोहम्मद तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना। वह एक शिक्षित और योग्य व्यक्ति था। अरबी और फारसी भाषाओं के अलावा खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गणित, चिकित्सा विज्ञान एवं तर्कशास्त्र में पारंगत सुल्तान तुगलक विद्वानों का सम्मान करता था। उसके दरबार में मोरक्को निवासी एक प्रसिद्ध विद्वान इब्ने बतूता भी था। इब्ने बतूता के पिता और दादा मोरोक्को में काजी थे। मोहम्मद तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी यानी मुख्य न्यायाधीश बनाया।
इब्ने बतूता की अदालत में मुसलमानों के साथ शरीयत के अनुसार और भारतीयों को मनुस्मृति के आधार पर विभाजित ब्राह्मण को ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय को क्षत्रिय धर्म और वैश्य को वैश्य धर्म के नियमों के अनुसार न्याय मिलता था परन्तु शूद्रों में अनेक जातियां होने के कारण निर्णय लेना बहुत ज्यादा पेचीदा होता था। तब इस शूद्र समूह की विशिष्ट पहचान के लिए इब्ने बतूता ने इन्हें सरकारी रिकॉर्ड में हिंदू नाम से दर्ज किया। तभी से परंपरागत रूप से सरकारी दस्तावेजों में शूद्रों को 'हिंदू' लिखा जाने लगा।
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यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में जजिया कर लगाये जाने पर ब्राह्मणों ने वह कर देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि हम हिंदू नहीं, ब्राह्मण हैं; इसलिए हम जजिया नहीं देंगे। अपनी बात की पुष्टि के लिए ब्राह्मणों ने इब्ने बतूता की अदालत में हुए फैसलों की नजीरें दीं। इस तर्क से संतुष्ट होकर मुगल शासकों ने ब्राह्मणों को जजिया कर से मुक्त कर दिया था।
उस समय हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं था, ब्राह्मण धर्म था जिसमें शूद्र नीच थे। ब्राह्मण मुगलों के साथ मिल-जुल कर रहते और राजकाज में सहयोग करते थे। यहां तक कि कहीं-कहीं ब्राह्मण और क्षत्रिय उनके रिश्तेदार भी बन गए थे।
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गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं सदी में रामचरितमानस लिखी, उस समय मुगल शासनकाल था। उन्होंने रामचरितमानस में मुगलों की बुराई पर या कथित हिंदू धर्म की अच्छाई पर एक चौपाई भी नहीं लिखी क्योंकि उस समय हिंदू-मुसलमान का कोई झगड़ा ही नहीं था। तत्कालीन ब्राह्मणों ने उन्हें बहुत सताया और उनका बहिष्कार कर दिया तो वे एक मस्जिद में जाकर रहने लगे। इस पर उन्होंने लिखा है—
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रूचै सो कहै कछु ओऊ।
मांगि कै खैबो मसीत को सोइबो, लैबो को एकु न दैबो को दोऊ।
(कवितावलि)
18वीं शताब्दी का अंत आते-आते 'हिंदू' शब्द धार्मिक अर्थ के साथ प्रयुक्त किया जाने लगा था।
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एक गुजराती ब्राह्मण दयानंद सरस्वती ने सन 1875 में लिखित अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि 'हिंदू शब्द संस्कृत का नहीं है। यह मुसलमान शासकों द्वारा हमें दी हुई गाली है, इसलिए हमें अपने-आप को हिंदू नहीं कहना चाहिए। हम आर्य हैं और हमारा धर्म भी आर्य है। हमें अपने-आप को आर्य ही कहना चाहिए।' इसीलिए उन्होंने वैदिक शिक्षाओं पर आधारित 'आर्य समाज' की स्थापना की।
बीसवीं सदी के प्रारम्भ (1914 से नवंबर 1918) में प्रथम विश्व-युद्ध हुआ। उस युद्ध के शुरुआती दौर में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने ब्रिटेन की जनता से अपील की कि लोग उन्हें इस युद्ध में पूरा सहयोग दें। युद्ध में ब्रिटेन के जीतने पर वह जनता को सरकार चुनने के लिए वयस्क मताधिकार देंगे। इस अपील का असर ब्रिटिश उपनिवेश भारत के राजनेताओं पर भी होना ही था, खास तौर पर यहां के अल्पसंख्यक ब्राह्मणों पर। जिनमें बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार और बालकृष्ण शिवराम मुंजे शामिल थे।
