मंगलवार, 20 सितंबर 2022

जब ड्रग्स के काले धंधे में सीआइए ही संलिप्त पाई गई

जब ड्रग्स के काले धंधे में सीआइए ही संलिप्त पाई गई

पत्रकार गैरी स्टीफन वेब

इधर हाल के दो-तीन वर्षों में जिस तरह भारत में आये दिन अरबों-खरबों रुपये की ड्रग्स, खास तौर पर एक निजी बंदरगाह पर ही पकड़ी जा रही है, उससे शंका होना लाजिमी हो जाता है कि कहीं यह किसी विदेशी संगठन के साथ उच्चस्तरीय आंतरिक गठजोड़ से तो नहीं किया जा रहा है? और वह भी एक ही कॉरपोरेट घराने को देश के बंदरगाह, कंटेनर परिवहन, रेलवे, हवाई सेवा तथा आंतरिक सुरक्षा में निजी सुरक्षाकर्मियों की नियुक्ति की छूट देने से तो ऐसे अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है।
यह आश्चर्यजनक है कि देश के मीडिया में इस पर कभी कोई खास चर्चा नहीं होती और शायद इसीलिए देश में किसी को भी नहीं मालूम कि नशीली दवाओं के टनों वजनी और अरबों-खरबों रुपये मूल्य की खेप देश में किसके द्वारा मंगाई जाती हैं, कहां ले जाई जाती हैं, इस काले धंधे के कारोबार में कौन-कौन शामिल हैं और उनके आश्रयदाता कौन-कौन हैं?
अमेरिका में 1970 से सदी के अंतिम वर्षों में जिस तरह ड्रग कार्टेल के केंद्रीय गुप्तचर संगठन सीआइए से गहरे सम्बंध बन गये थे उससे वहां के बड़े-बड़े शहरों में नशेड़ियों की भरमार हो गई थी। इस स्थिति की ओर जब एक बेहद कम प्रसार संख्या वाले अखबार के संवाददाता का ध्यान गया और उसने उसका अध्ययन करना शुरू किया तो बड़े चौंकाने वाले तथ्य सामने आये।

पत्रकार गैरी स्टीफन वेब


अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआइए द्वारा विदेशी सरकारों को गिराने के लिए वहां ड्रग्स का कारोबार फैलाने, हथियार सप्लाइ कर गृहयुद्ध भड़काने तथा सैनिक विद्रोह कराने के खेल का भंडाफोड़ पत्रकार गैरी स्टीफन वेब ने 1996 में अपनी तीन भागों में प्रकाशित एक शृंखला―'डार्क एलायंस' में किया था। यह कलंक-कथा 'सैन जोस मर्करी न्यूज' नामक एक मामूली पाठक-संख्या वाले अखबार में छपने के बाद वहां तहलका मच गया था।
बहरहाल, गैरी वेब ने इस लेखमाला में दावा किया था कि निकारागुआ की समाजवादी सैंडिस्ता सरकार उखाड़ फैंकने के लिए सीआइए ने फ़िरोज़ा डेमोक्रिटिका निकाराग्यून्स नामक विद्रोही गुरिल्ला सेना को ड्रग्स सप्लाइ की ताकि वे उस पैसे से हथियार खरीद सके। इस आरोप पर सीआइए ने आंखें मूंद लीं। हालांकि दबी जुबान से अमेरिकी सरकार ने इसका विरोध किया।
वेब ने लेख में बताया था कि निकारागुआ में 1980 के दशक में कोकीन की जो महामारी जो फैली थी, वह विद्रोहियों द्वारा की जा रही ड्रग तस्करी की सीआइए की अनदेखी के कारण आंशिक रूप से उपजी थी।
गैरी वेब के अनुसार मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले 'डार्क एलायंस’ का सीआइए के मध्य अमेरिका में साम्यवाद-विरोधी प्रयासों के बीच सम्बंध का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।

गैरी वेब को पुलित्जर पुरस्कार―
17 अक्टूबर, 1989 को बे एरिया भूकंप और उसके बाद के विस्तृत कवरेज के लिए पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त पत्रकार गैरी स्टीफन वेब ने अपनी इस लेखमाला के लिए लॉस एंजिल्स स्थित ड्रग माफिया 'फ्रीवे' रिकी रॉस पर ध्यान केंद्रित किया। जिसका तट-से-तट तक इस भूमिगत काले धंधे का कारोबार फैला था। वह कोकीन के लिए नकद भुगतान करता था। वेब ने दावा किया कि ब्लांडन-मेनेसेस-रिकी रॉस के ड्रग्स एलायंस ने कोलंबिया के कोकीन निर्माताओं और लॉस एंजिल्स के काले कारोबारियों के बीच पहली पाइपलाइन खोली जिसने अमेरिकी शहरों को क्रैक की खेपों से भर दिया था।
ड्रग माफिया 'फ्रीवे' रिकी रॉस

