मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

जय भीम : अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की चेतना जगाती है

जय भीम : अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की चेतना जगाती है



यदि आप फिल्म देखने के शौकीन हैं तो आपको 'जय भीम' फिल्म जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह आपके भीतर अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की न केवल चेतना जगाती है बल्कि उससे लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने का जज्बा भी पैदा करती है। यह ग्रामीण क्षेत्रों, खास तौर पर आदिवासी और दलितों के प्रति, भूमंडलीकरण के इस दौर में भी बरते जा रहे भेदभाव, शोषण तथा अमानवीय व्यवहार को रेखांकित करती है, बल्कि इससे जूझने को प्रेरित भी करती है।
यह फिल्म 1993 में चंद्रू नाम के एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा इरुलर जनजाति की महिला को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई पर आधारित है जो मद्रास हाइकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के वास्तविक जीवन से सम्बंधित है। जो तमिलनाडु की एक आदिवासी जनजाति के उत्पीड़न को बेहतरीन तरीके से दिखाती है।
फिल्म के निर्माता और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार सूर्या सिव कुमार ने फिल्म में आदिवासियों को न्याय दिलाने वाले वकील चंद्रू की भूमिका निभाई है। तमिल फिल्म निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल ने इसका निर्देशन और पटकथा लेखन किया है। फिल्म में के. मणिकंदन ने आदिवासी राजू कन्नू और लिजोमोल जोस ने आदिवासी राजू कन्नू की पत्नी संगिनी की भूमिका में जान डाल दी है। इसके संवाद, निर्देशन, दृश्य, कला और अभिनय को विश्व की चोटी की फिल्मों को टक्कर दी है। इनके अलावा सूर्या सिव कुमार, राजिशा विजयन, राव रमेश और प्रकाश राज जैसे स्टार्स ने भी दमदार अभिनय किया है।



इस फिल्म ने दो नवंबर को एमेजॉन प्राइम पर रिलीज़ होने के तीन सप्ताह में ही सर्वाधिक आइएमडीबी (IMDb) रेटिंग वाली हॉलीवुड फिल्म 'द शौशैंक रिडेम्प्शन' और 'द गॉडफादर' जैसी क्लासिक फिल्मों को पछाड़कर 10 में से 9.6 रेटिंग हासिल करने का रिकॉर्ड बनाया है। इस में हिंदू समाज की कठोर जातीय व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर मौजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले उस दमन की कहानी है जिनके पास रहने को एक झोपड़ी के लायक जमीन का टुकड़ा तक नहीं है। मतदाता सूची में भी इनका नाम इसलिए दर्ज नहीं किया गया है ताकि चुनाव में समाज के प्रभुवर्ग को उनकी देहरी पर वोट मांगने न जाना पड़े। न राशन कार्ड है, न बच्चों की पढ़ने की कोई व्यवस्था।
फिल्म की शुरुआत में ही सामाजिक विद्रूप को प्रदर्शित करने वाला ऐसा घिनौना, डरावना और जुगुप्सापूर्ण दृश्य है जिसमें जेल के बाहर खड़े पुलिस वाले जेल से छूटने वाले लोगों में से जाति पूछ कर कुछ को जाने को कहते हैं और कुछ को अपने साथ ले जाकर पुराने अनसुलझे मामलों में अपनी खाल बचाने के लिए दूसरे मामलों में बंद कर देते हैं।
यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि ऐसी घटनाएं हमेशा से होती आई हैं और अब भी हो रही हैं। देश के छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में हाशिए पर मौजूद लोगों, ख़ासकर दलितों का जीवन बहुत ही ज्यादा मुश्किलों से भरा हुआ और अनिश्चित है। उनका अधिकाधिक शोषण करने के लिए सामंतवादी और मनुवादी वर्ग हमारे समाज की जातीय भेदभाव पर आधारित व्यवस्था में पुलिस-प्रशासन को एक औजार की तरह इस्तेमाल करता आया है।
फिल्म की चाक्षुषता इसलिए भी अधिक है जब आज की वर्तमान राजनीति में यह अनेक बार देखा जा चुका है कि सवर्ण नेता-मंत्रीगण और उनके संगठन अपने स्वजातीय जघन्य अपराधियों को बचाने के लिए आंदोलन तक करते हैं, उनका फूल-मालाओं से स्वागत-सत्कार करते हैं क्योंकि वे जाति व सम्प्रदाय के आधार पर खुद को दूसरों से ऊपर समझते हुए अपने जन्म, जाति, कर्म, सामाजिक रुतबे के अनुसार इसे अपना अधिकार समझते हैं।
यह विचारणीय है कि हम संवैधानिक रूप से एक लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज होते हुए भी ऐसा वातावरण बनाने को स्वीकार कर लेते हैं जिसमें आरएसएस तथा कुछेक अन्य संगठन सार्वजनिक रूप से खुलेआम अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा व घिनौनी हरकतों के लिए लोगों को उकसाते हुए दिखते हैं। इन संगठनों का काम अपने सजातीय लोगों द्वारा किये गये अनैतिक और आपराधिक कृत्यों पर पर्दा डालना और उन्हें किसी भी हद तक जा कर बचाना है।





