गुरुवार, 28 जुलाई 2022

सावधान! कहीं भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं हम?

सावधान! कहीं भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं हम? 

महाभारत युद्ध के विभिन्न कारण गिनाए जा सकते हैं लेकिन उसका वास्तविक बीजारोपण चार पीढ़ी पहले तभी हो गया था, जब महाराज शांतनु को घर में पुत्रवधू लानी चाहिए थी लेकिन उस आयु में वे पुत्र की वंशवृद्धि में रुकावट बनकर खुद की दूल्हन ले आये। तो परिणाम विनाशकारी महायुद्ध के रूप में सामने आया।

अफ्रीका में 07 जून, 1893 को गांधी जी को ट्रेन से उतारे जाने की घटना ने कालांतर में ऐसे व्यापक बदलावों की नींव रखी कि भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में लोकतंत्र की बयार बहने लगी। 

मुहम्मद अली जिन्ना के मछली व्यवसायी हिंदू पितामह प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर पर उनके शाकाहारी सजातीयों द्वारा दबाव डालकर धंधा बंद कराने के बावजूद भी उनका बहिष्कार कर दिया गया तो वे पाला बदल कर मुसलमान बन गए और आगे चलकर उनका पोता भारत के विभाजन का कारण बना।

बोस्निया-हर्जेगोविना के ऑस्ट्रो-हंगेरियन प्रांत की यात्रा के दौरान 28 जून, 1914 को आर्क ड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या का दुष्परिणाम प्रथम विश्व युद्ध के महाविनाश के रूप में दुनिया को भोगना ही नहीं पड़ा बल्कि उसने विश्व-व्यवस्था की नई परिपाटी को जन्म दिया।

जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम के कारण ही परमाणु बम बनाने की तकनीक का आविष्कार अमेरिका भाग गए जर्मन यहूदियों द्वारा ही हुआ। 

भारत में कारतूसों में पशुओं की चर्बी होने की अफवाह से सैनिकों में भड़के आक्रोश ने यहां ब्रिटिश राज की चूलें ऐसी हिला दीं कि अंततः उन्हें यह देश छोड़कर स्वदेश लौट जाना पड़ा।

★★★

ये चंद उदाहरण अंग्रेजी की एक थ्योरी 'बटरफ्लाइ इफेक्ट' को रेखांकित करते हैं। इसका मतलब है कि पृथ्वी के किसी एक हिस्से में किसी तितली के हफ्तों पहले पंख फड़फड़ाने से किसी दूसरे हिस्से में तूफान आ सकता है। हालांकि यह एक दार्शनिक विचार है लेकिन वास्तविकता में इसका अर्थ होता है कि अतीत में हुए किसी नगण्य से कार्य/घटना का परिणाम आगे चलकर बड़े बदलाव के रूप में सामने आता है। इसे गणित में 'केऑस थ्योरी' कहा जाता है। 

भारतीय दर्शन में जिस कर्मफल सिद्धांत का वर्णन है उसके अनुसार मनुष्य द्वारा किये जाने वाले सभी कर्मों को परिणाम की दृष्टि से तीन वर्गों में बांटा जा सकता है। एक, ऐसे कर्म जो तत्काल नतीजा देते हैं; दूसरा, जिनका प्रतिफल एक लगभग निश्चित समय-सीमा में प्राप्त होता है और तीसरी श्रेणी में ऐसे कर्म आते हैं जिनका परिणाम मिलने की समय-सीमा, मात्रा, माध्यम और स्वरूप का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। 

यदि न्यूटन का गति का तीसरा नियम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सच है तो फिर मनुष्य का कोई भी कर्म निष्फल नहीं हो सकता है। प्रकृति उसके अनुरूप सूक्ष्म अथवा व्यापक प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करती है; मनुष्य चाहे उसे समझ सके या नहीं।

बहरहाल, आज देश में बहुसंख्यकवाद की जो आंधी चल रही है, उसमें इतिहास के झूठ-सच को आधार बनाकर अल्पसंख्यक मुसलमानों से बदला लेने की कोशिश में लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी अपनी महती भूमिका निभा रहा है।

यहां पर सोचने की जरूरत है कि क्या पीढ़ियों पुराने अच्छे-बुरे का हिसाब वर्तमान के साथ किया जा सकता है? यदि हां, तो फिर तो दुनिया के अनेक देशों के नक्शे ही बदलने पड़ेंगे। और, यह भी समझना होगा कि हम कालचक्र को पीछे की ओर धकेलते हुए कितनी लंबी दूरी तय करेंगे। आखीरकार सीमारेखा कहीं तो खींचनी होगी या फिर पौराणिक कथाओं को ही इतिहास मानकर पूर्व पाषाण काल और उससे भी पहले आदिम युग तक में हुई 'गलतियों/भूलों' को सुधारते जायेंगे?

बहरहाल, आज देश में पूरी तैयारी और ताकत के साथ झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर जैसा वातावरण बनाया जा रहा है, वह एक व्यापक परिवर्तन का ऐसा बीजारोपण हो सकता है जो निकट भविष्य में 'बटरफ्लाइ इफेक्ट' का एक और उदाहरण बने।

सोचिए, और इत्मीनान से सोचिये कि कहीं हम भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं? साथ ही यह भी याद रखना होगा कि समय न तो किसी का इंतजार करता है और न ही किसी को माफ करता है। अलबत्ता हर पीढ़ी के अच्छे-बुरे कर्मों का प्रतिफल आने वाली पीढ़ियों को जरूर मिलता है, कम से कम यह तो इतिहास बताता ही है। तो क्या हम इतिहास से कुछ सीखने और सकारात्मक कार्य करने की कोशिश करेंगे? ■


सोमवार, 25 जुलाई 2022

इस डरावनी आस्था से सावधान

 इस डरावनी आस्था से सावधान
—प्रियदर्शन

विजयदान देथा की एक कहानी है— 'रिजक की मर्यादा'। कहानी में एक भांड है जो तरह-तरह के रूप धर सकता है। वह एक सेठ के यहां साधु बन कर पहुंचता है। सेठ सपरिवार उसका भक्त हो जाता है। अगले कुछ महीनों में यह भक्ति इतनी बढ़ जाती है कि सेठ अपनी सारी संपत्ति साधु बने भांड को दान कर देता है लेकिन इसके साथ ही भांड अपने असली रूप में आ जाता है और कहता है, "मैं कोई साधु नहीं हूं।"
सेठ सिर पीट लेता है और पूछता है कि जब तुझे इतनी दौलत मिल गई थी तो तूने फिर साधु वेश छोड़ा क्यों। भांड का जवाब है, "यह रिजक की मर्यादा है।"
रिजक यानी रिज़्क।
कहानी में आगे यही भांड रानी के कहने पर नया रूप धर कर उसके अत्याचारी भाई को मार डालता है और अंत में ख़ुद मारा जाता है। उसने जान देकर अपने रिज़्क की लाज रख ली। आस्था यह होती है। उसके लिए जान लेने से ज़्यादा ज़रूरी जान देना होता है।
टीएस इलियट के ‘मर्डर इन द कैथेड्रल’ में कैंटरबरी के आर्क बिशप थॉमस बेकेट इस आस्था के लिए जान दे देते हैं। यह चीज़ उनके लिए इतनी बड़ी है कि वे हर प्रलोभन को ठुकरा देते हैं, यहां तक कि शहीद कहलाए जाने का प्रलोभन भी।
फ़िल्म 'मुगले आज़म' की शूटिंग के दौरान अकबर की भूमिका कर रहे पृथ्वीराज कपूर तपती रेत में चल कर अजमेर में ख़्वाजा चिश्ती की दरगाह तक गए थे। हालांकि फिल्म के निर्देशक के. आसिफ़ का कहना था कि वे त्वचा के रंग वाले मोजे पहन सकते हैं लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने कहा कि जब अकबर यहां आया होगा तो क्या वह जूते पहन कर सलीम चिश्ती की दरगाह तक गया होगा?
आस्था असल में यह होती है। उसका वास्ता धार्मिक आडंबरों से या कर्मकांडों से नहीं होता। वह अपने भीतर से पैदा होती है। वह किसी ईश्वर के प्रति, किसी इंसान के प्रति, किसी कर्म के प्रति हो सकती है।
गुरदयाल सिंह का उपन्यास है—'परसा।' परसा अपने खेतों में काम करता हुआ सबद और कीर्तन गाता रहता है। वह बहुत आस्थावान सिख है लेकिन वह कर्मकांडों में नहीं फंसता। हालांकि जब उसके बेटे अपने केश कटवा लेते हैं तो वह दुखी होता है; इस बात से नहीं कि उन्होंने केश कटवाए, बल्कि इस बात से कि उन्होंने यह काम बिना सोचे-विचारे किया।
ग्राहम ग्रीन का एक उपन्यास है—हार्ट ऑफ़ द मैटर। उपन्यास का नायक स्कोबी बहुत ईमानदार और सच्चा ईसाई है लेकिन अंत में खुदकुशी करता है जो ईसाइयत में बहुत बड़ा अपराध है। उसकी पत्नी चर्च के फादर से कहती है कि चर्च तो स्कोबी को जानता था। फ़ादर रेक्स कहते हैं, "हां, चर्च सबकुछ जानता है, लेकिन यह नहीं जानता कि एक अकेले हृदय के भीतर क्या कुछ चल रहा होता है।"
ये सारी कहानियां हैं; आज की नहीं, बीते ज़मानों की। इंसान के विवेक से निकली हुई, उसकी संवेदना से छन कर आई हुई। ऐसी कहानियां और भी हैं। ये सारी कहानियां आस्था के सवाल से जूझती हैं। अनास्था का भी सामना करती हैं।
