शनिवार, 16 अप्रैल 2022

मुंगेरीलाल का हसीन सपना है अखंड भारत

 मुंगेरीलाल का हसीन सपना है अखंड भारत


रासस प्रमुख मोहन भागवत ने कनखल (हरिद्वार) में एक समारोह को सम्बोधित करते हुए दक्षिणपंथियों का पुराना राग फिर से आलापते हुए कहा है कि '15 साल में भारत फिर 'अखंड भारत' बन जाएगा। यह सब हम अपनी आंखों से देखेंगे। अगर हम सब मिलकर थोड़ा प्रयास करेंगे और इसकी गति बढ़ाएंगे तो स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद के सपनों का अखंड भारत बन जाएगा।'
आश्चर्यजनक यह है कि वे यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने दावा किया कि 'इसे कोई रोकने वाला नहीं है, जो इसके रास्ते में जो आएंगे, मिट जाएंगे।'
अपने इरादे को परिणति तक पहुंचाने के लिए कोई किम जोंग उन जैसा सिरफिरा तानाशाह ही मोहन भागवत जैसी भाषा का प्रयोग कर सकता है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक समझ रखने वाला जिम्मेदार व्यक्ति नहीं क्योंकि अखंड भारत की इनकी परिकल्पना देश की हिमालय और समुद्री सीमा रेखाओं से परे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाइलैंड और तिब्बत तक जाती है।
अब कोई मोहन भागवत से पूछे कि ऐसा कैसे सम्भव होगा? जब प्रधानमंत्री के पद पर आपके एक प्रचारक स्वयंसेवक के आसीन होते हुए चीन ने अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक भारतीय सीमा के करीब 4.5 किमी. अंदर ऊपरी सुबनसिरी जिले में करीब सौ घरों वाला एक गांव बसा लिया। अरुणाचल प्रदेश में चीन की घुसपैठ पर वहां से भाजपा सांसद तापिर गावो की लोकसभा में दी गई चेतावनी को भी अनसुना कर दिया गया। पश्चिम में लद्दाख में चीन ने भारतीय सीमा के अंदर जबरन घुसकर गलवान घाटी में स्पैनगुर त्सो (पैंगोंग झील) के इलाके में नई सड़क का निर्माण कर लिया। जबकि पैंगोंग त्सो के दक्षिणी किनारे की ऊंची पहाड़ियों पर, फिंगर 4 के पूर्व में, उसने पहले ही कब्जा कर लिया। और, वह चीन के आगे थर-थर कांपते हुए कहता है, "न कोई घुसा था और न ही किसी ने कब्जा किया हुआ है!"
दूसरी बात, क्या अखंड भारत के संघी विचार से भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, थाइलैंड, श्रीलंका और चीन (तिब्बत) सहमत हैं? जिनकी मंजूरी के बिना तो यह एक दिवास्वप्न से अधिक नहीं है। या फिर आपके आदेश देते ही ये सभी देश पूरा इलाका छोड़ कर आपको सोने की थाली में सजाकर सौंप देंगे? यदि ऐसा नहीं है तो फिर ऐसी बेवकूफी भरी बात किसे मूर्ख बनाने के लिए कही गई है? सभी तो आपके संगठन के लठैत नहीं होते कि उनके सामने कुछ भी कह दिया जाये और वे समर्थन में जै-जैकार करने लग जायें मिस्टर भागवत।
अब रासस की उस पीड़ा को भी देख लिया जाये जो इसे भारत में मुसलमानों को लेकर है। मुस्लिम आबादी के नजरिये से भी देखें तो इनकी आबादी अफगानिस्तान (3.42 करोड़), पाकिस्तान (20.04 करोड़), बांग्लादेश (15.3 करोड़), म्यांमार (19.18 लाख), थाइलैंड (38.02 लाख) और भारत (22.5 करोड़) यानी प्रस्तावित अखंड भारत में कुल मुस्लिम आबादी 61.83 करोड़ हो जायेगी। जबकि भारत में हिंदुओं की संख्या 96 करोड़ 63 लाख है। रासस और उसकी तरह अपनी समस्याओं का कारण मुसलमानों को मानने वाले अन्य संगठनों को जब देश के वर्तमान 22.5 करोड़ मुस्लिमों से तकलीफ होती है, तो फिर अखंड भारत बनने से यह पीड़ा कम होने की जगह बढ़ ही जायेगी; क्योंकि तब कुल मिलाकर 61.83 करोड़ मुसलमान एकसाथ अखंड भारत में होंगे। जब अभी 22.5 करोड़ मुस्लिमों के कारण भारत के इस्लामिक राष्ट्र बन जाने का खतरा बताया जा रहा है, तब तो स्थिति आज से भी ज्यादा विस्फोटक हो जायेगी।
संघ प्रमुख द्वारा ऐसी बात कहने से पहले संविधान से अनुच्छेद 370 हटाने और 35ए को समाप्त करने पर संसद में चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने भी पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को भारत में शामिल करने का भरोसा दिया था।
माना कि अखंड भारत की चर्चा स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी, 1863-4 जुलाइ, 1902) और महर्षि अरविंद (15 अगस्त, 1872- 5 दिसंबर, 1950) ने भी की थी लेकिन वह दौर अंग्रेजी शासन का था। जो तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति, आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर न तब सम्भव हो सका और न निकट भविष्य में ऐसी कोई उम्मीद है। तो फिर इन लोगों की बात को मुंगेरीलाल का हसीन सपना ही माना जाएगा। या फिर सत्ता के नशे का दुष्प्रभाव जो अच्छे-अच्छे का दिमाग फेर देता है। शायद तुलसीदास ने ठीक ही कहा था―
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई।
जस थोरेहुं धन खल इतराई।।
(रामचरितमानस—4.14.3) ■


