गुरुवार, 31 मार्च 2022

जाते थे जापान पहुंच गये चीन

जाते थे जापान पहुंच गये चीन

चित्र―सऊदी अरब में निर्माणाधीन शहर नियोम (Neom)

हिंदी फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' (1958) में किशोर कुमार का गाया एक गाना था―जाते थे जापान पहुंच गये चीन, बिल्कुल ऐसी ही दशा भारत की बना दी गई है। कहां तो भारत 2014 आते-आते तक दुनिया के विकासशील देशों में अग्रणी था, विदेशी कंपनियां भारत में व्यापार करने को भारी निवेश कर रही थीं, जिससे रोजगार के नये-नये अवसर पैदा हो रहे थे, हर क्षेत्र तरक्की कर रहा था और कहां आज इसकी ऐसी दुर्दशा बना दी गई है कि यह आज कंगाली की ऐसी कगार पर पहुंचा दिया गया है, जहां वह सब एक सपने जैसा लगता है।

पिछले 97 सालों से आरएसएस देश में हिंदू-मुसलमान का वर्गभेद बढ़ाकर इसकी वैदिक संस्कृति और धर्म के विरुद्ध अपना हिंदुत्व थोपने का जो दुष्चक्र चलाता रहा है, उसके दुष्परिणाम हमारे सामने विविध रूपों में उपस्थित हैं। इसके एक प्रचारक ने दुनियाभर में सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने के लिए कुख्यात अमेरिकी पीआर. कंपनी ऐप्को वर्ल्डवाइड की मदद से देश की सत्ता पर कब्जा करने में कामयाबी हासिल करने के बाद इसे हर क्षेत्र में किस तरह बर्बाद कर दिया है, यह कोई छिपी बात नहीं है। 

पाखंड, अंधविश्वास और दिखावे की आस्था के मारक औजार पर सान चढ़ाकर ऐसी विनाशलीला का बीज बोया जा चुका है कि आज हम यह भी नहीं देखना चाहते कि दुनिया के दूसरे देशों में क्या हो रहा है। अब देश के समाचार माध्यमों में दिन-रात हिंदू-मुसलमान का विभेदकारी वातावरण बनाकर समाज को विभाजित करने का ही ऐजेंडा चलाया जा रहा है। जनसरोकारों पर चरचा बंद कर दी गई है। लोगों की नजरों से यह छिपाया जा रहा है कि दुनिया किस तरह आगे बढ़ रही है। 

दुनिया जिस तरह निरंतर उन्नति करती जा रही है, हम उसके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। यदि केवल मुस्लिम देशों को ही ले लें, जिनका भय दिखाकर संघ भारतीयों को ठगता रहा है, तो बात साफ हो जाती है। 

आज क्या है मुस्लिम देशों की आर्थिक स्थिति और वे आगे क्या करने जा रहे हैं, यह देश में संघ-समर्थक हिंदुओं को सोचने की जरूरत है।  

सऊदी अरब की आबादी 1.5 करोड है और तकरीबन इतने ही विदेशी नागरिक वहां काम करते और रहते हैं जिनमें लगभग 28 लाख भारतीय भी शामिल हैं। सऊदी अगले दस सालों में 7 ट्रिलियन डॉलर का निवेश कर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था का देश बनने की ओर अग्रसर है। वहां के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सऊदी की राजधानी रियाद को 2030 तक एक आर्थिक और व्यापारिक गढ़ बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं।

तेल निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए कई क़दम उठा रहा है क्योंकि सरकार जानती है कि तेल हमेशा के लिए नहीं रहेगा। इसलिए वैकल्पिक साधनों के जरिये देश की अर्थ-व्यवस्था को मजबूती देने की ओर कदम बढ़ाये जा चुके हैं।  

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 7 ट्रिलियन डॉलर इंफ़्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवा, ट्रांसपोर्ट एवं बंदरगाह, मैन्यूफ़ैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र, रिन्युएबल एनर्जी, डिजिटल एकनॉमी तथा पर्यटन पर खर्च कर 2030 तक देश की GDP 22% बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, ताकि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था अगले दस सालों में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक (Global Competitiveness Index) में दसवें स्थान पर हो।

1 ट्रिलियन डॉलर केवल इन्फ़्रास्ट्रक्चर योजना पर खर्च होगा जिसमें 300 बिलियन डॉलर नई सड़कें, हाइस्पीड ट्रेन पर खर्च किया जायेगा। वहां एक नई एयरलाइन खोलने के अलावा 147 बिलियन डॉलर की लागत से राजधानी रियाद में एक विश्वस्तरीय नया एअरपोर्ट बनाया जा रहा है। रियाद का कुल क्षेत्रफल दोगुना कर उसे सऊदी अरब का मुख्य व्यापारिक केंद्र बनाने का काम प्रगति पर है।

चित्र―सऊदी अरब में निर्माणाधीन शहर नियोम (Neom)

 लाल सागर के किनारे मिस्र और जॉर्डन की सीमा पर तबूक में सऊदी अरब दुनिया का अत्याधुनिक शहर नियोम (Neom) बसाने जा रहा है। जिसे भविष्य का नगर कहा जा रहा है। इसे शून्य उत्सर्जन और शून्य वाहन की थीम पर 500 बिलियन डॉलर की लागत से विकसित किया जा रहा है। दुबई और अबूधाबी जैसे दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक शहरों को पीछे छोड़ते हुए नियोम पूरी तरह आर्टिफिशियल इटैलिजेंस आधारित शहर होगा। इसका क्षेत्रफल 26,500 वर्ग किमी. होगा।

आज 2022 में चीन की अर्थव्यवस्था 8.1 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 18 ट्रिलियन डॉलर, भारत की 2.5 ट्रिलियन डॉलर और सऊदी अरब की 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी। 