यही इस फिल्म का थीम है और इसके जरिये यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि समाज का समृद्ध और सामर्थ्यवान वर्ग पुलिस व तंत्र के साथ मिलकर जिस तरह पीढ़ियों से निर्धन व दबे-कुचले लोगों के प्रति जातीय आधार पर अन्याय, शोषण और उत्पीड़न करता आया है, उन लोगों को न्याय दिलाने के लिए अपने घरों से निकलिए, उनकी सुनिये, उनसे बात कीजिये, उनके दर्द को समझिये और तब अपनी समझ बनाइये।
फिल्म में मावाधिकारों के संरक्षण तथा अपराधों की वैज्ञानिक तरीकों से गहन जांच-पड़ताल करने की जरूरत बताई गई है क्योंकि ये अदालती निर्णयों को जबर्दस्त तरीके से प्रभावित कर सच्चाई का पता लगाने में मददगार होते हैं।
फ्रेम-दर-फ्रेम आदिवासियों और दलितों के प्रति बरती जाने वाली अमानवता और तद्ज्जनित समस्याओं के दर्द को उकेरती एक भी ऐसी फिल्म मैंने अब तक नहीं देखी।
हालांकि तमिलनाडु के उच्च वर्ग में शुमार वन्नियार समुदाय के लोगों ने इस फिल्म के कुछ दृश्यों पर आपत्ति उठाते हुए निर्माता-अभिनेता सूर्या को निशाना बनाया था लेकिन निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल द्वारा फिल्म के माध्यम से उनका किसी व्यक्ति या समुदाय को अपमानित न करने का इरादा न होने और जिन्हें इससे ठेस पहुंची है उनके प्रति खेद व्यक्त करने से मामला ठंडा पड़ गया।
चूंकि फिल्म के निर्माता सूर्या सिव कुमार हैं तो इसमें उनकी भूमिका को एक वकील से भी बढ़कर कुछ ज्यादा ही उभारा गया है जो व्यावहारिक जीवन में संभव नहीं होता है। इस 'अति' को नजरअंदाज कर फिल्म देखना स्वयं में एक अनुभव होगा।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

