रविवार, 2 जनवरी 2022

अतिवाद और धर्मांधता से खुद को हानि होती है

अतिवाद और धर्मांधता से खुद को हानि होती है


प्रो. बलराज मधोक

महात्मा गांधी के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करने वाले कालीचरण उर्फ अभिजीत सराग के विरुद्ध रायपुर (छत्तीसगढ़) पुलिस द्वारा देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और न्यायालय ने उसे दो दिन के लिए पुलिस रिमांड पर भेज दिया है।

उधर पुणे पुलिस ने भी वहां एक कार्यक्रम में मुसलमानों और ईसाइयों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने और लोगों के बीच सांप्रदायिक दरार पैदा करने के इरादे से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में कालीचरण व पांच अन्य के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है। इससे कालीचरण को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अब देखना यह है कि उसकी मदद करने कौन-कौन सामने आते हैं।

इसी बीच छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रपिता के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग तथा उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे का वंदन करने वाले कालीचरण को भाजपा और आरएसएस के लोग साधु के रूप में महिमामंडित करते हुए देशभर में घुमा कर अपने सांप्रदायिक एजेंडे को प्रचारित करवा रहे हैं क्योंकि कालीचरण संघ-भाजपा की विध्वंसक सोच का प्रतिबिंब है।

इस तरह वर्चस्ववादी संघ के हिंदुत्व के झांसे में आकर खुद को संकट में डालने वालों को यह समझना होगा कि आखीरकार क्यों अति चतुर लोगों की यह मंडली अपने स्वयंसेवकों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखती है। इसका एक ही कारण है कि उन्हें अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करने के दौरान बात बिगड़ने पर साफ कह दिया जाता है कि उसका संघ से कोई सम्बंध नहीं है। 

सांप्रदायिक राजनीति की यही रणनीति होती है कि वह बड़े नेताओं और संगठन को बचाने के लिए मौका पड़ने पर अपने ही खास आदमी को पहचानने से इनकार कर देती है। काम हो जाने के बाद लोगों को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया जाता है। 


डॉ. प्रवीण तोगड़िया

जब पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में कई जगहों पर हुए आतंकी हमले के दौरान जिंदा पकड़ लिया गया था तो पाकिस्तान ने तमाम सबूतों के बावजूद भी उसे अपने देश का नागरिक मानने से इंकार कर दिया था।

कभी-कभी तो जिनके कंधे पर बंदूक रखकर लक्ष्य पर निशाना साधा जाता है, उनकी ही हत्या के प्रयास किये जाते हैं। ऐसा सिर्फ निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ ही नहीं बल्कि संगठन के बड़े लोगों के साथ भी किया जाता है। 

डॉ. प्रवीण तोगड़िया ने देश-विदेश में हिंदुत्व का परचम लहराया, पूरे भारत में लाखों त्रिशूल बंटवाये। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में कोई कमी नहीं रखी। फिर एक दिन अचानक गायब होने के 11घंटे बाद बेहोशी की हालत में मिले और कहा कि उनके एनकाउंटर की साजिश हो रही थी, आइबी के लोग उनकी हत्या करवाना चाहते हैं। यहां सहज ही यह सवाल पैदा होता है कि आखीर आइबी तोगड़िया की हत्या क्यों करना चाहती थी या फिर वे कौन लोग थे जिन्हें इस हत्या से लाभ मिलता?