1993 से पहले केवल मुम्बई और हॉग कॉग एशिया में दो बड़े वित्तीय केंद्र थे। सऊदी अरब या दुबई के शेख बम्बई आकर बिजनेस करते थे और आज मुकेश अंबानी तथा हिरानंदानी दुबई में कंपनी खोल कर स्टॉक एक्सचेंज में इनलिस्ट कर रहे हैं। 

दुबई में अब तक का सबसे भव्य एक्सपो 2022 हो गया, कतर में इस साल नवंबर 21 से 18 दिसंबर के बीच फीफा (FIFA) वर्ल्ड कप 2022 होने जा रहा है, मिस्र में नई राजधानी का उद्धाटन होगा, इसतांबूल में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र खुलेगा लेकिन हम अपने देश में दंगा कर के GDP जलाने को आतुर हैं।

चित्र―सऊदी अरब में निर्माणाधीन शहर नियोम (Neom)

हम समय-समय पर दंगे प्रायोजित करते हुए देश की GDP को जलाते गये जिस पर किसी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अर्थशास्त्री ने इस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में दंगा होने पर वहां के राष्ट्रपति सिरिल रामापोज़ा ने कहा कि उनके देश की GDP 3-4% जल कर ख़त्म हो गई। हमारे देश के स्वघोषित राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री मोदी के पास देश चलाने का कोई विज़न ही नहीं है। सिर्फ जुमले उछालने, विपक्षियों की खिल्ली उड़ाने और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर जीडीपी जलाने का विज़न है।

जरा सोचिए दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ चार दिन के दंगे से 3-4% जीडीपी खत्म हो गई तो हमारे यहाँ 70 साल से दंगे होते रहे हैं उनमें कितना नुकसान हुआ होगा। 

हम लोग भारत में साम्प्रदायिक घृणा फैला कर अनेक तरह की हानि उठाते रहे और गर्व करते रहे, उधर चीन 1965 से 5-6% की ग्रोथ करता रहा और 1989 से 10-12% ग्रोथ कर के 2019 तक 130 करोड़ आबादी को ग़रीबी से निकाल कर आज सुपर पॉवर हो गया है। भारत 1989-1992 के बीच बाबरी दंगा से पहले चीन से बड़ी 500 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था था लेकिन आज चीन विश्व का मन्युफैक्चरिंग हब है, हम नहीं। वह आज हमारे लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश में घुस कर तांडव कर रहा है और हमारा प्रधानमंत्री हमसे झूठ बोल रहा है कि न कोई घुसा था और न ही किसी ने कब्जा किया हुआ है। 

अब जब चीन मुस्लिम देशों को मिला कर 'वन बेल्ट वन रोड' बना कर दुनिया में समुंदर से सुरक्षा या ट्रेड का महत्व ख़त्म कर रहा है तब भी हमारे स्वघोषित देशभक्तों की आँखें नहीं खुल रही हैं। हम मंदिर-मसजिद, हिजाब, तबलीगी जमात, मॉब लिंचिंग, गाय, गोमूत्र जैसी एकदम वाहियात बातों में फंसे हुए हैं। 

अब जिस गति से अमेरिका का वर्चस्व लगातार कम होता जा रहा है उससे भी अधिक तेजी से चीन आगे बढ़ रहा है। दुनिया बदल गई है, अब यूरोप और अमेरिका का जमाना नहीं रहा। यह एशिया की सदी है जिसमें बड़े आबादी वाले देश भारत और चीन 80-90% तेल और गैस के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं।अब कोई देश मुस्लिम देशों की उपेक्षा कर सुपर पॉवर नहीं बन सकता है, चाहे वह अमेरिका हो या रूस हो या फिर चीन ही क्यों न हो। भारत की तो कोई हैसियत ही नहीं रही। क्योंकि दुनिया में जहां―

—अमेरिका मंगल ग्रह पर जीवन की सम्भावनाए ढूंढ रहा है।
—चीन संसार के सत्ताईस प्रतिशत बाजार पर कब्जा कर उसे सौ प्रतिशत करने में जुटा है।
—रूस दुनिया में बादशाहत कायम करने को जी जान से लगा है।
—जर्मनी में भविष्य का ईंधन 'आयरन एयर बैटरी' बनाई रही है।
—इसतांबूल में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र खुल रहा है। 
—जापान आर्थिक व तकनीक के क्षेत्र में पूरे विश्व को पछाड़ने की जुगत में है।

और हम कहां हैं...

—भूखे नंगों के वैश्विक सूचकांक में पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान से भी पीछे।
—प्रति व्यक्ति औसत आय बांग्लादेश से भी कम।
—खुशहाल देशों की सूची में अफगानिस्तान से मात्र दस कदम दूर हैं।
—विदेशी कर्ज का केवल ब्याज रक्षा बजट से दोगुना चुकाना पड़ रहा है।
—देश में करोड़ों लोगों की नौकरियां छीनी जा रही हैं।
—विश्व बाजार में हमारे उत्पादों की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है।
—शहंशाह को देश चलाने के लिए आये दिन देश की सम्पत्तियां बेचना पड़ रही हैं।
—हमारा खजाना इतना खाली हो गया कि रिजर्व बैंक का रिजर्व पैसा भी लेना पड़ता है।
—बेरोजगारों की फौज में रिकॉर्ड तोड़ते हुए दुनिया में भारत सबसे आगे है।
—तेईस करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिये गये हैं।
—विधानसभा के चुनाव जीतने के लिए मुफ्त राशन, नमक, तेल, बांटकर फिर डीजल, पैट्रोल और गैस के दाम बढ़ाकर पूरे देश से वसूलना पड़ रहा है।
—कुर्सी पर कब्जा किये रखने के लिए शहंशाह को शिक्षा का बजट घटाना और सिनेमा पर से कर हटाना पड़ रहा है।
—देश में स्वर्णकाल लाने को कटिवद्ध लोग मंदिर और रामायण विश्वविद्यालय बनवा रहे हैं। अयोध्या, काशी, मथुरा का कायाकल्प किया जा रहा है। अब शायद इन्हीं से बेड़ापार होगा। 