लॉस एंजेलिस टाइम्स का अनुमान था कि उसके गिरोह ने अपने चरम पर रोजाना औसतन आधा मिलियन क्रैक बेचीं।
सीआइए तथा हर संघीय एजेंसी द्वारा इस गोरखधंधे की उपेक्षा के बारे में अमेरिकी मुख्यधारा के प्रेस ने पहले कभी नहीं लिखा था। इसीलिए अश्वेतों, ड्रग-सुधार कार्यकर्ताओं और राजनीतिज्ञों के बीच इनके विरुद्ध नाराजगी पैदा की क्योंकि वे इस ड्रग वॉर के खिलाफ अपना काम नहीं कर रहे थे।
गैरी वेब के लेख की आलोचना की गई―
'सैन जोस मर्करी न्यूज' की अपेक्षा बहुत ज्यादा प्रसार संख्या वाले अमेरिकी अख़बारों ने गैरी वेब की यह शृंखला छापने के लिए अखबार व पत्रकार वेब की आलोचना की। उनका कहना था कि उसकी प्रस्तुति लचर, हल्की सोर्सिंग और सबूतों की कमी के कारण खोखली थी। उदाहरण के लिए, वेब ने दावा किया था कि ब्लांडन-मेनेसेस-रिकी रॉस के ड्रग्स एलायंस ने कोलंबियाई कोकीन निर्माताओं और लॉस एंजिल्स के बीच पहली पाइपलाइन खोली और शहरी अमेरिका में क्रैक विस्फोट की चिंगारी भड़काने में मदद की, लेकिन उनके लेख में कोई पुख्ता सबूत नहीं था।
इस पर लॉस एंजिल्स टाइम्स का कहना था कि बड़े प्रतिद्वंद्वी समाचार पत्र केवल इस बात से नाराज थे कि यह सनसनीखेज खबर उन्हें न देकर बहुत छोटे मीडिया हाउस द्वारा छापी गई।
अमेरिकी सरकार ने वेब की इस शृंखला को एक अजीब काम करार दिया।
प्रतिद्वंद्वियों के हमलों से घबराकर वेब के अपने अखबार 'सैन जोस मर्करी न्यूज' ने लेखों से खुद को अलग कर लिया और अपने पाठकों के नाम एक माफी-पत्र प्रकाशित किया।
क्या गैरी वेब ने झूठ लिखा था?―
गैरी वेब ने कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं लिखी थी, यह इसीसे सिद्ध होता है कि इससे पहले भी 1988 में सीनेट की एक उपसमिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि कुछ सीआइए समर्थित विद्रोहियों ने पैसा बनाने के लिए ड्रग्स की तस्करी की। इसके दस साल बाद 1998 में सीआइए के महानिरीक्षक फ्रेडरिक पी. हिट्ज ने हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के सामने गवाही दी कि इस मामले की गहन समीक्षा के बाद उनका मानना ​​था कि सीआइए कम से कम ड्रग्स-युद्ध के सम्बंध में एक मध्यस्थ के रूप में काम करता है।
'सैन जोस मर्करी न्यूज' के इस भंडाफोड़ को बड़े पैमाने पर मीडिया आउटलेट्स द्वारा रद्दी की टोकरी फेंक दिए जाने के बावजूद जिनेवा ओवरहोलर, द वाशिंगटन पोस्ट जैसे कुछ अखबार और पत्रकार उसके बचाव में भी आगे आए थे। बे एरिया भूकंप और उसके बाद के विस्तृत कवरेज के लिए पुलित्जर पुरस्कार प्राप्त करने वाले गैरी स्टीफन वेब ने 1996 में जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर पुरस्कार भी जीता।

गैरी स्टीफन वेब की किताब किल द मैसेंजर

उनकी उक्त लेखमाला पर आधारित 'किल द मैसेंजर' नाम वाली अनेक पुस्तकों तथा 2014 में बनाई गई हॉलीवुड फिल्म 'किल द मैसेंजर' भी खूब चर्चित रही।
भारतीय मीडिया आज इतिहास के ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जहां पर उसे मीडिया कहना भी निरर्थक हो गया है क्योंकि यह सत्ताधारियों तथा चंद पूंजीपतियों के गठजोड़ से अब केवल प्रोपेगैंडा मशीन का एक बड़ा हिस्सा बन गया है; जिसमें किसी गैरी स्टीफन वेब के लिए कोई गुंजाइश बाकी नहीं रह गई है। ■

दोहरे मापदंडों पर आधारित न्यायिक प्रक्रिया

 दोहरे मापदंडों पर आधारित न्यायिक प्रक्रिया 

यूनान के विश्वविख्यात दार्शनिक सुकरात को ईसा पूर्व 399 में परंपरागत रूप से मान्य देवताओं में विश्वास न कर उनकी उपेक्षा करने, युवा वर्ग को भ्रमित करने तथा देशद्रोह के आरोप में 70 साल की आयु में जहर पिलाकर मार दिया गया था।