आल्बेयर कामू का उपन्यास 'आउट साइडर' दूसरे विश्वयुद्ध के बाद एक गहरी अनास्था से गुज़र रहे यूरोपीय मानस के बीच से निकला है। उपन्यास के आख़िरी हिस्सों में मृत्यु दंड पाया नायक अपने पास आए पादरी को जम कर फटकारता है और कहता है कि उसे कोई नकली शांति नहीं चाहिए।
महाभारत के अठारहवें दिन से लेकर कृष्ण की मृत्यु तक के काल की कथा कहती धर्मवीर भारती की काव्य कृति 'अंधा युग' में कृष्ण को वंचक बताती गांधारी के लिए विदुर कहते हैं, "यह कटु निराशा की उद्धत अनास्था है। क्षमा करो प्रभु! यह कटु अनास्था भी अपने चरणों में स्वीकार करो! आस्था तुम लेते हो, लेगा अनास्था कौन?"
आस्था और अनास्था के सदियों से चले आ रहे द्वंद्व के बीच सभ्यता, संस्कृति और साहित्य का असली मक़सद इंसान और इंसानियत की तलाश रहा है। इस तलाश में आस्था की छेनी से ईश्वर बार-बार गढ़े और तोड़े गए हैं, धर्म बार-बार परिभाषित और पुनर्परिभाषित किए गए हैं और बार-बार यह प्रमाणित हुआ है कि अंततः यह संवेदना और विवेक है जिसके साझे से मनुष्यता का रसायन बनता है।
लेकिन आज के हिंदुस्तान में ये सारी कहानियां भुला दी गई हैं। एक डरावनी आस्था जैसे अट्टहास करती ख़ून बहाती घूम रही है। कहीं गो-तस्करी के नाम पर, कहीं मोहम्मद साहब के अपमान के प्रतिशोध के लिए, कहीं बस अपनी पहचान न बताने के जुर्म में और कहीं बस पहचान खुल जाने के अपराध में कोई भी सिरफिरा किसी का भी गला काट सकता है, पीट-पीट कर उसकी हत्या कर सकता है।
इसके बाद का अनुष्ठान मीडिया और नेताओं के हिस्से आता है। टीवी चैनलों पर चल रही खोखली और सरोकारविहीन बहसें बस देश का तापमान बढ़ाने के काम आती हैं। रही-सही कसर वह राजनीति पूरा कर देती है जिसे सांप्रदायिक नफ़रत का यह खेल रास आता है।
इस बर्बर हिंदुस्तान को न मोहम्मद साहब की कथाएं मालूम हैं और न भारत में देवी-देवताओं के वे सैकड़ों रूप, जो बरसों नहीं, सदियों की कल्पना के सांचे में ढले हैं।
मसलन, मोहम्मद साहब की यह कहानी काफ़ी दिलचस्प है—
‘एक रोज उनके तमाम अहम साथियों में से एक साथी मुआज को उन्होंने यमन का सूबेदार बनाकर भेजा। यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी, तो उन्होंने मुआज से जानना चाहा कि जब तुम यमन जाओगे तो तुम्हारा काम करने का तरीका क्या होगा? वह कौन सी बात होगी, जिसकी रोशनी में तुम वहां के लोगों के साथ इंसाफ़ कर सकोगे?
मुआज ने हजरत साहब को बताया कि वह लोगों की समस्याओं का समाधान कुरआन की शिक्षाओं के आधार पर करेंगे।
हजरत मोहम्मद ने पूछा कि अगर कुरआन की शिक्षाओं के साथ वहां की समस्याओं का तालमेल नहीं बैठा, तब क्या करोगे?
तब मुआज ने कहा कि तब अपने पैगंबर की मिसाल सामने रखकर उन समस्याओं का हल निकाला जाएगा।
हजरत मोहम्मद ने फिर पूछा कि अगर वह भी उनके साथ ठीक नहीं बैठी, तब क्या करोगे? मुआज ने जवाब दिया कि तब अपनी अक्ल और इंसाफ को आगे रखकर काम किया जाएगा।
फिर हजरत मोहम्मद मुस्कुराए और बोले कि यही सबसे अच्छा रास्ता है। अपनी अक्ल का इस्तेमाल हर रास्ते से बेहतर है। हर बात दूसरे के कहने की ही बेहतर नहीं मान लेनी चाहिए, अपनी अक्ल का इस्तेमाल करके बड़े काम अंजाम दिए जा सकते हैं। (सुनन अबी दाऊद 3592)
मुश्किल ये है कि हजरत मोहम्मद के अनुयायी ही यह कहानी भूल गए हैं। उनको लगता है कि मोहम्मद साहब पर की जाने वाली छींटाकशी वाकई उनके गिरेबान तक पहुंच जाएगी। उनको वे कहानियां भी याद नहीं हैं जब कोई चिड़चिड़ी औरत उनके ऊपर सब्ज़ियों के छिलके फेंका करती थी या कोई और किसी अन्य तरह की गुस्ताख़ी करता था जिन्हें वे न सिर्फ़ माफ़ करते थे, बल्कि उनका हालचाल लेने भी पहुंच जाते थे।
मुसलमान अगर मोहम्मद साहब की तालीम भूल गए हैं तो हिंदू तो अपने सारे देवी-देवताओं को बस मूर्तियों तक महदूद मान बैठे हैं।