उन्होंने इस अपील पर सोचना शुरू किया कि यदि ब्रिटेन युद्ध जीत गया तो वह अपने देश में जनता को वयस्क मताधिकार देगा। फिर देर-सबेर यह व्यवस्था भारत में भी लागू होगी। जिससे प्रतिनिधि सभाओं में बहुसंख्यक होने के कारण चुन कर यहां के शूद्र जायेंगे और अल्पसंख्यक होने की वजह से हम ब्राह्मण नहीं चुने जा सकेंगे। इस बात ने ब्राह्मण वर्ग की बेचैनी बढ़ा दी, खास तौर पर इस्रायली यहूदियों से हिंदू बने चितपावन ब्राह्मणों के एक वर्चस्ववादी गुट की क्योंकि उनकी सोच थी कि ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न ब्राह्मणों के सभी ग्रंथ शूद्रों के अधिकार छीनने, उनकी दासत्व की मानसिकता प्रगाढ़ करने और ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बताने के लिए लिखे गए हैं।
इस तरह जब इन हिंदू नेताओं की चिंता बढ़ने लगी तो इन्होंने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए इस बात पर खूब विचार मंथन कर एक रास्ता निकाला और तथाकथित हिंदुओं को संगठित करने के लिए 1915 में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में 'हिंदू महासभा' की स्थापना की गई, जिसका अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर और उपसभापति केशव बलराम हेडगेवार को बनाया गया।
उधर कांग्रेस में मोहनदास करमचंद गांधी का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था जो आजादी के संघर्ष में किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं के साथ-साथ दलितों, आदिवासियों तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की भरपूर भागीदारी का आह्वान किया करते थे।
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नवंबर 1918 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ और वादे के अनुसार 1918 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में वयस्क मताधिकार कानून पास हुआ। इस कानून की वजह से भारत में ब्राह्मण-धर्म खतरे में पड़ गया था। इसीलिए बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों के दृष्टिगत आजादी के संघर्ष को विभाजित कर उससे हिंदुओं को विलग करने के विचार से एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में हिंदू शब्द को 'हिंदुत्व' के रूप में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा 1923 में व्यक्त किया गया। और, इसी की अगली कड़ी के रूप में पूरे भारतीय समाज को नये-नवेले तथाकथित 'हिंदू-धर्म' और 'हिंदू-राष्ट्र' की अवधारणा के साथ सितंबर 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
जब इंग्लैंड में वयस्क मताधिकार का कानून लागू हुआ और उसे भारत में भी लागू करने की बात चल रही थी, तो इस पर बाल गंगाधर तिलक बोले, "ये तेली, तंबोली, कुनभट संसद में जाकर क्या हल चलाएंगे या तेली तेल निकालेंगे? संसद में जाने का अधिकार तो हम ब्राह्मणों का है। हम जाएंगे संसद में।" तब ब्राह्मणों ने अपने लिए पार्लियामेंट में चुनकर जाने का रास्ता साफ करने के लिए हिंदू-शब्द को 'हिंदू-धर्म' बनाया।
इस तरह वर्तमान तथाकथित 'हिंदू-धर्म' ही वस्तुत: ब्राह्मण-धर्म है हालांकि जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बतौर एक संस्कृति पारिभाषित कर दिया है।
शूद्रों के एक बड़े लड़ाकू वर्ग को इन्होंने पहले ही अछूत घोषित करके वर्ण-व्यवस्था से बाहर कर दिया और शूद्रों को कमजोर किया। जबकि जन-जाति के लोगों को विदेशी आर्य-ब्राह्मणों ने सिंधुघाटी सभ्यता के समय से ही जंगलों में जाकर रहने पर मजबूर कर दिया।
अब ब्राह्मणों ने सोच-समझकर हिंदू शब्द का वृहद स्तर पर इस्तेमाल "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" के आह्वान के साथ किया, जिससे सब हिंदुओं को समानता का भ्रम तो हो लेकिन, नेतृत्व ब्राह्मण के हाथों में ही बना रहे। इसी कारण 1950 से आज तक भारत का यह पिछड़ा समाज ब्राह्मणों के संगठन को हिंदू-हितैषी समझकर वोट देता रहा है। फलस्वरूप उन्हीं के वोट से ब्राह्मण बड़ी संख्या में चुनकर पार्लियामेंट में जा रहा है और आज न केवल देश की सत्ता में भागीदार बन गया है, बल्कि ऊंचे-ऊंचे पदों पर काबिज हो गया है।
इस तरह ब्राह्मणों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मण-धर्म को कायम रखा, भले ही नाम 'हिंदू-धर्म' कर दिया। इसमें जातीयता वैसी ही है जैसे पहले थी। यह जातियां ब्राह्मण-धर्म का प्राणतत्व हैं, जातियों के बिना ब्राह्मण का वर्चस्व खत्म हो जाएगा। ■

