शनिवार, 2 दिसंबर 2023

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव 


वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया। उसके 1,30,000 वर्ष तक वह अन्य पशुओं की तरह जीवनयापन करता रहा। फिर इस दीर्घ कालखंड के आखिरी वर्षों यानी अब से करीब 70,000 साल पहले उसमें चीजों और घटनाओं को गहराई से सोचने तथा भविष्य के लिए योजनाएं बनाने की क्षमता व कलाएं विकसित हुईं। जिससे मिस्र, मेसोपोटामिया (3000 से 600 ई. पू.), सिंधु घाटी (3,000-1900 ईपू), मध्य अमेरिका में माया व एजटेक दक्षिण में इंका (2600-1500 ईपू), बेबीलोन (2,500 ईपू.), फारस (550 से 330 ईपू.), आर्मीनियाई, चीनी आदि विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों का विकास हुआ।

बौद्धिक विकास के बाद मनुष्य के भीतर दार्शनिक विचारों का सिलसिला चालू हुआ तो उसने बाहर-भीतर दोनों ही के रहस्यों को जानने का प्रयास किया। इसी क्रम में वैदिक धर्म का विकास हुआ। इसकी उत्पत्ति पूर्वकालीन आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. मध्य एशिया से हिमालय तक फैले हुए थे, इसमें भी वैज्ञानिकों में मतभेद हैं। 

प्रारंभिक वैदिक काल (4500–1100 ईपू.) माना जाता है, लेकिन संभवतः इसकी जड़ें मध्य एशियाई ऐंड्रोनोवो संस्कृति (20,000-9000 ईपू.), सिंधु घाटी की सभ्यता (2600-1900 ईपू.) और उसके बाद सिंतश्ता संस्कृति (2200-1800 ई.पू.) में भी हैं।

कहते हैं कि आर्यों की ही एक शाखा ने अविस्तक धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमशः यहूदी मत (2000 ई.पू), जैन मत (600 ईपू), बौद्ध मत (500 ईपू), ईसाई मत सिर्फ 2000 वर्ष पहले और इस्लाम तो आज से केवल 1400 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ।

इस तरह मोटे तौर पर मनुष्य की इतनी सुदीर्घ जीवन-यात्रा के बाद दार्शनिक विचारों का उद्भव करीब 7,000 वर्ष पहले हुआ। 


बोधिसत्व ही विष्णु और शिव!



जहां तक सनातन से हिंदुत्व में बदल गई संस्कृति और विचारधारा का प्रश्न है इसका वर्तमान स्वरूप बौद्ध मत का ही आधुनिकीकरण है। इसमें अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के दो रूप बन गए हैं। जो शताब्दियों बाद लोक में विष्णु और शिव के रूप में पूजित हो गये। इन्हीं से वैष्णव और शैव मत बने। 

DrSanjay Jothe के अनुसार वैष्णव परम्परा की पुरानी मूर्तियों में अवलोकितेश्वर की छाप बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। बल्कि कई जगह तो अवलोकितेश्वर की मूर्ति को ही विष्णु बना दिया गया है। जबकि बौद्ध स्तूप आगे चलकर शिवलिंग बना, यह भी सिद्ध हो चुका है।

वज्रयान परम्परा में बोधिसत्व तारा और बोधिसत्व/बुद्ध का संवाद बताया गया है। तांत्रिक ग्रंथ 'विज्ञान भैरव तंत्र' में शिव-पार्वती संवाद मिलता है। बोधिसत्व और तारा ही बाद में शिव-पार्वती बन जाते हैं। मजे की बात यह है कि 'विज्ञान भैरव तंत्र' में ध्यान/समाधि की 108 विधियों में से शुरुआती 16 से ज्यादा विधियां आनापान (श्वांस) पर आधारित हैं। इसी से सिद्ध होता है कि यह बौद्ध ग्रंथ है। इसीलिए स्वयं शैव और वैष्णव भी इस ग्रंथ का उल्लेख नहीं करते। उनकी मंडलियों में लोग इस ग्रंथ की ज्यादा बात नहीं करते, बस भगवद्गीता और उपनिषदों को दोहराते रहते हैं।

वैष्णव परम्परा जिन उपनिषदों को आधार बनाती है वे खुद श्रमणों के ग्रंथ हैं। उपनिषद स्वयं वेदों के हिंसक यज्ञ, कर्मकांड और बलि के विरोध में खड़े हैं। उपनिषदों में मुख्य भूमिका राजा/क्षत्रिय ज्ञानियों की है, वहां ब्राह्मण शिष्य बनकर क्षत्रियों से सीख रहा है। राजपुरुष के मुनि, तीर्थंकर या बुद्ध बनने की परम्परा जैनों और बौद्धों की है। दिनकर ने 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखा है कि उपनिषद ब्राह्मणों के ग्रंथ नहीं हैं।

महायान और योगाचार सहित शून्यवाद से जन्मा ध्यान योग ही गौड़पाद, गोविंदपाद और आदिशंकर में नजर आता है। यही मायावाद बन जाता है। बौद्ध वज्रयान का तंत्र अभिनवगुप्त में नजर आता है। तिब्बत में यह खूब फैलता है। हिमालय से नीचे उतरते हुए यह सिलसिला गोरखनाथ से बहता हुआ कबीरदास, रैदास और नानक तक आता है। अवलोकितेश्वर ही इन सबके मूल में हैं।

अब ये बातें सामान्य भारतीयों को पता चलने लगी हैं। इसीलिए वर्णाश्रम व्यवस्था पर बहुत बड़ी चोट हो रही है। अब विशेष रूप से ओबीसी, दलित और जनजातीय समाज में श्रमण परम्परा के पक्ष में नई लहर पैदा हो रही है। अब बुद्ध और धम्म को समझने का सही समय आ रहा है। अगले कुछ दशकों में यह स्थापित हो जाएगा कि वर्तमान में प्रचलित हिंदू धर्म असल में महायान और वज्रयान का ही विकृत रूप है।

सत्ताधारी दक्षिणपंथियों द्वारा भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन और इसके उलट-फेर के प्रयासों के बीच लोक में इसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पक्ष की खुदाई भी साथ ही साथ चल रही है। इस दिशा में उठती धीमी आवाजें अब त्वरित गति पकड़ती जा रही हैं। हालांकि ये दोनों धाराएं राजनीति प्रेरित अधिक हैं लेकिन जो शुरुआत हुई है, वह आगे चलकर संख्याबल के आधार पर संगठित हुई तो उसके बड़े दूरगामी परिणाम सामने आएंगे।

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