बुधवार, 13 अप्रैल 2022

राम जन्म की तिथि चैत्र शुक्ल नवमी संदिग्ध है

राम जन्म की तिथि चैत्र शुक्ल नवमी संदिग्ध है

—रामाशीष यादव

हिंदुओं द्वारा श्रीराम का जन्मदिन राम नवमी के नाम से मनाया जाता है। यह दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को पड़ता है। इस तिथि को श्रीराम जन्मदिन कब से मनाया जा रहा है और श्रीराम का जन्म कब हुआ था, आइए इस विषय पर अब तक उपलब्ध तथ्यों/साक्ष्यों पर विचार करते हैं। क्या दशरथ पुत्र राम ऐतिहासिक व्यक्ति थे?

1. परम्परागत रूप से श्रीराम का जन्म त्रेता युग में हुआ माना जाता है। ग्रंथों में युग की परिभाषा विभिन्न प्रकार से मिलती है। एक युग पांच वर्ष से लेकर लाखों वर्ष तक को कहा गया है। पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20.000 वर्ष होते हैं जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष, द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ माना जाता है। कलयुग के 5,100 वर्ष, द्वापर के 8,64,000 वर्ष तथा राम के जीवन के 11,000 वर्ष मिलाकर 8,80,100 वर्ष होते हैं। इस तरह राम जन्म आज से 8,80,100 वर्ष पूर्व हुआ होगा। हलांकि बाल्मीकि रामायण में एक स्थान पर एक हजार वर्ष को टीका लिखने वाले ने एक हजार दिन माना है और उससे "बहुत दिन से" अर्थ लगाते हैं।

2. डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक (वास्तव रामायण-मराठी) का कहना है कि वाल्मीकि रामायण में एक स्थल पर विंध्याचल तथा हिमालय की ऊंचाई समान बताई गई है। विंध्याचल की ऊंचाई आजकल 2,467 फीट है तथा यह प्राय: स्थिर है जबकि हिमालय की ऊंचाई 29,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यतानुसार हिमालय एक सौ वर्षों में तीन फीट बढ़ता है। अत: इस गणना के अनुसार हिमालय को इतना बढ़ने में 8,85,400 वर्ष लगे होंगे। लेकिन डॉ. वर्तक स्वयं ही लिखते हैं कि इसकी पुष्टि और किसी स्रोत से नहीं हो पाती है। जब मैं पांचवी कक्षा में था तब एवरेस्ट की ऊंचाई 29,002 फीट पढ़ाया गया था। अब साठ वर्ष में 27 फीट की बढ़ोत्तरी हुई है या कि नापने में गलती थी/है। यदि नापने की गलती है तो वृद्धि का सिद्धांत भी त्रुटि से परे कैसे हो सकता है? इस विषय पर और अध्ययन की आवश्यकता लग रही है।

3. अब आइये प्रचलित वाल्मीकि रामायण के अंत: साक्ष्य के अनुसार इस समस्या पर विचार करते हैं। बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8-10 तक राम जन्म की जानकारी दी गई है। इस जानकारी के अनुसार, "यज्ञ समाप्ति के पश्चात छः ऋतुएं बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वशु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौसल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्व लोक वंदित राम को जन्म दिया।उस समय पांच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान पर विद्यमान थे।"

प्राय: सभी विद्वानों के अनुसार यह पांच उच्च ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र थे। इसका आधार सिर्फ राम जन्म सम्बंधी श्लोक न होकर अन्य भाइयों के जन्म सम्बंधी श्लोक को मिला जुलाकर है। इन्हीं श्लोकों के आधार पर राम जन्म तिथि निकालने का बहुत सारे लोगों ने प्रयास किया है। आइये इन तिथियों को समझते हैं—

4. डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक (उपरोक्त) ने उक्त श्लोकों के आधार पर राम जन्म की तिथि ईपू. 4-12-7323 (दिन में 1:30 बजे से 3:00 बजे) निकाली है। प्रो. तोबयस के अनुसार यह तिथि 10-01-5114 ईपू. 12:25 मिनट है। वर्ष 2004 में 'आई सर्वे' के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके जन्मतिथि 10-01-5114 सिद्ध किया है लेकिन यह तिथि इसलिए संदेहास्पद है क्योंकि उक्त सॉफ्टवेयर 3000 ईपू. से पहले का सही ग्रह गणित करने में सक्षम नहीं है। इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न हो कर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था और तिथि भी अष्टमी ही थी। बाद में एक विशेषज्ञ द्वारा 'ejplde431' सॉफ्टवेयर से गणना करने पर नवमी तिथि की पुष्टि होती है परंतु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में। (2013 से पूर्व 3000 ईपू. से पहले ग्रह गणित करने का सॉफ्टवेयर उपलब्ध ही नहीं था)। अत: 10-01-5114 ईपू. की तिथि वस्तुत: राम की जन्मतिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। ऐसी स्थिति में अब डॉ. वर्तक द्वारा पहले ही परिशोधित तिथि सॉफ्टवेयर द्वारा प्रमाणित हो जाये तभी राम जी का वास्तविक जन्मदिन प्राय: सर्वमान्य हो पायेगा अथवा प्रमाणित न हो पाने की स्थिति में नवीन तिथि के शोध का रास्ता खुलेगा अथवा हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित तिथि ही सर्वमान्य प्रमाण हो सकती है, इत्यादि। इन सब तिथियों में से किस एक को सही माना जाय तो क्यों?

उक्त तिथियां आर्यों के भारत में प्रवेश करने से पूर्व की हैं। जब आर्यों ने भारत में प्रवेश ही नहीं किया था तो आर्य परिवार से सम्बंधित माने जाते दशरथनन्दन राम का जन्म भारत में कैसे हुआ, यह यक्ष प्रश्न है?

5. अब चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी की बात की जाए। देश में प्राय:नवरात्रि मनाने की परंपरा है। यह सुर-असुर विवाद के कारण हुए युद्ध के कारण मनाया जाता है। ऋग्वेद में सुर शब्द ही नहीं है। इसका अर्थ है कि यह सुर-असुर का झगड़ा बहुत बाद का लग रहा है। यह युद्ध दो वर्गों के बीच की लड़ाई थी, जब एक ही असुर वर्ग के लोग दो अलग-अलग विचारधारा में बँट गये होंगे। वैसे भयंकर सुरापायी को सुर कहा जाता था और जो सुरा नहीं पीते थे उन्हें असुर, इस आशय के कई श्लोक मिल जाते हैं। इस मामले के विस्तार में नहीं जा रहा हूं फिर भी आजकल इस पर कुछ मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। अष्टमी को कन्याओं को भोजन कराया जाता है लेकिन मैं एक दूसरी बात बताना चाहता हूं। मेरा गांव बिहार की सीमा से ज्यादा दूर नहीं है। अतः बिहार की तमाम परम्पराओं को स्वत: ही वहां मान्यता मिल जाती है। मेरे गांव और आसपास के बहुत सारे गांवों में अष्टमी के दिन सायंकाल एक जगह एकत्र होकर (अधिकतर किसी धार्मिक स्थल पर जो हर गांव में होता ही है) पूजा करते हैं और वह भी गेहूं के आटे से परांठेनुमा रोटी बनाकर। ये पराठें उस समय नास्ते का काम देते हैं। उसके बाद देर रात तक पूरी और खीर बनता है और पूजा-पाठ करके फिर लोग खाना खाते हैं। अगले दिन अर्थात नवमी के दिन कोई खास कार्यक्रम नहीं होता बल्कि खाना भी देर रात वाला ही काम आता है। उस दिन पहले कुछ लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे परंतु अब वह परंपरा समाप्त हो गयी प्रतीत होती है। मैं अष्टमी की बात करना चाहता हूं। अष्टमी को राम नवमी के ऊपर महत्व देने का कारण समझ में नहीं आया। फिर मैंने अभी कुछ दिन पहले हिन्दू पंचांग देखा कि अष्टमी के बारे में वहां क्या बताया गया है? वैसे तो इसमें कई बातें दी गई हैं परंतु मेरा ध्यान 'अशोकाष्टमी' की तरफ गया। यह अशोकाष्टमी क्या है? कहीं यह सम्राट अशोक का जन्मदिन तो नहीं है? यह बहुत संभव है। इस तिथि का अशोक के वृक्ष से कोई मतलब तो नहीं दिखता भले निकालने वाले निकाल लें।जिस तरह मनाने का तरीका है वह जन्मदिन वाला ही है अर्थात खीर-पूड़ी बनाना और देर रात तक बनाना खाना।

