शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है

 अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है

भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र तैयार है।

(फोटो―वेंगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा 'बाबा वेंगा')
अपनी इन्द्रियातीत अनुभूतियों के आधार पर सटीक भविष्यवाणी करने वाली बुल्गारियाई महिला वेंगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा जो ‘नास्त्रेदमस फ्रॉम द बाल्कन, लेडी नास्त्रेदमस और वॉलकाँस या बाबा वेंगा के नामों से विश्वविख्यात है, ने 1996 में 85 वर्ष की उम्र में अपनी मृत्यु से वर्षों पहले पूरी धरती पर रोबोट्स की फौज होगी, धरतीवासी कृत्रिम सूर्य बनाने में सफल हो जाएंगे, एलियंस की मदद से मनुष्य समुद्र की तलहटी में आवासीय बस्ती बना लेगा, टाइम ट्रैवल के जरिये दूसरे ग्रहों से सम्बंध बनेंगे, मनुष्य शुक्र ग्रह तक पहुंच जाएगा, मंगल पर पृथ्वीवासियों का भयानक युद्ध होगा और पृथ्वी पर एक नयी मानव सभ्यता का अभ्युदय होगा जैसी भविष्यवाणियों के साथ ही यह भी कहा था कि इंसान व रोबोट मिल जाएंगे जिन्हें ‘साइबोर्स’ कहा जायेगा। तो शायद वर्तमान मनुष्य उसके बहुत करीब पहुंच गया है।
जी हां, बिल्कुल यह सच होने जा रहा है। गूगल, फेसबुक तथा वीडियो गेम बनाने वाली कंपनियों सहित दुनिया की अनेक प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों ने इस काम में हजारों इंजीनियरों को लगा रखा है। कहा जा रहा है कि यह भविष्य की तकनीक है जो मौजूदा दुनिया को पूरी तरह से वर्चुअल बनाने की एक कोशिश है। इस योजना पर इस साल 10 अरब डॉलर की राशि खर्च करने जा रही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग इस तकनीक को भविष्य बता चुके हैं और इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने फेसबुक को नया नाम 'मेटा' दिया है जो अंग्रेजी के Metamorphosis यानी 'कायाकल्प' का संक्षिप्तीकरण है। ऐसा क्यों किया गया, यह परीकथा आगे पढ़िये―
मार्क जुकरबर्ग द्वारा फेसबुक का नाम बदलकर मेटा करने के पीछे भविष्य पर गढ़ी उनकी नजर है। यह मेटावर्स नामक एक पेरेंट कंपनी का हिस्सा है जिसमें अभी फेसबुक,ह्वट्सऐप और इंस्टाग्राम हैं लेकिन आगे चलकर इसमें कंपनी के दूसरे प्लेटफॉर्म्स भी आएंगे।
मार्क इंटरनेट का भविष्य अपनी कंपनी मेटावर्स के जरिये देख रहे हैं जो वर्तमान से एकदम अलग एक नयी दुनिया होगी। वैसे होगी तो यह आभासी ही लेकिन समय बीतने के साथ ही यह आभासी दुनिया ही वास्तविक बनती जाएगी, जिसमें आप न सिर्फ दूरस्थ जीवित लोगों से बात कर पाएंगे बल्कि मृतकों से भी जिंदा लोगों की तरह बात कर पाएंगे। यह कोरी गप्प नहीं, हकीकत है।
CNN की एक खबर के अनुसार बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने मरे हुए परिजनों तथा ज्ञात-अज्ञात लोगों और सेलेब्रिटीज से बातचीत करने में सक्षम एक नई चैटबोट का पेटेंट पिछले साल कराया है। इस चैटबोट में मृतकों के सोशल प्रोफाइल से डेटा लेकर फीड करके उसके आधार पर नया प्रोग्राम तैयार होगा। जिसके आधार पर न सिर्फ मरे हुए लोगों से बातचीत सम्भव होगी, बल्कि उस समानान्तर दुनिया में आप घूमने-फिरने, खेलने, लोगों से मिलने-जुलने, सामान खरीदने से लेकर वे सभी काम कर सकेंगे जो इस शरीर से प्रत्यक्ष तौर पर अभी कर रहे हैं। इसके लिए उनके वर्चुअल रियलिटी हेडसेट्स, ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस, स्मार्टफोन ऐप्स और अन्य डिवाइसों की जरूरत पड़ेगी।
अभी तक आप मोबाइल फोन पर वीडियो कॉल कर किसी जगह या अपने किसी पसंदीदा लाइव शो का आनंद ले सकते हैं, लेकिन मेटावर्स इससे काफी आगे की चीज है। इसमें आप डिजिटल क्लॉथिंग के जरिए एक वर्जुअल दुनिया में एंट्री कर लेंगे। यानी शारीरिक तौर पर आप अपने घर में हैं लेकिन आपका दिमाग खास डिजिटल उपकरणों की सहायता से वर्चुअल दुनिया में विचरण कर रहा होगा।
हालांकि इस तकनीक को पूरी तरह से विकसित होने में 10 से 15 साल लग सकते हैं क्योंकि यह अलग-अलग टेक्नोलॉजी का बड़ा-सा जाल है जिसे कोई एक कंपनी नहीं बना सकती। इसीलिए इस पर कई कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं।
यदि गहराई से देखा जाये तो यह सारा प्रपंच न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की अगली अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। जो भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र है। जो कमोवेश बाबा वेंगा द्वारा बताये गये 'साइबोर्स' से मिलते-जुलते होंगे।
आदमी को अपना खिलौना बनाने वाली इस तकनीक को चार्ली ब्रोकर द्वारा लिखी कहानी पर बनी वेब-सीरीज 'ब्लैक मिरर' तो इससे आगे की बात बता रही है जिसे आप कोरी कल्पना कह कर खारिज नहीं कर सकते। फिलहाल इसे समझने के लिए आप इस वेब-सीरीज के सीजन-2 के पहले एपिसोड का हिंदी में सिर्फ 11ः39 मिनट का ट्रेलर https://www.youtube.com/watch?v=58bYgkPB2qE पर जाकर जरूर देख लीजिये। जबकि इसके पाँचों सीजन नेटफ्लिक्स पर हिंदी सब-टाइटल्स के साथ उपलब्ध हैं।
तो तैयार रहिये आदमी से साइबोर्स बनाये जाने के लिए !


अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

 अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

साहिबान कहते हैं कि इस दुनिया में अच्छा-बुरा समय सबका आता है।
अब यही देख लीजिये कि हिटलर के चरमोत्कर्ष के दिनों में किसने सोचा होगा कि उसे एक दिन अपने अत्यधिक सुरक्षित बंकर में खुद को गोली मार कर खत्म करना पड़ सकता है।

(फोटो साभार―गूगल)

नाजियों ने वर्ष 1933 से 1945 के कालखंड में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे। उस अमानवीय वीभत्स हत्याकांड को 'होलोकॉस्ट' कहा जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि हिटलर का मकसद दुनिया से यहूदियों का पूरी तरह खात्मा करना था।
उस युद्ध के समाप्त होने के बाद पकड़े गये नाजियों के अमानवीय कुकर्मों के लिए उन पर जर्मनी के शहर न्यूरेम्बर्ग में मुकदमा चलाया गया जो 'न्यूरेम्बर्ग ट्रायल' कहलाता है। 20 नवबर,1945 से 1 अक्तूबर,1946 तक करीब 2018 दिन चले ट्रायल में हिटलर के अत्यंत विश्वसनीय सहयोगी हरमन गोइरिंग, रुडॉल्फ हेस, होआचिम वॉन रिबेनट्रॉप और 18 उच्चस्तरीय़ नाजियों पर मुकदमा चला जिसमें कई सौ लोगों ने गवाही दी।
इसमें अमेरिकी वकील रॉबर्ट जैकसन और उनके साथियों ने जर्मनों की साजिश को दुनिया के सामने लाने का काम किया। सुनवाई पूरी होने पर 1 अक्टूबर, 1946 को हिटलर के 11 साथियों को मौत की सजा दी गई। जबकि हरमन गोइरिंग ने एक दिन पहले ही जहर खाकर जान दे दी थी।
हिटलर की आत्महत्या के कुछ ही घंटों बाद झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल बुनने के लिए कुख्यात उसके प्रोपेगैंडा मंत्री डॉ. जोसेफ गोएबेल्स और उसकी पत्नी मैग्डा ने अपने 6 बच्चों को मार कर अपने-आप को खत्म कर लिया था।
इसी तरह भारत में आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर मुख्य न्यायाधीश जसटिस जेसी शाह की अध्यक्षता में मार्च 1977 में आयोग का गठन किया। जस्टिस शाह द्वारा 11 मार्च, 1978 को तत्कालीन सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इंदिरा गांधी के कुछ सलाहकारों और अफसरों को ज्यादतियों के लिए दोषी माना। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इन लोगों ने नियमों से परे जाकर अपने पद और शक्तियों का गलत ढंग से इस्तेमाल किया।
हालांकि दिल्ली हाइकोर्ट ने बाद में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
शाह आयोग की रिपोर्ट में इंदिरा सरकार में रक्षा मंत्री बंसीलाल, सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला, इंदिरा के निजी सचिव आरके धवन, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर कृष्ण चंद, उनके सचिव नवीन चावला, दिल्ली पुलिस में डीआइजी पीएस. भिंडर को दोषी बताया गया था।
आपातकाल के दौरान दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर रहे कृष्ण चंद पर विपक्ष के तमाम नेताओं को जबरन जेल भेजने और बेतुके फैसले करने के आरोप थे। कहा जाता है कि उन दिनों जब दिल्ली में बड़े पैमाने पर लोगों के घर और व्यावसायिक जगहों की तोड़फोड़ हुई तो वह सब कृष्ण चंद के आदेशों से हुआ था। हालांकि चंद ने शाह आयोग के सामने कहा कि वे कमजोर आदमी थे। उन्हें जैसा आदेश ऊपर से मिलता था, वे वैसा ही करते थे।