संघियों की वर्चस्ववादी पेशवाई ग्रंथि स्थाई भाव बन गई है

 संघियों की वर्चस्ववादी पेशवाई ग्रंथि स्थाई भाव बन गई है

शाहजी राजे भोंसले (1594-1664) 17वीं शताब्दी के एक सेनानायक और बीजापुर तथा गोलकुंडा के मध्य स्थित जागीर कोल्हापुर के जागीरदार थे। वे कभी एक सल्तनत का आधिपत्य मानते तो कभी दूसरे का। अंतत: 23 जनवरी, 1664 को शिकार खेलते समय घोड़े पर से गिरने से उनकी मृत्यु हो गई।
शाहजी राजे भोंसले के पुत्र शिवाजी राजे भोंसले (1630-1680 ई.) तो किसी और ही मिट्टी का बना था, तो इन दोनों से ही नहीं बल्कि मुगल साम्राज्य के शासक औरंगज़ेब से भी संघर्ष कर 1674 ई. में पश्चिम भारत में स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की नींव रखी और छत्रपति का विरुद धारण किया। शानदार राजा हुए, जाणता राजा माने पीपुल्स किंग... लेकिन 3 अप्रैल, 1680 को 52 वर्ष की उम्र में ही चल बसे।
शिवाजी की पहली पत्नी के पुत्र सम्भाजी राजे या शम्भुराजे को पिता की मृत्यु की सूचना दिये बिना ही शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई ने अल्पवयस्क पुत्र राजराम (1689–1700) को गद्दी पर बैठाकर बचे-खुचे राज्य को सम्भाल लिया परन्तु सत्ता पर अपना प्रथम अधिकार जताते हुए सम्भाजी ने माँ-बेटे को कैद कर लिया और कुछ समय बाद उनकी हत्या करवा दी।
अब सम्भाजी राजे या शम्भुराजे (1657-1689) ने गद्दी संभाली। सम्भाजी ने बहुत कम समय के शासनकाल में 210 युद्ध किये और इनमें से एक में भी पराजित नहीं हुए लेकिन अंतिम युद्ध में औरंगजेब से हार गये और उसी की कैद में केवल 31 साल की आयु में 11 मार्च, 1689 को मृत्यु हो गई।
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सम्भाजी के बेटे और तीसरे छत्रपति राजाराम प्रथम (24 फरवरी, 1670-3 मार्च, 1700) का कार्यकाल काफी छोटा रहा, जिसमें वे अधिकांश समय मुग़लों से युद्ध में ही उलझे रहे।
राजाराम की मृत्यु के बाद शिवाजी द्वितीय (1696-1707) की माँ ताराबाई ने अपने 4 साल के पुत्र को गद्दी पर बैठाया और स्वयं उसकी संरक्षिका बनी। शिवाजी द्वितीय के राजा बनने का शाहूजी ने विरोध किया पर वे 17 सालों तक मुगलों के यहां बन्दी बने रहे। जब शाहूजी औरंगजेब की मृत्यु बाद मुग़लों की कैद से छूटे, तो गद्दी पर दावा ठोका।
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इसी सदी के शुरुआती दौर तक इस्रायल में यरूशलम को लेकर मुसलमानों से होने वाले युद्धों से त्रस्त यहूदी भारत के कोंकण (महाराष्ट्र) में शरण लेने के बाद हिंदू निम्न वर्गीय चितपावन ब्राह्मण बन चुके थे। उन्हीं में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट (1662–1720) ने सत्ता प्राप्ति में शाहूजी का साथ दिया, विजय मिली।
शाहूजी छत्रपति हुए और अहसानमन्द होकर बालाजी भट्ट को पेशवा यानी प्रधानमंत्री बना लिया। चतुर विश्वनाथ भट्ट ने सेना और राज्य शासन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के बाद छत्रपति शाहूजी से यह पद अपने परिवार के लिए वंशानुगत निश्चित करा दिया।
छत्रपति शाहूजी के इस निर्णय ने मराठों के भविष्य की दिशा ही बदल दी क्योंकि आगे चलकर छत्रपति कमजोर हुए और पेशवा ही असली शासक बन बैठा। वह प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि सेनानायक भी बन गया। उसने युद्ध में बड़ी सफलताऐं भी हासिल कीं और मराठा शासन का विस्तार किया। इसी बीच बालाजी विश्वनाथ भट्ट ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कोंकणस्थ यहूदियों से हिंदू बन गये निम्नवर्गीय चितपावन ब्राह्मणों को भारी संख्या में न केवल ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठा दिया बल्कि उन्हें खेती की जमीनें भी दीं।
शासन-व्यवस्था पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद भी समस्या यह थी कि पेशवा, छत्रपति नहीं था। उसे अपनी प्रभुसत्ता बांटनी पड़ती थी। जबकि ग्वालियर के सिंधिया, नागपुर के भोंसले, बड़ौदा के गायकवाड़ और इंदौर के होल्कर सरदार कमोबेश पूरे राजा ही थे।
