अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है
➤भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र तैयार है।
अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है
➤भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र तैयार है।
अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं
भारत की पहली स्वंतत्र सरकार काबुल में बनी थी !
कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!
मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है !
मैक्सिको की संसद के निचले सदन केमारा दे दिपुतादोस में अपने कपड़े उतारते और अंडरपैन्ट्स पहने पोडियम के पीछे खड़े होकर भाषण देते ये सज्जन मैक्सिको की डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन पार्टी के संसद सदस्य अंटोनियो गर्तिया कोनेहो (Antonio Garcia Conejo) हैं। सन् 2013 में बीबीसी, द वाल स्ट्रीट जर्नल और डेली मेल द्वारा प्रकाशित ये तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हैं।
इन अखबारों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंटोनियो गर्तिया कोनेहो संसद में अपने कपड़े उतार कर नए एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसके तहत एक-दूसरे से प्रॉफ़िट शेयर करने के लिए प्राइवेट कंपनियों को सरकारी कंपनी पेमेक्स (Pemex) के साथ तेल और गैस के खनन की मंज़ूरी दी गयी थी।
द गार्डियन ने अगस्त में रिपोर्ट किया था कि मैक्सिको की सरकारी तेल कंपनी पेमेक्स के पूर्व मुखिया एमिलिओ लोजोया ने वहां के पूर्व राष्ट्रपति एनरीक पेना नियेतो, फे़लिप काल्देरों और कार्लोस सेलिनास पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।
अंटोनियो गर्तिया का यह ऐतिहासिक भाषण केमारा दे दिपुतादोस (Cámara de Diputados) ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया था। दरअसल वे सरकार के एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसने प्राइवेट कंपनियों को सरकारी तेल कम्पनी के साथ निवेश की मंज़ूरी दी थी।
गर्तिया कपड़े उतारना शुरू करते हैं और कहते हैं, “क्योंकि वे (सरकार) ऐसा कर रहे हैं, इसलिए मुझे शर्म नहीं आ रही है। सरकार ने मैक्सिको के टेलिकॉम को छीन कर निजी हाथों में दे दिया। मुनाफ़ा कहां गया? मैक्सिको का रेल-रोड भी कोई मुनाफा नहीं देने वाले। शर्म आनी चाहिए तुम्हें…! तुम इसे जो चाहे कहो। तुम कायर हो, तुम एक कायर हो, तुम एक कायर हो। तुम लोग डरपोक हो क्योंकि जब वे तुम्हारे कपड़े उतार रहे थे तब तुमने कुछ नहीं किया।”
बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में उनका बयान दिया था, “ऐसे ही तुम देश को भी नंगा कर रहे हो। मुनाफ़ा कहां है? मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है।”
मैक्सिको में 2013 के दौरान जो कुछ भी हो रहा था, भारत में पिछले सात सालों में उससे भी कहीं अधिक भयावह स्थिति बना दी गई है और वह क्रम अभी भी निर्बाध रूप से जारी है। बड़ी तेजी से अरबों-खरबों रुपए के सरकारी उपक्रम और सम्पत्तियां अपने मित्रों को औने-पौने दामों पर सौंपी जा रही हैं जिसके बदले में पीएमकेअर फंड और इलैक्टोरल बॉन्ड्स जैसे चोर रास्तों से रिश्वत लेकर अकूत धन इकट्ठा किया जा रहा है। तरह-तरह के उपायों से जनता की जेब खाली कर उसकी बचत और क्रयशक्ति को खत्म किया जा रहा है। आलोचकों, विरोधियों और आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। उन्हें झूठे मुक़दमे दर्ज कर जेलों में ठूंस दिया जा रहा है। पूंजीपतियों द्वारा संचालित मीडिया के माध्यम से देश को गुमराह किया जा रहा है। यानी तानाशाही पूरे चरम पर है।
ऐसे में किसी राजनेता और मीडिया आउटलेट्स से इस तरह सत्ताधारी पार्टी की बखिया उधेड़ने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
तीन हत्या, तीन बलियां और एक षड्यंत्रकारी
वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस के नायकों में आप किसको शामिल करना चाहेंगे? जो किसी युद्ध या लोकहित के संघर्ष में आगे बढ़कर अपने प्राणों की आहुति देने को सदैव तत्पर रहते हैं या खुद को पीछे रखकर दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर पर्दे की ओट में कायर, डरपोक और नपुंसक की तरह छिप जायें? अपने और दूसरों के जीवन का मोल और महत्व के पैमाने अलग-अलग मानने वाले को आप क्या कहेंगे—सज्जन, सीधा, सरल, ईमानदार या फिर धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान, हत्यारा?
चलिए बात शुरू करते हैं इंग्लैंड से। जहां लंदन के इंडिया हाउस में भारत की आज़ादी के चाहने वाले अक्सर इकट्ठा होकर आपस में चर्चा करते। यहीं पर विनायक दामोदर सावरकर ने एक गुप्त संगठन अभिनव भारत बनाया। इसके एक सदस्य तीन हत्या, तीन बलि के बकरे और एक षड्यंत्रकारी
वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस के नायकों में आप किसको शामिल करना चाहेंगे? जो किसी युद्ध या लोकहित के संघर्ष में आगे बढ़कर अपने प्राणों की आहुति देने को सदैव तत्पर रहते हैं या खुद को पीछे रखकर दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर पर्दे की ओट में कायर, डरपोक और नपुंसक की तरह छिप जायें? अपने और दूसरों के जीवन का मोल और महत्व के पैमाने अलग-अलग मानने वाले को आप क्या कहेंगे—सज्जन, सीधा, सरल, ईमानदार या फिर धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान, हत्यारा?
चलिए बात शुरू करते हैं इंग्लैंड से। जहां लंदन के इंडिया हाउस में भारत की आज़ादी के चाहने वाले अक्सर इकट्ठा होकर आपस में चर्चा करते। यहीं पर विनायक दामोदर सावरकर ने एक गुप्त संगठन अभिनव भारत बनाया। इसके एक सदस्य मदन लाल ढींगरा भी थे।
मदनलाल ढींगरा को सावरकर ने बंगाल विभाजन के जिम्मेदार वॉयसराय लॉर्ड कर्जन को मारने का काम सौंपा। मदनलाल ने कर्जन की हत्या के तीन प्रयास किये लेकिन कभी हिम्मत न होती तो कभी जगह पर पहुंचने में देर हो जाती। इस पर प्रेरणास्रोत सावरकर ने ढींगरा को अपमानित करते हुए एक आख़िरी मौका दिया और कहा, "अबकी बार असफल हुए तो फिर कभी मुझे मुंह मत दिखाना।"
(फोटो―मदन लाल ढींगरा, साभार―सोशल मीडिया)
लेकिन कर्जन निश्चित कार्यक्रम में भाषण देकर जा चुके थे और कर्जन का भतीजा कर्जन वाईली सामने पड़ गया। इस बार खाली हाथ न आने की कसम दी गई थी, सो ढींगरा ने भतीजे को ही गोली मारकर ढेर कर दिया।
गुरु-चेला दोनों गिरफ्तार कर लिये गये।
मुकदमा चला, जिसमें गुरुजी साफ मुकर गए। पुलिस को उनके खिलाफ सबूत नहीं मिला तो छूट गए और शिष्य मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।
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विनायक दामोदर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी अभिनव भारत के सक्रिय सदस्य थे। गुरु जी ने इस बार नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन को मारने का प्लान बनाया। तो इसके लिए अनंत लक्ष्मण कान्हारे को उकसाया गया। करो या मरो के गुरुमंत्र के साथ हाथ में पिस्तौल थमा दी गयी। कन्हारे ने गुरुआज्ञा का पालन करते हुए 29 दिसंबर, 1909 कलैक्टर को मार गिराया। पकड़े गए, मुकदमा झेला और अंत में फांसी चढ़ा दिये गये।
लेकिन इस बार गुरु जी भी फँस गये। जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल पिस्तौल की खोज से पता चला कि दामोदर सावरकर ने इंग्लैंड से दस पिस्तौल तस्करी के जरिए भारत भेजी थीं। इसलिए उन्हें लंदन में स्कॉटलैंड यार्ड ने गिरफ्तार कर भारत भेज दिया।
इस बार विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ पुख्ता सबूत पुलिस के पास थे तो मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। चूंकि इंग्लैंड से भारत लाते हुए फ्रांस के निकट जहाज से समुद्र में कूद गये थे और वहां की सरकार ने लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही अंग्रेजों को सौंपा था और इससे पहले लंदन में एक बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता रहे थे और साथ ही कर्जन वाइली की हत्या में संदिग्ध रहे थे, भले ही सबूतों के अभाव में बरी कर दिये गये थे। इन सबके मद्देनजर खतरनाक अपराधी मानकर उन्हें अंडमान की सैलुलर जेल भेज दिया गया। जहां से 6 बार माफी मांगकर छूट गये लेकिन फांसी अनंत कन्हारे तो चढ़ ही गया।
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सावरकर की दूसरे को आगे कर खुद पर्दे के पीछे छिपे रहने की तीसरी कलंक-कथा सारी दुनिया जानती है। इस बार 1948 में हत्यारी पिस्तौल नाथूराम गोडसे के हाथों में थमाई गई। पकड़ा गया और लंबी-चौड़ी मुकदमेबाजी झेलने के बाद अंततः फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। सावरकर महात्मा गांधी की हत्या में शामिल होते हुए भी तकनीकी रूप से सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया।
ये तो जगजाहिर हत्याकांड हैं, जिनमें हत्या के लिए उकसाने वाला गुरु साफ बच निकला और चेला बलि का बकरा बनाकर यमपुरी भेज दिया गया।
इनके अलावा एक और ऐसे ही बलि का बकरा बनते-बनते रह गये थे चंद्र शेखर आजाद। उन्हें इन्हीं षड्यंत्रकारी गुरुजी ने मुहम्मद अली जिन्ना को मार डालने के लिए पिस्तौल और पचास हजार रुपये देने की पेशकश की लेकिन आजाद भड़क उठे और कहा, "सावरकर हमें भाड़े का हत्यारा समझता है?"
इन चारों घटनाओं से क्या नतीजा निकलता है? यही न कि विनायक दामोदर सावरकर वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस की कसौटी पर खरे उतरे नायक नहीं बल्कि धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान और दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला हत्यारा था।
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आज आप देखिए कि सावरकर के चेले उसकी षड्यंत्रकारी नीति का अनुसरण करते हुए खुद तो राष्ट्रवाद और हिंदू-हित की बातें कर लोगों को गुमराह करते हुए देश पर राज कर रहे हैं, अपने बच्चों को विदेशों में भेजकर उच्च स्तरीय शिक्षा दिलवा रहे हैं और आपके बच्चों की शिक्षा महंगी कर, उनके रोजगार छीनकर, उन्हें नशेड़ी बनाकर और उनको हत्या के औजार पकड़ाकर उन्हें हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। ये उन्हें मदनलाल ढींगरा, अनंत कन्हारे या नाथूराम गोडसे बना रहे हैं।
सोचिए कि क्या कार सेवा, साम्प्रदायिक दंगे या किसी सामाजिक आंदोलन या सीमा पर किसी मंत्री, बड़े राजनेता, उद्योगपति का बेटा या परिजन की मृत्यु हुई है? ऐसी जगहों पर मौत को गले लगाने वाले कौन थे या हैं?
सोचिए, हो सके तो और भी गहराई से अध्ययन, मनन, चिंतन कीजिए और इन धूर्तों के चंगुल में फंसने से बचिये-बचाइये। भी थे।
मदनलाल ढींगरा को सावरकर ने बंगाल विभाजन के जिम्मेदार वॉयसराय लॉर्ड कर्जन को मारने का काम सौंपा। मदनलाल ने कर्जन की हत्या के तीन प्रयास किये लेकिन कभी हिम्मत न होती तो कभी जगह पर पहुंचने में देर हो जाती। इस पर प्रेरणास्रोत सावरकर ने ढींगरा को अपमानित करते हुए एक आख़िरी मौका दिया और कहा, "अबकी बार असफल हुए तो फिर कभी मुझे मुंह मत दिखाना।"
लेकिन कर्जन निश्चित कार्यक्रम में भाषण देकर जा चुके थे और कर्जन का भतीजा कर्जन वाईली सामने पड़ गया। इस बार खाली हाथ न आने की कसम दी गई थी, सो ढींगरा ने भतीजे को ही गोली मारकर ढेर कर दिया।
गुरु-चेला दोनों गिरफ्तार कर लिये गये।
मुकदमा चला, जिसमें गुरुजी साफ मुकर गए। पुलिस को उनके खिलाफ सबूत नहीं मिला तो छूट गए और शिष्य मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।
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विनायक दामोदर के बड़े भाई बाबाराव सावरकर भी अभिनव भारत के सक्रिय सदस्य थे। गुरु जी ने इस बार नासिक के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट एएमटी जैक्सन को मारने का प्लान बनाया। तो इसके लिए अनंत कन्हारे को उकसाया गया। करो या मरो के गुरुमंत्र के साथ हाथ में पिस्तौल थमा दी गयी। कन्हारे ने गुरुआज्ञा का पालन करते हुए 29 दिसंबर, 1909 कलैक्टर को मार गिराया। पकड़े गए, मुकदमा झेला और अंत में फांसी चढ़ा दिये गये।
लेकिन इस बार गुरु जी भी फँस गये। जैक्सन की हत्या में इस्तेमाल पिस्तौल की खोज से पता चला कि दामोदर सावरकर ने इंग्लैंड से दस पिस्तौल तस्करी के जरिए भारत भेजी थीं। इसलिए उन्हें लंदन में स्कॉटलैंड यार्ड ने गिरफ्तार कर भारत भेज दिया।
इस बार विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ पुख्ता सबूत पुलिस के पास थे तो मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। चूंकि इंग्लैंड से भारत लाते हुए फ्रांस के निकट जहाज से समुद्र में कूद गये थे और वहां की सरकार ने लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही अंग्रेजों को सौंपा था और इससे पहले लंदन में एक बलात्कार के मामले में सजायाफ्ता रहे थे और साथ ही कर्जन वाइली की हत्या में संदिग्ध रहे थे, भले ही सबूतों के अभाव में बरी कर दिये गये थे। इन सबके मद्देनजर खतरनाक अपराधी मानकर उन्हें अंडमान की सैलुलर जेल भेज दिया गया। जहां से 6 बार माफी मांगकर छूट गये लेकिन फांसी अनंत कन्हारे तो चढ़ ही गया।
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सावरकर की दूसरे को आगे कर खुद पर्दे के पीछे छिपे रहने की तीसरी कलंक-कथा सारी दुनिया जानती है। इस बार 1948 में हत्यारी पिस्तौल नाथूराम गोडसे के हाथों में थमाई गई। पकड़ा गया और लंबी-चौड़ी मुकदमेबाजी झेलने के बाद अंततः फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। सावरकर महात्मा गांधी की हत्या में शामिल होते हुए भी तकनीकी रूप से सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया।
ये तो जगजाहिर हत्याकांड हैं, जिनमें हत्या के लिए उकसाने वाला गुरु साफ बच निकला और चेला बलि का बकरा बनाकर यमपुरी भेज दिया गया।
इनके अलावा एक और ऐसे ही बलि का बकरा बनते-बनते रह गये थे चंद्र शेखर आजाद। उन्हें इन्हीं षड्यंत्रकारी गुरुजी ने मुहम्मद अली जिन्ना को मार डालने के लिए पिस्तौल और पचास हजार रुपये देने की पेशकश की लेकिन आजाद भड़क उठे और कहा, "सावरकर हमें भाड़े का हत्यारा समझता है?"
इन चारों घटनाओं से क्या नतीजा निकलता है? यही न कि विनायक दामोदर सावरकर वीरता, शौर्य, पराक्रम और साहस की कसौटी पर खरे उतरे नायक नहीं बल्कि धूर्त, षड्यंत्रकारी, बेइमान और दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने वाला हत्यारा था।
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आज आप देखिए कि सावरकर के चेले उसकी षड्यंत्रकारी नीति का अनुसरण करते हुए खुद तो राष्ट्रवाद और हिंदू-हित की बातें कर लोगों को गुमराह करते हुए देश पर राज कर रहे हैं, अपने बच्चों को विदेशों में भेजकर उच्च स्तरीय शिक्षा दिलवा रहे हैं और आपके बच्चों की शिक्षा महंगी कर, उनके रोजगार छीनकर, उन्हें नशेड़ी बनाकर और उनको हत्या के औजार पकड़ाकर उन्हें हिंसा के लिए उकसा रहे हैं। ये उन्हें मदनलाल ढींगरा, अनंत कन्हारे या नाथूराम गोडसे बना रहे हैं।
सोचिए कि क्या कार सेवा, साम्प्रदायिक दंगे या किसी सामाजिक आंदोलन या सीमा पर किसी मंत्री, बड़े राजनेता, उद्योगपति का बेटा या परिजन की मृत्यु हुई है? ऐसी जगहों पर मौत को गले लगाने वाले कौन थे या हैं?
सोचिए, हो सके तो और भी गहराई से अध्ययन, मनन, चिंतन कीजिए और इन धूर्तों के चंगुल में फंसने से बचिये-बचाइये।
बिना झोले वाला सच्चा फकीर राष्ट्रपति!
ये हैं दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे के पूर्व राष्ट्रपति जोस मुजिका। इनका नाम दुनियाभर में आदरपूर्वक लिया जाता है क्योंकि इन्होंने अपने देश को तरक्की की बुलंदियों पर पहुंचा दिया लेकिन खुद के बारे में कभी सोचा ही नहीं और कंगाली में जीवन बिताया।
मुजिका क्यूबा की क्रांति से प्रेरित उरुग्वे के एक वामपंथी सशस्त्र संगठन टुपामारोस गुरिल्ला के 1960 और 1970 के दशक में सदस्य रहे। उन्हें छह बार गोली लगी और 14 साल जेल में बिताए। अंततः देश से तानाशाही खत्म हुई और लोकतंत्र की जीत हुई। इसके बाद धीरे-धीरे मुजिका उरुग्वे की राजनीति में सक्रिय हो गए। फिर 2010 में उरुग्वे के 40वें राष्ट्रपति के रूप मेें निर्वाचित हुए। पांच सालों में देश को शिखर तक पहुंचाकर मार्च 2015 में उन्होंने राष्ट्रपति के पद से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया था कि उन्हें अपने तीन पैर वाले दोस्त मैनुअल और चार पैर की बीटल के साथ बिताने के लिए समय की जरूरत है। मैनुअल उनका पालतू कुत्ता और बीटल गाड़ी है।
(फोटो साभार―सोशल मीडिया)
इस कर्मयोगी ने अपने पांच साल के कार्यकाल में देश को तो अमीर बना दिया लेकिन खुद ‘कंगाल’ बने रहे। इसीलिए इन्हें दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है।
उन्हें जब दुनिया का सबसे गरीब राष्ट्रपति का नाम दिया गया था, तो इस बारे में उनकी उत्कृष्ट प्रतिक्रिया थी—"मुझे सबसे गरीब राष्ट्रपति कहा जाता है; लेकिन मैं खुद ऐसा नहीं सोचता। गरीब वे हैं जो केवल विलासिता के लिए काम करते हैं और अधिक चाहते हैं।"
क्या आप यकीन करेंगे कि ये अपना सारा वेतन जरूरतमंदों को दान कर दिया करते थे क्योंकि इनका मानना था कि जब हमें सरकार की तरफ से सारी सुविधाएं मिल रही हैं तो ऐसे में वेतन लेकर क्या करेंगे।
राष्ट्रपति रहते हुए जोस मुजिका को मासिक वेतन 13300 डॉलर मिलते थे, जिसमें से वे 12000 डॉलर गरीबों को दान कर देते थे। बाकी बचे 1300 डॉलर में से 775 डॉलर छोटे कारोबारियों को दे देते थे। जीवनयापन के लिए मुजिका खुद खेती करते हैं।
मुजिका जीवनपर्यंत फकीरों जैसा जीवन जीते रहे। राष्ट्रपति रहते हुए भी सरकारी आवास के बजाय अपने 2 कमरे के मकान में रहते थे और सुरक्षा के नाम पर बस दो पुलिसकर्मियों की सेवाएं लेते थे। वे अपनी पुरानी फॉक्सवैगन बीटल को खुद ड्राइव कर ऑफिस जाते थे। हालांकि, ऑफिस जाते समय वे कोट-पैंट पहनते थे, लेकिन घर पर बेहद सामान्य कपड़ों में रहते थे।
मुजिका पत्नी के साथ मिलकर फूलों की खेती करते हैं, ताकि कुछ अतिरिक्त आमदनी हो सके। अपने खेतों में ट्रैक्टर भी वे खुद ही चलाते हैं। ट्रैक्टर खराब हो जाए तो मेकैनिक बुलाने की बजाय खुद ही ठीक भी करते हैं। वे कोई नौकर-चाकर भी नहीं रखते। वे आम लोगों की तरह खुद कुएं से पानी भरते हैं, अपनी चाय स्वयं तैयार करते हैं और अपने कपड़े भी धोते हैं।
शायद आप सोचते होंगे कि उरुग्वे एक गरीब देश है, इसीलिए यहां का राष्ट्रपति भी गरीब है। जी नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। वहां के लोगों की मासिक औसत आमदनी 50,000 रुपए है।
काश, हमने भी ऐसे ही किसी कर्मयोगी और नैतिक-चारित्रिक रूप से समृद्ध व्यक्ति को अपना नेता चुना होता।
ओ मन्नू! तेरा अब क्या होगा
किशोर कुमार की फिल्म चलती का नाम गाड़ी (1958) में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गाना तो आपने सुना ही होगा―जाना था जापान पहुँच गए चीन, समझ गए ना! ठीक यही हाल आज देश का हो गया है। कहां तो हम एक विकासशील देश थे जिसमें हम बड़ी तेजी से विश्व-अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की पहली पसंद थे और कहां आज हमारे प्रधानसेवक जी सारी दुनिया के कई-कई चक्कर काटने के बाद एक भी ढंग का निवेशक देश में नहीं ला सके। खुद को ग्लोबल एक्सपर्ट समझने वाले गोदी मीडिया मई 2020 में भारतीय भक्तों को पढ़ा रहा था―चीन छोड़कर भारत आ रही हैं कंपनियां, बौखला रहा है ड्रैगन' या 'चीन से 1000 कंपनियां समेट रहीं कारोबार, भारत में आने को तैयार' जैसी हैडलाइन बनाकर चीन की हजारों कंपनियों के भारत आने की जो हवाबाजी की गई थी उसकी भी हवा निकल गई।