हमें शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुगम यातायात, न्याय जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर जैसे ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। इनकी मांग करने वाले अर्बल नक्सल, देशद्रोही, धर्मद्रोही, आंदोलनजीवी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं। बस कोरी और दिखावे की आस्था को दुदृढ़ कीजिये, उसी से सब दुखों का निवारण हो जायेगा। ■

गुरुवार, 24 मार्च 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध सिर्फ आइसबर्ग की चोटी है

 रूस-यूक्रेन युद्ध सिर्फ आइसबर्ग की चोटी है

दुनिया आज परमाणु अस्त्रों की प्रेतछाया में जिस रूस-यूक्रेन युद्ध को दम साधे देख रही है, वह सिर्फ एक आइसबर्ग की चोटी की तरह है। जिसका एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दे रहा है जबकि सतह के भीतर बहुत कुछ अदृश्य है।

आगे बढ़ने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं। तो हो सकता है कि आपने 'इलुमिनाटी' का जिक्र जरूर सुना होगा। यह एक अत्यंत गुप्त संगठन है। दुनियाभर के हर धर्म, देश और धंधे की बड़ी-बड़ी हस्तियां इसकी सदस्य हैं। कहा जाता है कि दुनिया में जितने भी अमीर हैं उनमें से 70% लोग इस संगठन से जुड़े हुए हैं और माना जाता है कि इसका संचालन जर्मन मूल के यहूदियों का परिवार Rothschild और Rockefeller करते हैं। हालांकि आज तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है कि इस संगठन को कौन चलाता है और इसका मुखिया कौन है?

                                

                                        चित्र—इलुमिनाटी का चिह्न बनाती दुनिया की कुछ मशहूर हस्तियां

इसके सदस्यों में दुनियाभर के सभी देशों के बड़े-बड़े पूंजीपति, नेता, सेलिब्रिटी, धर्मगुरु, एक्टर, एक्ट्रेस, बिजनेसमैन, बैंकर, क्रिकेटर आदि के अलावा लगभग सभी क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियां विभिन्न सम्प्रदायों के धर्मगुरु, इमाम, फादर, पास्टर, मुफ्ती, मुल्ला, मौलवी, मसीह, माजदा आदि शामिल हैं।

इस संगठन पर अक्सर राजनीतिक शक्ति और प्रभाव हासिल कर एक नई विश्व व्यवस्था स्थापित करने के लिए समाज के प्रभावशाली लोगों, बुद्धिजीवियों, सरकार और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए वैश्विक स्तर पर घटनाओं तथा विश्व मामलों को नियंत्रित करने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है। इसी क्रम में व्यापक रूप से ज्ञात और विस्तृत षड्यंत्रकारी के रूप में इलुमिनाटी को दर्जनों उपन्यासों, फिल्मों, टेलीविजन शो, कॉमिक्स, वीडियो गेम और संगीत वीडियो में प्रछन्न रूप में शक्ति के तार और लीवर खींचने वाले के रूप में चित्रित किया गया है।

कहा जाता है कि इस संगठन से जुड़े हुए लोग सारी दुनिया पर शासन करना चाहते हैं। इस समुदाय का मुख्य उद्देश्य वैश्विक स्तर पर समान विचारधारा वाले धनाढ्य और प्रभावशाली लोगों के लिए सर्वसुविधासम्पन्न व्यवस्था बनाना है। इसलिए इस संगठन में सिर्फ ऐसे ही लोग शामिल किए जाते हैं। कई लोगों का मानना है कि विश्व युद्ध होने का कारण इलुमिनाटी समुदाय ही था।

विश्व का सबसे गुप्त और खतरनाक संगठन—

यह दुनिया का सबसे गुप्त और खतरनाक संगठन है। इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति को शपथ दिलवाई जाती है कि वह कभी भी और किसी भी परिस्थिति में अपनी पहचान किसी के सामने जाहिर नहीं करेगा। इसका उल्लंघन करने वाले को अपनी जान गंवानी पड़ती है। इसीलिए इसके सदस्य कभी यह नहीं कहते कि वे इससे जुड़े हुए हैं।

संगीत की दुनिया में सबसे ज्यादा मशहूर माइकल जैकसन भी इस संगठन के सदस्य थे। यह बात उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह दी थी। उसके दूसरे ही दिन उनकी मृत्यु रहस्यमय ढंग से हो गई। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की 22 नवंबर, 1963 को हुई  हत्या के पीछे भी इसी संगठन का हाथ माना जाता है। जो अब भी अमेरिकी राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है। सालों से खुफिया एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि उस हत्याकांड में किसका हाथ था लेकिन अब तक कुछ पता नहीं चल सका है। दरअसल, कैनेडी की हत्या से ठीक पहले एक संदिग्ध महिला दिखी थी, जिसके हाथ में खुफिया कैमरानुमा पिस्टल था। हत्या के साथ ही वह औरत जैसे आई थी, वैसे ही गायब हो गई। आज तक यह पता नहीं लग सका कि वह महिला कौन थी और कहां से आई थी। कई संगठनों को यकीन है कि गुप्त संगठन इलुमिनाटी ही इसके पीछे है और वह रहस्यमयी महिला इसी से जुड़ी हुई थी।

