शनिवार, 18 सितंबर 2021

एकाकीपन में कटती-खटती जिंदगियां

एकाकीपन में कटती-खटती जिंदगियां

एक बार यह जरा गौर से देखिये आपके आस-पास कितने घरों में अगली पीढ़ी वाले बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं? कितने संयुक्त परिवार आपके गाँव-मुहल्ले में अब भी बचे हुए हैं और आपके देखते-देखते कितने बिखर गए?
एक बार उन गली-मुहल्लों में पैदल निकलिए जहां से आप दोस्तों के संग स्कूल जाते समय या मौज-मस्ती करते हुए निकलते थे। हर घर की ओर आपको एक डरावना सन्नाटा मिलेगा, न बच्चों का शोर और न ही कोई दूसरे किस्म की आवाज़। बस किसी-किसी घर की खिड़की, बरामदे या सूने आँगन से नैराश्य में डूबी दो-चार जोड़ी बूढ़ी आँखें आते-जाते लोगों को ताकती जरूर मिल जायेंगी। पहले की तरह घरों के निकट मवेशी तो शायद ही बँधे मिलें।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते गाँवों या सुनसान पडते मुहल्लों के पीछे कारण क्या हैं?
वैश्विक पूंजीवाद और तद्ज्जनित उपभोक्तावादी दौड़ वाले आज के दौर में हर इंसान चाहता है कि उसके कम बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें-लिखें। इसमें गलत कुछ नहीं है।
उनको लगता है कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या बच्चा बिगड़ सकता है। बस यहीं से बच्चों के बाहर निकल कर बड़े शहरों के होस्टलों में जाने का सिलसिला शुरू जाता है।
यह और बात है कि महानगरों और छोटे शहरों में भी उसी क्लास की किताबें या उसका पाठ्यक्रम एक ही जैसा होता है फिर भी अविभावकों पर बच्चों को किसी बड़े शहर में पढ़ने भेजने का एक मानसिक और सामाजिक दबाव-सा आ जाता है।



हालांकि दूर शहर भेजने पर भी मुश्किल से कुछ ही बच्चे कंप्टीशन से अच्छे स्कूलों में जगह पाने मे सफल हो पाते हैं। फिर मजबूर होकर माँ-बाप बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल, बिज़नेस मैनेजमेंट या फिर किसी अच्छे कोर्स में दाखिला कराते हैं।
कई साल बाहर पढ़ते-पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच-बस जाते हैं। उनका गाँव-कस्बों और अपनी लोक-संस्कृति से जुड़ाव घटता जाता है। नौकरी भी आमतौर से बाहर ही मिलती है और घर-परिवार से कटने तथा खुलापन मिलने से अक्सर बच्चे बाहर ही शादी भी कर लेते हैं। ऐसे में बच्चे कुछ गलत न कर बैठें इस भय से या अपनी इज्जत बचाने के लिए माँ-बाप को तो शादी के लिए हां करना ही होता है।
बच्चे अब गिने-चुने मौकों और त्यौहारों पर घर आते हैं माँ-बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु। धीरे-धीरे यह रस्मी आना-जाना भी कम होता जाता है।
माँ-बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं। दो-तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। यूंही एक-एक करके साल बीतते जाते हैं। माँ-बाप बूढ़े होकर पड़ोसियों या दूर के रिश्तेदारों पर आश्रित होते जाते हैं। इधर बच्चे लोन लेकर या बचत करके बड़े शहरों में अपना मकान या फ्लैट ले लेते हैं। जिसकी किश्त चुकाने का दबाव कर्ज चुकता होने तक उनका पीछा नहीं छोड़ता।
अब अपना फ्लैट होने पर गांव-मुहल्ले में शादी-ब्याह और त्योहारों पर भी आना-जाना बंद। बस किसी जरूरी शादी-ब्याह में या परिजन की मृत्यु पर ही आते-जाते हैं। यदि ऐसे ही किसी मौके पर गाँव-मुहल्ले वाला कोई पूछ भी ले कि भाई अब कम आते-जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का वास्ता देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे-बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं। अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ-बाप को साथ में रखा जाये। कोई बच्चा 'बागवान' फिल्म की तरह माता-पिता को आधा-आधा रखने को भी तैयार नहीं। इसलिए मजबूरी में बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकान में अथवा किसी शहर के वृद्धाश्रम में आजीवन कारावास भोगते हुए।


अब घर खाली-खाली, मकान खाली-खाली और धीरे-धीरे मुहल्ला खाली-खाली हो रहा है। ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये 'भू माफियाओं' की गिद्ध जैसी निगाहें इन खाली होते मकानों पर पड़ती हैं। वे इन बच्चों को घुमा-फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं। उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है। एक प्लॉट भी लिया जा सकता है।
साथ ही साथ ये किसी बड़े व्यापारी को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं। बेटे-बहू भी माँ-बाप को बड़े शहर में रहकर आराम से मज़े लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को राज़ी कर ही लेते हैं।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं या निकलने के लिए पर तौल रहे हैं।
अब, बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं, अब वे वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है। यहां इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, जिम नहीं हैं, पार्क नहीं हैं, हॉबी क्लासेज नहीं हैं, इंजीनियरिंग या मेडिकल की कोचिंग नहीं हैं, मॉल नहीं हैं, बडे़ अस्पताल नहीं हैं, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है। आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?
जाने-अनजाने अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों, अपनी लोक-संस्कृति से नाता टूट रहा है, बडे़-बड़े घरों का सिर्फ एक कमरा आबाद रहता है, बूढ़े माता-पिता की जिंदगी तक। बाद में उस मकान में या तो एक बड़ा ताला पड़ जाता है या मकान का मालिक बदल जाता है।
पुराने लोगों के मन के किसी कोने में होता है कि भले ही बेटा कहीं फ्लैट खरीद ले, मगर अपने रिटायरमेंट के बाद रहे अपने उसी छोटे शहर या गाँव में अपने लोगों के बीच में। पर जैसे ही मन की बात रखते हैं, पड़ोसी समझाने आ जाते हैं कि अरे पागल हो गये हो, यहां क्या रखा है? वे भी गिद्ध की तरह मकान हथियाने का इंतज़ार करते हैं, बस सीधे कह नहीं सकते।
अब ये मॉल, ये बड़े स्कूल, ये बड़े टॉवर वाले फ्लैट सिर्फ इनसे तो ज़िन्दगी नहीं चलती। एक वक्त जब बुढ़ापा आता है तब उस समय आपको अपनों की ज़रूरत होती है। आपको ये अपने छोटे शहरों या गांवों में मिल सकते हैं, फ्लैटों की सोसाइटियों में नहीं।
बडे़ शहरों में देखा जाता है कि वहां शव चार कंधों पर नहीं बल्कि एक खुली गाड़ी में पीछे शीशे की केबिन में ले जाए जाते हैं सीधे शमशान या कब्रिस्तान। थोड़ी देर साथ देने की औपचारिकता निभाने को एक-दो रिश्तेदार बस और सब खत्म।
ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जा रही जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं।

आज जहां एक तरफ गाँव सूने हो रहे हैं, छोटे शहर कराह रहे हैं, बड़े घरों के कमरे एक-एक करके खाली होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर नगरों-महानगरों में बढ़ती भीड़-भाड़ और तेज रफ्तार जिंदगी के कारण जीवन के सुख-चैन में लगातार कमी होती जा रही है।
वे बहुत भाग्यशाली हैं जो आज के दौर में भी अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों और अपनी लोक-संस्कृति से जुडे़ हुए हैं क्योंकि सच पूछिए तो जिंदगी का असली आनंद अपनों के साथ जीने में ही है। अपनों से दूर एकाकी समय तो दूर अस्पताल में भर्ती रोगी, संन्यासी, पागल, जेल में बंद कैदी या फिर पशु-पक्षी भी काट ही लेते हैं।
रीति-रिवाजों से जिंदगी रंगीन और रौशन रहती है। जिंदगी जिंदादिली से आबाद रहती है, एकाकी और सूनी-सूनी जिंदगी जीये तो क्या जीये।

(सभी फोटो साभार―गूगल)