6. राम को विष्णु का अवतार मानकर पूजा कबसे प्रारंभ हुई? इस विषय में सत्यकेतु विद्यालंकार की पुस्तक 'प्राचीन भारत' के पृष्ठ 101 में लिखा है—"गुप्त युग में राम को भगवान विष्णु का अवतार मानकर पूजा करने की प्रवृत्ति इस समय तक प्रचलित नहीं हुई थी। कृष्ण की पूजा का उल्लेख इस युग के बहुत से शिलालेखों में पाया जाता है पर राम की पूजा के सम्बंध में कोई ऐसा निर्देश इस युग के अवशेषों में उपलब्ध नहीं होता, यद्यपि राम के परम पावन चरित्र के कारण उसमें भगवान के अंश का विचार इस समय में विकसित होना आरंभ हो गया था। कालीदास ने इसका निर्देश किया है पर राम की पूजा भारत में छठी सदी के बाद में ही शुरू हुई।"

गुप्त युग से पूर्व शिव प्रमुख देवता/ईश्वर थे परन्तु गुप्त युग में कृष्ण प्रमुख देवता/ईश्वर हो गए। इससे स्पष्ट है कि राम की पूजा छठी सदी या उसके बाद ही प्रमुख रूप से आरंभ हो पाई।

विश्लेषण:—
7. सबसे प्राचीन साहित्य है वैदिक साहित्य जिसमें रामकथा के पात्रों व नामों का उल्लेख मिलता है परंतु इनके पारस्परिक सम्बंध का कोई निर्देश नहीं मिलता। बाबा कामिल बुल्के के अनुसार—"वैदिक रचनाओं में रामायण के एकाध पात्रों के नाम अवश्य मिलते हैं, लेकिन न तो इनके पारंपरिक सम्बंध की कोई सूचना दी गई है और न ही इनके विषय में रामायण की कथा-वस्तु का किंचित भी निर्देश दिया गया है। जनक और सीता का बार-बार उल्लेख होने पर भी दोनों का पिता-पुत्री सम्बंध कहीं भी निर्दिष्ट नहीं हुआ है।

ऋग्वेद में राम को एक स्थल पर राम असुर कहा गया है। आजकल जो अर्थ असुर से लगाया जाता है वह वैदिक काल में नहीं था। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि ऋग्वेद में सुर शब्द ही नहीं है जबकि सुर और असुर एक-दूसरे के विपरीत माने जाते हैं। वैदिक काल में देवताओं को भी असुर की श्रेणी में रखा गया है। सुर-असुर का विभाजन बाद के दिनों का लगता है।

अतः वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा राम कथा सम्बंधी गाथाएं प्रसिद्ध हो चुकी थीं, इसका निर्देश विस्तृत वैदिक साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता है। अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम रामायण के पात्रों के नामों से मिलते हैं; इससे इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये नाम प्राचीन काल में भी प्रचलित थे।"

वैदिक साहित्य की रचना ईपू. 1700 से लेकर आगे गौतम बुद्ध के पूर्व तक मानी जाती है। अतः राम जन्म तिथि के बारे में वैदिक साहित्य से कोई अटकल लगाना खतरे से खाली नहीं है।

8. बाल काण्ड और उत्तर काण्ड बहुत बाद में वाल्मीकि रामायण में जोड़े गये हैं। बाल काण्ड के बारे में अनुमान है कि वह ईपू. 100 के आसपास वाल्मीकि रामायण में जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि सम्पूर्ण बालकाण्ड एक बार में जोड़ा गया है। इसे भी कई बार में जोड़ा गया है।जिन श्लोकों के आधार पर राम जन्म की गणना की जा रही है, वे श्लोक रामायण के तीन पाठों में से सिर्फ एक पाठ (दक्षिणात्य पाठ) में ही पाये जाने के कारण प्रक्षिप्त माने जाते हैं। अब ये देखना दिलचस्प है कि यह श्लोक कब रामायण में जोड़ा गया।

प्रस्तुत श्लोक में कर्क राशि का वर्णन है।सात वार तथा 12 राशियों का विचार विदेशी है। राशियों का प्रचलन बेबीलोनी (खाल्दियाई) ज्योतिष में हुआ था।खाल्दियाई राशि नामों को, साथ में फलित ज्योतिष को भी, यूनानियों ने अपनाया।सेल्यूकी साम्राज्य के दौरान बाद में शकों के साथ भारत में खाल्दियाई-यूनानी ज्योतिष (साथ में फलित ज्योतिष, राशि चक्र तथा सात वारों) को प्रवेश मिला।

कुछ प्राचीन आख्यानों से स्पष्ट है कि भारत में खाल्दियाई-यूनानी ज्योतिष का आगमन, फलित ज्योतिष भी, शकद्वीपी ब्राह्मणों के जरिए हुआ। वराहमिहिर (ईसा की छठी शताब्दी) संभवतः शकद्विपी शक ब्राह्मण थे। आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) को भी यूनानी ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था। (देखें गुणाकर मुले की पुस्तक 'आकाश दर्शन')।