इस संगठन की कार्यप्रणाली अत्यंत गोपनीय है। इससे जुड़े लोग चिह्नों और संकेतों के माध्यम से इसका अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार-प्रसार करते हैं और कभी किसी से इस संगठन का सदस्य बनने के लिए नहीं कहते।

इस संगठन की स्थापना जर्मनी के रहने वाले प्रोफेसर एडम विशॉप्ट  (1748-1830) ने बेवेरिया शहर में की थी और इसे 'परफेक्टिबिलिस्ट' नाम दिया गया। एडम का मानना था कि चर्च और कैथोलिक विचारों के कारण समाज खुलकर नहीं जी पा रहा है। इसीलिए उन्होंने हर तरह की धार्मिक बंदिशों से मुक्त एक संगठन तैयार करने के बारे में सोचा। इसी के साथ गुप्त संगठन इलुमिनाटी की नींव रखी गई। माना जाता है कि मई 1776 में प्रोफेसर एडम के नेतृत्व में इसके सदस्यों की पहली बैठक हुई, जिसमें यूनिवर्सिटी के 5 लोग शामिल थे। जल्द ही इसके सदस्य बढ़ते चले गए और साल 1784 में इसके लगभग 3000 सदस्य हो चुके थे। इसके एक शुरुआती कर्मठ सदस्य और कानून के छात्र मैसेनहौसेन के नाम पर इन लोगों को फ्रीमेसनरी कहा जाने लगा।

चित्र—प्रोफेसर एडम विशॉप्ट

इसकी शुरुआती अवधि के दौरान इसके सदस्यों में प्रभावशाली बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील राजनेताओं को शामिल किया गया जिनके तीन स्तर—नौसिखिए, मिनरवल और इल्यूमिनेटेड मिनरवल थे। संगठन का लक्ष्य अंधविश्वास, अश्लीलता, सार्वजनिक जीवन पर धार्मिक प्रभाव और राज्य सत्ता के दुरुपयोग रोकना था। इसके लोगों का मानना था कि दुख में खुदकुशी सही चुनाव है। इलुमिनाटी के सदस्य गलती करने वालों को मौत की सजा देने पर यकीन रखते थे। साथ ही यह कि धर्म पर यकीन करने वाले मूर्ख हैं और उन्हें सजा मिलनी चाहिए।

बाद में यह अपने लक्ष्य से भटककर समाज में शक्तिशाली बनने की ओर चल पड़ा। इसका नाम 'The order of Illuminati' रखा गया। इसके सदस्य शैतान लुसिफर की पूजा करने लगे। आज भी इस संगठन से जुड़ने के लिए अपनी आत्मा को शैतान लुसिफर को सौंपना पड़ता है। माना जाता है कि ऐसा करने वाले अपने काम में सफल होते हैं और अन्य लोगों के मुकाबले वे अपने जीवन में बहुत जल्दी सफलता प्राप्त कर बहुत अमीर और ताकतवर बन जाते हैं। इसीलिए अत्यंत महत्वाकांक्षी लोग इसके सदस्य बन जाते हैं।

इलुमिनाटी समुदाय का चिह्न एक त्रिकोणीय पिरामिड है जिसके ऊपर शैतान की एक आंख बनी हुई है।  


चित्र—इलुमिनाटी समुदाय का चिह्न

इलुमिनाटी का एजेंडा 2030—

इस संगठन के शक्तिशाली होने का प्रमाण है संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व व्यापार संगठन आदि सभी पर इसका प्रभाव। इसीलिए ये सभी संस्थाएं मानवता का मुखौटा लगाकर इनका ही हित साधने वाली नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम तैयार करती हैं। 

इनकी दुरभिसंधियों का शिकार भारत अकेला देश नहीं है। आज मोदी जी जो कुछ भी बोलते और करते हैं वह संरा (UNO) के 17 सूत्रीय नई विश्व-व्यवस्था के निर्धारित कार्यक्रम का ही हिस्सा होता है। वह चाहे किसानों की आय दोगुनी करने वाली बात हो या निजीकरण की सूनामी हो, बड़े-बड़े पूंजीपतियों के बैंक ऋण का एनपीए हो, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के बजट में लगातार कटौती हो, हर मुद्दे पर मोदी जी सिर्फ और सिर्फ उसी विश्व-व्यवस्था के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं।

हालांकि एजेंडा 2030 में दुनिया के तमाम देश जुड़े हैं लेकिन आश्चर्यजनक है कि मोदी सरकार उस एजेंडे के अंतर्गत तय किये गए टाइम टेबल से पहले ही सारे लक्ष्य पूरा करने में जुटी हुई दिखती है। याद कीजिये इन्होंने ज्यादातर लक्ष्य 2022 के लिए निश्चित किये हुए हैं।

इस संगठन द्वारा संरा के चार्टर में तमाम तरह की सब्सिडी को खत्म करने की बात प्रमुखता से शामिल की गयी है। भारत में पैंशन खत्म करने के अलावा तेल, गैस और रेल टिकट पर दी जाने वाली सब्सिडी लगभग खत्म की जा चुकी है। रेल परिचालन भी 80% कम कर दिया गया है। बिजली की सब्सिडी केंद्र के स्तर पर पहले ही समाप्त हो चुकी है। ऊपर से बिजली विधेयक लाया जाने वाला है; इसके कानून बन जाने के बाद समाज के कमजोर तबकों के लिए विद्युत उपयोग करना कठिन हो जाएगा। मतलब यह कि लगभग हर क्षेत्र में सब्सिडी समाप्त कर दी गयी है।