राम कोठारी और शरद कोठारी

यही हाल आरएसएस और बजरंग दल के फायर ब्रांड नेता रह चुके वेलेंटाइन डे पर लड़के-लड़कियों को पिटवाने वाले श्रीराम सेना नामक हिंदूवादी संगठन के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रमोद मुथालिक का भी है। उन्होंने संघ के लोगों से अपनी जान को खतरा बताया था। 

दीनदयाल उपाध्याय की हत्या में भी शक की सुई संघ-भाजपा के बड़े नेताओं की ओर संकेत करती है।

मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं—
बलराज मधोक संघ की राजनीतिक शाखा जनसंघ के संस्थापक नेताओं में एक और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे थे। उन्नीस सौ साठ के दशक में उनके नाम की तूती बोलती थी। वे संघ के वरिष्ठ नेता थे। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेई व अपने ही अन्य सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाये। फिर वे पार्टी से इस तरह निकाल फेंके गये कि लोगों को याद भी नहीं रहा कि वे जीवित भी हैं या नहीं। 




पहली बार अयोध्या को हिंदुओं के हवाले करने और गौहत्या पर रोक लगाने की आवाज उठाने वाले और कभी शीर्ष दक्षिणपंथी नेताओं में शुमार रहे बलराज मधोक की गुमनामी में ही 2 मई, 2016 को मौत हो गई।

लालकृष्ण आडवाणी उग्र हिंदुत्व का एजेंडा लेकर आये। लोकसभा में दो सीटों वाली भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया। आज उनकी हालत इतनी दयनीय बना दी गई है कि तरस खाने लायक है। 

राम कोठारी आज जिंदा होता तो बीकानेर में अपना कारोबार कर रहा होता या फिर कोलकाता में पिता का व्यवसाय संभाल रहा होता लेकिन ऐसा हो नहीं सका क्योंकि राम मंदिर के लिए 1990 में हुई कारसेवा में शामिल होने को राम कोलकाता से अपने छोटे भाई शरद के साथ अयोध्या पहुंचा, जहां दोनों भाई चार दिन बाद हुई गोलीबारी में मारे गये। कोठारी बंधुओं को आज कितने लोग याद करते हैं? 

बाबरी मस्जिद टूटने के कई साल बाद तक वाजपेयी और आडवाणी जैसे भाजपाई बड़े नेता कारसेवकों के लिए 'उन्मादी भीड़' शब्द का इस्तेमाल करते रहे। 

उसी कारसेवा में शामिल और संघ के एक समर्पित स्वयंसेवक भँवर मेघवंशी का तो संघ से ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने संघ की कार्यप्रणाली को लेकर अत्यंत लोकप्रिय एक मोटी किताब 'मैं एक कारसेवक था' ही लिख डाली। जिसके देश की कई भाषाओं में अनुवाद छप चुके हैं।

2002 के गुजरात दंगों का पोस्टर बॉय अशोक भावनभाई परमार उर्फ अशोक मोची अब कहां है? उसकी खोज-खबर लेने वाले कोई हैं? 

कासगंज (उप्र.) में 26 जनवरी, 2018 को तिरंगा यात्रा को लेकर हुई हिंसा में चंदन गुप्ता नाम के युवक की हत्या कर दी गई थी। उसके बाद उसके परिवार को तरह-तरह की घोषणाओं से लाद दिया गया था। बहन को नौकरी देने के 5 महीने बाद निकाल दिया गया था। तब से वह घर बैठकर आंसू बहा रही है। वे सारी घोषणाएं आज तक हवा में हैं।

ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिन्हें देखते हुए लोगों को सोचना चाहिए कि तथाकथित धर्म के नाम पर वे जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका कोई लाभ तो उन्हें होने से रहा परंतु हानि अवश्य है। उनके कंधों पर सवार होकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ने वाले ही मतलब निकालने के बाद उन्हें गुमनामी के अंधेरों में धकेल देंगे और उनके हाथ बर्बादी ही आयेगी, यह निश्चित है। कम से कम ऊपर दिये गये चंद उदाहरणों से तो यही स्पष्ट होता है।

संघ ही नहीं बल्कि दुनियाभर में इसी तरह के अतिवादी संगठन लोगों को तरह-तरह से इस्तेमाल करने के बाद उनको दूध की मक्खी की तरह निकाल कर उपेक्षा, निराशा, पश्चाताप, अवसाद, गुमनामी के अंधेरे कोने में फेंक देते हैं और यहां तक कि उनकी हत्या भी कर देते हैं।

साराशंत: अतिवाद और धर्मांधता के रास्ते पर चलने वाले को लाभ की बजाय हानि ही उठानी पड़ती है। 

(आप चाहें तो इस लेख को निम्नलिखित लिंक पर जाकर भी पढ़ सकते हैं—
https://janchowk.com/zaruri-khabar/rss-is-playing-major-role-in-all-religious-activities1/

हमारे जन्मने और मरने की फलश्रुति क्या है?

