मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

जय भीम : अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की चेतना जगाती है

जय भीम : अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की चेतना जगाती है



यदि आप फिल्म देखने के शौकीन हैं तो आपको 'जय भीम' फिल्म जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह आपके भीतर अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़े होने की न केवल चेतना जगाती है बल्कि उससे लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने का जज्बा भी पैदा करती है। यह ग्रामीण क्षेत्रों, खास तौर पर आदिवासी और दलितों के प्रति, भूमंडलीकरण के इस दौर में भी बरते जा रहे भेदभाव, शोषण तथा अमानवीय व्यवहार को रेखांकित करती है, बल्कि इससे जूझने को प्रेरित भी करती है।
यह फिल्म 1993 में चंद्रू नाम के एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा इरुलर जनजाति की महिला को न्याय दिलाने की कानूनी लड़ाई पर आधारित है जो मद्रास हाइकोर्ट के जज रहे जस्टिस चंद्रा के वास्तविक जीवन से सम्बंधित है। जो तमिलनाडु की एक आदिवासी जनजाति के उत्पीड़न को बेहतरीन तरीके से दिखाती है।
फिल्म के निर्माता और तमिल फिल्मों के सुपरस्टार सूर्या सिव कुमार ने फिल्म में आदिवासियों को न्याय दिलाने वाले वकील चंद्रू की भूमिका निभाई है। तमिल फिल्म निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल ने इसका निर्देशन और पटकथा लेखन किया है। फिल्म में के. मणिकंदन ने आदिवासी राजू कन्नू और लिजोमोल जोस ने आदिवासी राजू कन्नू की पत्नी संगिनी की भूमिका में जान डाल दी है। इसके संवाद, निर्देशन, दृश्य, कला और अभिनय को विश्व की चोटी की फिल्मों को टक्कर दी है। इनके अलावा सूर्या सिव कुमार, राजिशा विजयन, राव रमेश और प्रकाश राज जैसे स्टार्स ने भी दमदार अभिनय किया है।



इस फिल्म ने दो नवंबर को एमेजॉन प्राइम पर रिलीज़ होने के तीन सप्ताह में ही सर्वाधिक आइएमडीबी (IMDb) रेटिंग वाली हॉलीवुड फिल्म 'द शौशैंक रिडेम्प्शन' और 'द गॉडफादर' जैसी क्लासिक फिल्मों को पछाड़कर 10 में से 9.6 रेटिंग हासिल करने का रिकॉर्ड बनाया है। इस में हिंदू समाज की कठोर जातीय व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर मौजूद दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले उस दमन की कहानी है जिनके पास रहने को एक झोपड़ी के लायक जमीन का टुकड़ा तक नहीं है। मतदाता सूची में भी इनका नाम इसलिए दर्ज नहीं किया गया है ताकि चुनाव में समाज के प्रभुवर्ग को उनकी देहरी पर वोट मांगने न जाना पड़े। न राशन कार्ड है, न बच्चों की पढ़ने की कोई व्यवस्था।
फिल्म की शुरुआत में ही सामाजिक विद्रूप को प्रदर्शित करने वाला ऐसा घिनौना, डरावना और जुगुप्सापूर्ण दृश्य है जिसमें जेल के बाहर खड़े पुलिस वाले जेल से छूटने वाले लोगों में से जाति पूछ कर कुछ को जाने को कहते हैं और कुछ को अपने साथ ले जाकर पुराने अनसुलझे मामलों में अपनी खाल बचाने के लिए दूसरे मामलों में बंद कर देते हैं।
यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि ऐसी घटनाएं हमेशा से होती आई हैं और अब भी हो रही हैं। देश के छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में हाशिए पर मौजूद लोगों, ख़ासकर दलितों का जीवन बहुत ही ज्यादा मुश्किलों से भरा हुआ और अनिश्चित है। उनका अधिकाधिक शोषण करने के लिए सामंतवादी और मनुवादी वर्ग हमारे समाज की जातीय भेदभाव पर आधारित व्यवस्था में पुलिस-प्रशासन को एक औजार की तरह इस्तेमाल करता आया है।
फिल्म की चाक्षुषता इसलिए भी अधिक है जब आज की वर्तमान राजनीति में यह अनेक बार देखा जा चुका है कि सवर्ण नेता-मंत्रीगण और उनके संगठन अपने स्वजातीय जघन्य अपराधियों को बचाने के लिए आंदोलन तक करते हैं, उनका फूल-मालाओं से स्वागत-सत्कार करते हैं क्योंकि वे जाति व सम्प्रदाय के आधार पर खुद को दूसरों से ऊपर समझते हुए अपने जन्म, जाति, कर्म, सामाजिक रुतबे के अनुसार इसे अपना अधिकार समझते हैं।
यह विचारणीय है कि हम संवैधानिक रूप से एक लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज होते हुए भी ऐसा वातावरण बनाने को स्वीकार कर लेते हैं जिसमें आरएसएस तथा कुछेक अन्य संगठन सार्वजनिक रूप से खुलेआम अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध हिंसा व घिनौनी हरकतों के लिए लोगों को उकसाते हुए दिखते हैं। इन संगठनों का काम अपने सजातीय लोगों द्वारा किये गये अनैतिक और आपराधिक कृत्यों पर पर्दा डालना और उन्हें किसी भी हद तक जा कर बचाना है।





यही इस फिल्म का थीम है और इसके जरिये यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि समाज का समृद्ध और सामर्थ्यवान वर्ग पुलिस व तंत्र के साथ मिलकर जिस तरह पीढ़ियों से निर्धन व दबे-कुचले लोगों के प्रति जातीय आधार पर अन्याय, शोषण और उत्पीड़न करता आया है, उन लोगों को न्याय दिलाने के लिए अपने घरों से निकलिए, उनकी सुनिये, उनसे बात कीजिये, उनके दर्द को समझिये और तब अपनी समझ बनाइये।
फिल्म में मावाधिकारों के संरक्षण तथा अपराधों की वैज्ञानिक तरीकों से गहन जांच-पड़ताल करने की जरूरत बताई गई है क्योंकि ये अदालती निर्णयों को जबर्दस्त तरीके से प्रभावित कर सच्चाई का पता लगाने में मददगार होते हैं।
फ्रेम-दर-फ्रेम आदिवासियों और दलितों के प्रति बरती जाने वाली अमानवता और तद्ज्जनित समस्याओं के दर्द को उकेरती एक भी ऐसी फिल्म मैंने अब तक नहीं देखी।
हालांकि तमिलनाडु के उच्च वर्ग में शुमार वन्नियार समुदाय के लोगों ने इस फिल्म के कुछ दृश्यों पर आपत्ति उठाते हुए निर्माता-अभिनेता सूर्या को निशाना बनाया था लेकिन निर्देशक टी.जे. ग्नानवेल द्वारा फिल्म के माध्यम से उनका किसी व्यक्ति या समुदाय को अपमानित न करने का इरादा न होने और जिन्हें इससे ठेस पहुंची है उनके प्रति खेद व्यक्त करने से मामला ठंडा पड़ गया।
चूंकि फिल्म के निर्माता सूर्या सिव कुमार हैं तो इसमें उनकी भूमिका को एक वकील से भी बढ़कर कुछ ज्यादा ही उभारा गया है जो व्यावहारिक जीवन में संभव नहीं होता है। इस 'अति' को नजरअंदाज कर फिल्म देखना स्वयं में एक अनुभव होगा।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