इलुमिनाटी का वैश्विक बाज़ार पर असर—

इलुमिनाटी द्वारा नियंत्रित वैश्विक बाज़ारी ताकतों के दबाव से ही इस सरकार को कृषि क्षेत्र की सब्सिडी चुभ रही थी। इसीसे सरकार को विवादास्पद कृषि कानून लाने पड़े क्योंकि इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण सब्सिडी कृषि क्षेत्र की थी जिसे खत्म किये बिना इन अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का लक्ष्य पूरा हो ही नहीं सकता था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत खाद्य पदार्थों, दवाइयों और उपभोक्ता वस्तुओं का बड़ा उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों है। यह वैश्विक बाज़ारी ताकतों के लिए सोने का अंडा देने वाली स्थिति थी, तो वे इसे हाथ से कैसे जाने देतीं।

इस पूरी शोषणकारी व्यवस्था को समझने के लिए दुनिया के वर्तमान परिदृश्य को भी समझना जरूरी है जिसने अमेरिका के नेतृत्व में दुनियाभर में उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर अपनी तिजोरियां भरने का इंतजाम किया। जहां संसार की सबसे धनाढ्य यहूदी लॉबी का दुनिया में सबसे अधिक धनोपार्जन करने वाले व्यापार—हथियार व सैन्य साजो-सामान, फार्मा, तेल, मोटरकार व वायुयान निर्माण तथा बैंकिंग जैसे उद्योगों पर कब्जा है। यही नहीं वे हॉलीवुड के फिल्म उद्योग और समाचार माध्यमों पर भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। इनकी माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, पेप्सी, एप्पल आदि जैसी दिग्गज कंपनियों और मीडिया घरानों की बदौलत ही अमेरिका दुनिया पर राज करता है।

लेकिन इसी बीच चीन बहुत तेजी से परिदृश्य में उभर आया और उसने सारे समीकरण उलट-पलट कर दिए। आज चीन दुनिया की बड़ी फैक्ट्री बन चुका है और बड़ी ताकत भी। इसके साथ ही उसने दुनिया का थानेदार बने घूमने वाले अमेरिका के सामने जबरदस्त चुनौती पेश कर दी है। इससे सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया फिर से दो ध्रुवीय हो गई है।

एक खेमा अमेरिकी नेतृत्व में इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व अन्य नाटो देशों का है तो चीन, रूस, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान तथा कुछ अन्य मुस्लिम देशों का है। भविष्य में इसमें काफी बदलाव भी हो सकते हैं, क्योंकि सबसे पहले आर्थिक फायदे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। गुट निरपेक्ष आंदोलन के नेपथ्य में चले जाने पर भी एक तीसरा खेमा बचा है जिसके बारे में यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है।

इलुमिनाटी समूह उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं तथा आर्थिक ताकत के बल पर दुनियाभर में सरकार बनाने, चलाने और उन्हें गिराने का खेल खेलता आया है। इसके लिए यह अपने विभिन्न मुखौटों का इस्तेमाल करता है। यदि इतिहास में अधिक पीछे न भी जाकर केवल सत्तर-अस्सी साल के कालखंड पर निगाह डालें तो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लड़े गये सभी छोटे-बड़े युद्धों के बीच प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अमेरिका की मौजूदगी का कारण समझना आसान हो जाता है। क्या वर्तमान रूस-यूक्रेन युद्ध का कारण अमेरिका नहीं है?

चित्र—रॉथ्सचाइल्ड परिवार

एजेंडा 2030 पर सारे देश अपनी घरेलू नीतियों में संतुलन बैठा रहे हैं—

चर्चित एजेंडा 2030 पर भारत ही नहीं बल्कि बहुत सारे देशों ने दस्तखत किए हुए हैं, इसीलिए ये सभी इस एजेंडे के साथ अपनी घरेलू नीतियों में संतुलन बैठा रहे हैं या इसकी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शायद इस 17 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने में भारत की सरकार सबसे आगे है जो समय से पहले इस चार्टर को देश में लागू करने में जुटी हुई है। सम्भवतः इसका एक कारण आरएसएस का अमेरिकी तथा इस्राइली यहूदियों से प्रेम है। 

इसी जल्दबाजी में जनजातीय क्षेत्रों की ज़मीन का मसला हाइकोर्ट के एकतरफा निर्णय से सलटा लिया गया है और बिना किसी दबाव के देश के जल-जंगल-जमीन, खनिज सम्पदा, समुद्र, पहाड़, नदी, तालाब, आकाश, पाताल, मानव संसाधन यानी सबकुछ चंदा देने वाले प्रमुख पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। 

ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे संसार में किया जा रहा है। जिसका नियंत्रण अमेरिका और उसके मित्र देशों के हाथों में है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि इलुमिनाटी समूह आदमखोर बन गये भूखे शेर की तरह है जिसके सामने तीसरी दुनिया के देशों की स्थिति खूंटे से बंधी बकरी जैसी बना दी गई है। ■


(आप चाहें तो इस लेख को निम्नलिखित लिंक पर जाकर भी पढ़ सकते हैं—

https://janchowk.com/beech-bahas/russia-ukrane-war-is-just-a-tip-of-iceberg/

सोमवार, 21 मार्च 2022

सावरकर का हिंदुत्व

सावरकर का हिंदुत्व

आज विनायक दामोदर सावरकर की शिक्षा और उनके हिंदुत्व को समझने की बहुत जरूरत है क्योंकि उनका हिंदुत्व मर्यादा, सिद्धांत, आदर्श, नैतिकता, परंपरा, मानवीय मूल्य, नियम, कानून, संविधान जैसे सामाजिक समरसता के मूलभूत तत्वों और इतिहास का दुश्मन है। 

सावरकर का ऐसा हिंदुत्व सनातन धर्म और इसके महान गुणों को कलंकित करने वाला है लेकिन आज सत्ता के मद में चूर एक वर्ग द्वारा देश में ऐसे ही हिंदुत्व की वकालत की जा रही है तो क्या हिंदुओं को मर्यादा, आदर्श, नैतिकता, परंपरा, मानवीय मूल्य, सिद्धांत, नियम, कानून, संविधान को भुला देना चाहिए? क्या हजार-पांच सौ साल पहले की सच्ची-झूठी कहानियों पर विश्वास कर उनका प्रतिशोध वर्तमान पीढ़ी से लिया जाना चाहिए? 