 ■ काल-चिंतन ■

हमारे जन्मने और मरने की फलश्रुति क्या है?



आज दुनिया एक नये वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए सबके मंगल की कामनाएं व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि मैं स्वयं भी इस भीड़ में शामिल हूं लेकिन फिर थोड़ा दार्शनिक ढंग से सोच रहा हूं कि इसमें नया जैसा क्या है? अन्य दिनों की तरह आज भी एक सामान्य दिन ही तो है और इसमें नयापन कुछ भी तो दिखाई नहीं दे रहा है। यह बस नित्य-निरंतर परिवर्तनशील प्रकृति का परिणाम भर ही तो है।

यह परिवर्तन कैसे होता है? हमारा यह ब्रह्मांड एक लगभग अनंत सृष्टि का एक छोटा-सा हिस्सा है जिसकी उत्पत्ति किसी वृहदाकार श्याम-विवर (ब्लैक होल) में आंतरिक दबाव बढ़ जाने के कारण हुए महाविस्फोट (बिग बैंग) से छिटके द्रव्य तथा ऊर्जा से हुई है। इस घटना में द्रव्य के बड़ी तीव्रता से छिटकने की गति को 'समय' कहा जा सकता है। इस द्रव्य से निर्मित ब्रह्मांड तथा उसमें स्थित समस्त पिंड— ग्रह-उपग्रह, तारे और आकाशगंगाएं तभी से अपनी धुरी पर चक्राकार और बाहर की ओर निरंतर गतिमान हैं। इनके चक्राकार घूमने को घूर्णन कहा जाता है। 

उसी द्रव्य से निर्मित हमारी आकाशगंगा के एक छोटे-से कोने में स्थित नक्षत्र-समूह में मौजूद एक तारे के टूटने से निर्मित हमारी पृथ्वी अपने तारे—सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी धुरी पर चक्राकार घूम रही है। सूर्य के परिभ्रमण में इसे लगभग एक वर्ष या 365.14 दिन का समय लगता है और यह अपनी धुरी (अक्ष) पर एक चक्कर पूरा करने में 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09 सेकेंड का समय लेती है। इसका यह घूर्णन पश्चिम से पूरब की ओर होता है जिसे पृथ्वी की दैनिक गति कहते हैं। इसी से दिन और रात होते हैं। प्रकृति का यह कालक्रम सतत चलता रहता है। 

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चूंकि हमारा ब्रह्मांड चक्राकार घूम रहा है तो इसके घूर्णन की गति ही समय है और वैज्ञानिकों ने इसे मापने की ईकाई सेकेंड निर्धारित की है। इससे बड़े मापक मिनट, घंटे, दिन, हफ्ते, पखवाड़े, महीने और साल हैं। 

सूर्य के प्रकाश के एक अणु—फोटोन को पृथ्वी तक आने में 8 मिनट 19.005 सेकेंड का समय लगता है और एक फोटोन को जितनी दूरी तय करने में एक वर्ष का समय लगता है उसे एक प्रकाश वर्ष (Lightyear) कहा जाता है। यानी यह लगभग 950 खरब (9.5 ट्रिलियन) कि.मी. है। सूर्य हमसे 0.0000158125 प्रकाश वर्ष दूर है। 

हमारी आकाशगंगा में ही ऐसे असंख्य पिंड (ग्रह-उपग्रह) मौजूद हैं जिन तक हमारे तारे यानी सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता और यही स्थिति अन्य तारों की है जिनकी रोशनी हम तक नहीं आती। इसका अभिप्राय यह है कि इस ब्रह्मांड में पृथ्वी का अस्तित्व क्या है इसे समझने की जरूरत है!

अब दूसरे नजरिये से देखते हैं। वर्तमान समय में विश्व की कुल जनसंख्या सितंबर 2021 में 7.9 अरब हो गई थी। यानी इस कालखंड में लगभग आठ अरब लोग एकसाथ इस धरती पर रहते हैं। यदि यह हिसाब लगायें कि जब से पृथ्वी पर मनुष्य जाति का विकास हुआ है, तब से लेकर अब तक कुल मिलाकर कितने लोग यहां आये और कितने अभी और जन्म लेंगे, तो इस अपार जनसमूह में एक व्यक्ति की हैसियत क्या है, तो बुद्धि चकरा जाती है। 

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ब्रह्मांड का सभी दिशाओं में अभी भी विस्तार हो रहा है। एक समय इसे भी खत्म होना है। इसकी ऊर्जा का क्षय होते ही यह विखंडित हो जाएगा।


इस प्रकार नश्वर सृष्टि का यह क्रम चलता रहता है जिसका एक निश्चित डिजाइन और प्रक्रिया है। इसी के तहत हर पिछली घटना भावी घटनाओं की आधारशिला होती है। पृथ्वी पर जीव-जंतुओं, वनस्पतियों की उत्पत्ति, विकास और क्षय होता है तो विविध प्रकार की परिघटनाएं भी जन्म लेती हैं जिनका धरती के प्राणियों, जलवायु तथा पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी की आंतरिक तथा बाह्य परिस्थितियों और अन्य ग्रह-उपग्रहों के साथ इसके सम्बंधों के कारण जो कुछ भी यहां घटता है, वह ब्रह्मांड की नियामक प्रक्रिया का हिस्सा है। समय के अदृश्य पर्दे की ओट से प्रति-पल पूर्व निर्धारित अदृष्ट प्रकट होता रहता है।

हमें लगता है कि यह अभी-अभी हमारे सामने घट रहा है लेकिन वस्तुत: ऐसा होता नहीं। वह तो किसी मूवी की तरह पहले ही तैयार हो गया था, बस सामने आने की देर थी।


ऐसे परिवर्तनशील तथा नश्वर संसार में सामान्यतः मनुष्य अज्ञान व अहंकारवश स्वयं को कर्ता समझता है क्योंकि जीवन में जब तक कोई चीज हमारे नियंत्रण में है तो ऐसा महसूस होता है कि मैं ही उसे कर रहा हूं। धरती पर फैली विसंगतियों तथा अशांति के पीछे भी मूल कारण यही है। जबकि वास्तविकता यह है कि सब कुछ प्रकृति के नियमों के तहत संचालित हो रहा है। यह गुत्थी बेहद उलझी हुई है।

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अपनी सुविधानुसार काल-गणना और समय-विभाजन के लिए दुनिया की तमाम विकसित सभ्यताओं ने अपने-अपने कैलेंडर बनाये हैं। इसी के अनुरूप ग्रेगोरियन केलैंडर का साल 2021 कल अर्द्धरात्रि को समाप्त हो गया और नया वर्ष 2022 का प्रवेश हो गया है। इस समयांतराल में हमने क्या खोया और क्या पाया, इसका हिसाब लगाये बिना यह देखना होगा कि यदि सबकुछ प्रकृति के सुनिश्चित डिजाइन के अनुसार ही हो रहा है तो फिर हमारा कर्तव्य-कर्म क्या है और क्या है हमारे जन्मने और मरने की फलश्रुति? इसे वैज्ञानिक संसाधनों और सिद्धांतों की अपेक्षा आध्यात्मिक योग-साधना से सरलतापूर्वक अनुभव किया जा सकता है।

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