संघियों की वर्चस्ववादी पेशवाई ग्रंथि स्थाई भाव बन गई है

 संघियों की वर्चस्ववादी पेशवाई ग्रंथि स्थाई भाव बन गई है

शाहजी राजे भोंसले (1594-1664) 17वीं शताब्दी के एक सेनानायक और बीजापुर तथा गोलकुंडा के मध्य स्थित जागीर कोल्हापुर के जागीरदार थे। वे कभी एक सल्तनत का आधिपत्य मानते तो कभी दूसरे का। अंतत: 23 जनवरी, 1664 को शिकार खेलते समय घोड़े पर से गिरने से उनकी मृत्यु हो गई।
शाहजी राजे भोंसले के पुत्र शिवाजी राजे भोंसले (1630-1680 ई.) तो किसी और ही मिट्टी का बना था, तो इन दोनों से ही नहीं बल्कि मुगल साम्राज्य के शासक औरंगज़ेब से भी संघर्ष कर 1674 ई. में पश्चिम भारत में स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की नींव रखी और छत्रपति का विरुद धारण किया। शानदार राजा हुए, जाणता राजा माने पीपुल्स किंग... लेकिन 3 अप्रैल, 1680 को 52 वर्ष की उम्र में ही चल बसे।
शिवाजी की पहली पत्नी के पुत्र सम्भाजी राजे या शम्भुराजे को पिता की मृत्यु की सूचना दिये बिना ही शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई ने अल्पवयस्क पुत्र राजराम (1689–1700) को गद्दी पर बैठाकर बचे-खुचे राज्य को सम्भाल लिया परन्तु सत्ता पर अपना प्रथम अधिकार जताते हुए सम्भाजी ने माँ-बेटे को कैद कर लिया और कुछ समय बाद उनकी हत्या करवा दी।
अब सम्भाजी राजे या शम्भुराजे (1657-1689) ने गद्दी संभाली। सम्भाजी ने बहुत कम समय के शासनकाल में 210 युद्ध किये और इनमें से एक में भी पराजित नहीं हुए लेकिन अंतिम युद्ध में औरंगजेब से हार गये और उसी की कैद में केवल 31 साल की आयु में 11 मार्च, 1689 को मृत्यु हो गई।
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सम्भाजी के बेटे और तीसरे छत्रपति राजाराम प्रथम (24 फरवरी, 1670-3 मार्च, 1700) का कार्यकाल काफी छोटा रहा, जिसमें वे अधिकांश समय मुग़लों से युद्ध में ही उलझे रहे।
राजाराम की मृत्यु के बाद शिवाजी द्वितीय (1696-1707) की माँ ताराबाई ने अपने 4 साल के पुत्र को गद्दी पर बैठाया और स्वयं उसकी संरक्षिका बनी। शिवाजी द्वितीय के राजा बनने का शाहूजी ने विरोध किया पर वे 17 सालों तक मुगलों के यहां बन्दी बने रहे। जब शाहूजी औरंगजेब की मृत्यु बाद मुग़लों की कैद से छूटे, तो गद्दी पर दावा ठोका।
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इसी सदी के शुरुआती दौर तक इस्रायल में यरूशलम को लेकर मुसलमानों से होने वाले युद्धों से त्रस्त यहूदी भारत के कोंकण (महाराष्ट्र) में शरण लेने के बाद हिंदू निम्न वर्गीय चितपावन ब्राह्मण बन चुके थे। उन्हीं में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट (1662–1720) ने सत्ता प्राप्ति में शाहूजी का साथ दिया, विजय मिली।
शाहूजी छत्रपति हुए और अहसानमन्द होकर बालाजी भट्ट को पेशवा यानी प्रधानमंत्री बना लिया। चतुर विश्वनाथ भट्ट ने सेना और राज्य शासन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के बाद छत्रपति शाहूजी से यह पद अपने परिवार के लिए वंशानुगत निश्चित करा दिया।
छत्रपति शाहूजी के इस निर्णय ने मराठों के भविष्य की दिशा ही बदल दी क्योंकि आगे चलकर छत्रपति कमजोर हुए और पेशवा ही असली शासक बन बैठा। वह प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि सेनानायक भी बन गया। उसने युद्ध में बड़ी सफलताऐं भी हासिल कीं और मराठा शासन का विस्तार किया। इसी बीच बालाजी विश्वनाथ भट्ट ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कोंकणस्थ यहूदियों से हिंदू बन गये निम्नवर्गीय चितपावन ब्राह्मणों को भारी संख्या में न केवल ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठा दिया बल्कि उन्हें खेती की जमीनें भी दीं।
शासन-व्यवस्था पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद भी समस्या यह थी कि पेशवा, छत्रपति नहीं था। उसे अपनी प्रभुसत्ता बांटनी पड़ती थी। जबकि ग्वालियर के सिंधिया, नागपुर के भोंसले, बड़ौदा के गायकवाड़ और इंदौर के होल्कर सरदार कमोबेश पूरे राजा ही थे।
इसी बीच प्रमुख सरदारों को खुदमुखत्यारी (ऑटोनॉमी) दी गयी और एक मराठा संघ अस्तित्व में आया। इस 'संघ साम्राज्य' ने मुग़लों तक को दबाए रखा और उनसे कर वसूले। एक समय तो ऐसा भी आया जब पेशवा के बेटे की दिल्ली में ताजपोशी तक तय कर ली गई थी। इस तरह अब ये विशिष्ट महाराष्ट्रीय कुलीन ब्राह्मण बन गये लोग ही देश के शासक थे।
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इस प्रकार एक समय इस्रायल से भाग कर भारत में शरणार्थी बनकर आये यहूदियों ने केवल चार-पांच दशक में ही देश की सत्ता के केंद्र में अपने लिए प्रमुख स्थान बना लिया। उनके भीतर श्रेष्ठता का वही हैंगओवर आज तक मौजूद है। इसी वर्ग का मानना है कि अंग्रेजों ने मुग़लों से नहीं बल्कि मराठों (पेशवाओं) से, मराठी बाह्मण वर्ग से, भारत की सत्ता छीनी थी (जो उसे वापस लेनी होगी)।
आजादी के आंदोलन के दौरान उनका वही पेशवा होने का दम्भ कूटनीति से एक ओर सनातन धर्म की हिंदू के रूप में नई व्याख्या गढ़ रहा था तो दूसरी तरफ हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की भावना को उभार रहा था। मुस्लिमों को बाहरी आक्रांता बताते हुए उन्हें बाहर खदेड़ कर 'हिंदू धर्म' को फिर से गौरवान्वित करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उस सपने को मोहनदास करमचंद गांधी ने अनायास ही तोड़ दिया।
जब तक कांग्रेस का नेतृत्व इस तथाकथित महाराष्ट्रीय कुलीन यानी रानाडे, गोखले, तिलक के हाथ में रहा, ये लोग कांग्रेस से इस स्तर तक जुड़े रहे कि कांग्रेस को हिदू संगठन मानकर, उसके मुकाबले मुस्लिम लीग खड़ी हो गयी। मगर 1920 के बाद कांग्रेस और देश में गांधी का आना इनके लिए एक जबरदस्त झटका था।
उधर, गांधी समाज के सभी वर्गों के नये-नये लोगों को कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपते हुए आंदोलन को विस्तार देते जा रहे थे। मुस्लिमों, अछूतों, आदिवासियों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों, छात्रों आदि को पर्याप्त तवज्जो दे रहे थे। कांग्रेस के गांधीवादी स्वयंसेवक एक इलाके और एक तबके तक सीमित नहीं थे। यानी वे गुजरात, पंजाब, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, दक्षिण सब तरफ सक्रिय थे। और, बिना शक गांधी ही उनके नेता थे।
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इस तरह गांधी का यह प्रयोग इनकी सोच के विपरीत गया। तो इस महाराष्ट्रीय गुट ने एक तरफ कांग्रेस की मुखालफत और अंग्रेजों की तरफदारी चालू कर दी, तो दूसरी ओर गांधी जी की हत्या के प्रयास भी शुरू कर दिये। इन्हें उम्मीद थी कि हिंदुओं को कांग्रेस के खिलाफ भड़काने से वह टूट जायेगी। यही वह दौर था जब माधव सदाशिव गोलवलकर और विनायक दामोदर सावरकर कह रहे थे कि यदि अंग्रेज यहां से गये भी तो सत्ता हिंदुओं (यानी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों) को सौंपेंगे।
बहरहाल, अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश का विभाजन कराने में इस महाराष्ट्रीय गुट को सफलता मिल ही गई।
अब, अंग्रेजों के हटने के साथ ही इस महाराष्ट्रीय वर्ग को हिंदुओं को अखंड भारत बनाने के सपने दिखाते हुए अपने वर्चस्व की वही टूटी हुई श्रृंखला को फिर से जोड़ना था लेकिन नेतृत्व का अवसर तो कांग्रेस ने प्राप्त कर लिया। इसीलिए नफरत एवरेस्ट पर पहुंच गई और अब तक भी निशाने पर मुसलमानों के साथ-साथ कांग्रेस है। जिसका अक्स 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के उद्घोष में देखा जा सकता है।
यही मूल ग्रंथि है।
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कांग्रेस के नेता, बल्कि यों कहिए नेहरू, आधुनिक सोच के थे। उनका मॉडल प्रजातांत्रिक और समाजवादी था। जबकि इस महाराष्ट्रीय गुट के दिमाग में इतिहास की खाइयों में दफन हो चुका पेशवाई सामन्तशाही का गौरव अब भी घुसा हुआ था, जिसमें एक हिंदू राज्य (छत्रपति या सनातनी नहीं बल्कि पेशवा का राज = हिंदू राज = ब्राह्मण राज = मराठी ब्राह्मण राज) की संकल्पना थी।
यह उनका अपूर्ण एजेंडा था। तो अब इस महाराष्ट्रीय प्रभुवर्ग ने अपने नए संगठन बनाये, पार्टी बनाई, किताबें लिखीं, शाखाएं लगाकर प्रचार किया, नई-नई कहानियां गढ़नी शुरू की, मिथकों को इतिहास बताया। दुनिया भर के लेखकों, इतिहासकारों, अध्येताओं, रपटों, ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों, न्यायालयी फैसलों, सबूतों को कांग्रेसियों, वामपंथियों, मुसलमानों और विदेशियों द्वारा लिखित इतिहास बताते हुए सिरे से ही नकारना शुरू कर दिया।
ये हिंदू धर्म-विशारद बन बैठे, चीजें अपने अंदाज में बांचने की कला सीख थी। लक्ष्मीबाई और नाना साहब की बात खूब कहते लेकिन बेगम हजरत महल, शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन और अहमदुल्लाह को भूल जाते। शिवाजी की सेक्युलर नीति याद रही परन्तु टीपू का उल्लेख भूल जाते।
शुरू से उनके दल और संगठन को हिंदू राजे-रजवाड़ों का पूरा सहयोग मिला। आखिर हिंदू राजे कोई मौर्य, गुप्त काल के तो थे नहीं। ये सौ-दो सौ साल पुराने हिंदू राजे मराठा पेशवाई की ही उपज थे। डीएनए एक था और मजबूत होती कांग्रेस के खिलाफ अपना संगठन और हिंदूवादी राजनीतिक संगठन उनकी भी जरूरत थी।
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ग्वालियर के जीवाजी राव घनघोर महासभाई थे तो उनके सहयोग से उस दौर में हिंदूवादी दल ग्वालियर इलाके में फूल-फल रहे थे। नेहरू ने ग्वालियर के जीवाजी राव को कांग्रेस में आने का न्योता दिया। वे नेहरू को ना नहीं कह सके तो पत्नी विजय राजे सिंधिया कुछ समय के लिए कांग्रेस में आईं। मगर फिर घर-वापसी हो गयी। देश के दूसरे रजवाड़े भी हिंदू महासभा और उसके आनुषांगिक संगठनों से ही जुड़े। ये सब चितपावनों के संघ को खाद-पानी देते रहे।
बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने 1969 में राजाओं का प्रीविपर्स खत्म कर देश की मुख्यधारा के विपरीत चलने वाले इन हिंदूवादी संगठनों की आमदनी के स्रोत को बंद कर एक बड़ा झटका दे दिया।
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राजनीतिक अवसरवादी होना इन संगठनों की पेशवाकालीन विरासत और तासीर है। आपातकाल ने इन्हें शानदार मौका दिया। जयप्रकाश नारायण के साथ इन्होंने सत्ता की पहली सीढ़ी चढ़ी। कुछ दिन गांधीवादी समाजवाद का ढोंग भी किया। मगर सत्ता की मलाई मुख लगते ही अपनी मूलधारा में वापस आ गए। इस बार नए दौर के रजवाड़ों यानी कॉरपोरेट ने 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त' वाला फार्मूला अपनाते हुए इनके लिए अपनी तिजौरियां खोल दीं।
उग्रवादी हिंसक हिंदुत्व, मुस्लिम विरोध और स्वचयनित इतिहास के डिमेंशिया रोग के रथ पर सवार उस महाराष्ट्रीय संगठन ने अपना देशव्यापी जनाधार तैयार कर अपनी पकड़ लगातार बनाये रखी। साम्प्रदायिक, जातीय ऊंच-नीच का भेदभाव, पुरुषवादी सोच और धूर्तता इनमें रची-बसी है। ऊपर से नाजी और फासिस्ट कार्यप्रणाली व तौर-तरीके भी शामिल होकर करेला नीम की ऊंचाई तक चढ़ गया।
हिटलरी तौर-तरीकों और पेशवाई हैंगओवर में डूबे हुए ये लोग, इनका संगठन हिंदुस्तान की सबसे बड़ी प्रतिगामी फोर्स है। ये सोलहवीं-सत्रहवीं सदी और उससे भी पहले के भारत की मानसिक भावभूमि के साथ इक्कीसवीं सदी के भारत पर राज करना चाहते हैं। इनका दिशासूचक यंत्र भविष्य की ओर नहीं बल्कि भूतकाल की ओर जाने का संकेत करता है। ये न भारतीय संस्कृति के मूलाधार इसकी वैदिक परंपरा को मनते हैं, न लोकतंत्र को स्वीकार करते हैं, न ही समानता-समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को।
आप उन्नति के नाम पर काल्पनिक विकास, छद्म राष्ट्रवाद, अंधदेशभक्ति, कमजोर विपक्ष या कोई अन्य प्रतीक दिखाकर इनके किसी भी मोहरे को छत्रपति बना दीजिए, ये अपने पैर के अंगूठे से उसका राजतिलक कर देंगे लेकिन वास्तविक रूप से शासन-सत्ता की बागडोर इन्हीं के हाथों में रहेगी। तब तक ये अपने अपूर्ण एजेंडे पर काम करते रहेंगे।
स्पष्ट है कि इनका पेशवाई वर्चस्ववादी अहंकार अधिक समय तक वोटों का मोहताज रहना पसंद नहीं करेगा ! इसीलिए अपने सरसंघचलक को ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह भारत में हिंदुओं की धार्मिक आस्था और देश की राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठता देवता बनाने की पुरजोर कोशिश जारी है।