सावरकर के अनुसार रावण का कहना था कि पराई स्त्रियों से बलात्कार करना राक्षसों का धर्म है। वे छत्रपति शिवाजी को भी इस बात के लिए ताना मारते हैं कि उन्होंने युद्ध में जीती गई मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार नहीं कराया। 

मुस्लिम स्त्रियों को सम्मान सहित उनके परिवार को वापस करने की शिवाजी की उदारता को सावरकर सद्गुण की जगह दुर्गुण मानते हैं।


सावरकर का हिंदुत्व रावण की बुराइयों को अपनाने का न्योता देता है और शिवाजी की अच्छाइयों को कमजोरी मानता है।

°°°

प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक—6 स्वर्णिम पृष्ठ के 150वें पृष्ठ पर यह उद्धरण देखिए—

'४४१. रावण द्वारा सीता का अपहरण किये जाने के बाद जब श्रीराम ने आक्रमण किया, तब प्रत्यक्ष युद्ध से पहले रावण को उसके कुछ हित-चिंतक उपदेश करने लगे कि देखो, तुम्हारे इस अन्यायी कृत्य से हमारे राक्षस राज्य पर इस युद्ध का भयंकर संकट आया है। पर-स्त्री का अपहरण करना अधर्म है, इसलिए तुम यह अधर्म मत करो। सीता को सम्मानपूर्वक रामचंद्र को लौटा दो।'

'यह सुनकर रावण ने क्रोधित होकर उत्तर दिया—"क्या कह रहे हैं आप? पर-स्त्रियों का अपहरण उनके साथ बलात्कार करना अधर्म है? अरे महाशय! 'राक्षसानां परो धर्मः परदारविघर्षणम्। 

(अर्थात्—दूसरों की स्त्रियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार करना ही तो हम राक्षसों का परमधर्म है।)"

यहां सावरकर रावण के हवाले से दूसरों की स्त्री से बलात्कार करने वाले राक्षसों का धर्म अपनाने की सिफारिश करते हैं। आगे चलकर वह इसी पुस्तक में पृष्ठ 153 पर शिवाजी का उदाहरण देते हैं—

'४४८. शत्रुस्त्री-दाक्षिण्य जैसी राष्ट्रघातक और कुपात्र प्रयुक्त प्रवृत्तियों की घटनाओं के ऐसे हजारों उदाहरणों में से दो प्रमुख उदाहरण देना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। छत्रपति शिवाजी महाराज ने कल्याण के सूबेदार की मुसलिम बहू को बेटी मानकर सालंकृत पति के पास सम्मानपूर्वक भेज दिया और पराभूत पुर्तगाली किलेदार की शत्रु-स्त्री को भी चिम्माजी अप्पा (पेशवा) ने उसी प्रकार सम्मानपूर्वक उसके पति के पास वापस भेज दिया।

इन दोनों घटनाओं का गौरवास्पद उल्लेख हम आज भी सैकड़ों बार बड़े अभिमानपूर्वक करते हैं; परंतु शिवाजी महाराज अथवा चिम्माजी अप्पा को उन पराजित मुसलिम स्त्रियों का सम्मान करते समय थोड़ा भी स्मरण नहीं हुआ कि महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी आदि मुसलिम सुलतानों ने दाहिर की राजकन्याओं, कर्णवती के राजा कर्ण की पत्नी कमलादेवी, कन्या देवलदेवी आदि हजारों हिंदू राजकन्याओं पर किये हुए बलात्कार और लाखों हिंदू स्त्रियों पर भयंकर अत्याचार किये गये थे। यह क्या आश्चर्य की बात नहीं है?'

सावरकर आगे लिखते हैं—'हे शिवाजी अथवा हे चिमाजी अप्पा! आप हमारे ऊपर मुस्लिम सरदार और सुल्तानों द्वारा किए हुए अत्याचार और बलात्कारों को कदापि मत बोलिये। आप उन मुस्लिम अत्याचारियों के मन में ऐसी दहशत ऐसा आतंक उत्पन्न करें कि हिंदुओं की विजय होते ही उनकी मुस्लिम स्त्रियों की भी वैसे ही दुर्दशा की जायेगी जैसी उन्होंने हमारी की थी।'

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यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इतिहास में ठीक वैसा ही नहीं हुआ जैसा सावरकर लिख रहे हैं। वे जानबूझकर मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ खलनायक के तौर पर पेश कर रहे हैं, जबकि अपवाद हिंदू और मुस्लिम दोनों तरफ से थे। 

लेकिन स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि किसी शत्रु-स्त्री का बलात्कार न करने की परंपरा हिंदुओं का एक दुर्गुण है। और इस दुर्गुण के लिए वे रावण की तारीफ कर रहे हैं, जबकि यह दुर्गुण न निभाने के कारण छत्रपति शिवाजी की आलोचना कर रहे हैं।