अतः स्पष्ट है कि वार और राशि का प्रवेश भारत में बाद में हुआ है और इसके प्रचलित होने में समय लगा होगा। फादर कामिल बुल्के का अनुमान है कि यह श्लोक पांचवीं सदी ईस्वी अथवा इसके बाद का प्रक्षेप है।

निष्कर्ष:—
9. उक्त विवेचना से स्पष्ट है कि जिस श्लोक के आधार पर राम जन्म की गणना की जा रही है वह श्लोक ही संदिग्ध है। अतः उसके आधार पर निकाला गया निष्कर्ष भी संदेह से परे नहीं हो सकता। ऐसा लगता है कि इस श्लोक के प्रक्षेपण के बाद राम जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। कब प्रारंभ हुई, यह स्पष्ट तो नहीं है फिर भी छठी सदी में शुरू होने की प्रबल संभावना है। फिर यदि यह अनुमान सही है तो इस निष्कर्ष से भी यही पता चलता है कि राम जन्म पिछले चौदह-पंद्रह सौ वर्ष से तो इसी तिथि को लोग मनाते हैं भले ही यह तिथि संदिग्ध क्यों न हो।

निष्कर्ष तो यही निकलता है कि राम जन्म की यह तिथि संदिग्ध है।

जहां तक राम की ऐतिहासिकता की बात है, श्रीलंका, जिसे वाल्मीकि रामायण में लंका लिखा गया है, के प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों महावंस और दीप वंस में कहीं भी दशरथनन्दन राम और रावण का नाम नहीं मिलता है। इस तरह न राम और न रावण ही ऐतिहासिक व्यक्ति सिद्ध हो पाते हैं। प्रक्षेपण का यह हाल है कि रावण को बौद्धों ने बौद्ध धर्म का सिद्ध कर दिया और गौतम बुद्ध को लंका में जाकर रावण को उपदेश देना बता दिया। दरअसल सिंहल द्वीप को लंका नाम संभवतः बौद्धों का ही दिया गया लगता है।

इसी के साथ राम नवमी की सभी को अनन्त शुभकामनाएं क्योंकि भारत का संविधान सभी धर्मों को मानने के लिए छूट देता है। हालांकि साथ में वैज्ञानिक/तर्क के विकास की भी बात करता है। ■

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

देश पर नई गुलामी थोपने की तैयारी है―'अग्निपथ भर्ती योजना'

देश पर नई गुलामी थोपने की तैयारी है―'अग्निपथ भर्ती योजना'