इस हिंदुस्तान में तो जितने देवी-देवता हैं, उनसे ज़्यादा उनके रूप और नाम हैं। हर देवी-देवता के साथ तरह-तरह की कहानियां जुड़ी हुई हैं जिनमें कभी उनकी दुर्बलता भी दिखती है और कभी उनकी शक्ति भी। एक पूरी की पूरी दुनिया हमने देवताओं की बसाई हुई है जिसमें किसी की तपस्या से इंद्र का आसन डोलने लगता है और किसी की तपस्या से शिव इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि उसे भस्मासुर बना देते हैं। शंकर रावण को वरदान देते हैं और संहार मचाती काली को रोकने के लिए शिव उनके सामने लेट जाते हैं।
भारत में देवी-देवताओं की यह विहंगम अनूठी दुनिया शायद सदियों में बनी होगी; तरह-तरह की कहानियों, कविताओं, क़िस्सों, कथाओं, पुराणों-उपनिषदों में लिपटी हुई। लगभग हर कहानी यही बताती है कि अतिरेक भक्ति का हो, आस्था का हो, वरदान का हो, भगवान का हो, अंततः ख़तरनाक और आत्मघाती होता है। फिर इस अतिरेक से मुक्ति के लिए देवताओं को धरती पर उतरना पड़ता है।
लेकिन हम जैसे अतिरेकों के आसमान में जी रहे हैं। अपनी धार्मिक पहचान की बहुत सारी परतों को हम खुद नष्ट करने पर तुले हैं। हमें बस एक राम कथा चाहिए; एक हज़ार रामायणें नहीं जो हमारी दुनिया को अलग-सी विविधता और उदारता प्रदान करती हैं। शिव, विष्णु, काली, दुर्गा, पार्वती, सरस्वती, ब्रह्मा; हम इन सबकी पूजा करते हैं, लेकिन जो इन देवी-देवताओं ने बताया, वह जानने-समझने को तैयार नहीं होते। हमारे पास होती हैं तो बस विध्वंस की कहानियां, निर्माण के नाम पर हम भव्यता की अतिरिक्त भूख के मारे यह भी नहीं देखते कि जो मूर्तिशिल्प है, जो वास्तुशिल्प है, उसमें कितने धर्मों, कितनी सभ्यताओं का पानी मिला हुआ है।
कृपया यह न समझें कि यह लेख धर्म के पवित्र मूल्यों की याद दिलाने के लिए लिखा जा रहा है या फिर ईश्वर के उस उदार रूप की कल्पना के लिए लिखा जा रहा है जिसे हम खो चुके हैं। इस टिप्पणी का मक़सद बस यह याद दिलाना है कि सभी मत-सम्प्रदाय अपने सांगठनिक स्वरूप में राजनीति के अनुगामी हैं और अपने सत्ता-विमर्श में इनकी भूमिका बढ़ती जा रही है। इनका इस्तेमाल एक-दूसरे को लड़ाने, उनको पराया साबित करने के लिए हो रहा है। देवता बस संहार के रह गए हैं, सृजन के नहीं।
दरअसल जिसे हम धर्म कहते हैं, वह एक अर्थ में अवधारणा भर है। राम और कृष्ण, शिव और काली के प्रति हमारी जो आस्था है, वह उनकी रचनात्मक स्मृति से है, इस विश्वास से है कि वे हमारी रक्षा करेंगे। इस विश्वास को ठीक से समझ न पाने का नतीजा है कि मत व सम्प्रदायवाद राजनीति से कहीं ज़्यादा निरंकुश हो चुका है और वह देवताओं को पत्थर की मूर्तियों की तरह, अपने अहंकार और अधिकार के प्रतीकों की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
अगर हम में धर्म के प्रति सच्ची आस्था होती तो वह आस्था हर क़दम पर ठोकर न खाती, हमारी धार्मिक भावना जगह-जगह आहत न होती, लेकिन वह धार्मिक भावना नहीं है, आस्था नहीं है, बस आस्था का दिखावा है इसलिए वह अवसर देखकर प्रगट होती है।
यह खतरनाक अवस्था है। ज़्यादा बुरा यह है कि इस आस्था को कई स्तरों पर बढ़ावा मिल रहा है, इसे उकसाया जा रहा है जैसे वही इकलौती आस्था हो और भारत उसके विशेषाधिकार का क्षेत्र हो। जबकि भारत अपनी सांस्कृतिक बहुलता, भाषिक विविधता, सैकड़ों देवी-देवताओं, हज़ारों आस्थाओं, इससे भी ज़्यादा पूजा पद्धतियों, तरह-तरह के अजीब रीति-रिवाजों के बीच बनता है। वह रोज़ एक-दूसरे को देखता और जानता है कि सबको साथ जीना है। साथ जीने का यह भरोसा अगर कम पड़ा तो हिंदुस्तान कुछ फीका हो जाएगा, भारत माता के कुछ बेटे पराये माने जाएंगे तो वह कुछ उदास हो जाएगी। दुर्भाग्य से यह समझ उनको नहीं है जो भारत माता का सबसे ज़्यादा नाम लेते हैं। ■