इसी बीच प्रमुख सरदारों को खुदमुखत्यारी (ऑटोनॉमी) दी गयी और एक मराठा संघ अस्तित्व में आया। इस 'संघ साम्राज्य' ने मुग़लों तक को दबाए रखा और उनसे कर वसूले। एक समय तो ऐसा भी आया जब पेशवा के बेटे की दिल्ली में ताजपोशी तक तय कर ली गई थी। इस तरह अब ये विशिष्ट महाराष्ट्रीय कुलीन ब्राह्मण बन गये लोग ही देश के शासक थे।
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इस प्रकार एक समय इस्रायल से भाग कर भारत में शरणार्थी बनकर आये यहूदियों ने केवल चार-पांच दशक में ही देश की सत्ता के केंद्र में अपने लिए प्रमुख स्थान बना लिया। उनके भीतर श्रेष्ठता का वही हैंगओवर आज तक मौजूद है। इसी वर्ग का मानना है कि अंग्रेजों ने मुग़लों से नहीं बल्कि मराठों (पेशवाओं) से, मराठी बाह्मण वर्ग से, भारत की सत्ता छीनी थी (जो उसे वापस लेनी होगी)।
आजादी के आंदोलन के दौरान उनका वही पेशवा होने का दम्भ कूटनीति से एक ओर सनातन धर्म की हिंदू के रूप में नई व्याख्या गढ़ रहा था तो दूसरी तरफ हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की भावना को उभार रहा था। मुस्लिमों को बाहरी आक्रांता बताते हुए उन्हें बाहर खदेड़ कर 'हिंदू धर्म' को फिर से गौरवान्वित करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उस सपने को मोहनदास करमचंद गांधी ने अनायास ही तोड़ दिया।
जब तक कांग्रेस का नेतृत्व इस तथाकथित महाराष्ट्रीय कुलीन यानी रानाडे, गोखले, तिलक के हाथ में रहा, ये लोग कांग्रेस से इस स्तर तक जुड़े रहे कि कांग्रेस को हिदू संगठन मानकर, उसके मुकाबले मुस्लिम लीग खड़ी हो गयी। मगर 1920 के बाद कांग्रेस और देश में गांधी का आना इनके लिए एक जबरदस्त झटका था।
उधर, गांधी समाज के सभी वर्गों के नये-नये लोगों को कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपते हुए आंदोलन को विस्तार देते जा रहे थे। मुस्लिमों, अछूतों, आदिवासियों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों, छात्रों आदि को पर्याप्त तवज्जो दे रहे थे। कांग्रेस के गांधीवादी स्वयंसेवक एक इलाके और एक तबके तक सीमित नहीं थे। यानी वे गुजरात, पंजाब, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, दक्षिण सब तरफ सक्रिय थे। और, बिना शक गांधी ही उनके नेता थे।
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इस तरह गांधी का यह प्रयोग इनकी सोच के विपरीत गया। तो इस महाराष्ट्रीय गुट ने एक तरफ कांग्रेस की मुखालफत और अंग्रेजों की तरफदारी चालू कर दी, तो दूसरी ओर गांधी जी की हत्या के प्रयास भी शुरू कर दिये। इन्हें उम्मीद थी कि हिंदुओं को कांग्रेस के खिलाफ भड़काने से वह टूट जायेगी। यही वह दौर था जब माधव सदाशिव गोलवलकर और विनायक दामोदर सावरकर कह रहे थे कि यदि अंग्रेज यहां से गये भी तो सत्ता हिंदुओं (यानी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों) को सौंपेंगे।
बहरहाल, अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश का विभाजन कराने में इस महाराष्ट्रीय गुट को सफलता मिल ही गई।
अब, अंग्रेजों के हटने के साथ ही इस महाराष्ट्रीय वर्ग को हिंदुओं को अखंड भारत बनाने के सपने दिखाते हुए अपने वर्चस्व की वही टूटी हुई श्रृंखला को फिर से जोड़ना था लेकिन नेतृत्व का अवसर तो कांग्रेस ने प्राप्त कर लिया। इसीलिए नफरत एवरेस्ट पर पहुंच गई और अब तक भी निशाने पर मुसलमानों के साथ-साथ कांग्रेस है। जिसका अक्स 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के उद्घोष में देखा जा सकता है।
यही मूल ग्रंथि है।
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कांग्रेस के नेता, बल्कि यों कहिए नेहरू, आधुनिक सोच के थे। उनका मॉडल प्रजातांत्रिक और समाजवादी था। जबकि इस महाराष्ट्रीय गुट के दिमाग में इतिहास की खाइयों में दफन हो चुका पेशवाई सामन्तशाही का गौरव अब भी घुसा हुआ था, जिसमें एक हिंदू राज्य (छत्रपति या सनातनी नहीं बल्कि पेशवा का राज = हिंदू राज = ब्राह्मण राज = मराठी ब्राह्मण राज) की संकल्पना थी।