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा

संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों तथा जन-सामान्य को संघ के गठन की वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी नहीं देता क्योंकि इससे उसकी इटली के सिगनोर बेनिटो मुसोलिनी की फासीवादी पार्टी की विचारधारा से प्रभावित होने का पता चल जायेगा। परंतु इधर ऐसे सारे प्रमाण सामने आ चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि हेडगेवार एंड कंपनी फासिस्टों के सिर्फ मानस-पुत्र ही नहीं थे बल्कि वे सीधे तौर पर मुसोलिनी के साथ संपर्क साधे हुए थे और काफी वर्षों तक उनके निर्देशन में भारत में काम करते रहे थे।
1 अप्रैल, 1920 के दिन जर्मनी की जर्मन वर्कर्स पार्टी का नाम बदलकर नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी हुआ जिसका संक्षिप्त नाम नाजी पार्टी होता है। हिटलर अपने कुछ अत्यंत विश्वस्त लोगों, रूडोल्फ हेस, आल्फ्रेड रोजेनबर्ग, हर्मन गोरिंग, मैक्स अमानज तथा जूलिया स्ट्रेचर के साथ इस पार्टी पर काबिज हो गया और उसने इसके तूफानी दस्ते (स्टॉर्म ट्रुपर्स) का गठन किया। हिटलर के इस तूफानी दस्ते की भयावह कारस्तानियों की खबरें 1923 के बाद से सारी दुनिया में फैल रहीं थीं।
इसी प्रकार 1920-21 के जमाने से ही इटली में सिगनोर बेनिटो मुसोलिनी की फासीवादी पार्टी तथा उसके हथियारबंद दस्तों का बढ़ावा शुरू हुआ था। इटली की सरकार की शह पर मुसोलिनी के सशस्त्र दस्ते वहां की सोशलिस्ट पार्टी तथा मजदूर संगठनों पर कातिलाना हमले किया करते थे। 28 अक्टूबर, 1922 को इटली के राजा, वहां की सरकार और सेना की साजिश से मुसोलिनी इटली का प्राधनमंत्री बन गया और 1924 के बाद उसने सुनियोजित ढंग से इटली की तमाम जनतांत्रिक संस्थाओं का गला घोटना शुरू किया। 1926 तक फासीवादी पार्टी को छोड़कर बाकी सभी पार्टियां भंग कर दीं। सन 1920 से 1925 के दौरान सारी दुनिया में इटली की फासीवादी पार्टी की बढ़त और उसकी सफलता के किस्से भी काफी चर्चित थे।
आरएसएस के गठन के वक्त हेडगेवार के दिमाग में नाजी और फासीवादी पार्टियों का पूरा खाका निश्चित रूप से काम कर रहा था। आरएसएस के सांगठनिक स्वरूप की उनकी परिकल्पना को देखते हुए यह बात पूरे निश्चय के साथ कही जा सकती है। उन्होंने अपने संगठन के नामकरण तक में फासिस्टों से प्रेरणा ली थी। इटैलियन भाषा में फासी शब्द 'संघ' का पर्यायवाची है। इटली के फासिस्ट काली कमीज पहना करते थे। उन्हीं की तर्ज पर हेडगेवार ने संघ के कार्यकर्ताओं को काली टोपी पहनाई। दुनिया में इटली के फासिस्टों को 'काली कमीज', स्पेन के फासिस्टों को 'भूरी कमीज' के नाम से जाना जाता था, उसी प्रकार संघियों ने अपना परिचय खाकी निकर और काली टोपी वालों के रूप में स्थापित किया। इसके अलावा संघ के सांगठनिक ढांचे को उन्होंने सचेत रूप में शुरू से ही पूरी तरह से तानाशाहीपूर्ण बनाए रखा, जिसमें संघ के सर्वोच्च नेता सरसंघचालक के प्रति पूर्ण और प्रश्नहीन निष्ठा संघ की सदस्यता की पहली शर्त रखी गई। यह बिल्कुल उसी प्रकार था जिस प्रकार फासीवादी पार्टी में हर सदस्य को ड्यूस (नेता) अर्थात् मुसोलिनी के नाम पर यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह बिना कोई प्रश्न किए नेता के आदेश का पालन करेगा।
मुसोलिनी से सीधा संपर्क―
इधर ऐसे सारे प्रमाण सामने आ चुके हैं, जिनसे पता चलता है कि हेडगेवार एंड कंपनी फासिस्टों के सिर्फ मानस-पुत्र ही नहीं थे, वे सीधे तौर पर मुसोलिनी के साथ संपर्क साधे हुए थे और काफी वर्षों तक उनके निर्देशन में भारत में काम करते रहे थे। 'इकोनामिक एंड पालिटिकल वीकली' (ईपीडब्ल्यू.) के 22-28 जनवरी, 2000 के अंक में मार्जिया कैसालेरी के शोधप्रबंध 'हिंदुत्वाज फोरेन टाइ-अप इन द नाइन्टीन थर्टीज, आर्काइवल एविडेंस' में उन सारे तथ्यों का ब्यौरेवार विवरण दिया गया है, जिनसे आरएसएस के नेतृत्व के साथ मुसोलिनी और उसकी फासिस्ट पार्टी के सम्बंधों का खुलासा होता है। इसमें कैसालेरी कहते हैं कि सच्चाई यह है कि हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे प्रमुख संगठनों ने न सिर्फ सचेत रूप में और जान-बूझ कर फासीवादी विचारों को अपनाया था, बल्कि इसके पीछे प्रमुख हिंदू संगठनों और फासीवादी इटली के बीच सीधे संपर्क भी काम कर रहे थे।
कैसालेरी ने इसके प्रमाण के तौर पर आरएसएस के संस्थापकों में एक बालकृष्ण शिवराम मुंजे, जिन्हें हेडगेवार अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, की 1931 में इटली यात्रा का विस्तृत ब्यौरा दिया है। हेडगेवार के जीवनीकार एसआर. रामास्वामी ने लिखा है कि मुंजे ने ही हेडगेवार को उनकी जवानी के दिनों में अपने घर में रखा था और बाद में कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के लिए वहां के नेशनल मेडिकल कॉलेज में भेजा था। कैसालेरी ने ईपीडब्ल्यू. के अपने लेख में बताया है कि 1931 के फरवरी और मार्च महीने के बीच मुंजे ने यूरोप की यात्रा की थी, जिस दौरान वे इटली में काफी दिनों तक रुके थे। वहां उन्होंने कुछ सैनिक स्कूलों और शिक्षा संस्थाओं का दौरा किया और खुद मुसोलिनी से मुलाकात की। मुंजे ने इन तमाम बातों को अपनी डायरी में दर्ज किया है। अपनी डायरी में उन्होंने अपनी इटली यात्रा और मुसोलिनी के साथ हुई मुलाकात पर 13 पन्ने लिखे हैं। यह डायरी नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में 'मुंजे पेपर्स' के तौर पर माइक्रो फिल्म्स में सुरक्षित है।

बालकृष्ण शिवराम मुंजे
कैसालेरी के ब्यौरों से पता चलता है कि मुंजे 15 से 24 मार्च, 1931 तक रोम में थे। 19 मार्च को वे अन्य कई स्थलों के अलावा मिलिट्री कॉलेज, सेंट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ फिजिकल एडुकेशन तथा सर्वोपरि मुसोलिनी के हमलावर दस्तों के संगठन 'बलिल्ला' और 'आवांगर्द' संगठनों में भी गये। अपनी डायरी में उन्होंने इन दोनों संगठनों के बारे में दो से अधिक पृष्ठ लिखे हैं। ये संगठन फासीवादी विचारों की दीक्षा के मुख्य संगठन थे। युवकों को इनमें दीक्षित किया जाता था।
संघ का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल मुसोलिनी के हमलावर दस्तों जैसा।
कैसालेरी लिखते हैं कि 'मुंजे की डायरी में इन संगठनों का जो विवरण मिलता है आश्चर्यजनक रूप से आरएसएस का वास्तविक स्वरूप बिल्कुल वैसा ही है। इन संगठनों में छह से अठारह वर्ष की आयु के युवकों का दाखिला किया जाता था। उन्हें साप्ताहिक सभा में शामिल होना पड़ता था, जहां वे शारीरिक व्यायाम करते थे, अद्र्धसैनिक प्रशिक्षण लेते थे, ड्रिल और परेड किया करते थे।'
मुंजे की डायरी में मुसोलिनी के साथ वार्ता का बखान―
19 मार्च, 1931 को ही दोपहर 3 बजे इटली की फासीवादी सरकार के सदर दफ्तर पलाजो वेनेजिया में मुंजे की मुलाकात मुसोलिनी से हुई। मुंजे की डायरी के 20 मार्च के पृष्ठ पर इस मुलाकात के बारे में लिखा हुआ है। कैसालेरी ने अपने प्रबंध में डायरी के इस पूरे अंश को उद्धृत किया है जो इस प्रकार है―'जैसे ही मैंने दरवाजे पर दस्तक दी, वे उठ खड़े हुए और मेरे स्वागत के लिए आगे आये। मैंने यह कहते हुए कि मैं डॉ. मुंजे हूं, उनसे हाथ मिलाया। वे मेरे बारे में सबकुछ जानते थे और लगता था कि स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष को बहुत निकट से देख रहे थे। गांधी के लिए उनमें काफी सम्मान का भाव दिखायी दिया। वे अपनी मेज के सामने की दूसरी कुर्सी पर मेरे ठीक सामने बैठ गये और लगभग आधा घंटा तक मुझसे बात करते रहे। उन्होंने मुझसे गांधी और उनके आंदोलन के बारे में पूछा और यह सीधा सवाल किया कि ‘क्या गोलमेज सम्मेलन भारत और इंगलैंड के बीच शांति कायम कर पायेगा?'
मैंने कहा―"यदि अंग्रेज ईमानदारी से हमें अपने साम्राज्य के अन्य हिस्सों की तरह समानता का दर्जा देते हैं तो हमें साम्राज्य के प्रति शांतिपूर्ण और विश्वासपात्र बने रहने में कोई आपत्ति नहीं है, अन्यथा संघर्ष और तेज होगा, जारी रहेगा। भारत यदि उसके प्रति मित्रवत् और शांतिपूर्ण रहता है तो इससे ब्रिटेन को लाभ होगा और यूरोपीय राष्ट्रों में वह अपनी प्रमुखता को बनाये रख सकेगा। लेकिन भारत में तब तक ऐसा नहीं होगा जब तक उसे अन्य डोमीनियन्स के साथ बराबरी की शर्त पर डोमीनियन स्टेटस नहीं मिलता।"
सिगनोर मुसोलिनी मेरी इस टिप्पणी से प्रभावित दिखे। तब उन्होंने मुझसे पूछा कि आपने विश्वविद्यालय देखा। मैंने कहा―"मेरी लड़कों के सैनिक प्रशिक्षण के बारे में दिलचस्पी है और मैंने इंगलैंड, फ्रांस तथा जर्मनी के सैनिक स्कूलों को देखा है। मैं इसी उद्देश्य से इटली आया हूं तथा आभारी हूं कि विदेश विभाग और युद्ध विभाग ने इन स्कूलों में मेरे दौरे का अच्छा प्रबंध किया। आज सुबह और दोपहर को ही मैंने बलिल्ला और फासिस्ट संगठनों को देखा और उन्होंने मुझे काफी प्रभावित किया। इटली को अपने विकास और समृद्धि के लिए उनकी जरूरत है। मैंने उनमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं देखा जबकि अखबारों में उनके बारे में तथा महामहिम आपके बारे में बहुत कुछ ऐसा पढ़ता रहा हूं जिसे मित्रतापूर्ण आलोचना नहीं कहा जा सकता।"

सिगनोर मुसोलिनी―"इनके बारे में आपकी क्या राय है?"
डॉ. मुंजे―"महामहिम, मैं काफी प्रभावित हूं। प्रत्येक महत्वाकांक्षी और विकासमान राज्य को ऐसे संगठनों की जरूरत है। भारत को उसके सैनिक पुनर्जागरण के लिए इनकी सबसे अधिक जरूरत है। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन में भारतीयों को सैनिक पेशे से अलग कर दिया गया है। भारत अपनी रक्षा के लिए खुद को तैयार करने की इच्छा रखता है। मैं उसके लिए काम कर रहा हूं। मैंने खुद अपना संगठन इन्हीं उद्देश्यों के लिए बनाया है। इंगलैंड या भारत, जहां भी जरूरत पड़ेगी आपके बल्लिला और अन्य फासिस्ट संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक मंच से आवाज उठाने में मुझे कोई हिचक नहीं होगी। मैं इनके अच्छे भाग्य और पूर्ण सफलता की कामना करता हूं।"
यह है मुंजे की डायरी का वह अंश जिसमें उन्होंने मुसोलिनी के साथ अपनी वार्ता का बखान किया था। इटली में अन्यत्र कहां-कहां गये इसका ब्यौरा डायरी के अन्य पृष्ठों पर दिया हुआ है। इसमें फासीवाद, उसके इतिहास और फासिस्ट क्रांति आदि के बारे में भी कई सूचनाएं दर्ज हैं। मुझे लगता है कि भारत के लिए वे सर्वथा उपयुक्त हैं। यहां की खास परिस्थिति के अनुरूप उन्हें अपनाना चाहिए। मैं इन आंदोलनों से भारी प्रभावित हुआ हूं और अपनी आंखों से पूरे विस्तार के साथ मैंने उनके कामों को देखा है।'
उल्लेखनीय है कि 31 जनवरी, 1934 के दिन हेडगेवार ने केवाई. शास्त्री द्वारा आयोजित 'फासीवाद और मुसोलिनी' के बारे में एक सेमिनार की अध्यक्षता की थी।

(स्रोत : अरुण माहेश्वरी की प्रसिद्ध पुस्तक—'आरएसएस और उसकी विचारधारा')

बुधवार, 15 सितंबर 2021

आज़ादी की लड़ाई में दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों का योगदान मिटाया जा रहा है

 आज़ादी की लड़ाई में दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों का योगदान मिटाया जा रहा है

संघ वर्षों से कहता रहा है कि देश का इतिहास वामपंथियों, विदेशियों और काग्रेंस के लोगों द्वारा लिखा गया है जो झूठा है। अब केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद उस इतिहास को बदला जा रहा है। आजादी के साझा संघर्ष को भी सवर्ण-दलित एंगल दिया जा रहा है।
जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की करतूत के निशान मिटाते हुए उसके ऐहासिक स्वरूप को बदलने के बाद गांधी जी के साबरमती आश्रम को पिकनिक स्पॉट में बदलने पर जोरों से काम चल ही रहा है तो उधर 1922 के चौरी-चौरा कांड के शहीदों के नामों में साम्प्रदायिक तथा जातीय आधार पर उलट-फेर कर दिया गया है।
चौरी-चौरा घटना के कुछ शहीदों के नामों में फेरबदल और उम्र क़ैद पाने वाले 14 स्वतंत्रता सेनानियों में से सिर्फ़ सवर्ण जाति से जुड़े एक व्यक्ति की प्रतिमा स्मारक में स्थापित की गई है। इस पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या ये स्वतंत्रता संग्राम में दलितों और पिछड़ों के योगदान को धीरे-धीरे मिटाने की कोशिश है?
स्मारक में पुरानी तख़्ती की जगह लगाई गई नई तख़्ती में कई नामों में फेरबदल साफ़ नज़र आता है―
1―पुरानी पट्टिका के 'श्री लौटू पुत्र शिवनन्दन कहार' में से 'कहार' शब्द नई तख़्ती से ग़ायब है।
2―'श्री रामलगन पुत्र शिवटहल लोहार' अब शहीद रामलगन पुत्र शिवटहल के नाम से दिख रहे हैं।
3―शहीद लाल मुहम्मद के पिता हकीम फकीर का नाम अब महज़ 'हकीम' रह गया है।
4―लाल मुहम्मद को लाल अहमद और शिवनन्दन को नई तख़्ती में शिवचरन अंकित किया गया है।
5―आजीवन कारावास पाने वाले 14 में से सिर्फ़ एक व्यक्ति, द्वारिका प्रसाद पांडेय पुत्र नेपाल पांडेय की ही प्रतिमा लगाई गई है।