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ऐसे भ्रष्टबुद्धि और विकृत मानसिकता से ग्रस्त लोगों के पदचिह्नों पर चलने वाले ये स्वघोषित 'धर्म-रक्षक' इस देश को गौरवान्वित नहीं कर सकते। उनकी सोच विकृत है। वे हर अच्छी चीज को तहस-नहस करना अपना धर्म समझते हैं क्योंकि वे चीजों को एकांगी दृष्टि से देखते हैं। जबकि इतिहास को समझने के लिए तत्कालीन समाज और परिस्थितियों के गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है। ■


शुक्रवार, 11 मार्च 2022

नेहरू ने कभी नहीं कहा था—“मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और जन्म से हिंदू हूँ"

 नेहरू ने कभी नहीं कहा था—“मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और जन्म से हिंदू हूँ"



नाज़ियों और फासिस्टों के भारतीय चेले वर्षों तक पं. जवाहरलाल नेहरू का विभिन्न तरीकों से चरित्र-हनन करते रहे हैं। आज भी यह सिलसिला उनके फ़र्ज़ी उद्धरणों और फोटोशॉप तस्वीरों के माध्यम से निरंतर जारी है। खुद को उनके सामने बौना पाते हुए उनकी वैश्विक प्रसिद्धि से जले-भुने लोगों के इस खास वर्ग द्वारा सोशल मीडिया में उनका लगातार अपमान किया जाता रहा है।
ऐसी ही मनगढ़ंत कहानियों में उनकी आत्मकथा के हवाले से फैलाया जाता रहा यह जबरदस्त झूठ भी शामिल है कि उन्होंने स्वयं अपने बारे में कहा था—"मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और हिंदू सिर्फ जन्म के एक संयोग से हूं" (I am English by education, Muslim by culture and Hindu by an accident of birth)।
सबसे पहले यह अफवाह उड़ाने वाले थे—डॉ. नारायण भास्कर खरे। वे 1926 में नागपुर से प्रकाशित मराठी अखबार 'तरुण भारत' के संस्थापक-संपादक थे। उन्होंने 1916 में अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से की और 1938 तक इसके सदस्य रहे। वायसरॉय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हुए और फिर 1935 के अधिनियम के बाद जब 1937 में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के लिए चुनाव हुए तो वे मध्य प्रांत (वर्तमान मध्य प्रदेश) और बरार के मुख्यमंत्री हुए। तब इनके मंत्रिमंडल में द्वारिका प्रसाद मिश्र और रविशंकर शुक्ल भी हुआ करते थे।
रविशंकर शुक्ल, द्वारिका प्रसाद मिश्र और डी.एस. मेहता को बर्खास्त करने के कारण कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने बी.एन. खरे के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर उनको जुलाइ 1938 में पार्टी से बाहर कर दिया तो राज्य का मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल को बनाया गया। इससे खार खाये खरे ने महात्मा गांधी और सरदार पटेल पर 'टु माय कंट्रीमेन : माइ डिफेंस' शीर्षक से पार्टी से बाहर करने का आरोप लगाते हुए एक पैम्फलेट लिखा।



इसके बाद डॉ. नारायण भास्कर खरे ने हिंदूवादी ताकतों के संपर्क किया और अलवर राज्य के प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिये गये। फिर संविधान सभा में भी अलवर प्रतिनिधि के रूप में शामिल किये गये।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद खरे को नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे के साथ साजिश का हिस्सा होने के संदेह में दिल्ली में नजरबंद कर दिया गया लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिये गये। उन्हें फरवरी 1948 में संविधान सभा और अलवर राज्य के प्रधानमंत्री के पद से भी बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद एन.बी. खरे 15 अगस्त, 1949 को हिंदू महासभा में शामिल हुए और 1949 से 1951 तक इसके अध्यक्ष और 1954 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष रहे।
इसी दौरान नारायण भास्कर खरे 1952 में लोकसभा के पहले चुनाव में दक्षिणपंथियों की वित्त-पोषक देसी रियासतों में प्रमुख रहे ग्वालियर से निर्वाचित भी हुए।
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नेहरू के बारे में भारत और विदेश की कई प्रतिष्ठित राजनीतिक हस्तियों की टिप्पणियों का संकलन कर रफीक ज़कारिया द्वारा 1959 में प्रकाशित पुस्तक ‘ए स्टडी ऑफ़ नेहरू‘ में एक योगदानकर्ता एन.बी. खरे भी हैं। इस पुस्तक के पृष्ठ 215 पर ‘द एंग्री एरिस्टोक्रेट‘ शीर्षक से खरे का लेख, नेहरू पर एक आलोचना है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में कहा है कि 'वे (नेहरू) शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और जन्म की दुर्घटनावश हिंदू हैं।'

झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाने वाले नाज़ियों के भारतीय संस्करण संघियों ने बरसों बाद एक पतली सी पुस्तिका निकाली जिसमें एक पृष्ठ पर यह कथन नेहरू द्वारा स्वयं के बारे में कहना बता दिया गया। आज यह कथन सोशल मीडिया और तमाम वेबसाइट्स पर मौजूद है, जो गूगल करने पर दिखाई दे जाता है।
नेहरू की वैश्विक स्तर पर समादृत राजनीतिक विचारधारा और उनकी विरासत दक्षिणपंथी सगठनों तथा सोशल मीडिया नेटवर्क के लिए एक प्रकार का मानसिक अभिशाप है। इसीलिए नेहरू की तमाम बातों के साथ-साथ उनकी वंशावली, सुभाष चंद्र बोस व सरदार पटेल से उनके सम्बंध, उनकी शिक्षा नीति और आरएसएस के साथ उनके समीकरण आदि-इत्यादि को लेकर अफवाहें उड़ाई जाती हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू अपनी मृत्यु के पांच दशक से भी अधिक समय बाद आज तक आमजन के बीच एक चर्चित व्यक्तित्व बने हुए हैं तो दक्षिणपंथियों के लिए ईर्ष्या-द्वेष के केंद्र हैं।
सत्य से डरने वाले तथा झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर लोगों को भ्रमित कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने वाले विकृत मानसिकता से ग्रस्त अन्य संघियों की तरह नारायण भास्कर खरे के पास इतिहास में याद किये जाने के लिए नेहरू को दी गई गालियां भर थीं लेकिन भले ही उन गालियों के श्रेय से भी आदत से मजबूर संघियों ने उनका नाम मिटा दिया है परन्तु असत्य के इन प्रचारकों के प्रेरणास्रोत एन.बी. खरे को हिन्दुस्तान जरूर याद रखेगा।