भारत में लोकतंत्र बचेगा या मनुस्मृति वाली शासन प्रणाली लागू होगी?

भारत में लोकतंत्र बचेगा या मनुस्मृति वाली शासन प्रणाली लागू होगी?



फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी से लेकर हिटलर और मुसोलिनी तथा दुनिया भर के अन्य जन-विरोधी शासकों के अंत का इतिहास न तो कांग्रेसियों ने लिखा है और न ही किसी वामपंथी ने, जो देश के वर्तमान गर्वोन्मत्त और आत्ममुग्ध सत्ताधारियों को चीख-चीख कर चेतावनी दे रहा है।
और, यह चित्र भी एक ऐसी ऐतिहासिक घटना की याद दिला रहा है जिसमें सामान ढोने वाली एक साधारण घोड़ा गाड़ी पर संगीनों के साये में सहम कर बैठी हुई महिला के दोनों हाथ पीछे की ओर बंधे हुए हैं। उसी के बगल में मायूस बैठे सिर झुकाये आदमी के भी दोनों हाथ बंधे हुए हैं।
मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा से च्युत बंदी बनाकर इस तरह ले जाये जा रहे ये दोनों कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि फ्रांस के राजा लुइस और रानी मैरी हैं।
इतिहास में दर्ज है कि फ्रांस में सत्ता और चर्च की दुरभिसंधि से प्रचलित शोषणकारी एकाधिकारवादी राजतंत्र और जमींदारी प्रथा समाप्त कर संवैधानिक राजतंत्र लागू करने और चर्च के अधिकारों को सीमित कर जनता को मताधिकार देकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था को लागू करने के लिए सर्वहारा वर्ग ने फ्रांस में ईस्वी सन् 1789 से 1799 के बीच दस साल तक लगातार संघर्ष किया।
अंततोगत्वा 1799 में राजा लुइस और रानी मैरी की गिरफ्तारी के बाद फ्रांस की जनक्रांति समाप्त हुई। बहुमूल्य वस्त्राभूषण पहनकर बड़ी ठसक से सोने की शानदार बग्घी में सफर करने वाले राजा-रानी दोनों को माल ढोने वाली टूटी-फूटी साधारण घोड़ा गाड़ी में कैदियों की तरह बिठाकर जेल में बंद कर दिया गया।
इससे पहले भी इतिहास में अनेकों राजा, महाराजा और सम्राट युद्ध में पराजित हुए, मारे गये या बराबरी वाले विजेता द्वारा कारावास में डाल दिये गये लेकिन यह पहली बार हुआ जब जनांदोलन के कारण न केवल किसी राजा के साम्राज्य का अंत हो गया, बल्कि उसे कैदखाने में बंद किया गया और अंततः राजा लुइस तथा रानी मैरी को मौत के घाट उतार दिया गया।
फ्रांस की क्रांति का प्रभाव दुनिया के दूसरे देशों पर भी पड़ना शुरू हुआ तो एक-एक कर तमाम साम्राज्यों की नींव दरकने लगी और राजशाही का अंत होने लगा। यूरोप, अफ्रीका, रूस, चीन में राजतंत्र को जनक्रांति के द्वारा उखाड़ फेंका गया। आलीशान महलों से संचालित राज परिवारों की शक्ति छीनकर जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ गई।
गुजरते हुए वक्त के साथ जनक्रांतियों का सिलसिला जारी रहा। फ्रांस की क्रांति के डेढ़ सौ साल बाद भारत में भी जनता ने ब्रिटिश शासन का जुआ अपने कंधों से उतार कर सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
उधर 1979 में कट्टरपंथी मुस्लिम देश अफ़ग़ानिस्तान में भड़के जनविद्रोह के कारण कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना के लिए सोवियत सैनिकों ने देश में प्रवेश किया और सदैव के लिए राजशाही का अंत हो गया‌।
नेपाल में भी राजतंत्रीय व्यवस्था के विरुद्ध वर्षों तक चलते रहे जनांदोलनों और उथल-पुथल के बाद 2008 में लोकतंत्र की स्थापना हुई।
हालांकि इसी बीच नेपाल के एक छोटे-से राजनीतिक दल ने राजतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए प्रयास शुरू किया है। जिसका अर्थ है—ब्राह्मणों द्वारा विष्णु का अवतार घोषित क्षत्रिय राजा के शासन का लौटना। जैसे सन 1949 में भारतीय गणराज्य में विलय से पहले और उसके दशकों बाद तक टिहरी रियासत के राजा को 'बोलांदा बदरीनाथ' यानी साक्षात भगवान बदरीनाथ कहा जाता रहा।