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

वक्त की हर शै गुलाम!

वक्त की हर शै गुलाम!


सिग्मंड फ्रायड 

विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड ने मानव मस्तिष्क के कई गहरे राज़ उज़ागर किये और उनके मनोविश्लेषण के आधार पर मानव के मन-मस्तिष्क सम्बंधी असंख्य अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने में मदद मिलती रही है।

फ्रायड की तरह ही प्रतिभाशाली उनका एक भांजा एडवर्ड लुइस बर्नेस (Edward Louis Bernays) भी था। जिसे 'लाइफ' पत्रिका द्वारा 20वीं सदी के सौ सबसे प्रभावशाली अमेरिकियों में से एक नामित किया गया था। उसने मामा फ्रायड के मूल मनोवैज्ञानिक सिद्धांत—'व्यक्ति अपने अवचेतन में तर्कहीन शक्तियों द्वारा प्रभावित रहता है' को जनसंपर्क, विज्ञापन तथा मार्केटिंग का गुरुमंत्र बनाकर दुनिया को पब्लिक रिलेशन यानी पीआर का ऐसा विचार दिया जो वर्तमान समय की कॉरपोरेट व्यावसायिक विज्ञापन तथा चुनावी रणनीति का प्रमुख हिस्सा बन गया है।


एडवर्ड लुइस बर्नेस


एडवर्ड लुइस बर्नेस ने क्रिस्टलाइजिंग पब्लिक ओपिनियन (1923) तथा प्रोपेगैंडा (1928) जैसी किताबें लिखकर तहलका मचा दिया था। इसके बाद उसकी पब्लिक रिलेशन्स (1945) और द इंजीनियरिंग ऑफ कंसेंट (1955) भी अच्छी-खासी लोकप्रिय हुईं।

उसने कहा था, "यदि हम भीड़ के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और उद्देश्य को समझ लें तो उस भीड़ से उसके जाने बिना बड़ी आसानी से अपने हिसाब से काम करवा सकते हैं।" 
(प्रोपेगैंडा—1928)