रविवार, 12 फ़रवरी 2023

अग्निपथ योजना न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है !

 अग्निपथ योजना न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है !

चौंकिए नहीं, सिलसिलेवार पढ़ते जाइए कि कैसे।

दरअसल, यह सेना के निजीकरण का ऐसा प्रयास है जिसकी परिणति शुद्ध रूप से एक व्यापारिक संस्था ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सेना के माध्यम से सम्पूर्ण भारत को अपने अधिकार में ले लेने के तौर पर हम इतिहास में पहले देख और उसके अत्याचारों को भोग चुके हैं। 

जहाँगीर ने ईस्वी सन 1618 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ किये गये एक व्यापारिक समझौते के तहत, कंपनी और ब्रिटेन के सभी व्यापारियों को इस उपमहाद्वीप के प्रत्येक बंदरगाह पर ख़रीदने तथा बेचने के लिए जगहों के इस्तेमाल की इजाजत दी थी।

आगे चलकर मुगलों ने अंग्रेजों को करों में छूट, निर्बाध आवागमन और स्वतंत्र व्यापार की आज्ञा दे दी। इसके साथ ही उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली क्योंकि भारत में मुक्त व्यापार की अनुमति मानो अंग्रेजों के लिए लूट मचाने का एक लिखित आदेश थी। इससे मुगलों की भारत में जड़ें कमजोर होती चली गईं और अंग्रेजों का वर्चस्व बढ़ता गया।

सन 1750 तक भारत में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ता गया तो उन्होंने मौके का फायदा उठाया और मुगल साम्राज्य के विरुद्ध क्षेत्रीय ताकतों को उभारते और फिर संधि करते हुए उन्हें अपने अधीन कर लिया। अंततः 1858 तक हिंदुस्तान में मुगल राजवंश की सत्ता हमेशा के लिए समाप्त हो गई और गोवा व कुछेक अन्य अपवादों के अलावा शेष भारत पर उनका आधिपत्य हो गया।