(फोटो साभार―इंडिया टुडे)

शाह आयोग के सामने हुई पेशियों से कृष्ण चंद को अनिष्ट की आशंका हुई तो उन्होंने 09 जुलाइ, 1977 की रात दक्षिण दिल्ली के एक 60 फुट गहरे परित्यक्त कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली। उनके दो सुसाइड नोट मिले, एक उनकी पत्नी सीता के नाम उनके बेडरूम में छोड़ दिया गया था और दूसरा उनके जूतों के साथ कुएं की कंक्रीट पर मिला।
इसलिए समझदारी इसीमें है कि सत्ता, पद, अधिकार, शक्ति मिलने पर अच्छे दिन लाने की चाह में जरूरी नहीं कि वे ही आयेंगे, बुरे दिन भी आ सकते हैं, यह सोचकर अन्याय, उत्पीड़न और मनमानी करने से बचना चाहिये।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

भारत की पहली स्वंतत्र सरकार काबुल में बनी थी !

 भारत की पहली स्वंतत्र सरकार काबुल में बनी थी !


क्या आपको मालूम है कि 21 अक्टूबर, 1943 को बनी नेताजी सुभाष चद्र बोस की आजाद हिंद सरकार से 27 साल पहले ही एक राष्ट्रीय सरकार का गठन हो चुका था? सन 1914 ई. में मौलाना उबायदुल्ला सिंधी ने काबुल (अफ़गानिस्तान) में भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को बना दी थी। जिसके राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह और प्रधानमंत्री शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन को बनाया गया था।

(फोटो साभार―Swapnil Sansar)

क्या आप जानते हैं कि 30 मई, 1866 को स्थापित दार-उल-उलूम देवबंद की देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका थी? एशिया के इस सबसे बड़े इस्लामिक शिक्षा केंद्र के विख्यात अध्यापक व संरक्षक विद्वान मौलाना महमूद अल-हसन उन सेनानियों में से एक थे जिनकी लेखनी, ज्ञान, आचार तथा व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेख-उल-हिंद (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया था।

शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता थे। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अभूतपूर्व योगदान किया। हकीम अजमल खान जैसे आंदोलनकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजी हस्तक्षेप से परे दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना की। मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) की विद्वता और शिक्षा के प्रति गहरे लगाव के कारण ही इन्हें इमदादुल्लाह के हज़ पर जाने के बाद दार-उल-उलूम देवबंद का ख़लीफ़ा बनाया गया था।

वे अपने मुस्लिम छात्रों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने भारत के भीतर और बाहर दोनों ओर से ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू किया। देश-विदेश में फैले उनके असंख्य शिष्यों में से बड़ी संख्या में इस आंदोलन में शामिल हो गए। उनमें सबसे प्रसिद्ध मौलाना उबायदुल्ला सिंधी और मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी थे।

मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) ने 1878 में अंजुमने समरतुत की शुरुआत कर आज़ादी का संघर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 28 दिसंबर, 1885 को स्थापना होने से भी पहले चालू कर दिया था और 1909 में जमीयत-उल-अंसार की बुनियाद डाली।

शेख-उल-हिंद ने आज़ादी की लड़ाई तेज करने के लिए दार-उल-उलूम के अंदर एक संगठन खड़ा किया जिसकी सरगर्मी सरहदी इलाक़ों में अधिक थी। इस संगठन की बागडोर मौलाना उबायदुल्ला सिंधी के हाथ में सौंपी गई थी और 1913 में मुरादाबाद में सम्पन्न हुए इसके पहले सम्मेलन के बाद देश में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध व्यापक तैयारी शुरू हो गई। जिसके तहत रेशमी रूमाल जैसा एक महत्वपूर्ण गुप्त आंदोलन शुरू हुआ। अंग्रेजों की नजर बचाकर आजादी के दीवाने अपनी गुप्त योजनाओं का संदेश रेशमी रूमाल पर लिखकर आदान-प्रदान करते थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र में जाकर अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध प्रचार किया। यहां तक कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरानी शासकों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ने को तैयार हो जाये तो ज़मीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।

➤ सन 1914 ई. में मौलाना उबायदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को काबुल में बना दी थी।
➤ इस सरकार का राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को बनाया गया।
➤ शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन उक्त सरकार के प्रधानमंत्री बने।
➤ मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली तथा मौलाना उबायदुल्ला सिंधी इस सरकार में मंत्री थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने अपने शिष्य मौलाना उबायदुल्ला सिंधी को काबुल भेजने के साथ ही स्वयं हिज़ाज़ (अरब) की ओर प्रस्थान किया ताकि तुर्की हुकूमत से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मदद ली जा सके। इन्होंने वहां भी रेशमी रूमाल के जरिये अपने गुप्त संदेश मक्का और मदीना के गवर्नर को तथा मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी के हाथ सीमांत इलाक़ों में भेज दिया। जिसकी भनक अंग्रेज़ों को लग गई और इनका रहस्य खुल गया। मौलाना महमूद हसन और उनके साथी मौलाना वहीद अहमद फैज़ाबादी, मौलाना अज़ीज़ गुल, हकीम सैय्यद नुसरत हुसैन को गिरफ़्तार कर मॉल्टा भेज दिया गया। शेख-उल-हिंद 3 साल 19 दिन तक माल्टा की जेल में रहे। वे जब 8 जून, 1920 को पानी के जहाज से मुंबई पहुंचे तो उनका स्वागत करने वालों में महात्मा गांधी जैसे लोग भी थे।

इतिहास गवाह है कि अंग्रेज तत्कालीन मदरसों को राष्ट्रवाद का केंद्र कहते थे और इन्हें बंद करवा देते थे। आज भी वही काम हो रहा है। आजादी का इतिहास मिटाया जा रहा है। देश के इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत बताई जा रही है क्योंकि संघ ने देश की बलिवेदी पर शीश अर्पित करने वाले नहीं, गोडसे जैसे कलंक पैदा किये। इसीलिए देश की आजादी के आंदोलन में विघ्न डालने वाले नागपुरिया विषविद्यालय वाले आपको यह कभी नहीं बतायेंगे कि 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष में 5 लाख उलेमाओं ने भी शहादत दी थी। जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा है 5 लाख! अकेले एक कस्बे देवबंद जैसी छोटी बस्ती में ही 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था।

भारत की इस पहली आजाद सरकार को सौ-सौ सलाम ! देश के लिए किया गया इनका तप-त्याग आज भी हम पर कर्ज है, जिसे हम भूल गये हैं।
देश की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सभी अनाम शहीदों को हजारों-हजार सलाम !


गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

 कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

रूसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर लियोनिदोविच चिझेव्स्की पिछली सदी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी चिझेव्स्की न केवल एक प्रतिभाशाली आविष्कारक थे, बल्कि कॉस्मोबोलॉजी और हेलिओबोलॉजी के संस्थापक भी थे, जिन्होंने विश्व इतिहास की नई दार्शनिक समझ भी प्रस्तुत की थी।

(फोटो साभार―Prabook)

26 जनवरी, 1897 को एक फौजी अधिकारी के परिवार में जन्मे चिझेव्स्की ने अपनी युवावस्था में ही एक अद्भुत खोज की, जिसे सूर्य और पृथ्वी के पारस्परिक सम्बंध में बड़ी खोज कहा गया। चिझेव्स्की ने अपने इस अत्यंत महत्वपूर्ण शोध में बताया कि सूर्य में प्रत्येक 11 वर्ष के अंतराल पर आण्विक विस्फोट होते हैं और सूर्य पर जब-जब यह क्रिया घटती है, तब-तब पृथ्वी पर बड़ी क्रांतियां घटती हैं। चिझेव्स्की पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि पृथ्वी पर जीवन सूर्य की गतिविधि के साथ एक तरह से जुड़ा हुआ है, यह ब्रह्मांडीय बल है जो जीवमंडल में जीवन की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है। सूर्य में 11 वर्ष की अवधि में दोहराई जाने वाली ये घटनाएं हमारे ग्रह पर प्रजनन की तीव्रता और जीवों की वृद्धि-दर को प्रभावित करती हैं। पृथ्वी पर जीवन का विकास स्थलीय और ब्रह्मांडीय कारकों की पारस्परिक प्रक्रियाओं का परिणाम है; लौकिक दुनिया और स्थलीय जीवमंडल की दुनिया एक साथ जुड़ी हुई है। ये विचार पहली बार 1915 में चिज़ेव्स्की द्वारा व्यक्त किए गए थे।
उन्होंने अपनी बात सिद्ध करने के लिए पिछले कई सौ वर्षों का ब्यौरा प्रस्तुत किया। भारत में तो पहले ही इस पर बहुत काम हुआ और हम मानते रहे हैं कि सुदूर अंतरिक्ष में घटित होने वाली खगोलीय घटनाएं पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं की कारक बनती हैं। चिझेव्स्की ने अपने इस शोध को 'हेलिओबायोलॉजी' कहा था। इसे आसान भाषा में सूर्य का जीव-जगत पर पड़ने वाला प्रभाव या इनका अंतर्सम्बंध कह सकते हैं। चिझेव्स्की का शोध विज्ञान की कसौटी पर खरा था। उनके शोध को बड़ी मान्यता मिली। उनको कई विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के लिए बुलाया गया। अमेरिका ने भी बुलाया। उनको 1939 में अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस ऑफ बायोलॉजिकल फिजिक्स एंड स्पेस बायोलॉजी का मानद सदस्य चुना गया। विद्वानों का मानना है कि वे सोवियत यूनियन में नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले व्यक्ति हो सकते थे लेकिन तब तक बहुत समय नष्ट हो चुका था और उनका शोध आगे न बढ़ सका। लेकिन उनके अपने देश रूस में क्या हुआ? वह समय था जब सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन का शासन था। कम्युनिस्ट सोवियत का विचार था कि क्रांतियां आर्थिक असमानता के चलते होती हैं। इसलिए उन्हें चिझेव्स्की का यह शोध हजम न हुआ। खुद को विज्ञानवादी कहने वाले कम्युनिस्टों ने चिझेव्स्की के विज्ञान पर विचार किया ही नहीं। उसका अध्ययन करने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
(फोटो साभार―wikipedia.org)

मार्क्स की थ्योरी को वैज्ञानिक बताने वाले उसके अनुयायियों को कुछ और कहां दिखता है। उनकी मान्यता है कि 'कार्ल मार्क्स ज्ञान की सर्वसत्ता हैं। उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता है। वही ध्रुवसत्य है।' इसी ग्रंथि के चलते स्टालिन ने सीधे कहा, "तुम्हारा शोध 1905 व 1917 में हुई हमारी क्रांति की अवधारणा के अनुकूल नहीं है। इसे बदल दो। हम अपनी व्याख्याएं संपादित नहीं कर सकते। न ही उससे इतर कोई तथ्य या व्याख्या स्वीकार कर सकते हैं।" चिझेव्स्की ने मना कर दिया। नतीजतन 1942 में चिझेव्स्की को गिरफ्तार कर लिया गया। तानाशाह स्टालिन उन्हें निश्चित ही मार देता, परंतु चिझेव्स्की के पिता रूसी सेना की आर्टिलरी के प्रमुख जनरल थे। इसलिए रहम करके जान बख़्श दी गई और उन्हें 8 साल जेल में बिताने पड़े। इस तरह इतने सालों तक उन्होंने अपने शोध की कीमत जेल में रहकर चुकाई। विचारधारा के कोरे अनुयायियों की वर्चस्ववादी सोच ने ज्ञान को ढांपने का प्रयास किया। इसीलिए कोरी विचारधारा नर्क है। बंधे-बंधाये विचार रूढ़िवाद और नर्क का मार्ग हैं क्योंकि विचारधारा का रूढ़िवाद ज्ञान के कपाट का उद्घाटन नकार देता है। सतत प्रवहमान नदी पोखर बन जाती है। विचारों से चित्त बनता है। चित्त से कर्म की प्रेरणा होती है और कर्म से व्यक्तित्व का निर्माण होता है लेकिन क्या मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसका अस्तित्व है? या जीवनी-शक्ति का महत्व अधिक है? जीवन तो प्रकृति प्रदत्त है, विचारधारा कृत्रिम और मानव समाज द्वारा विकसित है। विचारधारा के अंधेपन में जीवन को नकार देना त्रासदी है। ज्ञान को नकार देना आपदा है। विचार तो नाव की तरह होते हैं, जहां तक उनकी आवश्यकता हो वहीं प्रयोग करके, फिर वहीं छोड़ देना यथेष्ठ है। उसे अकारण बोझ की तरह ढोने का कोई मतलब नहीं। और कम से कम ज्ञान-विज्ञान को कोरी विचारधाराओं से बरी रखने से ही मानवजाति का भला हो सकता है।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है !

 मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है !

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

मैक्सिको की संसद के निचले सदन केमारा दे दिपुतादोस में अपने कपड़े उतारते और अंडरपैन्ट्स पहने पोडियम के पीछे खड़े होकर भाषण देते ये सज्जन मैक्सिको की डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन पार्टी के संसद सदस्य अंटोनियो गर्तिया कोनेहो (Antonio Garcia Conejo) हैं। सन् 2013 में बीबीसी, द वाल स्ट्रीट जर्नल और डेली मेल द्वारा प्रकाशित ये तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हैं।

इन अखबारों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंटोनियो गर्तिया कोनेहो संसद में अपने कपड़े उतार कर नए एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसके तहत एक-दूसरे से प्रॉफ़िट शेयर करने के लिए प्राइवेट कंपनियों को सरकारी कंपनी पेमेक्स (Pemex) के साथ तेल और गैस के खनन की मंज़ूरी दी गयी थी।

द गार्डियन ने अगस्त में रिपोर्ट किया था कि मैक्सिको की सरकारी तेल कंपनी पेमेक्स के पूर्व मुखिया एमिलिओ लोजोया ने वहां के पूर्व राष्ट्रपति एनरीक पेना नियेतो, फे़लिप काल्देरों और कार्लोस सेलिनास पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

अंटोनियो गर्तिया का यह ऐतिहासिक भाषण केमारा दे दिपुतादोस (Cámara de Diputados) ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया था। दरअसल वे सरकार के एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसने प्राइवेट कंपनियों को सरकारी तेल कम्पनी के साथ निवेश की मंज़ूरी दी थी।

गर्तिया कपड़े उतारना शुरू करते हैं और कहते हैं, “क्योंकि वे (सरकार) ऐसा कर रहे हैं, इसलिए मुझे शर्म नहीं आ रही है। सरकार ने मैक्सिको के टेलिकॉम को छीन कर निजी हाथों में दे दिया। मुनाफ़ा कहां गया? मैक्सिको का रेल-रोड भी कोई मुनाफा नहीं देने वाले। शर्म आनी चाहिए तुम्हें…! तुम इसे जो चाहे कहो। तुम कायर हो, तुम एक कायर हो, तुम एक कायर हो। तुम लोग डरपोक हो क्योंकि जब वे तुम्हारे कपड़े उतार रहे थे तब तुमने कुछ नहीं किया।”

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में उनका बयान दिया था, “ऐसे ही तुम देश को भी नंगा कर रहे हो। मुनाफ़ा कहां है? मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है।”

मैक्सिको में 2013 के दौरान जो कुछ भी हो रहा था, भारत में पिछले सात सालों में उससे भी कहीं अधिक भयावह स्थिति बना दी गई है और वह क्रम अभी भी निर्बाध रूप से जारी है। बड़ी तेजी से अरबों-खरबों रुपए के सरकारी उपक्रम और सम्पत्तियां अपने मित्रों को औने-पौने दामों पर सौंपी जा रही हैं जिसके बदले में पीएमकेअर फंड और इलैक्टोरल बॉन्ड्स जैसे चोर रास्तों से रिश्वत लेकर अकूत धन इकट्ठा किया जा रहा है। तरह-तरह के उपायों से जनता की जेब खाली कर उसकी बचत और क्रयशक्ति को खत्म किया जा रहा है। आलोचकों, विरोधियों और आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। उन्हें झूठे मुक़दमे दर्ज कर जेलों में ठूंस दिया जा रहा है। पूंजीपतियों द्वारा संचालित मीडिया के माध्यम से देश को गुमराह किया जा रहा है। यानी तानाशाही पूरे चरम पर है।

ऐसे में किसी राजनेता और मीडिया आउटलेट्स से इस तरह सत्ताधारी पार्टी की बखिया उधेड़ने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

तीन हत्या, तीन बलियां के बकरे और एक षड्यंत्रकारी

 तीन हत्या, तीन बलियां और एक षड्यंत्रकारी

वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस के नायकों में आप किसको शामिल करना चाहेंगे? जो किसी युद्ध या लोकहित के संघर्ष में आगे बढ़कर अपने प्राणों की आहुति देने को सदैव तत्पर रहते हैं या खुद को पीछे रखकर दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर पर्दे की ओट में कायर, डरपोक और नपुंसक की तरह छिप जायें? अपने और दूसरों के जीवन का मोल और महत्व के पैमाने अलग-अलग मानने वाले को आप क्या कहेंगे—सज्जन, सीधा, सरल, ईमानदार या फिर धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान, हत्यारा?

चलिए बात शुरू करते हैं इंग्लैंड से। जहां लंदन के इंडिया हाउस में भारत की आज़ादी के चाहने वाले अक्सर इकट्ठा होकर आपस में चर्चा करते। यहीं पर विनायक दामोदर सावरकर ने एक गुप्त संगठन अभिनव भारत बनाया। इसके एक सदस्य तीन हत्या, तीन बलि के बकरे और एक षड्यंत्रकारी

वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस के नायकों में आप किसको शामिल करना चाहेंगे? जो किसी युद्ध या लोकहित के संघर्ष में आगे बढ़कर अपने प्राणों की आहुति देने को सदैव तत्पर रहते हैं या खुद को पीछे रखकर दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर पर्दे की ओट में कायर, डरपोक और नपुंसक की तरह छिप जायें? अपने और दूसरों के जीवन का मोल और महत्व के पैमाने अलग-अलग मानने वाले को आप क्या कहेंगे—सज्जन, सीधा, सरल, ईमानदार या फिर धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान, हत्यारा? 

(फोटो―विनायक दामोदर सावरकर, साभार―सोशल मीडिया)

चलिए बात शुरू करते हैं इंग्लैंड से। जहां लंदन के इंडिया हाउस में भारत की आज़ादी के चाहने वाले अक्सर इकट्ठा होकर आपस में चर्चा करते। यहीं पर विनायक दामोदर सावरकर ने एक गुप्त संगठन अभिनव भारत बनाया। इसके एक सदस्य मदन लाल ढींगरा भी थे।

मदनलाल ढींगरा को सावरकर ने बंगाल विभाजन के जिम्मेदार वॉयसराय लॉर्ड कर्जन को मारने का काम सौंपा। मदनलाल ने कर्जन की हत्या के तीन प्रयास किये लेकिन कभी हिम्मत न होती तो कभी जगह पर पहुंचने में देर हो जाती। इस पर प्रेरणास्रोत सावरकर ने ढींगरा को अपमानित करते हुए एक आख़िरी मौका दिया और कहा, "अबकी बार असफल हुए तो फिर कभी मुझे मुंह मत दिखाना।" 

(फोटो―मदन लाल ढींगरा, साभार―सोशल मीडिया)

लेकिन कर्जन निश्चित कार्यक्रम में भाषण देकर जा चुके थे और कर्जन का भतीजा कर्जन वाईली सामने पड़ गया। इस बार खाली हाथ न आने की कसम दी गई थी, सो ढींगरा ने भतीजे को ही गोली मारकर ढेर कर दिया। 

गुरु-चेला दोनों गिरफ्तार कर लिये गये।

मुकदमा चला, जिसमें गुरुजी साफ मुकर गए। पुलिस को उनके खिलाफ सबूत नहीं मिला तो छूट गए और शिष्य मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।

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विनायक दामोदर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी अभिनव भारत के सक्रिय सदस्य थे। गुरु जी ने इस बार नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन को मारने का प्लान बनाया। तो इसके लिए अनंत लक्ष्मण कान्हारे को उकसाया गया। करो या मरो के गुरुमंत्र के साथ हाथ में पिस्तौल थमा दी गयी। कन्हारे ने गुरुआज्ञा का पालन करते हुए 29 दिसंबर, 1909 कलैक्टर को मार गिराया। पकड़े गए, मुकदमा झेला और अंत में फांसी चढ़ा दिये गये। 

लेकिन इस बार गुरु जी भी फँस गये। जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल पिस्तौल की खोज से पता चला कि दामोदर सावरकर ने इंग्लैंड से दस पिस्तौल तस्करी के जरिए भारत भेजी थीं। इसलिए उन्हें लंदन में स्कॉटलैंड यार्ड ने गिरफ्तार कर भारत भेज दिया। 

(फोटो―अनंत लक्ष्मण कान्हारे, साभार―सोशल मीडिया)

इस बार विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ पुख्ता सबूत पुलिस के पास थे तो मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। चूंकि इंग्लैंड से भारत लाते हुए फ्रांस के निकट जहाज से समुद्र में कूद गये थे और वहां की सरकार ने लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही अंग्रेजों को सौंपा था और इससे पहले लंदन में एक बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता रहे थे और साथ ही कर्जन वाइली की हत्या में संदिग्ध रहे थे, भले ही सबूतों के अभाव में बरी कर दिये गये थे। इन सबके मद्देनजर खतरनाक अपराधी मानकर उन्हें अंडमान की सैलुलर जेल भेज दिया गया। जहां से 6 बार माफी मांगकर छूट गये लेकिन फांसी अनंत कन्हारे तो चढ़ ही गया। 

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सावरकर की दूसरे को आगे कर खुद पर्दे के पीछे छिपे रहने की तीसरी कलंक-कथा सारी दुनिया जानती है। इस बार 1948 में हत्यारी पिस्तौल नाथूराम गोडसे के हाथों में थमाई गई। पकड़ा गया और लंबी-चौड़ी मुकदमेबाजी झेलने के बाद अंततः फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। सावरकर महात्मा गांधी की हत्या में शामिल होते हुए भी तकनीकी रूप से सबूतों के अभाव में  छोड़ दिया गया।

ये तो जगजाहिर हत्याकांड हैं, जिनमें हत्या के लिए उकसाने वाला गुरु साफ बच निकला और चेला बलि का बकरा बनाकर यमपुरी भेज दिया गया।

(फोटो―नाथूराम गोडसे, साभार―सोशल मीडिया)

इनके अलावा एक और ऐसे ही बलि का बकरा बनते-बनते रह गये थे चंद्र शेखर आजाद। उन्हें इन्हीं षड्यंत्रकारी गुरुजी ने मुहम्मद अली जिन्ना को मार डालने के लिए पिस्तौल और पचास हजार रुपये देने की पेशकश की लेकिन आजाद भड़क उठे और कहा, "सावरकर हमें भाड़े का हत्यारा समझता है?" 

इन चारों घटनाओं से क्या नतीजा निकलता है? यही न कि विनायक दामोदर सावरकर वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस की कसौटी पर खरे उतरे नायक नहीं बल्कि धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान और दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला हत्यारा था।

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आज आप देखिए कि सावरकर के चेले उसकी षड्यंत्रकारी नीति का अनुसरण करते हुए खुद तो राष्ट्रवाद और हिंदू-हित की बातें कर लोगों को गुमराह करते हुए देश पर राज कर रहे हैं, अपने बच्चों को विदेशों में भेजकर उच्च स्तरीय शिक्षा दिलवा रहे हैं और आपके बच्चों की शिक्षा महंगी कर, उनके रोजगार छीनकर, उन्हें नशेड़ी बनाकर और उनको हत्या के औजार पकड़ाकर उन्हें हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। ये उन्हें मदनलाल ढींगरा, अनंत कन्हारे या नाथूराम गोडसे बना रहे हैं।

सोचिए कि क्या कार सेवा, साम्प्रदायिक दंगे या किसी सामाजिक आंदोलन या सीमा पर किसी मंत्री, बड़े राजनेता, उद्योगपति का बेटा या परिजन की मृत्यु हुई है? ऐसी जगहों पर मौत को गले लगाने वाले कौन थे या हैं?

सोचिए, हो सके तो और भी गहराई से अध्ययन, मनन, चिंतन कीजिए और इन धूर्तों के चंगुल में फंसने से बचिये-बचाइये।  भी थे।

मदनलाल ढींगरा को सावरकर ने बंगाल विभाजन के जिम्मेदार वॉयसराय लॉर्ड कर्जन को मारने का काम सौंपा। मदनलाल ने कर्जन की हत्या के तीन प्रयास किये लेकिन कभी हिम्मत न होती तो कभी जगह पर पहुंचने में देर हो जाती। इस पर प्रेरणास्रोत सावरकर ने ढींगरा को अपमानित करते हुए एक आख़िरी मौका दिया और कहा, "अबकी बार असफल हुए तो फिर कभी मुझे मुंह मत दिखाना।" 

लेकिन कर्जन निश्चित कार्यक्रम में भाषण देकर जा चुके थे और कर्जन का भतीजा कर्जन वाईली सामने पड़ गया। इस बार खाली हाथ न आने की कसम दी गई थी, सो ढींगरा ने भतीजे को ही गोली मारकर ढेर कर दिया। 

गुरु-चेला दोनों गिरफ्तार कर लिये गये।

मुकदमा चला, जिसमें गुरुजी साफ मुकर गए। पुलिस को उनके खिलाफ सबूत नहीं मिला तो छूट गए और शिष्य मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।

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विनायक दामोदर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी अभिनव भारत के सक्रिय सदस्य थे। गुरु जी ने इस बार नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन को मारने का प्लान बनाया। तो इसके लिए अनंत कन्हारे को उकसाया गया। करो या मरो के गुरुमंत्र के साथ हाथ में पिस्तौल थमा दी गयी। कन्हारे ने गुरुआज्ञा का पालन करते हुए 29 दिसंबर, 1909 कलैक्टर को मार गिराया। पकड़े गए, मुकदमा झेला और अंत में फांसी चढ़ा दिये गये। 

लेकिन इस बार गुरु जी भी फँस गये। जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल पिस्तौल की खोज से पता चला कि दामोदर सावरकर ने इंग्लैंड से दस पिस्तौल तस्करी के जरिए भारत भेजी थीं। इसलिए उन्हें लंदन में स्कॉटलैंड यार्ड ने गिरफ्तार कर भारत भेज दिया। 

इस बार विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ पुख्ता सबूत पुलिस के पास थे तो मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। चूंकि इंग्लैंड से भारत लाते हुए फ्रांस के निकट जहाज से समुद्र में कूद गये थे और वहां की सरकार ने लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही अंग्रेजों को सौंपा था और इससे पहले लंदन में एक बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता रहे थे और साथ ही कर्जन वाइली की हत्या में संदिग्ध रहे थे, भले ही सबूतों के अभाव में बरी कर दिये गये थे। इन सबके मद्देनजर खतरनाक अपराधी मानकर उन्हें अंडमान की सैलुलर जेल भेज दिया गया। जहां से 6 बार माफी मांगकर छूट गये लेकिन फांसी अनंत कन्हारे तो चढ़ ही गया। 

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सावरकर की दूसरे को आगे कर खुद पर्दे के पीछे छिपे रहने की तीसरी कलंक-कथा सारी दुनिया जानती है। इस बार 1948 में हत्यारी पिस्तौल नाथूराम गोडसे के हाथों में थमाई गई। पकड़ा गया और लंबी-चौड़ी मुकदमेबाजी झेलने के बाद अंततः फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। सावरकर महात्मा गांधी की हत्या में शामिल होते हुए भी तकनीकी रूप से सबूतों के अभाव में  छोड़ दिया गया।

ये तो जगजाहिर हत्याकांड हैं, जिनमें हत्या के लिए उकसाने वाला गुरु साफ बच निकला और चेला बलि का बकरा बनाकर यमपुरी भेज दिया गया।

इनके अलावा एक और ऐसे ही बलि का बकरा बनते-बनते रह गये थे चंद्र शेखर आजाद। उन्हें इन्हीं षड्यंत्रकारी गुरुजी ने मुहम्मद अली जिन्ना को मार डालने के लिए पिस्तौल और पचास हजार रुपये देने की पेशकश की लेकिन आजाद भड़क उठे और कहा, "सावरकर हमें भाड़े का हत्यारा समझता है?" 

इन चारों घटनाओं से क्या नतीजा निकलता है? यही न कि विनायक दामोदर सावरकर वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस की कसौटी पर खरे उतरे नायक नहीं बल्कि धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान और दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला हत्यारा था।

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आज आप देखिए कि सावरकर के चेले उसकी षड्यंत्रकारी नीति का अनुसरण करते हुए खुद तो राष्ट्रवाद और हिंदू-हित की बातें कर लोगों को गुमराह करते हुए देश पर राज कर रहे हैं, अपने बच्चों को विदेशों में भेजकर उच्च स्तरीय शिक्षा दिलवा रहे हैं और आपके बच्चों की शिक्षा महंगी कर, उनके रोजगार छीनकर, उन्हें नशेड़ी बनाकर और उनको हत्या के औजार पकड़ाकर उन्हें हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। ये उन्हें मदनलाल ढींगरा, अनंत कन्हारे या नाथूराम गोडसे बना रहे हैं।

सोचिए कि क्या कार सेवा, साम्प्रदायिक दंगे या किसी सामाजिक आंदोलन या सीमा पर किसी मंत्री, बड़े राजनेता, उद्योगपति का बेटा या परिजन की मृत्यु हुई है? ऐसी जगहों पर मौत को गले लगाने वाले कौन थे या हैं? 

सोचिए, हो सके तो और भी गहराई से अध्ययन, मनन, चिंतन कीजिए और इन धूर्तों के चंगुल में फंसने से बचिये-बचाइये। 

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

बिना झोले वाला सच्चा फकीर राष्ट्रपति!

 बिना झोले वाला सच्चा फकीर राष्ट्रपति!

(फोटो साभार―सोशल मीडिया)

ये हैं दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे के पूर्व राष्ट्रपति जोस मुजिका। इनका नाम दुनियाभर में आदरपूर्वक लिया जाता है क्योंकि इन्होंने अपने देश को तरक्की की बुलंदियों पर पहुंचा दिया लेकिन खुद के बारे में कभी सोचा ही नहीं और कंगाली में जीवन बिताया।

मुजिका क्यूबा की क्रांति से प्रेरित उरुग्वे के एक वामपंथी सशस्त्र संगठन टुपामारोस गुरिल्ला के 1960 और 1970 के दशक में सदस्य रहे। उन्हें छह बार गोली लगी और 14 साल जेल में बिताए। अंततः देश से तानाशाही खत्म हुई और लोकतंत्र की जीत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे मुजिका उरुग्वे की राजनीति में सक्रिय हो गए। फिर 2010 में उरुग्वे के 40वें राष्ट्रपति के रूप मेें निर्वाचित हुए। पांच सालों में देश को शिखर तक पहुंचाकर मार्च 2015 में उन्होंने राष्ट्रपति के पद से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि उन्हें अपने तीन पैर वाले दोस्त मैनुअल और चार पैर की बीटल के साथ बिताने के लिए समय की जरूरत है। मैनुअल उनका पालतू कुत्ता और बीटल गाड़ी है।

(फोटो साभार―सोशल मीडिया)

इस कर्मयोगी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में देश को तो अमीर बना दिया लेकिन खुद ‘कंगाल’ बने रहे। इसीलिए इन्हें दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है। 

उन्हें जब दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति का नाम दिया गया था, तो इस बारे में उनकी उत्कृष्ट प्रतिक्रिया थी—"मुझे सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है; लेकिन मैं खुद ऐसा नहीं सोचता। गरीब वे हैं जो केवल विलासिता के लिए काम करते हैं और अधिक चाहते हैं।"

क्या आप यकीन करेंगे कि ये अपना सारा वेतन जरूरतमंदों को दान कर दिया करते थे क्योंकि इनका मानना था कि जब हमें सरकार की तरफ से सारी सुविधाएं मिल रही हैं तो ऐसे में वेतन लेकर क्या करेंगे।

राष्ट्रपति रहते हुए जोस मुजिका को मासिक वेतन 13300 डॉलर मिलते थे, जिसमें से वे 12000 डॉलर गरीबों को दान कर देते थे। बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को दे देते थे। जीवनयापन के लिए मुजिका खुद खेती करते हैं।

मुजिका जीवनपर्यंत फकीरों जैसा जीवन जीते रहे। राष्ट्रपति रहते हुए भी सरकारी आवास के बजाय अपने 2 कमरे के मकान में रहते थे और सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मियों की सेवाएं लेते थे। वे अपनी पुरानी फॉक्सवैगन बीटल को खुद ड्राइव कर ऑफिस जाते थे। हालांकि, ऑफिस जाते समय वे कोट-पैंट पहनते थे, लेकिन घर पर बेहद सामान्य कपड़ों में रहते थे। 

मुजिका पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते हैं, ताकि कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सके। अपने खेतों में ट्रैक्टर भी वे खुद ही चलाते हैं। ट्रैक्टर खराब हो जाए तो मेकैनिक बुलाने की बजाय खुद ही ठीक भी करते हैं। वे कोई नौकर-चाकर भी नहीं रखते। वे आम लोगों की तरह खुद कुएं से पानी भरते हैं, अपनी चाय स्वयं तैयार करते हैं और अपने कपड़े भी धोते हैं। 

(फोटो साभार―सोशल मीडिया)

शायद आप सोचते होंगे कि उरुग्वे एक गरीब देश है, इसीलिए यहां का राष्ट्रपति भी गरीब है। जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। वहां के लोगों की मासिक औसत आमदनी 50,000 रुपए है।

काश, हमने भी ऐसे ही किसी कर्मयोगी और नैतिक-चारित्रिक रूप से समृद्ध व्यक्ति को अपना नेता चुना होता।


रविवार, 10 अक्टूबर 2021

जिम कॉर्बेट का नाम मिटाने की कोशिश ठीक नहीं है

जिम कॉर्बेट का नाम मिटाने की कोशिश ठीक नहीं है

जिम कॉर्बेट की विश्व-प्रसिद्धि का कारण उनके शिकारी जीवन से कहीं अधिक पर्यावरण संरक्षण,
प्रकृति-प्रेम, अन्वेषण, वन्यजन्तु संरक्षण और लेखन के क्षेत्र में उनका योगदान है।

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क को भारत-आयरलैंड मैत्री के एक खूबसूरत स्मारक के तौर पर विकसित किया जा सकता है
केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के अनुसार उत्तराखंड के नैनीताल, अल्मोड़ा, गढ़वाल तथा उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिलों में फैले जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क किया जाएगा। इस प्रस्ताव के सम्बंध में औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और जल्द ही इसका ऐलान किया जा सकता है। मंत्री ने 3 अक्टूबर को पार्क का दौरा करने के दौरान इसके धनगढ़ी स्थित प्रवेश द्वार पर बने म्यूजियम की विजिटर बुक में नाम परिवर्तन की विधिवत घोषणा से पहले ही अपने संदेश में ‘रामगंगा नेशनल पार्क’ ही लिखा।
इस पार्क की स्थापना 1936 में की गई थी। उस समय इसका नाम संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के गवर्नर मॉल्कम हेली के नाम पर 'हेली नेशनल पार्क' रखा गया। आजादी मिलने के बाद इसका नाम रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया लेकिन 1957 में इसका नाम फिर से बदलकर विश्वप्रसिद्ध शिकारी जिम कॉर्बेट के नाम पर जिम कार्बेट नेशनल पार्क किया गया।
सिर्फ जिम कॉर्बेट के नाम से दुनिया भर में विख्यात आदमखोर पशुओं के शिकारी और पर्यावरण प्रेमी का पूरा नाम जिम एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट था। इनके पूर्वज तीन पीढ़ियों पहले आयरलैंड छोड़कर भारत आकर बस गये थे और यहीं के खूबसूरत शहर नैनीताल में इस आयरिश (आम लोगों के लिए अंग्रेज) का जन्म 25 जुलाइ, 1875 को हुआ। बचपन जंगलों में तीर कमान चलाते हुए बीता तो स्वाभाविक ही वनों और वन्य प्राणियों से मुहब्बत हो गई। वे बचपन से जंगली जानवरों की आवाज सुनकर ही उसके बारे में अनेक प्रकार की बातें जान जाते थे।
जिम कॉर्बेट के जीवनीकार अंग्रेजी लेखक मार्टिन बूथ ने उनके स्थानीय नाम पर इस किताब का शीर्षक 'कारपेट साहिब' रखा है तो इसीसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिम इस पर्वतीय इलाके में कितने प्यारे इंसान के तौर पर जाने जाते होंगे। स्थानीय लोग उन्हें आज भी आदरपूर्वक 'कारपेट साहब' ही कहते हैं।
जिम कार्बेट 1895 के आसपास रेलवे में भर्ती हुए जहां उन्होंने 20 साल तक नौकरी करने के बाद उसे छोड़कर रेलवे में ठेकेदारी शुरू कर दी। चालीस की उम्र आते-आते उन्होंने हिंदुस्तान को अपने अंदर इस हद तक समेट लिया कि उनका शेष जीवन पूरी तरह एक हिंदुस्तानी की तरह हो गया।

कॉर्बेट ने लिखी 6 किताबें―
जिम कॉर्बेट ने 6 किताबें लिखी हैं―मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं (1944), द मैन ईटिंग लैपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग (1948), माय इंडिया (1952), जंगल लोर (1953), टेम्पल टाइगर एंड मोर मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं (1955) और ट्री टॉप्स (1955)। इनमें से 'माय इंडिया' बताती है कि वे हिंदुस्तान और यहां के लोगों से कितनी मोहब्बत करते थे।
जिम कॉर्बेट की किताब 'मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं' तो शिकार पर अंग्रेजी साहित्य की एक अद्वितीय क्लासिकल रचना मानी जाती है।
बहरहाल, कॉर्बेट ने 1907 से 1938 तक लगभग 1200 लोगों को मारने वाले आदमखोर पशुओं का शिकार कर लोगों को उनके आतंक से मुक्त किया। लोग उन्हें चिट्ठी लिखकर बताते कि वे आदमखोर से कितने भयभीत हैं और कार्बेट उन्हें भयमुक्त करने चल पड़ते। शिकार करना कॉर्बेट का शौक़ नहीं, बल्कि उससे भी कहीं अधिक आदमखोरों से पीड़ित जनता को निर्भय रहने की आजादी देना था।
इसीलिए वे केवल आदमख़ोर जानवरों का शिकार करते लेकिन शिकार से पहले इस बात की पुष्टि कर लेते थे कि वह पक्के तौर पर आदमख़ोर है या नहीं। उस दौर में आदमखोरों के आतंक की कल्पना केवल इसी एक उदाहरण से की जा सकती है कि उत्तराखंड की पूर्वी सीमा पर काली नदी के दोनों तरफ यानी चंंपावत और नेपाल के बीच एक ही बाघिन ने 436 इंसानों को मार डाला था। उस बाघिन को मारने में अनेक शिकारियों के असफल हो जाने पर जिम कॉर्बेट को बुलाया गया। तो उन्होंने कुछ महीनों के अंदर उस बाघिन का आतंक खत्म कर दिया।
इस तरह वे जहां भी पहुंच जाते थे, वहां के लोग आदमखोर जानवर का अंत आया समझ कर निश्चिंत हो जाते थे।

कॉर्बेट ने बताया जंगली जानवर आदमखोर यों ही नहीं बनते―
उन्होंने आदमखोर जंगली जानवरों से नफरत करने की बजाए यह जानना जरूरी समझा कि आखिर ये आदमखोर हुए क्यों? अपने गहन अध्ययन से कॉर्बेट ने यह बताया कि जंगली जानवर आदमखोर यों ही नहीं बनते बल्कि जब इंसान इन पर हमला करता है तभी ये इंसानों से चिढ़कर उनका शिकार शुरू करते हैं। इस तरह इन आदमखोरों की प्रवृत्ति का गहन अध्ययन के बाद कॉर्बेट ने समझा कि इंसानों को बाघ व चीतों से बचाने से ज़्यादा जरूरी है इन जानवरों को इंसानों से बचाना। इसके बाद से ही कॉर्बेट बाघ और चीतों को बचाने के अभियान में जुट गए।
उनका वह अध्ययन इस बारीकी तक था कि कॉर्बेट ने लोगों को बाघों और तेंदुए के बीच का फर्क बताया। उन्होंने बताया कि जब बाघ के मन से इंसानों का डर निकल जाता है तभी वह आदमखोर हो जाता है। इसी कारण वे दिन में भी हमला करते हैं। वहीं तेंदुए कितने भी आदमखोर क्यों ना हो जाएं, मगर इंसान का डर उनके अंदर बराबर बना रहता है और इसीलिए वे रात के अंधेरे में शिकार करते हैं।
कॉर्बेट बाघों के प्रति इतने अधिक चिंतित थे कि उन्होंने इनकी घटती आबादी रोकने के लिए अपने प्रयासों से 8 अगस्त, 1936 को देश के पहले नेशनल पार्क की स्थापना करवाई तो इसे हेली नेशनल पार्क नाम दिया लेकिन 1952 में इस पार्क का नाम बदल कर जिम कार्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया।

दुनिया को बाघ बचाओ की प्रेरणा दी जिम कॉर्बेट ने
यदि देखा जाये तो आज दुनिया भर में जो बाघ बचाओ अभियान चल रहा है उसके पीछे जिम कॉर्बेट की प्रेरणा और उनके अध्ययन से मिली सीख का मत्वपूर्ण योगदान है।
कॉर्बेट की उदारता सिर्फ जानवरों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि वे इंसानों के लिए भी इतने ही दयालु थे। रेलवे की ठेकेदारी के दिनों में कॉर्बेट ने मोकामा घाट (बिहार) के स्टेशन मास्टर रामसरन के साथ मिल कर पैसे की तंगी के कारण अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए स्कूल खुलवाया था। इसी दौरान उनका भावनात्मक रिश्ता चमारी नामक एक व्यक्ति से ऐसा जुड़ा कि उसे याद कर कॉर्बेट हमेशा रो पड़ते थे।
जिम कॉर्बेट द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश आर्मी में भी रहे जहां उन्हें कर्नल रैंक दिया गया था।

कॉर्बेट शिकार में सदैव उनके साथ रहने वाले राम सिंह नेगी को अपनी कालाढूंगी की ज़मीन देने के अलावा साथ ही साथ जब वे 1947 में भारत छोड़ कर केन्या गये तो जाने से पहले जिस बैंक में उनका खाता था उसे एक चिट्ठी दे गये कि हर महीने उनके खाते से राम सिंह को 10 रुपये दिए जाएं। जब तक कॉर्बेट जीवित रहे, तब तक राम सिंह को ये रुपये मिलते रहे। भारत के गरीबों के प्रति कॉर्बेट कितने उदार थे और हिंदुस्तान उनके लिए क्या मायने रखता था या उनकी आत्मा में हिंदुस्तान किस स्तर तक समाया हुआ था, यह उनकी लिखी किताब 'माय इंडिया' पढ़ने से पता चलता है।
जिम के पिता क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट की मृत्यु 21 अप्रैल, 1881 में और माता मैरी जेन कॉर्बेट का निधन 1927 में हुआ। इन दोनों को नैनीताल के सूखाताल स्थित सैंट जॉन चर्च के कब्रिस्तान में दफनाया गया। कॉर्बेट और उनकी बहन मार्गेट कॉर्बेट 'मैगी' आजीवन अविवाहित रहे और दोनों भाई-बहन एकसाथ 1947 में केन्या चले गये जहां जिम कार्बेट की 19 अप्रैल, 1955 को मृत्यु हो गई।

जिम कॉर्बेट आज पूरी दुनिया में मशहूर हैं तो इसका कारण उनके शिकारी जीवन से कहीं अधिक पर्यावरण संरक्षण, प्रकृतिप्रेम, अन्वेषण, वन्यजन्तु संरक्षण और लेखन के क्षेत्र में उनका योगदान है। ऐसे विश्वप्रसिद्ध व्यक्ति के नाम पर यदि आज संकुचित विचारों के लोग अपने राजनीतिक स्वार्थसिद्ध करने के लिए उनका नाम खत्म करना चाहते हैं तो यह देश को वैश्विक स्तर पर नीचा दिखाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है।

चीन-जापान से सबक सीखना चाहिये―
इस मामले में इन्हें चीन से सबक सीखना चाहिये जिसने एक भारतीय चिकित्सक डॉ. द्वारकानाथ शान्ताराम कोटणीस (10 अक्टूबर, 1910-9 दिसम्बर, 1942) का नाम और चीन के लोगों की स्वास्थ्य-रक्षा में किये गये उनके योगदान को आज तक इस स्तर तक अक्षुण्ण रखा है कि जब भी चीन के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या कोई अन्य प्रमुख नेता भारत-यात्रा पर आते हैं तो वे डॉ. कोटनीस के परिजनों से भेंट कर उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। चीन में कोटनीस के नाम पर शिजियाझुआंग के एक मेडिकल कॉलेज का नाम रखा गया है। इसके अलावा शिजियाझुआंग और तानझियांग में उनके नाम पर कई प्रतिमाएं और स्मारक स्थापित किए गए हैं।
क्या हम यह भूल गये हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां आज भी जापान के रन्कोजी मंदिर में सहेज कर रखी हुई हैं और उनका पवित्र स्मारक बना हुआ है?
इसी तरह यदि भारतीय नेतृत्व चाहे तो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क को भारत-आयरलैंड मैत्री के एक खूबसूरत स्मारक के तौर पर विकसित किया जा सकता है।
इसलिए वैचारिक संकीर्णताओं के गहरे कुंए में कूपमंडूक बने रहना छोड़कर ज्ञान और विवेक के प्रकाश में रहकर ही दुनिया के साथ कदमताल करना श्रेयस्कर होगा। काश, हम अपने भीतर उदारता का बीज अंकुरित होने देते।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

ओ मन्नू! तेरा अब क्या होगा

ओ मन्नू! तेरा अब क्या होगा

किशोर कुमार की फिल्म चलती का नाम गाड़ी (1958) में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गाना तो आपने सुना ही होगा―जाना था जापान पहुँच गए चीन, समझ गए ना! ठीक यही हाल आज देश का हो गया है। कहां तो हम एक विकासशील देश थे जिसमें हम बड़ी तेजी से विश्व-अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की पहली पसंद थे और कहां आज हमारे प्रधानसेवक जी सारी दुनिया के कई-कई चक्कर काटने के बाद एक भी ढंग का निवेशक देश में नहीं ला सके। खुद को ग्लोबल एक्सपर्ट समझने वाले गोदी मीडिया मई 2020 में भारतीय भक्तों को पढ़ा रहा था―चीन छोड़कर भारत आ रही हैं कंपनियां, बौखला रहा है ड्रैगन' या 'चीन से 1000 कंपनियां समेट रहीं कारोबार, भारत में आने को तैयार' जैसी हैडलाइन बनाकर चीन की हजारों कंपनियों के भारत आने की जो हवाबाजी की गई थी उसकी भी हवा निकल गई।

फोटो साभार―गूगल

यह तो सर्वविदित ही है कि संघ सत्य और ज्ञान का शत्रु है, इसीलिए वह लोगों को शिक्षित करने के विरुद्ध है और शायद इसीलिए देश की शिक्षा का भट्टा बैठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है। 

यूनेस्को (UNESCO) की '2021 स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया: नो टीचर्स, नो क्लास' रिपोर्ट से तो कम-से-कम यही साबित होता है। 

रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग लगभग 1.1 लाख स्कूल एक ही अध्यापक के भरोसे चल रहे हैं। देश के स्कूलों में शिक्षकों के कुल 19% या 11.16 लाख पद खाली हैं, जिनमें से 69% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। एक लाख से ज्यादा रिक्त पद वाले तीन राज्य उत्तर प्रदेश (3.3 लाख), बिहार (2.2 लाख) और पश्चिम बंगाल (1.1 लाख) हैं। 

मध्य प्रदेश में सिंगल टीचर स्कूलों की संख्या सर्वाधिक (21077) है। ज्यादातर वैकेंसी ग्रामीण स्कूलों में हैं जैसे बिहार के मामले में, जहां 2.2 लाख शिक्षकों की जरूरत है और इनमें 89% गांवों में हैं। इसी तरह यूपी में खाली पड़े 3.2 लाख पदों में से 80 फीसदी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हैं। पश्चिम बंगाल के लिए यह आंकड़ा 69% है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 7.7% प्री-प्राइमरी, 4.6% प्राइमरी और 3.3% अपर-प्राइमरी शिक्षक कम योग्यता प्राप्त हैं। इस मामले में बिहार के हालात सबसे खराब हैं। 

रिपोर्ट मे कहा गया है कि शिक्षकों की वर्तमान कमी को पूरा करने के लिए भारत को 11.16 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत है। भारत में महिलाएं शिक्षण कार्यबल का लगभग 50% हिस्सा हैं, लेकिन महत्वपूर्ण अंतर-राज्यीय और शहरी-ग्रामीण भिन्नताएं हैं। 

कक्षा 3, 5 और 8 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार निम्न-शिक्षण निष्कर्ष के साथ इसे जोड़ते हुए यूनेस्को (UNESCO) ने शिक्षकों के रोजगार की शर्तों में सुधार करने, गांवों में उनकी काम करने की स्थिति में सुधार करने के अलावा 'आकांक्षी जिलों' को चिह्नित करने और शिक्षकों को फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की है।

फोटो साभार―गूगल

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) और शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (Unified District Information System for Education)(यूडीआइएसई) के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण-शहरी असमानता है और पूर्वोत्तर में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और तैनाती में सुधार की बहुत जरूरत है।

रिपोर्ट बहुत विस्तृत है और इसमें विभिन्न विसंगतियों को रेखांकित किया गया। कुल मिलाकर देश की प्राइमरी और मिडिल स्तर की पढ़ाई-लिखाई चौपट होने का सबूत पेश करती है। 

सबकुछ धन्नासेठों के हवाले करने की सनक अकस्मात सवार नहीं हुई है, बल्कि यह बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत गुरु गोलवलकर के सपनों को साकार करने के लिए किया जा रहा है ताकि देश में सवाल खड़ा करने वाले पढ़े-लिखे लोगों से मुक्ति पाई जा सके।  

बहरहाल, मजरूह सुल्तानपुरी ने इसी गीत में ठीक ही पूछा है―

ओ मन्नू! तेरा-मेरा अब क्या होगा?