संघ देश का संविधान समाप्त करना चाहता है
भारत में आरएसएस ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह अपने सरसंघचालक को हिंदुओं की धार्मिक आस्था और राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने को प्रयासरत है। फासिस्ट वर्चस्ववादी संघ जिस तरह सधी हुई चालें चल रहा है उसे देखते हुए आने वाले समय में जल्दी ही भाजपा अत्यधिक शक्तिशाली हो सकती है। जिससे सरसंघचालक को राष्ट्रपति बनाकर संविधान समाप्त करना आसान हो जाएगा और फिर उसे ही पंडे-पुजारियों, भगवाधारियों और बड़े-बड़े दो-तीन पूंजीपतियों के गठजोड़ से भारत भाग्यविधाता घोषित कर दिया जायेगा। इसका संकेत अयोध्या में मंदिर निर्माण की शुरुआत करते समय देश की हिंदू परंपरा को किनारे रखकर किसी भी शंकराचार्य को आमंत्रित किये बिना ही मोहन भागवत ने स्वयं पूजा-अर्चना करके दे दिया है। राम मंदिर निर्माण के सम्मोहन से मंत्र-मुग्ध हिंदू जनमानस ने इस अपारंपरिक घटना का जरा भी नोटिस नहीं लिया। जबकि संघ की इस कुटिलता का हर हाल में विरोध होना चाहिए था।
दुनिया आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी और वाणिज्य के सहारे निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर है परंतु हमें साम्प्रदायिक व जातीय घृणा तथा द्वेष का विषाक्त वातावरण बनाकर मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था और शासन प्रणाली की ओर धकेला जा रहा है। यह याद रखना चाहिए कि संघ-भाजपा की मजबूती का मतलब है संविधान और कानून के राज की समाप्ति और मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था का लागू होना।
इसके साथ ही यह भी विचारणीय है कि आज जिस तरह सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज़ लोग अपने चंद वित्त पोषकों और भगवा ब्रिगेड की मदद से झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर आमजन का जीवन दुखमय बनाने में जुटे हुए हैं, उससे जनक्रांति के फट पड़ने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। शायद इसका आभास शातिर दिमागों को हो गया है, इसीलिए तेवरों में बदलाव आता दिख रहा है। अन्यथा एक पत्रकार के सवाल का सीधा जवाब न देकर दोस्ती बनी रहे कहकर उठ खड़ा होने वाला नेता किसानों से खुलेआम माफी कदापि नहीं मांगता।

 

रविवार, 28 नवंबर 2021

 भारत को पाब्लो एस्कोबार का कोलंबिया बनाया जा रहा है

➤मुंबई में पकड़ी गई 1000 करोड़ रुपये की ड्रग्स, अफगानिस्तान से लाई गई थी हेरोइन (10 अगस्त, 2020)

➤DRI ने पकड़ी 2000 करोड़ की हेरोइन, ईरान से लाए थे मुंबई (5 जुलाई, 2021)

➤ड्रग्स की बड़ी खेप के साथ 7 अरेस्ट, गुजरात तट पर पकड़ी गई ईरानी नौका (19 सित. 2021)

➤ADANI के स्वामित्व वाले मुंद्रा पोर्ट पर पकड़ी गई ड्रग्स की सबसे बड़ी खेप, मोदी-शाह सहित मीडिया की चुप्पी पर बड़े सवाल (20 सित. 2021)

➤गुजरातः 20000 करोड़ तक हो सकती है मुंद्रा पोर्ट से जब्त की गई ड्रग्स की कीमत, तालिबान-ISI पर भी शक (21 सितंबर 2021)

➤डीआरआई ने मुंबई से पकड़ी 125 करोड़ रुपये की हेरोइन, मूंगफली की बोरियों के कंटेनर में रखा गया था मादक पदार्थ (8 अक्टूबर, 2021)

➤Drug Seize: गुजरात में 350 करोड़ रुपये का नशीला पदार्थ जब्त, दो गिरफ्तार (10 नवबर, 2021)

यदि केवल पिछले पांच महीनों में आई इस तरह की खबरों को मिलाकर देखें तो भावी भारत की जो तस्वीर उभरती है उसमें और पाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया के जमाने के कोलंबिया में ज्यादा फर्क महसूस नहीं होता, बशर्ते कि आप दुनिया के उस सबसे बड़े धनवान और क्रूरतम ड्रग माफिया के बारे में जानते हों।

    

                                                    

(फोटो―पाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया, सौजन्य―Mathrubhumi/शोसल मीडिया)

 

कोलंबिया के रियोनेग्रो में 1 दिसंबर 1949 को जन्मा पाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया अब तक इतिहास का सबसे कामयाब और धनाढ्य ड्रग माफिया है। उसने कोकीन की तस्करी से इतना अधिक पैसा बनाया था कि साल 1989 में फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उसे 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया का सातवां सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया था।  

कोलंबिया में मेडेलिन के पास एक छोटे से शहर में एक स्कूल शिक्षक मां और किसान बाप के छह बच्चों में से एक पाब्लो और उसके भाई को पास में जूते न होने के कारण स्कूल से लौटा दिया गया था। उसे पैसे के अभाव में यूनिवर्सिदाद डी एन्तियोकिया से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन के दौरान अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी थी। 

अपने जीवन की शुरुआत में वह कब्रों से पत्थर व तरह-तरह की अन्य चीजें चुराकर तस्करों को बेचता था। इसके बाद 20 वर्ष की उम्र आते-आते पाब्लो ने प्रतिबंधित सिगरेट व नकली लॉटरी टिकट बेचने, कार चुराने के अलावा कई तरह के गैरकानूनी कामों की शुरुआत की। फिर उसने जल्द से जल्द अमीर बनने के लिए नशीली दवाओं के कारोबारी अलवारो प्रेटो के साथ काम किया और मात्र 2 साल में करोड़पति बन गया।  

इसके बाद एस्कोबार ने प्रेटो से अलग होकर जल्दी ही ड्रग माफिया के मेडेलिन कार्टेल को संगठित कर कोलंबियाई सीमाओं के पार समुद्री तथा वायु मार्ग से पेरू, इक्वाडोर और बोलीविया सहित अमेरिकी और यूरोपीय महाद्वीप के विभिन्न देशों में कोकीन के धंधे को बढ़ावा दिया। एक समय दुनिया भर में फैले कोकीन के कारोबार में से 85 फीसदी पर अकेले पाब्लो का कब्ज़ा था। 

वह सरकार की ड्रग्स सम्बंधी नीतियों तथा योजनाओं की टोह लेता रहता था। वह अपने कारोबार के विस्तार के लिए नियमित रूप से अधिकारियों, न्यायाधीशों, पुलिस और पत्रकारों को लाखों डॉलर के तोहफे तथा नकदी बतौर नजराना देता था। 

(फोटो―पाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया, सौजन्य―शोसल मीडिया) 


पाब्लो अपनी काली कमाई से स्कूलों व गिरजाघरों के निर्माण के अलावा गरीबों को पैसा बांटता था। मेडेलिन की गरीब जनता उसकी पहरेदारी करती थी और युवा उसके विश्वासपात्र मुखबिर हुआ करते थे। 

पाब्लो एस्कोबार के एकाउंटेंट रॉबर्टो के अनुसार पाब्लो को नोटों की गड्डियां बांधने के लिए हर हफ्ते एक हजार डॉलर के रबर बैंड खरीदने पड़ते थे। चूंकि वह अपनी काली कमाई को बैंकों में नहीं रख सकता था, इसलिए इसे गोदामों और गड्ढों में रखा जाता था। इस कारण इस नकदी का 10 फीसदी (करीब 1 मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष) चूहे नष्ट कर देते थे। 

उसके पास असंख्य लग्जरी गाड़ियां, आलीशान घर और दफ्तर हुआ करते थे। उसने 1975 में अमेरिका में कोकीन की खेप पहुंचाने के लिए अपना खुद का विमान उड़ाया और बाद में इस विमान को अपने फार्म हाउस के आंगन में टांग दिया। अपने चरमोत्कर्ष के दौरान पाब्लो का मेडेलिन ड्रग कार्टेल एक दिन में प्राय: 15 टन कोकीन की तस्करी करता था, जिसकी उन दिनों अमेरिका में आधा बिलियन डॉलर से ज्यादा कीमत थी।

ड्रग तस्कर पाब्लो एस्कोबार कोलंबिया में अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी व्यक्ति था और कोलंबिया की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने का सपना देखने लगा था। उसने महसूस किया कि उसके पास राजनीतिक शक्ति नहीं है तो पैसा तो पर्याप्त है। इसलिए उसने अपने राजनीतिक मंसूबे पूरा करने के लिए अपनी अकूत दौलत के बल पर साल 1986 में कोलंबिया का 10 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज चुकता कर देने का प्रस्ताव सरकार के सामने रखा। धन और चालबाजियों के बल पर वह गणतंत्र की कांग्रेस तक पहुंच गया। जहां जाकर उसका देश की केंद्रीय सत्ता पर सीधी पकड़ होना निश्चित थी। 

