ओ मन्नू! तेरा अब क्या होगा
किशोर कुमार की फिल्म चलती का नाम गाड़ी (1958) में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गाना तो आपने सुना ही होगा―जाना था जापान पहुँच गए चीन, समझ गए ना! ठीक यही हाल आज देश का हो गया है। कहां तो हम एक विकासशील देश थे जिसमें हम बड़ी तेजी से विश्व-अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की पहली पसंद थे और कहां आज हमारे प्रधानसेवक जी सारी दुनिया के कई-कई चक्कर काटने के बाद एक भी ढंग का निवेशक देश में नहीं ला सके। खुद को ग्लोबल एक्सपर्ट समझने वाले गोदी मीडिया मई 2020 में भारतीय भक्तों को पढ़ा रहा था―चीन छोड़कर भारत आ रही हैं कंपनियां, बौखला रहा है ड्रैगन' या 'चीन से 1000 कंपनियां समेट रहीं कारोबार, भारत में आने को तैयार' जैसी हैडलाइन बनाकर चीन की हजारों कंपनियों के भारत आने की जो हवाबाजी की गई थी उसकी भी हवा निकल गई।
यह तो सर्वविदित ही है कि संघ सत्य और ज्ञान का शत्रु है, इसीलिए वह लोगों को शिक्षित करने के विरुद्ध है और शायद इसीलिए देश की शिक्षा का भट्टा बैठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
यूनेस्को (UNESCO) की '2021 स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया: नो टीचर्स, नो क्लास' रिपोर्ट से तो कम-से-कम यही साबित होता है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग लगभग 1.1 लाख स्कूल एक ही अध्यापक के भरोसे चल रहे हैं। देश के स्कूलों में शिक्षकों के कुल 19% या 11.16 लाख पद खाली हैं, जिनमें से 69% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। एक लाख से ज्यादा रिक्त पद वाले तीन राज्य उत्तर प्रदेश (3.3 लाख), बिहार (2.2 लाख) और पश्चिम बंगाल (1.1 लाख) हैं।
मध्य प्रदेश में सिंगल टीचर स्कूलों की संख्या सर्वाधिक (21077) है। ज्यादातर वैकेंसी ग्रामीण स्कूलों में हैं जैसे बिहार के मामले में, जहां 2.2 लाख शिक्षकों की जरूरत है और इनमें 89% गांवों में हैं। इसी तरह यूपी में खाली पड़े 3.2 लाख पदों में से 80 फीसदी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हैं। पश्चिम बंगाल के लिए यह आंकड़ा 69% है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 7.7% प्री-प्राइमरी, 4.6% प्राइमरी और 3.3% अपर-प्राइमरी शिक्षक कम योग्यता प्राप्त हैं। इस मामले में बिहार के हालात सबसे खराब हैं।
रिपोर्ट मे कहा गया है कि शिक्षकों की वर्तमान कमी को पूरा करने के लिए भारत को 11.16 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत है। भारत में महिलाएं शिक्षण कार्यबल का लगभग 50% हिस्सा हैं, लेकिन महत्वपूर्ण अंतर-राज्यीय और शहरी-ग्रामीण भिन्नताएं हैं।
कक्षा 3, 5 और 8 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार निम्न-शिक्षण निष्कर्ष के साथ इसे जोड़ते हुए यूनेस्को (UNESCO) ने शिक्षकों के रोजगार की शर्तों में सुधार करने, गांवों में उनकी काम करने की स्थिति में सुधार करने के अलावा 'आकांक्षी जिलों' को चिह्नित करने और शिक्षकों को फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की है।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) और शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (Unified District Information System for Education)(यूडीआइएसई) के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण-शहरी असमानता है और पूर्वोत्तर में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और तैनाती में सुधार की बहुत जरूरत है।
रिपोर्ट बहुत विस्तृत है और इसमें विभिन्न विसंगतियों को रेखांकित किया गया। कुल मिलाकर देश की प्राइमरी और मिडिल स्तर की पढ़ाई-लिखाई चौपट होने का सबूत पेश करती है।
सबकुछ धन्नासेठों के हवाले करने की सनक अकस्मात सवार नहीं हुई है, बल्कि यह बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत गुरु गोलवलकर के सपनों को साकार करने के लिए किया जा रहा है ताकि देश में सवाल खड़ा करने वाले पढ़े-लिखे लोगों से मुक्ति पाई जा सके।
बहरहाल, मजरूह सुल्तानपुरी ने इसी गीत में ठीक ही पूछा है―
ओ मन्नू! तेरा-मेरा अब क्या होगा?


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें