एकाकीपन में कटती-खटती जिंदगियां
शनिवार, 18 सितंबर 2021
एकाकीपन में कटती-खटती जिंदगियां
गुरुवार, 16 सितंबर 2021
संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा
संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा
बुधवार, 15 सितंबर 2021
आज़ादी की लड़ाई में दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों का योगदान मिटाया जा रहा है
आज़ादी की लड़ाई में दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों का योगदान मिटाया जा रहा है
सोमवार, 6 सितंबर 2021
महाभारत का युद्ध तो अब भी जारी है !
महाभारत का युद्ध तो अब भी जारी है !
यदि देखा जाये तो महाभारत का युद्ध अब भी जारी है, बल्कि कुछ हद तक आधुनिक तकनीक ने इसे और भी मारक बना दिया है। महाभारत कथा के अनुसार शकुनि बार-बार दुर्योधन को याद दिलाता है कि राज करने का अधिकार उसका (हिंदुओं का) था। वह इसके लिए भाइयों सहित दुर्योधन को बाल्यकाल से ही (शाखाओं में) तैयार करता है।
पर्दे के पीछे से बिल्कुल ठीक शकुनि की तरह संघ अपने भांजे यानी स्वयंसेवक को हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठाने के लिए निरंतर एक के बाद दूसरा षड्यंत्र रचता रहता है। लाक्षाग्रह (साम्प्रायिक दंगे), छल-कपट से जुए (चुनाव) में पांडवों (कांग्रेस) को हराकर सत्ता पर कब्जा करना, सशक्त राजाओं (नेताओं) को डरा-धमका कर, प्रलोभन देकर या फिर रिश्ते बनाकर कौरवों की तरफ मिलाना, हर समय युद्ध के लिए तत्पर रहना, लोगों व उनके घरों तक में फूट डालना (कृष्ण के भाई बलराम तथा पांडवों के मामा शल्य का उदाहरण), असहमतों व विरोधियों को (आयकर, ईडी, सीबीआइ, पुलिस-प्रशासन या गुंडे-मवालियों के जरिये) डराना-धमकाना, मर्यादा, आदर्श, परंपरा, नियम आदि स्थापित मान्यताओं को रौंद डालना, स्त्रियों (द्रौपदी व आदिवासी कन्या) के शीलहरण पर मौन समर्थन देना आदि जैसे तमाम कुकर्मों में सहभागिता व पृष्ठपोषण तथा उनकी अभिवृद्धि व संरक्षण की रणनीति बनाता है।
शकुनि ने दुर्योधन को ऐसा पाठ पढ़ाया कि वह असहिष्णु, हिंसक, परपीड़क, भयानक रूप से युद्धप्रिय और रक्तपिपासु बन गया। झूठ-कपट, छल-प्रपंच और जनबल के भरोसे उसके अत्याचार बढ़ते रहे। पांडवों के शांति और भाईचारे के प्रस्ताव को उसने अनसुना ही नहीं कर दिया बल्कि संदेशवाहक कृष्ण को ही गिरफ्तार कर जेल में डालने का आदेश दे दिया।
देखा जाये तो पूरा महाभारत युद्ध नकारात्मकता के पर्याय शकुनि के षड्यंत्रों से पांडवों का बचाव करने वाले और सकारात्मकता के पक्षधर कृष्ण के बीच लड़ा गया।
अंत में क्या हुआ? सत्ता के सुख की मृगतृष्णा और अहंकार ने कौरवों का वंशनाश कर दिया और मर्यादा, आदर्श, जन-सरोकारों के प्रति संवेदनशील पांडवों को राजलक्ष्मी प्राप्त हुई।
इसीलिए कहा गया है―
यतो धर्मस्ततो जय:। जहां धर्म, मर्यादा, मानवता, न्याय, समता, दया, करुणा, सेवा आदि उच्च मानवीय गुण होते हैं, वहीं विजय और शुभ-लाभ विराजमान रहते हैं।
जहां सुमति तहं सम्पत्ति नाना।
जहां कुमति तहं विपद निधाना।।
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