रविवार, 3 अक्टूबर 2021

गांधी जी की हत्या के उग्रवादी हिंदुओं द्वारा छह प्रयास किये गये थे

 गांधी जी की हत्या के उग्रवादी हिंदुओं द्वारा छह प्रयास किये गये थे

आज जब जलियांवालाबाग से लेकर साबरमती, चौरी-चौरा व अन्य तमाम ऐतिहासिक स्थलों सहित अभिलेखों तक में दर्ज देश के इतिहास को सुनियोजित तरीके से अपनी इच्छानुसार बदला जा रहा है, तब इतिहास के उन काले पन्नो को बार-बार सामने लाने की जरूरत है जिनमें दर्ज अपने कुकर्मों के कारण वर्चस्ववादी संघी बिरादरी सदैव भयभीत रहती आई है। ऐसा ही एक प्रमुख मामला है महात्मा गांधी जी की हत्या के छह बार किये गये प्रयास।
सिखा-पढ़ाकर दिलवाये गये नाथूराम गोडसे के उस अदालती बयान को संघी गिरोह बार-बार दोहराता है जिसमें उसने गांधी की हत्या का कारण गांधी जी की पाकिस्तान बनाने और उसके बाद उसे 55 करोड़ रुपये देने की सहमति बताया था। गोडसे के उस लंबे बयान को इसी गिरोह द्वारा एक पुस्तिका 'मैंने गांधी को क्यों मारा' के नाम से छापकर अब तक खूब बंटवाया जाता रहा है।
गोडसे के उक्त बयान के आधार पर ही संघ सहित तमाम उग्रवादी हिंदूवादी संगठन गांधी जी की हत्या को 'वध' कहते हैं लेकिन वे यह सच्चाई जानबूझ कर छिपा देना चाहते हैं कि गांधी जी हत्या की कोशिशें तो 1934 से ही शुरू कर दी गईं थीं।
गांधी हत्या की पहली कोशिश (1934)―
हिंदुत्व के गढ़ पुणे की नगरपालिका द्वारा आयोजित गांधी जी के सम्मान समारोह में जाते वक्त गांधी जी की गाड़ी पर बम फेंका गया। जिसमें नगरपालिका के मुख्य अधिकारी और पुलिस के दो जवानों सहित सात लोग गंभीर रूप से घायल हुए। गांधी जी के साथ चल रही लगभग एक जैसी दिखने वाली दो गाड़ियों में से गांधी जी वाली गाड़ी की ठीक-ठीक पहचान में चूक होने से हत्या की यह कोशिश विफल हो गई।
दरअसल गांधी जी उस गाड़ी में नहीं, उसके पीछे वाली में थे। वह चूक हत्या की योजना बनाने वालों से ही नहीं बल्कि इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करने के जिम्मेदार लोगों से भी हुई और मामला वहीं-का-वहीं दबा दिया गया।
दूसरी कोशिश (1944)―
इस साल गांधीजी जब जेल से रिहा हुए तो वे बीमार और बेहद कमजोर थे। इसलिए उन्हें तुरंत राजनीतिक गहमागहमी से दूर शांत-एकांत में आराम करने के लिए पुणे के निकट पंचगनी ले जाया गया। यहां बीमार गांधी का ठहरना हिन्दुत्ववादियों को अपने शौर्य प्रदर्शन का अवसर लगा और वे वहां पहुंचकर लगातार नारेबाजी व प्रदर्शन करने लगे। फिर 22 जुलाइ को नाथूराम गोडसे मौका देखकर गांधीजी की तरफ छुरा लेकर झपटा लेकिन भिसारे गुरुजी ने उसे दबोच कर उसके हाथ से छुरा छीन लिया। गांधी जी ने उसे छोड़ देने का निर्देश देते हुए कहा कि उसको कहो कि वह मेरे पास आकर कुछ दिन रहे ताकि मैं जान सकूं कि उसे मुझसे शिकायत क्या है लेकिन नाथूराम इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
तीसरी कोशिश (1944)―
पंचगमी की विफलता को सफलता में बदलने के इरादे से गांधी जी की हत्या की तीसरी कोशिश 1944 में ही वर्धा स्थित गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम में की गई। पंचगनी से निकल कर गांधी जी फिर से अपने काम में डूबे हुए थे। टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरगना विनायक दामोदर सावरकर की मुहम्मद अली जिन्ना तथा अंग्रेजों से मिलकर की जाती रही बंटवारे की कोशिशों को अमली जामा पहनाने की बातें हवा में थीं। सावरकर और जिन्ना सांप्रदायिकता का जहर फैलाने में व्यस्त थे। सांप्रदायिक हिंदू-मुसलमान दोनों ही मामले को और बिगाड़ने में लगे थे। गांधी जी इस पूरे मामले पर जिन्ना से सीधे बातचीत की योजना बना रहे थे और यह तय हुआ कि गांधी जी मुंबई जाकर जिन्ना से मिलेंगे।