इससे पाब्लो को रोकने के लिए पूरे कोलंबिया में उसकी मुखालिफत करने वाले अकेले अखबार 'एल एस्पक्टाडोर' के संपादक गिलेरमो कानो ने अभियान छेड़ दिया। बौखलाये पाब्लो ने उसके दफ्तर को बम से उड़ाने के अलावा गिलेरमो को मरवा दिया। पाब्लो ने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए कई मंत्रियों, राजनेताओं, न्यायाधीशों, अधिकारियों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और तस्करों की हत्याएं करवाईं। यहां तक कि उसने चार राष्ट्रपतियों का जीवन दुःस्वप्न बना दिया, अधिकारियों में घुसपैठ की और पूरी दुनिया को चुनौती दी। उसके साथ हुई खूनी जंग में सिर्फ साल 1991 में ही 700 से ज्यादा लोग मारे गए थे।

दुस्साहसी पाब्लो ने ड्रग्स तस्करी के साथ-साथ अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में बाधक बने राष्ट्रपति पद के एक उम्मीदवार लुइस कार्लोस गैलान की चुनाव सभा में बम विस्फोट से हत्या करवा दी और कोलंबिया का राष्ट्रपति बनने के सपने देखने लगा। इन हत्याओं के बाद कोलंबिया का शासन-प्रशासन एस्कोबार के पूरी तरह खिलाफ हो गया।

पाब्लो एस्कोबार को सरकार ने सुधरने का एक मौका दिया। उसने खुद को अमेरिका प्रत्यारोपित किये जाने से बचने के लिए जेल जाना स्वीकार किया तो वह राजाओं के महल जैसी सुख-सुविधाओं से लैस अपनी ही निजी जेल ‘ला कैटेड्रल’ में खुद को कैद करने को राजी हो गया परंतु वहां से भी वह अपनी गतिविधियां निर्बाध रूप से जारी रखे हुए था। जब उसके खिलाफ कार्रवाई की गई तो जेल से भाग कर राज्य, शासक वर्ग और पूरे देश के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। उसे हराने के लिए सरकार ने एक शक्तिसम्पन्न आधुनिक संसाधनों से लैस समूह का गठन किया। रेडियो ट्राएंगुलेशन तकनीक के इस्तेमाल से कोलंबियाई पुलिस ने उसकी लोकेशन पता लगाया था और घेराबंदी कर दी। 

इसी दौरान मेडेलिन के एक घर में छिपे पाब्लो और उसके अंगरक्षक को 2 दिसंबर, 1993 को पुलिस के साथ हुई फायरिंग मे गोली मार कर खत्म कर दिया। 

(फोटो―रॉबर्टो एस्कोबार, सौजन्य―Gina Dimuro)


अपनी मृत्यु के समय पाब्लो अपनी पत्नी मारिया विक्टोरिया और बच्चों जुआन पाब्लो और मैनुएला के लिए एक ग्रीक किले का निर्माण करवा रहा था। तमाम तरह के चढ़ाव-उतारों से भरे पाब्लो एमिलियो एस्कोबार गैविरिया के सफर का विस्तृत विवरण उसके भाई रॉबर्टो एस्कोबार की किताब 'द एकाउंटेंट्स स्टोरी' में मिलता है।


अब एक ही खेप में जिस गति से और जितनी बड़ी मात्रा में अरबों-खरबों रुपये मूल्य की ईरान, अफगानिस्तान के रास्ते देश में लाई गई नशीली दवाओं की खेप आये दिन पकड़ी जा रही हैं उससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि ऐजेंसियों की पकड़ से छूट/बच जाने वाली ड्रग्स कितनी हो सकती है। जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा कर देश को भयानक हानि पहुंचाई जा रही है। 

दूसरी ओर सरकार नारको एक्ट में बदलाव कर ड्रग्स को कम मात्रा में निजी उपयोग के लिए रखना अपराध के दायरे से बाहर करने जा रही है। इसके लिए संसद के अगले सत्र में विधेयक लाने की तैयारी है। क्या सरकार यह नहीं समझ सकती है कि ऐसा करने से तो देश में अधिक से अधिक लोग बेखटके ड्रग्स का इस्तेमाल करना शुरू कर देंगे और ड्रग्स की खपत में वृद्धि होने से इसका कारोबार खूब तरक्की करेगा?  

इससे भी दुखदाई यह है कि देश में न तो कोई गिलेरमो कानो जैसा पत्रकार दिखाई देता है और न ही लुइस कार्लोस गैलान जैसा ईमानदार, निर्भीक और देश के प्रति प्रतिबद्ध राजनेता। इससे देश के जल्दी ही पाब्लो एस्कोबार का कोलंबिया जैसा बन जाने की पूरी सम्भावना है।

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के कदम

 अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के कदम

हाल ही में दो जेनेटिक इंजीनियरों ने अपनी नई पुस्तक 'द डेथ ऑफ डेथ' के प्रेजेंटेशन के दौरान दावा किया कि 25 साल बाद मनुष्य के लिए मरना स्वैच्छिक और उम्र बढ़ने से रोकना चिकित्सा योग्य हो जाएगा। इनका कहना है कि अमर रहना एक वास्तविक और वैज्ञानिक संभावना है, जो मूल रूप से सोचे जाने की तुलना में बहुत पहले आ सकती है। 

(फोटो साभार―सोशल मीडिया)

वेनेजुएला में जन्मे जोस लुई कोरडैरो और कैंब्रिज के गणितज्ञ डेविड वुड का कहना है कि 2045 के आस-पास इंसानों की मौत केवल हादसों से होगी न कि किसी प्राकृतिक कारण या बीमारी से। 

इनका कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बुढ़ापे को किसी बीमारी के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। नई आनुवंशिक परिवर्तन तकनीकों में प्रमुख नैनो टेक्नोलॉजी से इस प्रक्रिया में खराब जीन को स्वस्थ जीन में बदला जाएगा, शरीर से मृत कोशिकाओं को खत्म करना, नष्ट हो गई कोशिकाओं को ठीक करना, स्टेम सेल से इलाज और महत्वपूर्ण अंगों को 3डी में प्रिंट करना शामिल है। 

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी में पदस्थ कोरडैरो का कहना है, 'उसने न मरने का फैसला किया है और 30 साल बाद वह आज के मुकाबले ज्यादा युवा होगा।'

बुढ़ापा यानी कि एजिंग, डीएनए के सिरे पर मौजूद टेलोमर्स (Telomeres) का परिणाम है, जो क्रोमोसोम्स में होते हैं। बढ़ती उम्र के साथ ये छोटे, कमजोर और क्षतिग्रस्त होने लगते हैं, इसे रोकने के लिए टेलोमर्स को लंबा करना होता है।

इन दोनों इंजीनियरों के अनुसार वे गैरकानूनी तरीके से दो साल पहले से इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और इनकी पहली मरीज एलिजाबेथ पैरिस हैं, जिन्होंने उम्र बढ़ने के लक्षणों को रोकने का इलाज करने में रुचि दिखाई।

वुड ने बताया कि उनका इलाज काफी जोखिम भरा और गैरकानूनी था, लेकिन अभी उस इलाज का कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखाई दिया है और उनके खून में टेलोमर्स का स्तर पहले की तुलना में आज भी 20 साल पूर्व की स्थिति में है।

लेकिन अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के इस कदम से मरण की प्राकृतिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होगी जिससे अनेक प्रकार के सामाजिक, आर्थिक व अन्य प्रकार के संकट पैदा हो जायेंगे क्योंकि पुराने मरेंगे नहीं और नये जन्म लेते जायेंगे तो लगातार बढ़ती जनसंख्या का बोझ धरती के संसाधनों पर पड़े बिना नहीं रहेगा। प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो जायेंगे। सरकारों द्वारा की जाने वाली भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, परिवहन आदि सम्बंधी व्यवस्थाएं कम पड़ती जायेंगी। हिंसा और शोषण की प्रवृत्ति में भयानक वृद्धि होगी। 

ऐसे में इस वैज्ञानिक खोज का लाभ उठाने वाला कोई भी व्यक्ति धरती पर मौजूद रहेगा भी कि नहीं? इस प्रश्न का उत्तर आज ही ढूँढना होगा। खुद समस्या खड़ी कर समाधान भावी पीढ़ी पर छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि मूर्खता होगी। वैसे मूर्खता के इस स्वर्णकाल में शायद यह सवाल उठाना भी अपने आप में मूर्खता ही कही जायेगी। 

