जय भीम : अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की चेतना जगाती है
यदि आप फिल्म देखने के शौकीन हैं तो आपको 'जय भीम' फिल्म जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह आपके भीतर अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की न केवल चेतना जगाती है बल्कि उससे लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने का जज्बा भी पैदा करती है। यह ग्रामीण क्षेत्रों, खास तौर पर आदिवासी और दलितों के प्रति, भूमंडलीकरण के इस दौर में भी बरते जा रहे भेदभाव, शोषण तथा अमानवीय व्यवहार को रेखांकित करती है, बल्कि इससे जूझने को प्रेरित भी करती है।
यह फिल्म 1993 में चंद्रू नाम के एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा इरुलर जनजाति की महिला को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई पर आधारित है जो मद्रास हाइकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के वास्तविक जीवन से सम्बंधित है। जो तमिलनाडु की एक आदिवासी जनजाति के उत्पीड़न को बेहतरीन तरीके से दिखाती है।
फिल्म के निर्माता और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार सूर्या सिव कुमार ने फिल्म में आदिवासियों को न्याय दिलाने वाले वकील चंद्रू की भूमिका निभाई है। तमिल फिल्म निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल ने इसका निर्देशन और पटकथा लेखन किया है। फिल्म में के. मणिकंदन ने आदिवासी राजू कन्नू और लिजोमोल जोस ने आदिवासी राजू कन्नू की पत्नी संगिनी की भूमिका में जान डाल दी है। इसके संवाद, निर्देशन, दृश्य, कला और अभिनय को विश्व की चोटी की फिल्मों को टक्कर दी है। इनके अलावा सूर्या सिव कुमार, राजिशा विजयन, राव रमेश और प्रकाश राज जैसे स्टार्स ने भी दमदार अभिनय किया है।
इस फिल्म ने दो नवंबर को एमेजॉन प्राइम पर रिलीज़ होने के तीन सप्ताह में ही सर्वाधिक आइएमडीबी (IMDb) रेटिंग वाली हॉलीवुड फिल्म 'द शौशैंक रिडेम्प्शन' और 'द गॉडफादर' जैसी क्लासिक फिल्मों को पछाड़कर 10 में से 9.6 रेटिंग हासिल करने का रिकॉर्ड बनाया है। इस में हिंदू समाज की कठोर जातीय व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर मौजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले उस दमन की कहानी है जिनके पास रहने को एक झोपड़ी के लायक जमीन का टुकड़ा तक नहीं है। मतदाता सूची में भी इनका नाम इसलिए दर्ज नहीं किया गया है ताकि चुनाव में समाज के प्रभुवर्ग को उनकी देहरी पर वोट मांगने न जाना पड़े। न राशन कार्ड है, न बच्चों की पढ़ने की कोई व्यवस्था।
फिल्म की शुरुआत में ही सामाजिक विद्रूप को प्रदर्शित करने वाला ऐसा घिनौना, डरावना और जुगुप्सापूर्ण दृश्य है जिसमें जेल के बाहर खड़े पुलिस वाले जेल से छूटने वाले लोगों में से जाति पूछ कर कुछ को जाने को कहते हैं और कुछ को अपने साथ ले जाकर पुराने अनसुलझे मामलों में अपनी खाल बचाने के लिए दूसरे मामलों में बंद कर देते हैं।
यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि ऐसी घटनाएं हमेशा से होती आई हैं और अब भी हो रही हैं। देश के छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में हाशिए पर मौजूद लोगों, ख़ासकर दलितों का जीवन बहुत ही ज्यादा मुश्किलों से भरा हुआ और अनिश्चित है। उनका अधिकाधिक शोषण करने के लिए सामंतवादी और मनुवादी वर्ग हमारे समाज की जातीय भेदभाव पर आधारित व्यवस्था में पुलिस-प्रशासन को एक औजार की तरह इस्तेमाल करता आया है।
फिल्म की चाक्षुषता इसलिए भी अधिक है जब आज की वर्तमान राजनीति में यह अनेक बार देखा जा चुका है कि सवर्ण नेता-मंत्रीगण और उनके संगठन अपने स्वजातीय जघन्य अपराधियों को बचाने के लिए आंदोलन तक करते हैं, उनका फूल-मालाओं से स्वागत-सत्कार करते हैं क्योंकि वे जाति व सम्प्रदाय के आधार पर खुद को दूसरों से ऊपर समझते हुए अपने जन्म, जाति, कर्म, सामाजिक रुतबे के अनुसार इसे अपना अधिकार समझते हैं।
यह विचारणीय है कि हम संवैधानिक रूप से एक लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज होते हुए भी ऐसा वातावरण बनाने को स्वीकार कर लेते हैं जिसमें आरएसएस तथा कुछेक अन्य संगठन सार्वजनिक रूप से खुलेआम अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा व घिनौनी हरकतों के लिए लोगों को उकसाते हुए दिखते हैं। इन संगठनों का काम अपने सजातीय लोगों द्वारा किये गये अनैतिक और आपराधिक कृत्यों पर पर्दा डालना और उन्हें किसी भी हद तक जा कर बचाना है।
यही इस फिल्म का थीम है और इसके जरिये यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि समाज का समृद्ध और सामर्थ्यवान वर्ग पुलिस व तंत्र के साथ मिलकर जिस तरह पीढ़ियों से निर्धन व दबे-कुचले लोगों के प्रति जातीय आधार पर अन्याय, शोषण और उत्पीड़न करता आया है, उन लोगों को न्याय दिलाने के लिए अपने घरों से निकलिए, उनकी सुनिये, उनसे बात कीजिये, उनके दर्द को समझिये और तब अपनी समझ बनाइये।
फिल्म में मावाधिकारों के संरक्षण तथा अपराधों की वैज्ञानिक तरीकों से गहन जांच-पड़ताल करने की जरूरत बताई गई है क्योंकि ये अदालती निर्णयों को जबर्दस्त तरीके से प्रभावित कर सच्चाई का पता लगाने में मददगार होते हैं।
फ्रेम-दर-फ्रेम आदिवासियों और दलितों के प्रति बरती जाने वाली अमानवता और तद्ज्जनित समस्याओं के दर्द को उकेरती एक भी ऐसी फिल्म मैंने अब तक नहीं देखी।
हालांकि तमिलनाडु के उच्च वर्ग में शुमार वन्नियार समुदाय के लोगों ने इस फिल्म के कुछ दृश्यों पर आपत्ति उठाते हुए निर्माता-अभिनेता सूर्या को निशाना बनाया था लेकिन निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल द्वारा फिल्म के माध्यम से उनका किसी व्यक्ति या समुदाय को अपमानित न करने का इरादा न होने और जिन्हें इससे ठेस पहुंची है उनके प्रति खेद व्यक्त करने से मामला ठंडा पड़ गया।
चूंकि फिल्म के निर्माता सूर्या सिव कुमार हैं तो इसमें उनकी भूमिका को एक वकील से भी बढ़कर कुछ ज्यादा ही उभारा गया है जो व्यावहारिक जीवन में संभव नहीं होता है। इस 'अति' को नजरअंदाज कर फिल्म देखना स्वयं में एक अनुभव होगा।