गांधी जी के मुंबई जाने की तैयारियां चल रही थीं कि तभी विभाजन पर अड़े सावरकर के गिरोह ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी सूरत में गांधी जी को जिन्ना से बात करने मुंबई नहीं जाने देंगे। पुणे से उनकी एक टोली वर्धा आ पहुंचीं और उसने सेवाग्राम आश्रम को घेर लिया। वे वहां से नारेबाजी करते, आने-जाने वालों को परेशान करते और गांधी जी पर हमला करने का मौका खोजते रहते। पुलिस का पहरा था। निर्भीक गांधीजी ने बता दिया कि वे नियत समय पर मुंबई जाने के लिए आश्रम से निकलेंगे और विरोध करने वाली टोली के साथ तब तक पैदल चलते रहेंगे जब तक वे उन्हें मोटर में बैठने की इजाजत नहीं देते।
पुलिस के पास ख़ुफ़िया जानकारी थी कि ये उपद्रवी लोग कुछ अप्रिय करने की तैयारी में है। इसीलिए उसने उपद्रवी टोली को गिरफ्तार कर लिया। सबकी तलाशी ली गई तो इस टोली के सदस्य ग. ल थत्ते के पास एक बड़ा सा छुरा बरामद हुआ। उन उपद्रवी युवाओं का वर्धा पहुंचना, उनके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्माताओं में से एक माधवराव सदाशिव गोलवलकर का अचानक वर्धा आगमन और यह छुरा, यह सब मिलाकर एक ही कहानी कहते हैं कि जिस तरह भी हो, गांधी का खात्मा करो।
चौथी कोशिश (1946)―
पंचगनी और वर्धा की विफलता से परेशान इन लोगों ने तय किया कि गांधी जी को मारने के क्रम में कुछ दूसरे भी मरते हों तो मरें। इसीलिए जब गांधी जी 30 जून को जिस रेलगाड़ी से मुंबई से पुणे जा रहे थे उसे पलटने का षड्यंत्र रचा गया। करजत स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चली थी लेकिन सावधान ड्राइवर ने गाड़ी पलटने के इरादे से ट्रेन की पटरियों पर रखे बड़े-बड़े पत्थर देख लिये थे। उसने तत्काल इमर्जेंसी ब्रेक लगाकर गाड़ी रोकी। गांधी जी एक बार फिर बच गए।
इस घटना का अपनी प्रार्थना सभा में जिक्र करते हुए गांधी जी ने कहा, "मैं सात बार मारने के ऐसे प्रयासों से बच गया हूं। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूं। मैं तो 125 साल जीने की आशा रखता हूं।" इस पर पुणे से निकलने वाले अख़बार ‘हिंदू राष्ट्र’ के संपादक नाथूराम गोडसे ने जवाब दिया, "लेकिन आपको इतने साल जीने कौन देगा।"
पांचवीं कोशिश (1948)―
पर्दे के पीछे लगातार षड्यंत्रों और योजनाओं का दौर चलता रहा। सावरकर अब तक की अपनी हर कोशिश की विफलता से खिन्न और अधीर हो चला था क्योंकि हत्या उसके तरकश का आखिरी नहीं, ज़रूरी हथियार था। इसे कब, कैसे और किसके लिए इस्तेमाल करना है यह फैसला हमेशा सावरकर का ही होता था।