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है

 अगले कुछ सालों में आदमी को साइबोर्स बनाने की तैयारी है

भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र तैयार है।

(फोटो―वेंगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा 'बाबा वेंगा')
अपनी इन्द्रियातीत अनुभूतियों के आधार पर सटीक भविष्यवाणी करने वाली बुल्गारियाई महिला वेंगेलिया पांडेवा दिमित्रोवा जो ‘नास्त्रेदमस फ्रॉम द बाल्कन, लेडी नास्त्रेदमस और वॉलकाँस या बाबा वेंगा के नामों से विश्वविख्यात है, ने 1996 में 85 वर्ष की उम्र में अपनी मृत्यु से वर्षों पहले पूरी धरती पर रोबोट्स की फौज होगी, धरतीवासी कृत्रिम सूर्य बनाने में सफल हो जाएंगे, एलियंस की मदद से मनुष्य समुद्र की तलहटी में आवासीय बस्ती बना लेगा, टाइम ट्रैवल के जरिये दूसरे ग्रहों से सम्बंध बनेंगे, मनुष्य शुक्र ग्रह तक पहुंच जाएगा, मंगल पर पृथ्वीवासियों का भयानक युद्ध होगा और पृथ्वी पर एक नयी मानव सभ्यता का अभ्युदय होगा जैसी भविष्यवाणियों के साथ ही यह भी कहा था कि इंसान व रोबोट मिल जाएंगे जिन्हें ‘साइबोर्स’ कहा जायेगा। तो शायद वर्तमान मनुष्य उसके बहुत करीब पहुंच गया है।
जी हां, बिल्कुल यह सच होने जा रहा है। गूगल, फेसबुक तथा वीडियो गेम बनाने वाली कंपनियों सहित दुनिया की अनेक प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों ने इस काम में हजारों इंजीनियरों को लगा रखा है। कहा जा रहा है कि यह भविष्य की तकनीक है जो मौजूदा दुनिया को पूरी तरह से वर्चुअल बनाने की एक कोशिश है। इस योजना पर इस साल 10 अरब डॉलर की राशि खर्च करने जा रही फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग इस तकनीक को भविष्य बता चुके हैं और इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने फेसबुक को नया नाम 'मेटा' दिया है जो अंग्रेजी के Metamorphosis यानी 'कायाकल्प' का संक्षिप्तीकरण है। ऐसा क्यों किया गया, यह परीकथा आगे पढ़िये―
मार्क जुकरबर्ग द्वारा फेसबुक का नाम बदलकर मेटा करने के पीछे भविष्य पर गढ़ी उनकी नजर है। यह मेटावर्स नामक एक पेरेंट कंपनी का हिस्सा है जिसमें अभी फेसबुक,ह्वट्सऐप और इंस्टाग्राम हैं लेकिन आगे चलकर इसमें कंपनी के दूसरे प्लेटफॉर्म्स भी आएंगे।
मार्क इंटरनेट का भविष्य अपनी कंपनी मेटावर्स के जरिये देख रहे हैं जो वर्तमान से एकदम अलग एक नयी दुनिया होगी। वैसे होगी तो यह आभासी ही लेकिन समय बीतने के साथ ही यह आभासी दुनिया ही वास्तविक बनती जाएगी, जिसमें आप न सिर्फ दूरस्थ जीवित लोगों से बात कर पाएंगे बल्कि मृतकों से भी जिंदा लोगों की तरह बात कर पाएंगे। यह कोरी गप्प नहीं, हकीकत है।
CNN की एक खबर के अनुसार बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने मरे हुए परिजनों तथा ज्ञात-अज्ञात लोगों और सेलेब्रिटीज से बातचीत करने में सक्षम एक नई चैटबोट का पेटेंट पिछले साल कराया है। इस चैटबोट में मृतकों के सोशल प्रोफाइल से डेटा लेकर फीड करके उसके आधार पर नया प्रोग्राम तैयार होगा। जिसके आधार पर न सिर्फ मरे हुए लोगों से बातचीत सम्भव होगी, बल्कि उस समानान्तर दुनिया में आप घूमने-फिरने, खेलने, लोगों से मिलने-जुलने, सामान खरीदने से लेकर वे सभी काम कर सकेंगे जो इस शरीर से प्रत्यक्ष तौर पर अभी कर रहे हैं। इसके लिए उनके वर्चुअल रियलिटी हेडसेट्स, ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस, स्मार्टफोन ऐप्स और अन्य डिवाइसों की जरूरत पड़ेगी।
अभी तक आप मोबाइल फोन पर वीडियो कॉल कर किसी जगह या अपने किसी पसंदीदा लाइव शो का आनंद ले सकते हैं, लेकिन मेटावर्स इससे काफी आगे की चीज है। इसमें आप डिजिटल क्लॉथिंग के जरिए एक वर्जुअल दुनिया में एंट्री कर लेंगे। यानी शारीरिक तौर पर आप अपने घर में हैं लेकिन आपका दिमाग खास डिजिटल उपकरणों की सहायता से वर्चुअल दुनिया में विचरण कर रहा होगा।
हालांकि इस तकनीक को पूरी तरह से विकसित होने में 10 से 15 साल लग सकते हैं क्योंकि यह अलग-अलग टेक्नोलॉजी का बड़ा-सा जाल है जिसे कोई एक कंपनी नहीं बना सकती। इसीलिए इस पर कई कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं।
यदि गहराई से देखा जाये तो यह सारा प्रपंच न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की अगली अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी है। जो भविष्य में लोगों के शरीर और दिलो-दिमाग को हैक कर संसार के संपूर्ण मानव-संसाधन की हर गतिविधि को नियंत्रित कर अपने हिसाब से संचालित करने का दुष्चक्र है। जो कमोवेश बाबा वेंगा द्वारा बताये गये 'साइबोर्स' से मिलते-जुलते होंगे।
आदमी को अपना खिलौना बनाने वाली इस तकनीक को चार्ली ब्रोकर द्वारा लिखी कहानी पर बनी वेब-सीरीज 'ब्लैक मिरर' तो इससे आगे की बात बता रही है जिसे आप कोरी कल्पना कह कर खारिज नहीं कर सकते। फिलहाल इसे समझने के लिए आप इस वेब-सीरीज के सीजन-2 के पहले एपिसोड का हिंदी में सिर्फ 11ः39 मिनट का ट्रेलर https://www.youtube.com/watch?v=58bYgkPB2qE पर जाकर जरूर देख लीजिये। जबकि इसके पाँचों सीजन नेटफ्लिक्स पर हिंदी सब-टाइटल्स के साथ उपलब्ध हैं।
तो तैयार रहिये आदमी से साइबोर्स बनाये जाने के लिए !


अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

 अच्छे दिनों की चाह में बुरे दिन भी आ सकते हैं

साहिबान कहते हैं कि इस दुनिया में अच्छा-बुरा समय सबका आता है।
अब यही देख लीजिये कि हिटलर के चरमोत्कर्ष के दिनों में किसने सोचा होगा कि उसे एक दिन अपने अत्यधिक सुरक्षित बंकर में खुद को गोली मार कर खत्म करना पड़ सकता है।

(फोटो साभार―गूगल)

नाजियों ने वर्ष 1933 से 1945 के कालखंड में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी थी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे। उस अमानवीय वीभत्स हत्याकांड को 'होलोकॉस्ट' कहा जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि हिटलर का मकसद दुनिया से यहूदियों का पूरी तरह खात्मा करना था।
उस युद्ध के समाप्त होने के बाद पकड़े गये नाजियों के अमानवीय कुकर्मों के लिए उन पर जर्मनी के शहर न्यूरेम्बर्ग में मुकदमा चलाया गया जो 'न्यूरेम्बर्ग ट्रायल' कहलाता है। 20 नवबर,1945 से 1 अक्तूबर,1946 तक करीब 2018 दिन चले ट्रायल में हिटलर के अत्यंत विश्वसनीय सहयोगी हरमन गोइरिंग, रुडॉल्फ हेस, होआचिम वॉन रिबेनट्रॉप और 18 उच्चस्तरीय़ नाजियों पर मुकदमा चला जिसमें कई सौ लोगों ने गवाही दी।
इसमें अमेरिकी वकील रॉबर्ट जैकसन और उनके साथियों ने जर्मनों की साजिश को दुनिया के सामने लाने का काम किया। सुनवाई पूरी होने पर 1 अक्टूबर, 1946 को हिटलर के 11 साथियों को मौत की सजा दी गई। जबकि हरमन गोइरिंग ने एक दिन पहले ही जहर खाकर जान दे दी थी।
हिटलर की आत्महत्या के कुछ ही घंटों बाद झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल बुनने के लिए कुख्यात उसके प्रोपेगैंडा मंत्री डॉ. जोसेफ गोएबेल्स और उसकी पत्नी मैग्डा ने अपने 6 बच्चों को मार कर अपने-आप को खत्म कर लिया था।
इसी तरह भारत में आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर मुख्य न्यायाधीश जसटिस जेसी शाह की अध्यक्षता में मार्च 1977 में आयोग का गठन किया। जस्टिस शाह द्वारा 11 मार्च, 1978 को तत्कालीन सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इंदिरा गांधी के कुछ सलाहकारों और अफसरों को ज्यादतियों के लिए दोषी माना। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि इन लोगों ने नियमों से परे जाकर अपने पद और शक्तियों का गलत ढंग से इस्तेमाल किया।
हालांकि दिल्ली हाइकोर्ट ने बाद में इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था।
शाह आयोग की रिपोर्ट में इंदिरा सरकार में रक्षा मंत्री बंसीलाल, सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला, इंदिरा के निजी सचिव आरके धवन, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर कृष्ण चंद, उनके सचिव नवीन चावला, दिल्ली पुलिस में डीआइजी पीएस. भिंडर को दोषी बताया गया था।
आपातकाल के दौरान दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर रहे कृष्ण चंद पर विपक्ष के तमाम नेताओं को जबरन जेल भेजने और बेतुके फैसले करने के आरोप थे। कहा जाता है कि उन दिनों जब दिल्ली में बड़े पैमाने पर लोगों के घर और व्यावसायिक जगहों की तोड़फोड़ हुई तो वह सब कृष्ण चंद के आदेशों से हुआ था। हालांकि चंद ने शाह आयोग के सामने कहा कि वे कमजोर आदमी थे। उन्हें जैसा आदेश ऊपर से मिलता था, वे वैसा ही करते थे।

