'हिंदू' : एक विवेचन----------------------
भारत में फिरंग रोग (सिफलिस) लाने वाले अंग्रेज़ों को यहां घृणावश फिरंगी कहा जाने लगा, ठीक इसी तरह फारस की खाड़ी तथा मध्य एशिया से आने वाले आक्रान्ता सिंधु नदी के इस तरफ रहने वालों को 'हिंदू' कहते थे। चूंकि उनके पास 'स' को अभिव्यक्त करने वाला वर्ण था ही नहीं तो इसीलिए वे यहां के निवासियों को हिंदू तथा इस देश को हिंदुस्तान कहते थे। वे बड़ी हिकारत से हिंदू शब्द का प्रयोग काफिर, काला, रहजन (बटमार), चोर, लुटेरा, असभ्य, जंगली, पराजित लोग और गुलाम के अर्थ में प्रयोग करते थे। आगे चलकर हिंदू शब्द संकुचित अर्थ में एक धार्मिक संप्रदाय के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
जैसा कि ईस्वी सन 1030 में मोहम्मद गजनवी के साथ भारत आये फारसी इतिहासकार अल-बरूनी ने पहली बार हिंदू शब्द का लिखित रूप में प्रयोग करते हुए अनेक जगहों पर लिखा है—'तब देहाती हिन्दुओं के एक गिरोह नें हमें घेर लिया...।' या 'वे जंगली हिंदू शोर मचा कर हमारी ओर बढ़े। वे निर्वस्त्र और गंदे थे...' आदि।
अल-बरूनी से पहले वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भागवत, मनुस्मृति आदि कहीं भी हिन्दू शब्द का उल्लेख किसी भी ग्रंथ, बोली-भाषा अथवा लिखित दस्तावेज में नहीं मिलता क्योंकि इनके रचनाकाल में कोई हिंदू था ही नहीं। उस दौर में कोई भारतीय व्यक्ति हिंदू के नाम से नहीं बल्कि जाति के नाम से पहचाना जाता था। देसी समाज में वर्ण व्यवस्था चालू थी और उस व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और उसके नीचे सभी अधिकारों से वंचित शूद्र थे। जिसका कार्य उच्च वर्णों की सेवा करना था। अर्थात उनका दास था।
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12वीं सदी में भारत आये मुसलमानों की बोली और लिपि परशियन यानी फारसी थी। उन्होंने अपने विजित भारतीयों को हिंदू की संज्ञा दी तब से यह हिंदू शब्द प्रचलित हुआ। तब हिंदू शब्द धर्मवाचक न होकर समूहवाचक था। हिंदू शब्द, दो भिन्न-भिन्न शब्दों—हीन और दुन के योग से बना है। जिसमे हीन का मतलब है—तुच्छ, गंदा, नीच और दुन का मतलब—लोक, प्रजा, जनता आदि।
12वीं सदी के पहले हिंदू-शब्द किसी भी ग्रंथ, बोली-भाषा अथवा लिखित दस्तावेज में नहीं मिलता क्योंकि यह शब्द वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, भागवत, ज्ञानेश्वरी, मनुस्मृति, दासबोध और अभंगवाणी आदि किसी में भी हिंदू धार्मिक ग्रंथों में नहीं है।
ईस्वी सन 1325 में मोहम्मद तुगलक दिल्ली का सुल्तान बना। वह एक शिक्षित और योग्य व्यक्ति था। अरबी और फारसी भाषाओं के अलावा खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, गणित, चिकित्सा विज्ञान एवं तर्कशास्त्र में पारंगत सुल्तान तुगलक विद्वानों का सम्मान करता था। उसके दरबार में मोरक्को निवासी एक प्रसिद्ध विद्वान इब्ने बतूता भी था। इब्ने बतूता के पिता और दादा मोरोक्को में काजी थे। मोहम्मद तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी यानी मुख्य न्यायाधीश बनाया।
इब्ने बतूता की अदालत में मुसलमानों के साथ शरीयत के अनुसार और भारतीयों को मनुस्मृति के आधार पर विभाजित ब्राह्मण को ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय को क्षत्रिय धर्म और वैश्य को वैश्य धर्म के नियमों के अनुसार न्याय मिलता था परन्तु शूद्रों में अनेक जातियां होने के कारण निर्णय लेना बहुत ज्यादा पेचीदा होता था। तब इस शूद्र समूह की विशिष्ट पहचान के लिए इब्ने बतूता ने इन्हें सरकारी रिकॉर्ड में हिंदू नाम से दर्ज किया। तभी से परंपरागत रूप से सरकारी दस्तावेजों में शूद्रों को 'हिंदू' लिखा जाने लगा।