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अब इसी तरह वर्तमान समय में एक शहंशाह की तरह सत्ता का संचालन कर रहे नरेंद्र मोदी एक-एक कर सभी सरकारी कंपनियों को औने-पौने दामों में अपने मित्र अडाणी-अंबानी को सौंपते जा रहे हैं तो बहुत जल्दी देश के अधिकांश पीएसयू इन्हीं के हाथों बिक चुके होंगे। फिर तो स्वाभाविक रूप से अडाणी-अंबानी को भी अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ), तेल शोधक कारखानों, खदानों, रेलवे, हवाई अड्डों, बंदरगाहों आदि जैसे विशाल व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सैकड़ों हैक्टर में फैले हुए इनके परिसरों की सुरक्षा के लिए युवा और प्रशिक्षित लड़ाकों वाली निजी सेना रखने की आवश्यकता होगी ही। इसीलिए उन्हें प्रशिक्षित लड़ाके उपलब्ध कराने के लिए यह अग्निपथ योजना शुरू की जा रही है। इसके शुरुआती 5-6 वर्षों में रिटायर होने वाले अग्निवीर इनकी कंपनियों में खप जाएंगे। यही बात तो सत्ताधारी वर्ग खूब जोर-शोर से प्रचारित कर रहा है।

भारत में सरकार की सहमति से निजी क्षेत्र द्वारा अपनी सेना रखने का चलन इस दशक के खत्म होने से पहले आप अपनी आंखों से देखेंगे। जिन्हें हमारी सरकार आंतरिक सुरक्षा के ठेके देगी। इस योजना का ड्राफ्ट तैयार है। संभवतः यह सब जल्दी ही सामने आएगा क्योंकि तैयारी हो चुकी है और शुरुआत उत्तर प्रदेश से की जाने वाली है।

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निजी सेना यानी भाड़े के सैनिक (mercenary) रखना कोई नई बात नहीं है। विदेशों में यह बहुत पहले ही शुरू हो चुका है। पिछले अनेक दशकों से देखा जा रहा है कि दुनियाभर में कई जगहों पर युद्ध में भाड़े के सैनिकों का सहारा लिया गया है। अग्निवीर उसी का भारतीय संस्करण है। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका ने ऐसे ही भाड़े के सैनिकों का इस्तेमाल किया था। यूक्रेन के साथ अपने वर्तमान युद्ध में रूस ने वहां की एक निजी सैन्य कंपनी वैगनर के सैनिक यूक्रेन की राजधानी कीव में तैनात किये हैं।

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जरा पीछे मुड़कर देखिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में वहां 'अबकी बार ट्रंप सरकार' जैसे खुलेआम चलाये गये अभियान को अमेरिकी सरकार और जनता ने उनके आंतरिक चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप क्यों नहीं माना? जबकि इसके विपरीत पर्दे के पीछे से डोनाल्ड ट्रंप की मदद करने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के खिलाफ वहां हंगामा खड़ा हो गया था। 

इसका कारण दुनिया की सबसे धनाढ्य लॉबी अमेरिकी यहूदियों के साथ संघ के मधुर सम्बंध हैं, जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर लाने को उद्यत विश्व की दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियों वाले पूंजीपतियों का समूह है और भारत में मोदी उनका ही रास्ता साफ कर रहे हैं। जो एक तरह से न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है।

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अमेरिका की सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (CSIS) की वर्ष 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार शीत युद्ध के बाद विभिन्न देशों की सरकारों तथा गैर सरकारी संस्थानों में प्राइवेट सिक्यूरिटी कंपनी (Private Security Companies—पीएससी) और प्राइवेट मिलिट्री कंपनी (Private Military Companies—पीएमसी) की मांग में तेजी आई है। भाड़े के ये सैनिक प्रायः अंशकालिक यानी ‘फ्रीलांस सैनिक’ होते हैं जो सस्ते और अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम देते हैं। इनकी छोटी इकाई को किसी खास मिशन पर भेजा जा सकता है और इनकी जवाबदेही कम होती है।

निजी सैन्य कंपनी (Private Military Company—पीएमसी) राष्ट्रीय सरकारों, राज्य सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा निजी कंपनियों को सैन्य सेवाएं प्रदान करती है। ये कंपनियां निजीकृत सैन्य उद्योग का एक महत्वपूर्ण और गहन विवादास्पद तत्व हैं जो युद्ध और सुरक्षा बल प्रदान करने में माहिर होती हैं। इनका काम छोटे पैमाने पर प्रशिक्षण मिशन चलाने से लेकर टैंक और हमले के हेलीकॉप्टर सहित शक्तिशाली हथियार प्लेटफार्मों से लैस कई सौ उच्च प्रशिक्षित सैनिकों से बनी लड़ाकू इकाइयां प्रदान करना होता है। यहां तक कि इनका इस्तेमाल विदेशी सरकारों को गिराने में भी किया जाता है।