यह खबर ताजा है कि अब सरकार सेना में 'अग्निपथ भर्ती योजना' के तहत तीन वर्ष के लिए सैनिकों को संविदा पर भर्ती करने जा रही है। इन्हें 'अग्निवीर' कहा जायेगा। बताया जा रहा है कि इससे सशत्र बलों की औसत उम्र में कमी आयेगी और साथ ही रिटायरमेंट बैनिफिट्स व पैंशन का 'बोझ' भी सरकार पर नहीं पड़ेगा। तीन साल बाद अपनी जरूरत को देखते हुए सेना इन अग्निवीरों में से कुछ को सेना की स्थाई सेवा में भी शामिल कर सकेगी। तीन साल बाद सेना से निकलकर ये अग्निवीर कॉरपोरेट क्षेत्र में भी नौकरी कर सकेंगे। कहा जा रहा है कि इस 'अग्निपथ भर्ती योजना' के लिए सेना के तीनों अंगों ने उच्चाधिकारियों को अपनी तरफ से संस्तुतियां दे दी हैं।
अब यह समझना बेहद जरूरी है कि इस 'अग्निपथ भर्ती योजना' के निहितार्थ क्या हैं, क्योंकि यह रासस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के उस खतरनाक खेल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है जो बहुत पहले ही शुरू हो चुका है।
कैसे? आइये देखते हैं―
पहले थोड़ा इतिहास में जाकर देखते हैं, जब कथित रामजन्मभूमि स्थल पर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया गया था, तब हिंदुओं के लिए उस अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर पूजा-अर्चना के लिए चारों पीठों में से किसी एक भी शंकराचार्य को आमंत्रित ही नहीं किया गया। उनकी जगह पर सरसंघचालक मोहन भागवत स्वयं बैठ गये थे। क्यों? क्या सरसंघचलक शंकराचार्य से भी अधिक पूजनीय और समस्त हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता है? नहीं। तो फिर शंकराचार्य को उपेक्षित कर मोहन भागवत क्यों बैठ गये?
इसका एकमात्र कारण है रासस की अपने सरसंघचालक को 1979 के ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह हिंदुओं की धार्मिक आस्था और राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने की योजना। जिसके आधे हिस्से में रासस अपने जेबी संगठन भाजपा के जरिये केंद्र व कुछेक राज्यों की सरकार का पर्दे के पीछे से संचालन कर ही रहा है। तो इसका दूसरा आधा भाग था अयोध्या वाली पूजा-प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में शंकराचार्य के स्थान पर मोहन भागवत का बैठ जाना।
अब आगे देखिये―
रासस ने अपनी दूरगामी योजना के तहत ही सबसे पहले केंद्र सरकार के उच्च प्रशासनिक स्तर पर संयुक्त सचिव और उससे नीचे के पदों पर निजी क्षेत्र से अपने स्वयंसेवकों की सीधे-सीधे नियुक्ति कराने का रास्ता खुलवा दिया। अब वे अधिकारी आजीवन रासस के प्रति वफादार रहेंगे और सरकारी सेवाओं के दौरान समय-समय पर सरकार की नीतियों, निर्णयों, योजनाओं और कार्यक्रमों को रासस के अनुसार संचालित करेंगे। रासस के वित्तपोषक पूंजीपतियों का हित-लाभ करेंगे। रासस का कृपापात्र होने से वे सदैव मुख्य प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से चुने गये ऐसे अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सिरदर्द पैदा करते रहेंगे जो रासस से असहमत हों।
रासस के ऐसे कृपापात्र अधिकारी धीरे-धीरे जिला व तहसील स्तर पर डीएम और एसडीएम के पदों पर भी बैठाये जायेंगे। तो दूसरी तरफ सेना के खर्चे पर प्रशिक्षित और वहां तीन साल तक नौकरी कर चुके 'अग्निवीरों' की भारी तादात निजी सुरक्षा ऐजेंसियों के नाम पर कॉरपोरेट घरानों के पास मौजूद होगी ही जो ठीक हिटलर की एस.एस. की तरह डीएम और एसडीएम के मार्फत जनता को नियंत्रित करने का काम करेगी।
इस तरह सत्ता पर आधिपत्य जमाने का रासस का कार्य पूरा होने के बाद अगले चरण में―सबसे पहले साम्प्रदायिक दंगे करवा कर मुस्लिम आबादी, विरोधी नेताओं तथा बुद्धिजीवियों का सफाया शुरू किया जायेगा। इस काम में रासस के कृपापात्र आइएएस, आइपीएस अधिकारी स्थानीय स्तर पर व्यवस्था को पंगु कर सहयोग करेंगे। वे यातायात, दूर संचार और खाद्य आपूर्ति सेवाओं को कठिन बना देंगे। इसके साथ ही लोगों का ध्यान बंटाने और उन्हें चुप कराने के लिए सीमा पर सैनिक हलचल तेज कर दी जायेगी।
इतना सब करने के बाद रासस के सरसंघचालक को 1979 के ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह हिंदुओं की धार्मिक आस्था और देश की राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनने से कौन रोक सकेगा?
इसके बाद संविधान को निलंबित/संशोधित या पूर्णतया समाप्त कर दिया जायेगा। न्यायालयों का संचालन तालिबानी और शिया अदालतों की तरह मनुस्मृति के आधार पर किया जायेगा। समाज में वर्ण-व्यवस्था कठोरतापूर्वक लागू की जायेगी। दलितों, बौद्धों और स्त्रियों की दशा दोयम दर्जे के नागरिकों जैसी होगी। जनता के लिए 'सम्राट' की आज्ञा सर्वोपरि होगी।
और यह सब आपकी आंखों के सामने होगा क्योंकि इसकी सहमति आपने ही दे रखी है। और, 2024 में भी जनता को सद्बुद्धि आ जायेगी, इसकी सम्भावना कम से कम मुझे तो नहीं दिखाई दे रही है, अपनी आप जानें। ■



 