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यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत में जजिया कर लगाये जाने पर ब्राह्मणों ने वह कर देने से यह कहते हुए मना कर दिया कि हम हिंदू नहीं, ब्राह्मण हैं; इसलिए हम जजिया नहीं देंगे। अपनी बात की पुष्टि के लिए ब्राह्मणों ने इब्ने बतूता की अदालत में हुए फैसलों की नजीरें दीं। इस तर्क से संतुष्ट होकर मुगल शासकों ने ब्राह्मणों को जजिया कर से मुक्त कर दिया था।
उस समय हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं था, ब्राह्मण धर्म था जिसमें शूद्र नीच थे। ब्राह्मण मुगलों के साथ मिल-जुल कर रहते और राजकाज में सहयोग करते थे। यहां तक कि कहीं-कहीं ब्राह्मण और क्षत्रिय उनके रिश्तेदार भी बन गए थे।
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गोस्वामी तुलसीदास ने 16वीं सदी में रामचरितमानस लिखी, उस समय मुगल शासनकाल था। उन्होंने रामचरितमानस में मुगलों की बुराई पर या कथित हिंदू धर्म की अच्छाई पर एक चौपाई भी नहीं लिखी क्योंकि उस समय हिंदू-मुसलमान का कोई झगड़ा ही नहीं था। तत्कालीन ब्राह्मणों ने उन्हें बहुत सताया और उनका बहिष्कार कर दिया तो वे एक मस्जिद में जाकर रहने लगे। इस पर उन्होंने लिखा है—
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको, जाको रूचै सो कहै कछु ओऊ।
मांगि कै खैबो मसीत को सोइबो, लैबो को एकु न दैबो को दोऊ।
(कवितावलि)
18वीं शताब्दी का अंत आते-आते 'हिंदू' शब्द धार्मिक अर्थ के साथ प्रयुक्त किया जाने लगा था।
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एक गुजराती ब्राह्मण दयानंद सरस्वती ने सन 1875 में लिखित अपने ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि 'हिंदू शब्द संस्कृत का नहीं है। यह मुसलमान शासकों द्वारा हमें दी हुई गाली है, इसलिए हमें अपने-आप को हिंदू नहीं कहना चाहिए। हम आर्य हैं और हमारा धर्म भी आर्य है। हमें अपने-आप को आर्य ही कहना चाहिए।' इसीलिए उन्होंने वैदिक शिक्षाओं पर आधारित 'आर्य समाज' की स्थापना की।
बीसवीं सदी के प्रारम्भ (1914 से नवंबर 1918) में प्रथम विश्व-युद्ध हुआ। उस युद्ध के शुरुआती दौर में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज ने ब्रिटेन की जनता से अपील की कि लोग उन्हें इस युद्ध में पूरा सहयोग दें। युद्ध में ब्रिटेन के जीतने पर वह जनता को सरकार चुनने के लिए वयस्क मताधिकार देंगे। इस अपील का असर ब्रिटिश उपनिवेश भारत के राजनेताओं पर भी होना ही था, खास तौर पर यहां के अल्पसंख्यक ब्राह्मणों पर। जिनमें बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार और बालकृष्ण शिवराम मुंजे शामिल थे।
उन्होंने इस अपील पर सोचना शुरू किया कि यदि ब्रिटेन युद्ध जीत गया तो वह अपने देश में जनता को वयस्क मताधिकार देगा। फिर देर-सबेर यह व्यवस्था भारत में भी लागू होगी। जिससे प्रतिनिधि सभाओं में बहुसंख्यक होने के कारण चुन कर यहां के शूद्र जायेंगे और अल्पसंख्यक होने की वजह से हम ब्राह्मण नहीं चुने जा सकेंगे। इस बात ने ब्राह्मण वर्ग की बेचैनी बढ़ा दी, खास तौर पर इस्रायली यहूदियों से हिंदू बने चितपावन ब्राह्मणों के एक वर्चस्ववादी गुट की क्योंकि उनकी सोच थी कि ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न ब्राह्मणों के सभी ग्रंथ शूद्रों के अधिकार छीनने, उनकी दासत्व की मानसिकता प्रगाढ़ करने और ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बताने के लिए लिखे गए हैं।