निजी सैन्य कंपनी के लड़ाकुओं को छोटे-छोटे मिशन या सीमित क्षेत्र में दायित्वों के निर्वहन के विपरीत नियमित सैनिकों की तरह बड़े स्तर पर युद्ध में झौंकने की शुरुआत अमेरिका द्वारा इराक के खिलाफ की गई थी। जिसमें एक पूर्व अमेरिकी नेवी सील एरिक प्रिंस द्वारा संचालित प्राइवेट सैन्य कंपनी ब्लैकवाटर के भाड़े के सैनिकों को तैनात किया गया था। हालांकि इसमें ज्यादातर रिटायर्ड अमेरिकी सैनिक थे। इन सैनिकों का काम युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना को हर संभव सहयोग देना था। इराक युद्ध के बाद एरिक प्रिंस प्राइवेट अमेरिकी मिलिट्री का पोस्टर ब्वॉय बन गया था।

UN की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा—
भाड़े पर सैनिक देने वाली अमेरिकी कंपनी ब्लैकवाटर के पूर्व प्रमुख एरिक ने तीन वर्ष पहले लीबिया में सरकार गिराने के लिए 600 करोड़ में सौदा किया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सहयोगी और ब्लैकवाटर कंपनी के पूर्व प्रमुख प्रिंस एरिक ने लीबिया में सरकार गिराने के लिए एक लीबियाई कमांडर को हथियार देने का प्रस्ताव दिया था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रिंस एरिक ने 2019 में लीबिया के एक सैन्य कमांडर को भाड़े के विदेशी सैनिक, अटैक एयरक्राफ्ट, गनबोट और साइबर युद्ध की क्षमता देने का करीब 600 करोड़ रुपए का सौदा किया था। इसमें चुनींदा लीबियाई कमांडरों पर नजर रखने और उनको मारने की योजना थी। ताकि लीबिया की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को गिराया जा सके।

इराक युद्ध के दौरान ब्लैकवाटर के सैनिकों के पास नियमित सेना को युद्ध में दिये जाने वाले पॉल स्लॉग, इवेन लिबर्टी, डस्टिन हर्ड व निकोलस स्लॉटर मशीनगन, ग्रेनेड लॉन्चर जैसे हथियार और स्नाइपर से लैस एक बख्तरबंद काफिला तथा वे सारी सुविधाएं और आर्टलरी थी जिनका सेना इस्तेमाल करती है। 

इस काफिले ने इराक की राजधानी बगदाद में निसौर चौर पर निहत्थे और निर्दोष लोगों पर गोलियां बरसाईं थीं। इस घटना में दो बच्चों समेत 17 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना पर बहुत हल्ला मचा और मामले की जांच की गई। जांच में यूएस फेडरल कोर्ट ने 2014 में ब्लैक वाटर कंपनी के 4 गार्ड्स को दोषी पाया और चारों को 30-30 साल की सजा सुनाई गई थी लेकिन दिसंबर 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन सभी को माफी दे दी।

अमेरिकी कोर्ट द्वारा ब्लैकवाटर पर प्रतिबंध लगाने के बाद कंपनी ने अपना नाम बदल कर एक्सई सर्विस रख लिया और आज भी यह प्राइवेट सेना अपनी सर्विसेस दे रही है।

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दरअसल, 'वन रैंक वन पैंशन' योजना के नाम पर सत्ता में आई मोदी सरकार की 'नो रैंक नो पैंशन' वाली अग्निपथ योजना भी इसी कॉन्सेप्ट पर आधारित है और एक तरह से न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का हिस्सा है। ■


मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...