'द कश्मीर फाइल्स' दंगाई मानसिकता को बढ़ावा देने वाली एक घटिया हरकत है

'द कश्मीर फाइल्स' दंगाई मानसिकता को बढ़ावा देने वाली एक घटिया हरकत है




'द कश्मीर फाइल्स' फिल्म पर चर्चाओं का दौर जारी है, जिसे कुछ लोग ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित बता रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है।
यह बड़ी विचित्र बात है कि जो कश्मीरी पंडित सदैव से ही जम्मू कश्मीर की राजनीति, प्रशासन और अर्थतंत्र पर प्रभावी रहे वे देश की राजनीति में रासस-भाजपा के ताकतवर बनते ही इस स्तर तक कमजोर हो गये कि उन्हें कोई संघर्ष किये बिना ही अपने पूर्वजों की विरासत छोड़कर कैसे भागना पड़ा।
यह समझना होगा कि जब भी किसी पर संकट आता है तो वह उससे मुक्त होने के लिए अपने स्तर से यथाशक्ति संघर्ष और प्रतिरोध करता है। अपनी क्षमता कम आंककर दूसरों की मदद लेता है। पुलिस, प्रशासन और सरकार पर दबाव डालता है। देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे जनांदोलन चलते रहते हैं। खेती-किसानी पर आंच आई तो किसान 13 महीनों तक अनेक तरह की मुसीबत झेलते हुए भी देश की राजधानी के सीमाद्वारों पर पड़े रहे।
जम्मू-कश्मीर में आज भी जाट, गुर्जर और बीस हजार से भी अधिक सिख खेती कर रहे हैं। जिन्होंने आज तक दिल्ली आकर पीड़ित होने का रोना-धोना नहीं किया है।
सारा देश और दुनिया जानती है कि देश के बारह राज्यों में 1967 के बाद आदिवासियों की पुश्तैनी जमीनों को हथियाने के लिए उनको चुन-चुनकर मारा जा रहा है। उन्हें माओवादी, नक्सली और विकास के मार्ग में रोड़ा बताते हुए जेलों में सड़ाया जा रहा है। जबकि सारा खेल राजनीतिक दलों को भारी चंदा और बड़े-बड़े राजनेताओं व पुलिस-प्रशासन के उच्च पदस्थ अधिकारियों को मोटी रकम चढ़ाकर आदिवासियों की जमीन, जंगल पर कब्जा कर व्यावसायिक लाभ लेने के लिए बड़े पूंजीपतियों का है। वे ही अपने हितलाभ के नियम-कानून बनवाकर आदिवासियों को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर रहे हैं।
ऊपर से पीढ़ियों से जंगलों के बीच तमाम तरह के साधनों से विहीन होते हुए भी खुद में मगन रहने वाले आदिवासियों को एक तरफ पुलिस-प्रशासन और दूसरी ओर माओवादियों के आतंक का शिकार होना पड़ता है। वे दो पाटों के बीच में पिस रहे हैं। इसके बावजूद भी आदिवासियों का उत्पीड़न उनका नरसंहार कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। उनके विस्थापन के दर्द और पुनर्वास की योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर कोई विमर्श नहीं होता।
जबकि दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों को देखें तो वे 1989 तक बहुत खुश थे और हर क्षेत्र में अग्रणी बने हुए थे। वहां सबकुछ वे ही संचालित कर रहे थे। अल्पसंख्यक होते हुए भी प्रशासन, अर्थतंत्र, राजनीति सब पर उनका ही वर्चस्व बना हुआ था।
अचानक 2 दिसम्बर, 1989 को दिल्ली में रासस-भाजपा समर्थित वीपी. सिंह की सरकार आ गई और राज्य सरकार को बर्खास्त करके जगमोहन को राज्यपाल बना दिया गया। उसके बाद ही एक निश्चित योजना के तहत कश्मीरी पंडितों पर जुल्म शुरू कराया गया।
ट्रेड यूनियन नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हृदयनाथ वांचू का कहना था कि 'यहां खुला दमन है। बीजेपी और आरएसएस लॉबी खुलेआम कह रही है कि जगमोहन को उन्होंने भेजा है। कश्मीर पर सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। विपक्ष को खत्म कर दिया गया है। मध्यमार्गियों के खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं।'