इस तरह जब इन हिंदू नेताओं की चिंता बढ़ने लगी तो इन्होंने अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए इस बात पर खूब विचार मंथन कर एक रास्ता निकाला और तथाकथित हिंदुओं को संगठित करने के लिए 1915 में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में 'हिंदू महासभा' की स्थापना की गई, जिसका अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर और उपसभापति केशव बलराम हेडगेवार को बनाया गया।
उधर कांग्रेस में मोहनदास करमचंद गांधी का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था जो आजादी के संघर्ष में किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं के साथ-साथ दलितों, आदिवासियों तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की भरपूर भागीदारी का आह्वान किया करते थे।
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नवंबर 1918 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ और वादे के अनुसार 1918 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में वयस्क मताधिकार कानून पास हुआ। इस कानून की वजह से भारत में ब्राह्मण-धर्म खतरे में पड़ गया था। इसीलिए बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों के दृष्टिगत आजादी के संघर्ष को विभाजित कर उससे हिंदुओं को विलग करने के विचार से एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में हिंदू शब्द को 'हिंदुत्व' के रूप में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा 1923 में व्यक्त किया गया। और, इसी की अगली कड़ी के रूप में पूरे भारतीय समाज को नये-नवेले तथाकथित 'हिंदू-धर्म' और 'हिंदू-राष्ट्र' की अवधारणा के साथ सितंबर 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
जब इंग्लैंड में वयस्क मताधिकार का कानून लागू हुआ और उसे भारत में भी लागू करने की बात चल रही थी, तो इस पर बाल गंगाधर तिलक बोले, "ये तेली, तंबोली, कुनभट संसद में जाकर क्या हल चलाएंगे या तेली तेल निकालेंगे? संसद में जाने का अधिकार तो हम ब्राह्मणों का है। हम जाएंगे संसद में।" तब ब्राह्मणों ने अपने लिए पार्लियामेंट में चुनकर जाने का रास्ता साफ करने के लिए हिंदू-शब्द को 'हिंदू-धर्म' बनाया।
इस तरह वर्तमान तथाकथित 'हिंदू-धर्म' ही वस्तुत: ब्राह्मण-धर्म है हालांकि जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बतौर एक संस्कृति पारिभाषित कर दिया है।
शूद्रों के एक बड़े लड़ाकू वर्ग को इन्होंने पहले ही अछूत घोषित करके वर्ण-व्यवस्था से बाहर कर दिया और शूद्रों को कमजोर किया। जबकि जन-जाति के लोगों को विदेशी आर्य-ब्राह्मणों ने सिंधुघाटी सभ्यता के समय से ही जंगलों में जाकर रहने पर मजबूर कर दिया।
अब ब्राह्मणों ने सोच-समझकर हिंदू शब्द का वृहद स्तर पर इस्तेमाल "गर्व से कहो हम हिंदू हैं" के आह्वान के साथ किया, जिससे सब हिंदुओं को समानता का भ्रम तो हो लेकिन, नेतृत्व ब्राह्मण के हाथों में ही बना रहे। इसी कारण 1950 से आज तक भारत का यह पिछड़ा समाज ब्राह्मणों के संगठन को हिंदू-हितैषी समझकर वोट देता रहा है। फलस्वरूप उन्हीं के वोट से ब्राह्मण बड़ी संख्या में चुनकर पार्लियामेंट में जा रहा है और आज न केवल देश की सत्ता में भागीदार बन गया है, बल्कि ऊंचे-ऊंचे पदों पर काबिज हो गया है।
इस तरह ब्राह्मणों ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मण-धर्म को कायम रखा, भले ही नाम 'हिंदू-धर्म' कर दिया। इसमें जातीयता वैसी ही है जैसे पहले थी। यह जातियां ब्राह्मण-धर्म का प्राणतत्व हैं, जातियों के बिना ब्राह्मण का वर्चस्व खत्म हो जाएगा। ■