यह उनका अपूर्ण एजेंडा था। तो अब इस महाराष्ट्रीय प्रभुवर्ग ने अपने नए संगठन बनाये, पार्टी बनाई, किताबें लिखीं, शाखाएं लगाकर प्रचार किया, नई-नई कहानियां गढ़नी शुरू की, मिथकों को इतिहास बताया। दुनिया भर के लेखकों, इतिहासकारों, अध्येताओं, रपटों, ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों, न्यायालयी फैसलों, सबूतों को कांग्रेसियों, वामपंथियों, मुसलमानों और विदेशियों द्वारा लिखित इतिहास बताते हुए सिरे से ही नकारना शुरू कर दिया।
ये हिंदू धर्म-विशारद बन बैठे, चीजें अपने अंदाज में बांचने की कला सीख थी। लक्ष्मीबाई और नाना साहब की बात खूब कहते लेकिन बेगम हजरत महल, शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन और अहमदुल्लाह को भूल जाते। शिवाजी की सेक्युलर नीति याद रही परन्तु टीपू का उल्लेख भूल जाते।
शुरू से उनके दल और संगठन को हिंदू राजे-रजवाड़ों का पूरा सहयोग मिला। आखिर हिंदू राजे कोई मौर्य, गुप्त काल के तो थे नहीं। ये सौ-दो सौ साल पुराने हिंदू राजे मराठा पेशवाई की ही उपज थे। डीएनए एक था और मजबूत होती कांग्रेस के खिलाफ अपना संगठन और हिंदूवादी राजनीतिक संगठन उनकी भी जरूरत थी।
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ग्वालियर के जीवाजी राव घनघोर महासभाई थे तो उनके सहयोग से उस दौर में हिंदूवादी दल ग्वालियर इलाके में फूल-फल रहे थे। नेहरू ने ग्वालियर के जीवाजी राव को कांग्रेस में आने का न्योता दिया। वे नेहरू को ना नहीं कह सके तो पत्नी विजय राजे सिंधिया कुछ समय के लिए कांग्रेस में आईं। मगर फिर घर-वापसी हो गयी। देश के दूसरे रजवाड़े भी हिंदू महासभा और उसके आनुषांगिक संगठनों से ही जुड़े। ये सब चितपावनों के संघ को खाद-पानी देते रहे।
बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने 1969 में राजाओं का प्रीविपर्स खत्म कर देश की मुख्यधारा के विपरीत चलने वाले इन हिंदूवादी संगठनों की आमदनी के स्रोत को बंद कर एक बड़ा झटका दे दिया।
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राजनीतिक अवसरवादी होना इन संगठनों की पेशवाकालीन विरासत और तासीर है। आपातकाल ने इन्हें शानदार मौका दिया। जयप्रकाश नारायण के साथ इन्होंने सत्ता की पहली सीढ़ी चढ़ी। कुछ दिन गांधीवादी समाजवाद का ढोंग भी किया। मगर सत्ता की मलाई मुख लगते ही अपनी मूलधारा में वापस आ गए। इस बार नए दौर के रजवाड़ों यानी कॉरपोरेट ने 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त' वाला फार्मूला अपनाते हुए इनके लिए अपनी तिजौरियां खोल दीं।
उग्रवादी हिंसक हिंदुत्व, मुस्लिम विरोध और स्वचयनित इतिहास के डिमेंशिया रोग के रथ पर सवार उस महाराष्ट्रीय संगठन ने अपना देशव्यापी जनाधार तैयार कर अपनी पकड़ लगातार बनाये रखी। साम्प्रदायिक, जातीय ऊंच-नीच का भेदभाव, पुरुषवादी सोच और धूर्तता इनमें रची-बसी है। ऊपर से नाजी और फासिस्ट कार्यप्रणाली व तौर-तरीके भी शामिल होकर करेला नीम की ऊंचाई तक चढ़ गया।
हिटलरी तौर-तरीकों और पेशवाई हैंगओवर में डूबे हुए ये लोग, इनका संगठन हिंदुस्तान की सबसे बड़ी प्रतिगामी फोर्स है। ये सोलहवीं-सत्रहवीं सदी और उससे भी पहले के भारत की मानसिक भावभूमि के साथ इक्कीसवीं सदी के भारत पर राज करना चाहते हैं। इनका दिशासूचक यंत्र भविष्य की ओर नहीं बल्कि भूतकाल की ओर जाने का संकेत करता है। ये न भारतीय संस्कृति के मूलाधार इसकी वैदिक परंपरा को मनते हैं, न लोकतंत्र को स्वीकार करते हैं, न ही समानता-समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को।
आप उन्नति के नाम पर काल्पनिक विकास, छद्म राष्ट्रवाद, अंधदेशभक्ति, कमजोर विपक्ष या कोई अन्य प्रतीक दिखाकर इनके किसी भी मोहरे को छत्रपति बना दीजिए, ये अपने पैर के अंगूठे से उसका राजतिलक कर देंगे लेकिन वास्तविक रूप से शासन-सत्ता की बागडोर इन्हीं के हाथों में रहेगी। तब तक ये अपने अपूर्ण एजेंडे पर काम करते रहेंगे।
स्पष्ट है कि इनका पेशवाई वर्चस्ववादी अहंकार अधिक समय तक वोटों का मोहताज रहना पसंद नहीं करेगा ! इसीलिए अपने सरसंघचलक को ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह भारत में हिंदुओं की धार्मिक आस्था और देश की राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठता देवता बनाने की पुरजोर कोशिश जारी है।