लाल मुहम्मद को 3 जुलाइ, 1923 को रायबरेली जेल में फ़ांसी दी गई थी। उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 4 फ़रवरी, 1922 में चौरी-चौरा की उस घटना के लिए ज़िम्मेदार पाया था जिसमें पुलिस थाने में आग लगा दी गई थी और 23 पुलिसवालों की मौत हो गई थी। इसके लिए कुल 19 लोगों को फ़ांसी और 14 को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।
हालांकि, स्मारक में हुए बदलाव से जुड़े लोगों ने आरोपों को ग़लत बताते हुए कहा है कि 'ग़लती सुधार के लिए आवेदन दिया गया है।' स्मारक समिति के संयोजक हालांकि यह जोड़ना नहीं भूलते कि शहीदों या परिवार के लोगों के नाम से जाति का नाम हटा देने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है लेकिन जबसे उनसे यह पूछा गया कि घटना से जुड़े सवर्ण लोगों के सरनेम क्यों नहीं हटाए गए तो उनके पास कोई उचित जवाब नहीं था।
लेखक और इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा ने चौरी चौरा पर 'चौरी-चौरा : विद्रोह, स्वाधीनता आंदोलन' नाम की पुस्तक लिखी है जो साल 2014 में प्रकाशित हुई थी।
चौरी-चौरा की घटना की याद में गोरखपुर शहर (उप्र) से क़रीब 26 किलोमीटर दूर 1993 में स्मारक तैयार हुआ था, जिसका पिछले दो सालों में सौंदर्यीकरण करवाए जाने के बाद साल 2021 जनवरी को लोकार्पण हुआ था। साल 2021 को चौरी-चौरा घटना के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।
आजीवन कारावास पाने वाले 14 में से सिर्फ़ एक व्यक्ति, द्वारिका प्रसाद पांडेय पुत्र नेपाल पांडेय की ही प्रतिमा लगाए जाने को लेकर भी विवाद है। जबकि डुमरी खुर्द निवासी बिक्रम अहीर को इसी घटना के लिए फ़ांसी दी गई थी।


उनके पड़पोते शरदानंद यादव कहते हैं, "सेशन कोर्ट ने जिन 172 लोगों को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी, उसे देखिए और बताइए कि उसमें अपर कास्ट के कितने लोग हैं। यह ज़मींदारी प्रथा के सताए हुए किसानों और मज़दूरों का आंदोलन था। सरकार उन लोगों के योगदान को धीर-धीरे मिटा देना चाहती है।"
लाल मुहम्मद जिन्हें 3 जुलाइ, 1923 को फ़ांसी हुई थी, उनके पोते मैनुद्दीन ने दादा और परदादा के नामों को 'सुधरवाने के लिए' मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है।
मैनुद्दीन कहते हैं, "स्मारक में लगी मूर्तियों में हमारी पहचान को छिपा दिया गया है। हम फक़ीर बिरादरी के हैं लेकिन अब उसे बदल दिया गया है।"
वे कहते हैं, "जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए इतना बड़ा काम किया, अगर आप उन्हें पहचान नहीं दे सकते हैं तो कम से कम उनकी पहचान को तो न ख़राब किया जाये।"
ज़िला स्वतंत्रता संग्राम शहीद स्मारक समिति के संयोजक और फ़ांसी की सज़ा पाने वाले मेघू तिवारी के पौत्र रामनारायण त्रिपाठी कहते हैं, 'कुछ लोग हैं जो चौरी-चौरा आंदोलन को दलितों का आंदोलन बताने के लिए व्याकुल हैं।' त्रिपाठी के अनुसार उन्होंने ही 'शहीदों की सूची' सम्बंधित विभाग को भेजी थी। नामों को उल्टा-सीधा कर दिया गया है जिसके लिए उन्होंने डीएम कार्यालय में आवेदन दे रखा है लेकिन उसमें कुछ प्रशासनिक वजहों से देरी हो गई है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे प्रो. आनंद कुमार सीधे तौर पर कहते हैं कि "स्मारक पर किसी सरकारी बाबू या वोट के ज़रिए पांच साल के लिए चुने गए किसी 'राजा-रानी' की तुलना में शहीदों के वंशजों का ज़्यादा अधिकार है और अगर वे चाहते हैं कि शहीदों के नाम से जातीय पहचान न मिटाई जाए तो उसे नहीं मिटाया जाना चाहिए। शहीदों की स्मृति की रक्षा की ज़िम्मेदारी समाज की है लेकिन वे किस रूप में याद किए जाएं यह उनके परिवार की प्राथमिकता है।"
चौरी-चौरा कांड―
पुलिस ने 228 लोगों के ख़िलाफ़ गोरखपुर के सेशन कोर्ट में आरोप पत्र दाख़िल किया था, जिनमें से दो की जेल में मौत हो गई थी और एक व्यक्ति के सरकारी गवाह बन जाने के बाद 225 लोगों पर मुक़दमा चला।
सेशन कोर्ट जज एच.ई. होत्म्स ने 9 जनवरी, 1923 को 172 लोगों को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी जिसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश एडवर्ड ग्रीमवुड मीयर्स और सर थियोडोर पिगॉट की बेंच ने इस मामले में 30 अप्रैल 1923 को दिये फ़ैसले में 14 लोगों को उम्रक़ैद और 19 को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी।