पाखंड तथा अंधविश्वास के विरोध और सत्य का प्रचार करने के लिए बहुसंख्यक समाज के दबाव में ईसा मसीह को सूली पर लटका दिया गया था।

सन् 1548 में इटली में जन्मे जर्दानो ब्रूनो को सरेआम रोम के चौराहे पर भारी भीड़ के सामने जिंदा जलाया गया था क्योंकि उसने चर्च द्वारा फैलाए गये झूठ के विरुद्ध आवाज उठाई थी जिसके लिए चर्च उसे ऐसी सजा देना चाहता था।

चर्च के झूठ व पाखंड को मानने से इंकार करने वाले वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली को माफ़ी मांगने पर मजबूर करने के बाद भी नज़रबंद कर दिया गया और फिर 8 जनवरी, 1642 को कैद में रहते हुए ही गैलीलियो की मृत्‍यु हो गई।


पूरी दुनिया में हाथ में तराजू उठाये और आंखों पर पट्टी बांध कर खड़ी एक स्त्री को न्याय का प्रतीक चिह्न इसलिए माना जाता है कि न्याय करते हुए उसकी बंद आंखें किसी को देख नहीं सकतीं, इसलिए उसके लिए सभी बराबर होते हैं। लेकिन भारत में पिछले कुछ समय से पक्षपात रहित न्याय की अवधारणा और आवश्यकता कमजोर हुई है। इससे ऐसा लगता है कि देश की न्यायिक व्यवस्था भी उन न्यायाधीशों में शामिल हो गई है जिन्होंने सच को स्वीकार करने की बजाय भीड़ के दबाव में आकर सुकरात, ईसा मसीह, जर्दानो ब्रूनो, गैलीलियो गैलीली आदि को दंडित किया।

ऐतिहासिक प्रमाणों तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा सटीक पुष्टि नहीं करने के बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट ने बहुसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक आस्था को ध्यान में रखकर रामजन्म भूमि पर आदेश जारी कर दिया।

मामले में अगस्त 2002 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रस्ताव दिया था कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा विवादित स्थल की खुदाई की जाए। हाइकोर्ट ने प्रस्ताव में यह भी कहा कि खुदाई से पहले एएसआइ ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जमीन के भीतर मौजूद वस्तुओं की जानकारी देने वाला उपकरण) या भू-रेडियोलॉजी प्रणाली का उपयोग करके विवादित स्थल का सर्वेक्षण करे।

एएसआइ ने जीपीआर सर्वेक्षण कर अपनी जो रिपोर्ट अदालत को सौंपी थी, उसमें गुप्त, उत्तर गुप्त, कुषाण और शुंग कालीन कुछ चीजें मिलने का उल्लेख तो था लेकिन उनसे किसी भी तरह यह सिद्ध नहीं होता कि विवादास्पद स्थान पर ही राम का जन्म हुआ था। 

लेकिन अभी-अभी पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि 29 फोन में से 5 में मैलवेयर तो मिला लेकिन वह जासूसी पेगासस के जरिए की गई इसके सबूत नहीं हैं। अब यहां पर न्यायालय अकाट्य साक्ष्यों की जरूरत बताता है जिन्हें अयोध्या मामले में आवश्यक नहीं समझा गया।

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फ़रवरी 2002 में गोधरा (गुजरात) में साबरमती एक्सप्रेस में लगाई गई आग में 59 कारसेवकों की मौत के बाद पूरे गुजरात में भड़के साम्प्रदायिक दंगों में 1,044 लोग मारे गए थे और अनेक लोग गुम हो गए थे।

उक्त मामले में सुप्रीम कोर्ट ने, यह कहते हुए कि इतना लंबा समय बीतने के बाद इन पर सुनवाई का कोई मतलब नहीं है, 9 में से 8 केसों को बंद कर दिया है।

इसके साथ ही कुछ सवाल उठते हैं कि क्या सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन 1984 के सिख विरोधी दंगों और 1987 से चल रही बोफोर्स तोप सौदे में हुई कथित घपलेबाजी की सुनवाई भी इसी वजह से बंद कर दी जायेगी कि वे गोधरा कांड से भी पहले क्रमशः 38 और 35 साल से चल रहे हैं? जबकि भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कारखाने में दिसम्बर 1984 में हुए बहुचर्चित गैस कांड की लंबित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई फिर से हो रही है। 

क्या ऐसे दोहरे मापदंडों पर आधारित न्यायिक प्रक्रिया सत्य की तुला पर खरी उतरती है जबकि आधुनिक काल में कहा जाता है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए बल्कि उसे होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए ताकि जनमानस का उस पर भरोसा बना रहे। ■


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