रविवार, 3 अक्टूबर 2021

गांधी जी की हत्या के उग्रवादी हिंदुओं द्वारा छह प्रयास किये गये थे

 गांधी जी की हत्या के उग्रवादी हिंदुओं द्वारा छह प्रयास किये गये थे

आज जब जलियांवालाबाग से लेकर साबरमती, चौरी-चौरा व अन्य तमाम ऐतिहासिक स्थलों सहित अभिलेखों तक में दर्ज देश के इतिहास को सुनियोजित तरीके से अपनी इच्छानुसार बदला जा रहा है, तब इतिहास के उन काले पन्नो को बार-बार सामने लाने की जरूरत है जिनमें दर्ज अपने कुकर्मों के कारण वर्चस्ववादी संघी बिरादरी सदैव भयभीत रहती आई है। ऐसा ही एक प्रमुख मामला है महात्मा गांधी जी की हत्या के छह बार किये गये प्रयास।
सिखा-पढ़ाकर दिलवाये गये नाथूराम गोडसे के उस अदालती बयान को संघी गिरोह बार-बार दोहराता है जिसमें उसने गांधी की हत्या का कारण गांधी जी की पाकिस्तान बनाने और उसके बाद उसे 55 करोड़ रुपये देने की सहमति बताया था। गोडसे के उस लंबे बयान को इसी गिरोह द्वारा एक पुस्तिका 'मैंने गांधी को क्यों मारा' के नाम से छापकर अब तक खूब बंटवाया जाता रहा है।
गोडसे के उक्त बयान के आधार पर ही संघ सहित तमाम उग्रवादी हिंदूवादी संगठन गांधी जी की हत्या को 'वध' कहते हैं लेकिन वे यह सच्चाई जानबूझ कर छिपा देना चाहते हैं कि गांधी जी हत्या की कोशिशें तो 1934 से ही शुरू कर दी गईं थीं।
गांधी हत्या की पहली कोशिश (1934)―
हिंदुत्व के गढ़ पुणे की नगरपालिका द्वारा आयोजित गांधी जी के सम्मान समारोह में जाते वक्त गांधी जी की गाड़ी पर बम फेंका गया। जिसमें नगरपालिका के मुख्य अधिकारी और पुलिस के दो जवानों सहित सात लोग गंभीर रूप से घायल हुए। गांधी जी के साथ चल रही लगभग एक जैसी दिखने वाली दो गाड़ियों में से गांधी जी वाली गाड़ी की ठीक-ठीक पहचान में चूक होने से हत्या की यह कोशिश विफल हो गई।
दरअसल गांधी जी उस गाड़ी में नहीं, उसके पीछे वाली में थे। वह चूक हत्या की योजना बनाने वालों से ही नहीं बल्कि इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करने के जिम्मेदार लोगों से भी हुई और मामला वहीं-का-वहीं दबा दिया गया।
दूसरी कोशिश (1944)―
इस साल गांधीजी जब जेल से रिहा हुए तो वे बीमार और बेहद कमजोर थे। इसलिए उन्हें तुरंत राजनीतिक गहमागहमी से दूर शांत-एकांत में आराम करने के लिए पुणे के निकट पंचगनी ले जाया गया। यहां बीमार गांधी का ठहरना हिन्दुत्ववादियों को अपने शौर्य प्रदर्शन का अवसर लगा और वे वहां पहुंचकर लगातार नारेबाजी व प्रदर्शन करने लगे। फिर 22 जुलाइ को नाथूराम गोडसे मौका देखकर गांधीजी की तरफ छुरा लेकर झपटा लेकिन भिसारे गुरुजी ने उसे दबोच कर उसके हाथ से छुरा छीन लिया। गांधी जी ने उसे छोड़ देने का निर्देश देते हुए कहा कि उसको कहो कि वह मेरे पास आकर कुछ दिन रहे ताकि मैं जान सकूं कि उसे मुझसे शिकायत क्या है लेकिन नाथूराम इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
तीसरी कोशिश (1944)―
पंचगमी की विफलता को सफलता में बदलने के इरादे से गांधी जी की हत्या की तीसरी कोशिश 1944 में ही वर्धा स्थित गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम में की गई। पंचगनी से निकल कर गांधी जी फिर से अपने काम में डूबे हुए थे। टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरगना विनायक दामोदर सावरकर की मुहम्मद अली जिन्ना तथा अंग्रेजों से मिलकर की जाती रही बंटवारे की कोशिशों को अमली जामा पहनाने की बातें हवा में थीं। सावरकर और जिन्ना सांप्रदायिकता का जहर फैलाने में व्यस्त थे। सांप्रदायिक हिंदू-मुसलमान दोनों ही मामले को और बिगाड़ने में लगे थे। गांधी जी इस पूरे मामले पर जिन्ना से सीधे बातचीत की योजना बना रहे थे और यह तय हुआ कि गांधी जी मुंबई जाकर जिन्ना से मिलेंगे।

गांधी जी के मुंबई जाने की तैयारियां चल रही थीं कि तभी विभाजन पर अड़े सावरकर के गिरोह ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी सूरत में गांधी जी को जिन्ना से बात करने मुंबई नहीं जाने देंगे। पुणे से उनकी एक टोली वर्धा आ पहुंचीं और उसने सेवाग्राम आश्रम को घेर लिया। वे वहां से नारेबाजी करते, आने-जाने वालों को परेशान करते और गांधी जी पर हमला करने का मौका खोजते रहते। पुलिस का पहरा था। निर्भीक गांधीजी ने बता दिया कि वे नियत समय पर मुंबई जाने के लिए आश्रम से निकलेंगे और विरोध करने वाली टोली के साथ तब तक पैदल चलते रहेंगे जब तक वे उन्हें मोटर में बैठने की इजाजत नहीं देते।
पुलिस के पास ख़ुफ़िया जानकारी थी कि ये उपद्रवी लोग कुछ अप्रिय करने की तैयारी में है। इसीलिए उसने उपद्रवी टोली को गिरफ्तार कर लिया। सबकी तलाशी ली गई तो इस टोली के सदस्य ग. ल थत्ते के पास एक बड़ा सा छुरा बरामद हुआ। उन उपद्रवी युवाओं का वर्धा पहुंचना, उनके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माताओं में से एक माधवराव सदाशिव गोलवलकर का अचानक वर्धा आगमन और यह छुरा, यह सब मिलाकर एक ही कहानी कहते हैं कि जिस तरह भी हो, गांधी का खात्मा करो।
चौथी कोशिश (1946)―
पंचगनी और वर्धा की विफलता से परेशान इन लोगों ने तय किया कि गांधी जी को मारने के क्रम में कुछ दूसरे भी मरते हों तो मरें। इसीलिए जब गांधी जी 30 जून को जिस रेलगाड़ी से मुंबई से पुणे जा रहे थे उसे पलटने का षड्यंत्र रचा गया। करजत स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चली थी लेकिन सावधान ड्राइवर ने गाड़ी पलटने के इरादे से ट्रेन की पटरियों पर रखे बड़े-बड़े पत्थर देख लिये थे। उसने तत्काल इमर्जेंसी ब्रेक लगाकर गाड़ी रोकी। गांधी जी एक बार फिर बच गए।
इस घटना का अपनी प्रार्थना सभा में जिक्र करते हुए गांधी जी ने कहा, "मैं सात बार मारने के ऐसे प्रयासों से बच गया हूं। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूं। मैं तो 125 साल जीने की आशा रखता हूं।" इस पर पुणे से निकलने वाले अख़बार ‘हिंदू राष्ट्र’ के संपादक नाथूराम गोडसे ने जवाब दिया, "लेकिन आपको इतने साल जीने कौन देगा।"
पांचवीं कोशिश (1948)―
पर्दे के पीछे लगातार षड्यंत्रों और योजनाओं का दौर चलता रहा। सावरकर अब तक की अपनी हर कोशिश की विफलता से खिन्न और अधीर हो चला था क्योंकि हत्या उसके तरकश का आखिरी नहीं, ज़रूरी हथियार था। इसे कब, कैसे और किसके लिए इस्तेमाल करना है यह फैसला हमेशा सावरकर का ही होता था।
जब लंदन में धींगरा हत्या की ऐसी ही एक कोशिश में विफल हुआ, तब भी सावरकर ने उसे चेतावनी दी थी, "अगर इस बार विफल रहे तो फिर मुझे मुंह न दिखाना।"
इसी दौर में देश को सांप्रदायिकता की दावाग्नि में झौंका जा चुका था। अकेले गांधी क्षमा, शांति और विवेक का भाव भरते कभी यहां, तो कभी वहां भागते फिरते। वे पंजाब के रास्ते दिल्ली पहुंचे जहां की हालत बेहद खराब थी। हालात काबू में आने तक गांधी जी दिल्ली में ही रुकने का फैसला करते हैं। इधर गांधी जी का फैसला हुआ, उधर सावरकर की हत्यारी टोली का भी आर-पार का फैसला हुआ। गांधीजी ने कहा, "मैं दिल्ली छोड़कर नहीं जाऊंगा।" सावरकर टोली ने कहा, "हम आपको दिल्ली से जिंदा वापस निकलने नहीं देंगे!" स्थान गांधी जी का था―बिरला भवन और बम सावरकर के गिरोह का।
दिल्ली में 13 से 19 जनवरी तक गांधी जी का आमरण उपवास चला। इसके कारण अंधाधुंध हत्याओं व लूट-पाट पर कुछ रोक लगी। सभी समाजों, समृप्रदायों, सगठनों ने गांधी जी को वचन दिया कि वे दिल्ली का मन फिर नहीं बिगड़ने देंगे। ऐसा कहने वालों में सावरकर का गिरोह भी शामिल था जो उसी वक़्त हत्या की अपनी योजना पर भी काम कर रहा था।
बिरला भवन में रोज की तरह 20 जनवरी की शाम को भी प्रार्थना थी। गांधी जी अपनी क्षीण आवाज़ में इन सारी बातों का जिक्र कर रहे थे कि विभाजन के एक शरणार्थी मदनलाल पाहवा ने दीवार की आड़ से उन पर बम फेंका। बम फटा भी लेकिन गांधी जी जहां बैठे थे, उसकी दूरी का मनलाल का अंदाजा गलत होने से उसका निशाना चूक गया। गांधी जी फिर बच गए। बमबाज मदनलाल पाहवा पकड़ा भी गया लेकिन जिन्हें पकड़ना था, उन्हें किसी ने नहीं पकड़ा।


छठी अंतिम कोशिश (30 जनवरी, 1948)―
इसके सिर्फ दस दिन बाद ही प्रार्थना-भाव में मग्न अपने राम की तरफ जाते हुए इस देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को सत्य व अहिंसा का पाठ पढ़ाने तथा स्वतंत्रता का मूल्य समझाने वाले फकीर की छाती में नाथूराम ने तीन गोलियां उतार कर उग्रवादी हिंदुओं के माथे पर सदैव के लिए कलंक का टीका लगा दिया।
इस तरह पूज्य बापू अमरत्व को प्राप्त कर गये और हत्यारों की प्रेत आत्माएं अनंतकाल तक भटकने को अभिशप्त हो गईं। जो आज भी यथावत् हम सबके बीच अपने कुकर्मों की अग्नि में जलती हुई अश्वत्थामा की तरह भटक रही हैं।

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