भारत में लोकतंत्र बचेगा या मनुस्मृति वाली शासन प्रणाली लागू होगी?

भारत में लोकतंत्र बचेगा या मनुस्मृति वाली शासन प्रणाली लागू होगी?



फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी से लेकर हिटलर और मुसोलिनी तथा दुनिया भर के अन्य जन-विरोधी शासकों के अंत का इतिहास न तो कांग्रेसियों ने लिखा है और न ही किसी वामपंथी ने, जो देश के वर्तमान गर्वोन्मत्त और आत्ममुग्ध सत्ताधारियों को चीख-चीख कर चेतावनी दे रहा है।
और, यह चित्र भी एक ऐसी ऐतिहासिक घटना की याद दिला रहा है जिसमें सामान ढोने वाली एक साधारण घोड़ा गाड़ी पर संगीनों के साये में सहम कर बैठी हुई महिला के दोनों हाथ पीछे की ओर बंधे हुए हैं। उसी के बगल में मायूस बैठे सिर झुकाये आदमी के भी दोनों हाथ बंधे हुए हैं।
मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा से च्युत बंदी बनाकर इस तरह ले जाये जा रहे ये दोनों कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी हैं।
इतिहास में दर्ज है कि फ्रांस में सत्ता और चर्च की दुरभिसंधि से प्रचलित शोषणकारी एकाधिकारवादी राजतंत्र और जमींदारी प्रथा समाप्त कर संवैधानिक राजतंत्र लागू करने और चर्च के अधिकारों को सीमित कर जनता को मताधिकार देकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लागू करने के लिए सर्वहारा वर्ग ने फ्रांस में ईस्वी सन् 1789 से 1799 के बीच दस साल तक लगातार संघर्ष किया।
अंततोगत्वा 1799 में राजा लुइस और रानी मैरी की गिरफ्तारी के बाद फ्रांस की जनक्रांति समाप्त हुई। बहुमूल्य वस्त्राभूषण पहनकर बड़ी ठसक से सोने की शानदार बग्घी में सफर करने वाले राजा-रानी दोनों को माल ढोने वाली टूटी-फूटी साधारण घोड़ा गाड़ी में कैदियों की तरह बिठाकर जेल में बंद कर दिया गया।
इससे पहले भी इतिहास में अनेकों राजा, महाराजा और सम्राट युद्ध में पराजित हुए, मारे गये या बराबरी वाले विजेता द्वारा कारावास में डाल दिये गये लेकिन यह पहली बार हुआ जब जनांदोलन के कारण न केवल किसी राजा के साम्राज्य का अंत हो गया, बल्कि उसे कैदखाने में बंद किया गया और अंततः राजा लुइस तथा रानी मैरी को मौत के घाट उतार दिया गया।
फ्रांस की क्रांति का प्रभाव दुनिया के दूसरे देशों पर भी पड़ना शुरू हुआ तो एक-एक कर तमाम साम्राज्यों की नींव दरकने लगी और राजशाही का अंत होने लगा। यूरोप, अफ्रीका, रूस, चीन में राजतंत्र को जनक्रांति के द्वारा उखाड़ फेंका गया। आलीशान महलों से संचालित राज परिवारों की शक्ति छीनकर जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ गई।
गुजरते हुए वक्त के साथ जनक्रांतियों का सिलसिला जारी रहा। फ्रांस की क्रांति के डेढ़ सौ साल बाद भारत में भी जनता ने ब्रिटिश शासन का जुआ अपने कंधों से उतार कर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
उधर 1979 में कट्टरपंथी मुस्लिम देश अफ़ग़ानिस्तान में भड़के जनविद्रोह के कारण कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना के लिए सोवियत सैनिकों ने देश में प्रवेश किया और सदैव के लिए राजशाही का अंत हो गया‌।
नेपाल में भी राजतंत्रीय व्यवस्था के विरुद्ध वर्षों तक चलते रहे जनांदोलनों और उथल-पुथल के बाद 2008 में लोकतंत्र की स्थापना हुई।
हालांकि इसी बीच नेपाल के एक छोटे-से राजनीतिक दल ने राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास शुरू किया है। जिसका अर्थ है—ब्राह्मणों द्वारा विष्णु का अवतार घोषित क्षत्रिय राजा के शासन का लौटना। जैसे सन 1949 में भारतीय गणराज्य में विलय से पहले और उसके दशकों बाद तक टिहरी रियासत के राजा को 'बोलांदा बदरीनाथ' यानी साक्षात भगवान बदरीनाथ कहा जाता रहा।