सोमवार, 6 सितंबर 2021

महाभारत का युद्ध तो अब भी जारी है !

महाभारत का युद्ध तो अब भी जारी है ! 

यदि देखा जाये तो महाभारत का युद्ध अब भी जारी है, बल्कि कुछ हद तक आधुनिक तकनीक ने इसे और भी मारक बना दिया है। महाभारत कथा के अनुसार शकुनि बार-बार दुर्योधन को याद दिलाता है कि राज करने का अधिकार उसका (हिंदुओं का) था। वह इसके लिए भाइयों सहित दुर्योधन को बाल्यकाल से ही (शाखाओं में) तैयार करता है। 

पर्दे के पीछे से बिल्कुल ठीक शकुनि की तरह संघ अपने भांजे यानी स्वयंसेवक को हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठाने के लिए निरंतर एक के बाद दूसरा षड्यंत्र रचता रहता है। लाक्षाग्रह (साम्प्रायिक दंगे), छल-कपट से जुए (चुनाव) में पांडवों (कांग्रेस) को हराकर सत्ता पर कब्जा करना, सशक्त राजाओं (नेताओं) को डरा-धमका कर, प्रलोभन देकर या फिर रिश्ते बनाकर कौरवों की तरफ मिलाना, हर समय युद्ध के लिए तत्पर रहना, लोगों व उनके घरों तक में फूट डालना (कृष्ण के भाई बलराम तथा पांडवों के मामा शल्य का उदाहरण), असहमतों व विरोधियों को (आयकर, ईडी, सीबीआइ, पुलिस-प्रशासन या गुंडे-मवालियों के जरिये) डराना-धमकाना, मर्यादा, आदर्श, परंपरा, नियम आदि स्थापित मान्यताओं को रौंद डालना, स्त्रियों (द्रौपदी व आदिवासी कन्या) के शीलहरण पर मौन समर्थन देना आदि जैसे तमाम कुकर्मों में सहभागिता व पृष्ठपोषण तथा उनकी अभिवृद्धि व संरक्षण की रणनीति बनाता है।

शकुनि ने दुर्योधन को ऐसा पाठ पढ़ाया कि वह असहिष्णु, हिंसक, परपीड़क, भयानक रूप से युद्धप्रिय और रक्तपिपासु बन गया। झूठ-कपट, छल-प्रपंच और जनबल के भरोसे उसके अत्याचार बढ़ते रहे। पांडवों के शांति और भाईचारे के प्रस्ताव को उसने अनसुना ही नहीं कर दिया बल्कि संदेशवाहक कृष्ण को ही गिरफ्तार कर जेल में डालने का आदेश दे दिया। 

देखा जाये तो पूरा महाभारत युद्ध नकारात्मकता के पर्याय शकुनि के षड्यंत्रों से पांडवों का बचाव करने वाले और सकारात्मकता के पक्षधर कृष्ण के बीच लड़ा गया।   

अंत में क्या हुआ? सत्ता के सुख की मृगतृष्णा और अहंकार ने कौरवों का वंशनाश कर दिया और मर्यादा, आदर्श, जन-सरोकारों के प्रति संवेदनशील पांडवों को राजलक्ष्मी प्राप्त हुई। 

इसीलिए कहा गया है―

यतो धर्मस्ततो जय:। जहां धर्म, मर्यादा, मानवता, न्याय, समता, दया, करुणा, सेवा आदि उच्च मानवीय गुण होते हैं, वहीं विजय और शुभ-लाभ विराजमान रहते हैं। 

जहां सुमति तहं सम्पत्ति नाना। 

जहां कुमति तहं विपद निधाना।।


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