बर्नेस का कहना था, "लोकतंत्र में भीड़ के सामूहिक चैतन्य और तार्किकता की आदतों और राय को जोड़तोड़ कर जो इसे फ़ेरबदल कर दे, वह आसानी से उस भीड़ पर या उस देश पर राज कर सकता है।"

उसके अनुसार 'हमारी रुचियां, हमारा स्वाद, हमारे विचार, हमारी सोच सब कुछ बहुत कम लोगों द्वारा नियंत्रित होता है, जिन्हें हम जानते भी नहीं। ये ही वे लोग हैं जो भीड़ की लगाम अपने हाथ में रखते हैं।' 

वह जनता को तर्कहीन झुंड बताता था। इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य की बारीकियां अपनाते हुए आज पीआर एजेंसियों के माध्यम से विज्ञापन चलाकर जहां कॉरपोरेट जगत द्वारा बाजार पर तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता पर कब्जा किया जाता है क्योंकि जिस प्रोडक्ट या विचार को लोगों के अवचेतन में घुसाना हो, उसे बर्नेस के सिद्धांत की मदद से बड़ी आसानी से घुसाया जा सकता है।

इसी फॉर्मूले को अपना कर अमेरिकी पीआर कंपनी एप्को (APCO) वर्ल्डवाइड ने दुनियाभर में अनेक हथियार सौदागरों, तानाशाहों की छवि चमकदार बनाकर उनकी मदद की। यही वह अमेरिकी एजेंसी थी जिसे स्वघोषित हिंदू राष्ट्रवादी ने 2006 में खुद को भारत का सर्वेसर्वा बनाने के लिए 11 हजार करोड़ रुपए का ठेका दिया था और जो आज इस भीड़ के मस्तिष्क पर पूरी तरह नियंत्रण कर चुका है। तभी तो जब कहा गया कि '70 साल में कुछ भी नहीं किया गया' तो जैविक रोबोट्स बन चुकी भीड़ ने चिल्लाते हुए दोनों हाथ उठाकर समर्थन किया।

बर्नेस के अनुसार भेड़ों के झुंड में तब्दील हो गई इस भीड़ ने खुद विचार करना छोड़ दिया है। इसीलिए उसे अपने हानि-लाभ का हिसाब लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं होती। न ही उसे ऐसी स्थिति में कोई फर्क पड़ता है। वह अवचेतन तर्कहीन विश्वास (Unconscious Irrational Belief—UIB) वाली मानव कमज़ोरी द्वारा नियंत्रित हैं। भेड़ों के इस रेहड़ का गड़रिया चाहे तो उनके घर बिकवा दे, उन्हें सड़क पर नंगा दौड़ा दे, उन्हें भूखा-प्यासा मार दे, वे फ़िर भी मंत्रमुग्ध ही रहेंगे।

दुनिया ऐसी स्थिति को हिटलर के जर्मनी में देख चुकी है जहां प्रोफेसरों, वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने आंखें और दिमाग की खिड़कियां बंद कर नाज़ियों की मानवता विरोधी नीतियों, कार्यक्रमों तथा आदेशों का सोचे-समझे बिना ही समर्थन और पालन किया। 

उन्होंने इंसानों को भेड़ और जॉम्बी की मिश्रित नस्ल में परिवर्तित कर दिया था। तभी तो वहां होलोकास्ट जैसे राक्षसी कुकर्म किए जा सके। 

आज कमोवेश भारत में भी वैसी ही स्थिति बना दी गई है। आज यहां भी भेड़ों का अपने गड़रिये के पीछे आँख बंद कर चलना और मालिक के खिलाफ कुछ कहने वाले को मारने दौड़ना आम बात हो गई है।

यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है जिसमें अभी भी इनके समक्ष दूर-दूर तक कोई नहीं है। इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में इन्हें हरा पाना बहुत कठिन लग रहा है लेकिन चूंकि समय किसी का भी एक जैसा नहीं रहता तो नाज़ियों के इन मानसपुत्रों की भी वैसी ही दशा होना असम्भव नहीं है। समय का इंतजार करना होगा जब भारत में भी न्यूरेमबर्ग जैसा ट्रायल शुरू किया जायेगा। 

वक्त किसी का भी गुलाम नहीं होता, यह मूर्ख भेड़ नहीं समझतीं क्योंकि उन्हें उस पीड़ा के दौर से गुज़र कर अपने कुकर्मों का प्रायश्चित करना पड़ता है जो उन्होंने खुद चुना है। ■


मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...