राज्यपाल जगमोहन ने कश्मीर आते ही कुछ दिनों के भीतर ही कश्मीरी पंडितों का घाटी छोड़कर पलायन शुरू हो गया; क्योंकि जगमोहन ने पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रेरित ही नहीं किया बल्कि उन्हें अन्यत्र चले जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराए।
अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आइएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्ला कहते हैं कि उन्होंने राज्यपाल जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहां सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी लेकिन जगमोहन ने मना ही नहीं कर दिया बल्कि इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैंप बनाए जा रहे हैं जो पंडित डर महसूस करें वे इन कैंपों में जा सकते हैं। जो कर्मचारी घाटी छोड़कर जाएंगे उन्हें तनख्वाह मिलती रहेंगी। जाहिर सी बात है कि उनकी ऐसी बातों ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया।
दरअसल, जगमोहन को घाटी में हिंदू-मुसलमान वैमनस्य बढ़ाने के लिए ही भेजा गया था। ताकि वहां से पंडितों की मारकाट और पलायन कराने के बाद सारे देश और दुनिया में हो-हल्ला मचाकर हिंदुत्व की भावना को वोट में तब्दील किया जा सके।
यही कारण था कि राज्यपाल जगमोहन ने पंडितों के भारी संख्या में सामूहिक पलायन की 20-21 जनवरी, 1990 को हुई शुरुआत पर चुप्पी साध ली और फिर देश भर में भाजपा समर्थित केंद्र सरकार की थुक्का फजीहत होने के डेढ़ महीने बाद 7 मार्च को पंडितों से कश्मीर छोड़कर न जाने की अपील की।
18 सितंबर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार 'अफसाना' में छपे एक पत्र में के. एल. कौल ने लिखा—'पंडितों से कहा गया था कि उन्हें मुफ्त राशन, घर, नौकरियां आदि सुविधाएं दी जाएंगी। उन्हें यह भी कहा गया कि नरसंहार खत्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा। हालांकि यह वादे पूरे नहीं किए गए।'
इसके बाद रासस-भाजपा ने अपनी पूर्व योजनानुसार मुसलमानों को विलेन साबित करने के लिए कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर खूब उछालना शुरू कर दिया।
उधर जगमोहन को भाजपा ने पुरस्कार स्वरूप 1996, 1998 और 1999 में नई दिल्ली से तीन बार लोकसभा सदस्य बनाया। अटल बिहारी वाजपेई ने 1998 में संचार, शहरी विकास और पर्यटन सहित विभिन्न विभागों का मंत्री बनाकर उपकृत किया। भाजपा के एहसान तले दबे जगमोहन ने 2019 में अनुच्छेद 370 और 35A को रद्द करने के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए भाजपा के आउटरीच अभियान में भाग लिया।
कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे को निपटाने के लिए सालाना खरबों के पैकेज दिए और जितने भी कश्मीरी पंडित पलायन करके आये उनको एलीट क्लास में स्थापित कर दिया।
कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला प्रतिमाह मुआवजा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवजे से अधिक है। समय-समय पर इसे बढ़ाया भी गया। आखिरी बार उमर अब्दुल्ला के शासनकाल में 2008 में आतंकवाद में मारे गए लोगों को 5 लाख रुपए की सहायता तथा क्षतिपूरक नौकरी का आदेश दिया गया। फिर 2015 में नकद राहत प्रति व्यक्ति ₹1500 से बढ़ाकर ₹2500 कर दी गई। एक परिवार के लिए अधिकतम राशि ₹10000 तय की गई। कश्मीरी विस्थापितों के लिए 3000 नौकरियां और आवास देने के लिए 200 करोड़ का पैकेज अनुमोदित किया गया।
वे साल में एक बार जंतर-मंतर पर आते, रासस-भाजपा के सहयोग से सरकार को ब्लैकमेल करते और हफ्ता वसूली कर वापस लौट जाते।
उधर, आदिवासी अपनी पीढ़ियों की संजोई विरासत को बचाने के लिए चूहों की तरह घेरेबंदी कर आये दिन मारे जा रहे हैं लेकिन न तो कभी संज्ञान लिया जाता और न ही इनके लिए भी कश्मीरी पंडितों की तरह पैंशन आदि की व्यवस्था की जरूरत महसूस की जाती।
आज देश के किसानों को विभिन्न तरीकों से कमजोर किया जा रहा है, उनकी जमीनें कब्जियाने के लिए तरह-तरह के नये-नये नियम-कानून लादे जा रहे हैं लेकिन कोई चर्चा नहीं होती।
आये दिन कश्मीरी पंडितों की हिमायत लेकर धरना-प्रदर्शन करने वाले 8 साल से केंद्र में प्रचंड बहुमत की सरकार चला रहे हैं, कश्मीर से पौने तीन साल पहले 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू कश्मीर को दो भागों में विभाजित कर चुके हैं लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापिसी को लेकर कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं।
और, कश्मीरी पंडितों की यह हफ्तावसूली गैंग घरवापसी की बातें भुलाकर धरने-प्रदर्शन से हटकर अब फिल्मों के सहारे पूरे देश को इमोशनल ब्लैकमेल करके वसूली का नया तरीका ईजाद कर चुकी है। हफ्ता-वसूली और इमोशनल अत्याचारों का यह धंधा कब तक चलाया जाएगा? पंडितों के लिए आंसू बहाने वालों की यह केंद्र सरकार संरक्षण दे रही है, वहां चप्पे-चप्पे पर सैन्यबल तैनात है तो डर किससे है? कश्मीर घाटी में सिख, जाट, गुज्जर आज भी रह-रहे हैं उन्होंने कभी असुरक्षा को लेकर रोना-धोना नहीं किया है। तो फिर पंडितों को ही खतरा क्यों महसूस होता है?
1995 के बाद आज तक लाखों किसान व्यवस्था की दरिंदगी से तंग आकर आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन पिछले 25 सालों में एक बार भी राष्ट्रीय मीडिया में विमर्श का विषय नहीं बना और केंद्र सरकार कभी भी उनकी समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर उचित समाधान की ओर बढ़ती दिखाई नहीं दी।
भागलपुर, पूर्णिया, गोधरा, मुजफ्फरनगर के दंगों से भी पलायन हुआ और सैंकड़ों नागरिक मारे गए। आज तो सत्ताधारी वर्ग ही दंगा भड़काने की पूरी कोशिश कर रहा है क्योंकि उनकी राजनीतिक खेती साम्प्रदायिक रक्तपात और शवों के खाद-पानी से लहलहाती है। जबकि देश के हर नागरिक की मौत का संज्ञान लिया जाना चाहिए।
सारत: 'द कश्मीर फाइल्स' वास्तविक घटनाओं, उनके मूल कारणों और तज्जनित परिस्थितियों के समाधान पर कोई चर्चा न कर केवल दंगाई मानसिकता को बढ़ावा देने वालों के हितलाभ को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्म और एक घटिया हरकत है। ■

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