यह तो सर्वविदित ही है कि संघ सत्य और ज्ञान का शत्रु है, इसीलिए वह लोगों को शिक्षित करने के विरुद्ध है और शायद इसीलिए देश की शिक्षा का भट्टा बैठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
यूनेस्को (UNESCO) की '2021 स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडिया: नो टीचर्स, नो क्लास' रिपोर्ट से तो कम-से-कम यही साबित होता है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग लगभग 1.1 लाख स्कूल एक ही अध्यापक के भरोसे चल रहे हैं। देश के स्कूलों में शिक्षकों के कुल 19% या 11.16 लाख पद खाली हैं, जिनमें से 69% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। एक लाख से ज्यादा रिक्त पद वाले तीन राज्य उत्तर प्रदेश (3.3 लाख), बिहार (2.2 लाख) और पश्चिम बंगाल (1.1 लाख) हैं।
मध्य प्रदेश में सिंगल टीचर स्कूलों की संख्या सर्वाधिक (21077) है। ज्यादातर वैकेंसी ग्रामीण स्कूलों में हैं जैसे बिहार के मामले में, जहां 2.2 लाख शिक्षकों की जरूरत है और इनमें 89% गांवों में हैं। इसी तरह यूपी में खाली पड़े 3.2 लाख पदों में से 80 फीसदी ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में हैं। पश्चिम बंगाल के लिए यह आंकड़ा 69% है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 7.7% प्री-प्राइमरी, 4.6% प्राइमरी और 3.3% अपर-प्राइमरी शिक्षक कम योग्यता प्राप्त हैं। इस मामले में बिहार के हालात सबसे खराब हैं।
रिपोर्ट मे कहा गया है कि शिक्षकों की वर्तमान कमी को पूरा करने के लिए भारत को 11.16 लाख अतिरिक्त शिक्षकों की जरूरत है। भारत में महिलाएं शिक्षण कार्यबल का लगभग 50% हिस्सा हैं, लेकिन महत्वपूर्ण अंतर-राज्यीय और शहरी-ग्रामीण भिन्नताएं हैं।
कक्षा 3, 5 और 8 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार निम्न-शिक्षण निष्कर्ष के साथ इसे जोड़ते हुए यूनेस्को (UNESCO) ने शिक्षकों के रोजगार की शर्तों में सुधार करने, गांवों में उनकी काम करने की स्थिति में सुधार करने के अलावा 'आकांक्षी जिलों' को चिह्नित करने और शिक्षकों को फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के रूप में मान्यता देने की सिफारिश की है।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) और शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली (Unified District Information System for Education)(यूडीआइएसई) के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण-शहरी असमानता है और पूर्वोत्तर में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और तैनाती में सुधार की बहुत जरूरत है।
रिपोर्ट बहुत विस्तृत है और इसमें विभिन्न विसंगतियों को रेखांकित किया गया। कुल मिलाकर देश की प्राइमरी और मिडिल स्तर की पढ़ाई-लिखाई चौपट होने का सबूत पेश करती है।
सबकुछ धन्नासेठों के हवाले करने की सनक अकस्मात सवार नहीं हुई है, बल्कि यह बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत गुरु गोलवलकर के सपनों को साकार करने के लिए किया जा रहा है ताकि देश में सवाल खड़ा करने वाले पढ़े-लिखे लोगों से मुक्ति पाई जा सके।
बहरहाल, मजरूह सुल्तानपुरी ने इसी गीत में ठीक ही पूछा है―
ओ मन्नू! तेरा-मेरा अब क्या होगा?
गांधी जी की हत्या के उग्रवादी हिंदुओं द्वारा छह प्रयास किये गये थे
मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...