(फोटो साभार―इंडिया टुडे)

शाह आयोग के सामने हुई पेशियों से कृष्ण चंद को अनिष्ट की आशंका हुई तो उन्होंने 09 जुलाइ, 1977 की रात दक्षिण दिल्ली के एक 60 फुट गहरे परित्यक्त कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली। उनके दो सुसाइड नोट मिले, एक उनकी पत्नी सीता के नाम उनके बेडरूम में छोड़ दिया गया था और दूसरा उनके जूतों के साथ कुएं की कंक्रीट पर मिला।
इसलिए समझदारी इसीमें है कि सत्ता, पद, अधिकार, शक्ति मिलने पर अच्छे दिन लाने की चाह में जरूरी नहीं कि वे ही आयेंगे, बुरे दिन भी आ सकते हैं, यह सोचकर अन्याय, उत्पीड़न और मनमानी करने से बचना चाहिये।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

भारत की पहली स्वंतत्र सरकार काबुल में बनी थी !

 भारत की पहली स्वंतत्र सरकार काबुल में बनी थी !


क्या आपको मालूम है कि 21 अक्टूबर, 1943 को बनी नेताजी सुभाष चद्र बोस की आजाद हिंद सरकार से 27 साल पहले ही एक राष्ट्रीय सरकार का गठन हो चुका था? सन 1914 ई. में मौलाना उबायदुल्ला सिंधी ने काबुल (अफ़गानिस्तान) में भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को बना दी थी। जिसके राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह और प्रधानमंत्री शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन को बनाया गया था।

(फोटो साभार―Swapnil Sansar)

क्या आप जानते हैं कि 30 मई, 1866 को स्थापित दार-उल-उलूम देवबंद की देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका थी? एशिया के इस सबसे बड़े इस्लामिक शिक्षा केंद्र के विख्यात अध्यापक व संरक्षक विद्वान मौलाना महमूद अल-हसन उन सेनानियों में से एक थे जिनकी लेखनी, ज्ञान, आचार तथा व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेख-उल-हिंद (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया था।

शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता थे। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अभूतपूर्व योगदान किया। हकीम अजमल खान जैसे आंदोलनकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजी हस्तक्षेप से परे दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना की। मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) की विद्वता और शिक्षा के प्रति गहरे लगाव के कारण ही इन्हें इमदादुल्लाह के हज़ पर जाने के बाद दार-उल-उलूम देवबंद का ख़लीफ़ा बनाया गया था।

वे अपने मुस्लिम छात्रों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने भारत के भीतर और बाहर दोनों ओर से ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू किया। देश-विदेश में फैले उनके असंख्य शिष्यों में से बड़ी संख्या में इस आंदोलन में शामिल हो गए। उनमें सबसे प्रसिद्ध मौलाना उबायदुल्ला सिंधी और मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी थे।

मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) ने 1878 में अंजुमने समरतुत की शुरुआत कर आज़ादी का संघर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 28 दिसंबर, 1885 को स्थापना होने से भी पहले चालू कर दिया था और 1909 में जमीयत-उल-अंसार की बुनियाद डाली।

शेख-उल-हिंद ने आज़ादी की लड़ाई तेज करने के लिए दार-उल-उलूम के अंदर एक संगठन खड़ा किया जिसकी सरगर्मी सरहदी इलाक़ों में अधिक थी। इस संगठन की बागडोर मौलाना उबायदुल्ला सिंधी के हाथ में सौंपी गई थी और 1913 में मुरादाबाद में सम्पन्न हुए इसके पहले सम्मेलन के बाद देश में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध व्यापक तैयारी शुरू हो गई। जिसके तहत रेशमी रूमाल जैसा एक महत्वपूर्ण गुप्त आंदोलन शुरू हुआ। अंग्रेजों की नजर बचाकर आजादी के दीवाने अपनी गुप्त योजनाओं का संदेश रेशमी रूमाल पर लिखकर आदान-प्रदान करते थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र में जाकर अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध प्रचार किया। यहां तक कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरानी शासकों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ने को तैयार हो जाये तो ज़मीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।

➤ सन 1914 ई. में मौलाना उबायदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को काबुल में बना दी थी।
➤ इस सरकार का राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को बनाया गया।
➤ शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन उक्त सरकार के प्रधानमंत्री बने।
➤ मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली तथा मौलाना उबायदुल्ला सिंधी इस सरकार में मंत्री थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने अपने शिष्य मौलाना उबायदुल्ला सिंधी को काबुल भेजने के साथ ही स्वयं हिज़ाज़ (अरब) की ओर प्रस्थान किया ताकि तुर्की हुकूमत से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मदद ली जा सके। इन्होंने वहां भी रेशमी रूमाल के जरिये अपने गुप्त संदेश मक्का और मदीना के गवर्नर को तथा मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी के हाथ सीमांत इलाक़ों में भेज दिया। जिसकी भनक अंग्रेज़ों को लग गई और इनका रहस्य खुल गया। मौलाना महमूद हसन और उनके साथी मौलाना वहीद अहमद फैज़ाबादी, मौलाना अज़ीज़ गुल, हकीम सैय्यद नुसरत हुसैन को गिरफ़्तार कर मॉल्टा भेज दिया गया। शेख-उल-हिंद 3 साल 19 दिन तक माल्टा की जेल में रहे। वे जब 8 जून, 1920 को पानी के जहाज से मुंबई पहुंचे तो उनका स्वागत करने वालों में महात्मा गांधी जैसे लोग भी थे।

इतिहास गवाह है कि अंग्रेज तत्कालीन मदरसों को राष्ट्रवाद का केंद्र कहते थे और इन्हें बंद करवा देते थे। आज भी वही काम हो रहा है। आजादी का इतिहास मिटाया जा रहा है। देश के इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत बताई जा रही है क्योंकि संघ ने देश की बलिवेदी पर शीश अर्पित करने वाले नहीं, गोडसे जैसे कलंक पैदा किये। इसीलिए देश की आजादी के आंदोलन में विघ्न डालने वाले नागपुरिया विषविद्यालय वाले आपको यह कभी नहीं बतायेंगे कि 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष में 5 लाख उलेमाओं ने भी शहादत दी थी। जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा है 5 लाख! अकेले एक कस्बे देवबंद जैसी छोटी बस्ती में ही 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था।

भारत की इस पहली आजाद सरकार को सौ-सौ सलाम ! देश के लिए किया गया इनका तप-त्याग आज भी हम पर कर्ज है, जिसे हम भूल गये हैं।
देश की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सभी अनाम शहीदों को हजारों-हजार सलाम !


गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

 कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

रूसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर लियोनिदोविच चिझेव्स्की पिछली सदी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी चिझेव्स्की न केवल एक प्रतिभाशाली आविष्कारक थे, बल्कि कॉस्मोबोलॉजी और हेलिओबोलॉजी के संस्थापक भी थे, जिन्होंने विश्व इतिहास की नई दार्शनिक समझ भी प्रस्तुत की थी।

(फोटो साभार―Prabook)

26 जनवरी, 1897 को एक फौजी अधिकारी के परिवार में जन्मे चिझेव्स्की ने अपनी युवावस्था में ही एक अद्भुत खोज की, जिसे सूर्य और पृथ्वी के पारस्परिक सम्बंध में बड़ी खोज कहा गया। चिझेव्स्की ने अपने इस अत्यंत महत्वपूर्ण शोध में बताया कि सूर्य में प्रत्येक 11 वर्ष के अंतराल पर आण्विक विस्फोट होते हैं और सूर्य पर जब-जब यह क्रिया घटती है, तब-तब पृथ्वी पर बड़ी क्रांतियां घटती हैं। चिझेव्स्की पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि पृथ्वी पर जीवन सूर्य की गतिविधि के साथ एक तरह से जुड़ा हुआ है, यह ब्रह्मांडीय बल है जो जीवमंडल में जीवन की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है। सूर्य में 11 वर्ष की अवधि में दोहराई जाने वाली ये घटनाएं हमारे ग्रह पर प्रजनन की तीव्रता और जीवों की वृद्धि-दर को प्रभावित करती हैं। पृथ्वी पर जीवन का विकास स्थलीय और ब्रह्मांडीय कारकों की पारस्परिक प्रक्रियाओं का परिणाम है; लौकिक दुनिया और स्थलीय जीवमंडल की दुनिया एक साथ जुड़ी हुई है। ये विचार पहली बार 1915 में चिज़ेव्स्की द्वारा व्यक्त किए गए थे।
उन्होंने अपनी बात सिद्ध करने के लिए पिछले कई सौ वर्षों का ब्यौरा प्रस्तुत किया। भारत में तो पहले ही इस पर बहुत काम हुआ और हम मानते रहे हैं कि सुदूर अंतरिक्ष में घटित होने वाली खगोलीय घटनाएं पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं की कारक बनती हैं। चिझेव्स्की ने अपने इस शोध को 'हेलिओबायोलॉजी' कहा था। इसे आसान भाषा में सूर्य का जीव-जगत पर पड़ने वाला प्रभाव या इनका अंतर्सम्बंध कह सकते हैं। चिझेव्स्की का शोध विज्ञान की कसौटी पर खरा था। उनके शोध को बड़ी मान्यता मिली। उनको कई विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के लिए बुलाया गया। अमेरिका ने भी बुलाया। उनको 1939 में अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस ऑफ बायोलॉजिकल फिजिक्स एंड स्पेस बायोलॉजी का मानद सदस्य चुना गया। विद्वानों का मानना है कि वे सोवियत यूनियन में नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले व्यक्ति हो सकते थे लेकिन तब तक बहुत समय नष्ट हो चुका था और उनका शोध आगे न बढ़ सका। लेकिन उनके अपने देश रूस में क्या हुआ? वह समय था जब सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन का शासन था। कम्युनिस्ट सोवियत का विचार था कि क्रांतियां आर्थिक असमानता के चलते होती हैं। इसलिए उन्हें चिझेव्स्की का यह शोध हजम न हुआ। खुद को विज्ञानवादी कहने वाले कम्युनिस्टों ने चिझेव्स्की के विज्ञान पर विचार किया ही नहीं। उसका अध्ययन करने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
(फोटो साभार―wikipedia.org)

मार्क्स की थ्योरी को वैज्ञानिक बताने वाले उसके अनुयायियों को कुछ और कहां दिखता है। उनकी मान्यता है कि 'कार्ल मार्क्स ज्ञान की सर्वसत्ता हैं। उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता है। वही ध्रुवसत्य है।' इसी ग्रंथि के चलते स्टालिन ने सीधे कहा, "तुम्हारा शोध 1905 व 1917 में हुई हमारी क्रांति की अवधारणा के अनुकूल नहीं है। इसे बदल दो। हम अपनी व्याख्याएं संपादित नहीं कर सकते। न ही उससे इतर कोई तथ्य या व्याख्या स्वीकार कर सकते हैं।" चिझेव्स्की ने मना कर दिया। नतीजतन 1942 में चिझेव्स्की को गिरफ्तार कर लिया गया। तानाशाह स्टालिन उन्हें निश्चित ही मार देता, परंतु चिझेव्स्की के पिता रूसी सेना की आर्टिलरी के प्रमुख जनरल थे। इसलिए रहम करके जान बख़्श दी गई और उन्हें 8 साल जेल में बिताने पड़े। इस तरह इतने सालों तक उन्होंने अपने शोध की कीमत जेल में रहकर चुकाई। विचारधारा के कोरे अनुयायियों की वर्चस्ववादी सोच ने ज्ञान को ढांपने का प्रयास किया। इसीलिए कोरी विचारधारा नर्क है। बंधे-बंधाये विचार रूढ़िवाद और नर्क का मार्ग हैं क्योंकि विचारधारा का रूढ़िवाद ज्ञान के कपाट का उद्घाटन नकार देता है। सतत प्रवहमान नदी पोखर बन जाती है। विचारों से चित्त बनता है। चित्त से कर्म की प्रेरणा होती है और कर्म से व्यक्तित्व का निर्माण होता है लेकिन क्या मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसका अस्तित्व है? या जीवनी-शक्ति का महत्व अधिक है? जीवन तो प्रकृति प्रदत्त है, विचारधारा कृत्रिम और मानव समाज द्वारा विकसित है। विचारधारा के अंधेपन में जीवन को नकार देना त्रासदी है। ज्ञान को नकार देना आपदा है। विचार तो नाव की तरह होते हैं, जहां तक उनकी आवश्यकता हो वहीं प्रयोग करके, फिर वहीं छोड़ देना यथेष्ठ है। उसे अकारण बोझ की तरह ढोने का कोई मतलब नहीं। और कम से कम ज्ञान-विज्ञान को कोरी विचारधाराओं से बरी रखने से ही मानवजाति का भला हो सकता है।

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है !

 मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है !

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

मैक्सिको की संसद के निचले सदन केमारा दे दिपुतादोस में अपने कपड़े उतारते और अंडरपैन्ट्स पहने पोडियम के पीछे खड़े होकर भाषण देते ये सज्जन मैक्सिको की डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन पार्टी के संसद सदस्य अंटोनियो गर्तिया कोनेहो (Antonio Garcia Conejo) हैं। सन् 2013 में बीबीसी, द वाल स्ट्रीट जर्नल और डेली मेल द्वारा प्रकाशित ये तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हैं।

इन अखबारों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, अंटोनियो गर्तिया कोनेहो संसद में अपने कपड़े उतार कर नए एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसके तहत एक-दूसरे से प्रॉफ़िट शेयर करने के लिए प्राइवेट कंपनियों को सरकारी कंपनी पेमेक्स (Pemex) के साथ तेल और गैस के खनन की मंज़ूरी दी गयी थी।

द गार्डियन ने अगस्त में रिपोर्ट किया था कि मैक्सिको की सरकारी तेल कंपनी पेमेक्स के पूर्व मुखिया एमिलिओ लोजोया ने वहां के पूर्व राष्ट्रपति एनरीक पेना नियेतो, फे़लिप काल्देरों और कार्लोस सेलिनास पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था।

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

अंटोनियो गर्तिया का यह ऐतिहासिक भाषण केमारा दे दिपुतादोस (Cámara de Diputados) ने अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया था। दरअसल वे सरकार के एनर्जी बिल का विरोध कर रहे थे जिसने प्राइवेट कंपनियों को सरकारी तेल कम्पनी के साथ निवेश की मंज़ूरी दी थी।

गर्तिया कपड़े उतारना शुरू करते हैं और कहते हैं, “क्योंकि वे (सरकार) ऐसा कर रहे हैं, इसलिए मुझे शर्म नहीं आ रही है। सरकार ने मैक्सिको के टेलिकॉम को छीन कर निजी हाथों में दे दिया। मुनाफ़ा कहां गया? मैक्सिको का रेल-रोड भी कोई मुनाफा नहीं देने वाले। शर्म आनी चाहिए तुम्हें…! तुम इसे जो चाहे कहो। तुम कायर हो, तुम एक कायर हो, तुम एक कायर हो। तुम लोग डरपोक हो क्योंकि जब वे तुम्हारे कपड़े उतार रहे थे तब तुमने कुछ नहीं किया।”

(फोटो―अंटोनियो गर्तिया कोनेहो, साभार―सोशल मीडिया)

बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में उनका बयान दिया था, “ऐसे ही तुम देश को भी नंगा कर रहे हो। मुनाफ़ा कहां है? मुझे शर्म नहीं आ रही, तुम जो कर रहे हो वह शर्मनाक है।”

मैक्सिको में 2013 के दौरान जो कुछ भी हो रहा था, भारत में पिछले सात सालों में उससे भी कहीं अधिक भयावह स्थिति बना दी गई है और वह क्रम अभी भी निर्बाध रूप से जारी है। बड़ी तेजी से अरबों-खरबों रुपए के सरकारी उपक्रम और सम्पत्तियां अपने मित्रों को औने-पौने दामों पर सौंपी जा रही हैं जिसके बदले में पीएमकेअर फंड और इलैक्टोरल बॉन्ड्स जैसे चोर रास्तों से रिश्वत लेकर अकूत धन इकट्ठा किया जा रहा है। तरह-तरह के उपायों से जनता की जेब खाली कर उसकी बचत और क्रयशक्ति को खत्म किया जा रहा है। आलोचकों, विरोधियों और आंदोलनकारियों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। उन्हें झूठे मुक़दमे दर्ज कर जेलों में ठूंस दिया जा रहा है। पूंजीपतियों द्वारा संचालित मीडिया के माध्यम से देश को गुमराह किया जा रहा है। यानी तानाशाही पूरे चरम पर है।

ऐसे में किसी राजनेता और मीडिया आउटलेट्स से इस तरह सत्ताधारी पार्टी की बखिया उधेड़ने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...