आप चाहें तो इस लेख को निम्नलिखित लिंक पर जाकर भी पढ़ सकते हैं—
https://janchowk.com/beech-bahas/nehru-had-never-said-that-by-education-i-am-british/?fbclid=IwAR2lBviyMrcar6Hq0a6KiBHYZJ2WdkSlbPvXUgKJ-SfvpSljw8MK7rnpcAQ


इस 'बग्यूव' से देश की जनता दुर्दशा भोग रही है

इस 'बग्यूव' से देश की जनता दुर्दशा भोग रही है

मैं तब शायद चौथी-पांचवीं कक्षा में पढ़ता था, हमारे पिताजी को एक बार घर लौटने में देर हो गई। जाड़ों के मौसम में रात के नौ बज गए होंगे। अकेले थे दाहिने हाथ की उंगलियों में सुतली से बंधी तम्बाकू की दो सेर वाली पिंडी फंसी हुई थी और बायें हाथ में एक झोले में एक मोटी-सी पुस्तक थी। रास्ते में एक नाले के किनारे घात लगाकर बैठे गुलदार ने अचानक पिताजी पर पीछे से हमला कर दिया। उसके दोनों पंजे पिताजी के दोनों कंधों पर थे और थूथन बायें कान पर। बस, पिताजी ने दायां मुक्का पूरी ताकत से उसके थूथन पर दे मारा।


                                        


जोरदार घूंसे से मर्माहत गुलदार उतर कर दूर हट गया। इस बीच पिताजी जोर-जोर से उसे ललकारते रहे। उनकी आवाज़ ऊपर चढ़ाई पर स्थित नूना गांव में ठाकुरदत्त जी ने सुनी और उन्होंने बंदूक से हवाई फायर किया। लंबी वाली टॉर्च से नीचे आवाज की दिशा में रोशनी फैंकी और सामने वाले गांव कोट को आवाज लगाई क्योंकि हमारा गांव―नौकुड़ा पहाड़ की ओट में है। हमारे व अन्य गांवों से मशालें, लाठी-डंडे लेकर लोग वहां इकट्ठा हो गये। फिर सभी मिलकर पिताजी को सुरक्षित घर लाये।

इस घटनाक्रम में उल्लेखनीय बात यह थी कि पिताजी जरा भी नहीं घबराये। हालांकि उनके दोनों कंधों पर गुलदार के नाखूनों के गहरे घाव थे और उसके नाखूनों से कोट कंधों से नीचे तक फट गया था।

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में एक शब्द प्रचलित हैबग्यूव! कहा जाता है कि जब बाघ किसी मनुष्य या पशु पर हमला करता है तो भय के मारे उसकी बुद्धि काम नहीं करती और वह बाघ के आगे समर्पण कर देता है, बदहवासी की इसी मनोदशा को 'बग्यूव' कहा जाता है।

आज ठीक ऐसी ही 'बग्यूव' जैसी दुर्दशा देश की जनता की हो गई लगती है।

आज आसुरी शक्तियां इस देश को हर तरह से तहस-नहस करने में जुटी हुई हैं, जिसे सभी देशवासी देख समझ रहे हैं लेकिन इसका प्रतिकार करने के बजाय उन्हीं विनाशकारी लोगों के हाथों में खुद को सौंप दिया है।

जनता यह बात बिल्कुल भूल चुकी है कि उसने 2014 में तत्कालीन सत्ता को उखाड़ फेंक कर जिस आशा और विश्वास के साथ जिनके हाथों में देश की बागडोर सौंपी थी, वे उसकी पूर्ति कर भी रहे हैं या नहीं। लोगों का इस स्तर तक मतिहरण हो गया है कि वे सत्ताधारियों से सवाल पूछने की बजाय विपक्ष से पूछ्ते हैं। जबकि वे देख रहे हैं कि रोजी-रोटी, शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, रोजगार आदि तमाम जन-सरोकारों को बड़े सुनियोजित तरीके से हवा में उड़ाया जा रहा है।

आप सत्ताधारियों के साथ खड़े होकर चाहते हैं कि विपक्ष आपकी आवाज बुलंद करे? वाह! खाने को लड़का और लड़ने को भतीजा? विपक्ष को शक्तिविहीन कर चाहते हैं कि वह आपकी लड़ाई लड़े!! धन्य हैं आप!!!

इसी सोच के कारण जनता एक ओर लगातार बढ़ती महंगाई बेरोजगारी से त्रस्त है तो दूसरी तरफ सत्ताधारियों की गुंडागर्दी और टैक्स वसूली से परेशान है। देश में संवैधानिक संस्थाओं ने भी सत्ता के आगे घुटने टेक दिये हैं। न्यायिक व्यवस्था और सेना का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता समाप्त है। वह देख रहा है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में आचार संहिता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं फिर भी इसे वह चुपचाप अपना मौन समर्थन दे रहा है।

यह बाघ आदमखोर हो चुका है और लोग 'बग्यूव' से सम्मोहित होकर अपना अस्तित्व ही खतरे में डाल कर उसके आगे लम्बलेट हो रहे हैं।

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...