संघ देश का संविधान समाप्त करना चाहता है
भारत में आरएसएस ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह अपने सरसंघचालक को हिंदुओं की धार्मिक आस्था और राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने को प्रयासरत है। फासिस्ट वर्चस्ववादी संघ जिस तरह सधी हुई चालें चल रहा है उसे देखते हुए आने वाले समय में जल्दी ही भाजपा अत्यधिक शक्तिशाली हो सकती है। जिससे सरसंघचालक को राष्ट्रपति बनाकर संविधान समाप्त करना आसान हो जाएगा और फिर उसे ही पंडे-पुजारियों, भगवाधारियों और बड़े-बड़े दो-तीन पूंजीपतियों के गठजोड़ से भारत भाग्यविधाता घोषित कर दिया जायेगा। इसका संकेत अयोध्या में मंदिर निर्माण की शुरुआत करते समय देश की हिंदू परंपरा को किनारे रखकर किसी भी शंकराचार्य को आमंत्रित किये बिना ही मोहन भागवत ने स्वयं पूजा-अर्चना करके दे दिया है। राम मंदिर निर्माण के सम्मोहन से मंत्र-मुग्ध हिंदू जनमानस ने इस अपारंपरिक घटना का जरा भी नोटिस नहीं लिया। जबकि संघ की इस कुटिलता का हर हाल में विरोध होना चाहिए था।
दुनिया आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और वाणिज्य के सहारे निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर है परंतु हमें साम्प्रदायिक व जातीय घृणा तथा द्वेष का विषाक्त वातावरण बनाकर मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था और शासन प्रणाली की ओर धकेला जा रहा है। यह याद रखना चाहिए कि संघ-भाजपा की मजबूती का मतलब है संविधान और कानून के राज की समाप्ति और मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था का लागू होना।
इसके साथ ही यह भी विचारणीय है कि आज जिस तरह सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज़ लोग अपने चंद वित्त पोषकों और भगवा ब्रिगेड की मदद से झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर आमजन का जीवन दुखमय बनाने में जुटे हुए हैं, उससे जनक्रांति के फट पड़ने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। शायद इसका आभास शातिर दिमागों को हो गया है, इसीलिए तेवरों में बदलाव आता दिख रहा है। अन्यथा एक पत्रकार के सवाल का सीधा जवाब न देकर दोस्ती बनी रहे कहकर उठ खड़ा होने वाला नेता किसानों से खुलेआम माफी कदापि नहीं मांगता।

 

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...