जब लंदन में धींगरा हत्या की ऐसी ही एक कोशिश में विफल हुआ, तब भी सावरकर ने उसे चेतावनी दी थी, "अगर इस बार विफल रहे तो फिर मुझे मुंह न दिखाना।"
इसी दौर में देश को सांप्रदायिकता की दावाग्नि में झौंका जा चुका था। अकेले गांधी क्षमा, शांति और विवेक का भाव भरते कभी यहां, तो कभी वहां भागते फिरते। वे पंजाब के रास्ते दिल्ली पहुंचे जहां की हालत बेहद खराब थी। हालात काबू में आने तक गांधी जी दिल्ली में ही रुकने का फैसला करते हैं। इधर गांधी जी का फैसला हुआ, उधर सावरकर की हत्यारी टोली का भी आर-पार का फैसला हुआ। गांधीजी ने कहा, "मैं दिल्ली छोड़कर नहीं जाऊंगा।" सावरकर टोली ने कहा, "हम आपको दिल्ली से जिंदा वापस निकलने नहीं देंगे!" स्थान गांधी जी का था―बिरला भवन और बम सावरकर के गिरोह का।
दिल्ली में 13 से 19 जनवरी तक गांधी जी का आमरण उपवास चला। इसके कारण अंधाधुंध हत्याओं व लूट-पाट पर कुछ रोक लगी। सभी समाजों, समृप्रदायों, सगठनों ने गांधी जी को वचन दिया कि वे दिल्ली का मन फिर नहीं बिगड़ने देंगे। ऐसा कहने वालों में सावरकर का गिरोह भी शामिल था जो उसी वक़्त हत्या की अपनी योजना पर भी काम कर रहा था।
बिरला भवन में रोज की तरह 20 जनवरी की शाम को भी प्रार्थना थी। गांधी जी अपनी क्षीण आवाज़ में इन सारी बातों का जिक्र कर रहे थे कि विभाजन के एक शरणार्थी मदनलाल पाहवा ने दीवार की आड़ से उन पर बम फेंका। बम फटा भी लेकिन गांधी जी जहां बैठे थे, उसकी दूरी का मनलाल का अंदाजा गलत होने से उसका निशाना चूक गया। गांधी जी फिर बच गए। बमबाज मदनलाल पाहवा पकड़ा भी गया लेकिन जिन्हें पकड़ना था, उन्हें किसी ने नहीं पकड़ा।


छठी अंतिम कोशिश (30 जनवरी, 1948)―
इसके सिर्फ दस दिन बाद ही प्रार्थना-भाव में मग्न अपने राम की तरफ जाते हुए इस देश ही नहीं, बल्कि दुनिया को सत्य व अहिंसा का पाठ पढ़ाने तथा स्वतंत्रता का मूल्य समझाने वाले फकीर की छाती में नाथूराम ने तीन गोलियां उतार कर उग्रवादी हिंदुओं के माथे पर सदैव के लिए कलंक का टीका लगा दिया।
इस तरह पूज्य बापू अमरत्व को प्राप्त कर गये और हत्यारों की प्रेत आत्माएं अनंतकाल तक भटकने को अभिशप्त हो गईं। जो आज भी यथावत् हम सबके बीच अपने कुकर्मों की अग्नि में जलती हुई अश्वत्थामा की तरह भटक रही हैं।

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