शुक्रवार, 13 मई 2022

राजद्रोह की धारा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सरकार बेचैन क्यों?

राजद्रोह की धारा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सरकार बेचैन क्यों?


सुप्रीम कोर्ट ने आइपीसी की धारा 124ए के तहत राजद्रोह (Sedition Law) सम्बंधी सभी मौजूदा मामलों में आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सरकार जब तक इस कानून की समीक्षा पूरी न कर ले, तब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस कानून के तहत नए मामले दर्ज न करें। ऐसा आदेश देते हुए कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि उसे देश की सुरक्षा और लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखना है।
अभी चीफ जस्टिस एनवी. रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली इन तीन जजों की बेंच राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा सहित पांच पक्षों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
इस मामले में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में पेश शपथ-पत्र में कहा था कि उसने राजद्रोह कानून की धारा 124A पर पुनर्विचार और उसकी पुन: जांच कराने का निर्णय लिया है। लिहाजा, इसकी वैधता की समीक्षा पूरी होने तक इस मामले पर सुनवाई न करे लेकिन अदालत ने केंद्र सरकार की इस बात को नहीं माना है और कानून पर रोक लगा दी है।
हालांकि विशेषज्ञों ने इसे सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला बताया है लेकिन केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू का बयान आया है कि 'न्यायालय को लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए। कोर्ट को सरकार और विधायिका का सम्मान करना चाहिए।'
इससे पहले केंद्र सरकार ने अभी 7 मई को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पांच जजों की पीठ ने इसे जरूरी माना था। इसके चार दिन बाद बुधवार को अचानक केंद्र ने इस मामले पर यू-टर्न लिया और शीर्ष अदालत में कहा कि वह इस कानून को समाप्त करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून में आवश्यक संशोधन करना समयोचित समझती है।
देश में औपनिवेशिक काल से प्रचलित राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के संदर्भ में चिंता ज़ाहिर करते हुए मुख्य न्यायाधीश एनवी. रमना ने कहा है कि 'राजद्रोह कानून का इस्तेमाल बिल्कुल उसी तरह से है, जैसे हम किसी बढ़ई को लकड़ी का एक टुकड़ा काटने के लिए आरी देते हैं लेकिन वह उसका इस्तेमाल पूरे जंगल को ही काटने में कर डालता है।'
इस मामले में याचियों की तरफ से बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि इस कानून के तहत लगभग तेरह हजार लोग जेलों में बंद हैं।
धारा 124A क्या है—
धारा 124A कहती है कि जो कोई भी व्यक्ति लिखित या फिर मौखिक शब्दों या चिह्नों या प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से नफरत फैलाने या फिर विधि संगत बनी सरकार के खिलाफ असंतोष को बढ़ावा देता है या इसकी कोशिश करता है, उसे 3 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
यह कानून अंग्रेजों ने उनकी शोषणकारी नीतियों और मनमानी के विरोधियों का दमन करने के लिए बनाया था। जिसका इस्तेमाल महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक सरीखे स्वतंत्रता सेनानियों को भी जबरन गिरफ्तार करने के लिए किया गया था।
इस औपनिवेशिक कठोर कानून के प्रमुख विरोधी रहे केएम. मुंशी ने साफ़-साफ़ कहा था कि ऐसे कानून भारत के लोकतंत्र के ऊपर बहुत बड़ा ख़तरा हैं। उनका कहना था कि किसी भी लोकतंत्र की सफ़लता का राज ही उसकी सरकार की आलोचना में है। केएम. मुंशी और सिख नेता भूपिंदर सिंह मान के संयुक्त प्रयास के फलस्वरूप ही संविधान से राजद्रोह शब्द को हमेशा के लिए हटाने की स्थिति बनी थी।
इस कानून का प्रयोग अक्सर सरकार-विरोधी लोगों को चुप कराने के लिए किया जाता रहा है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार नागरिक संशोधन कानून (CAA) के विरोध-प्रदर्शन में शामिल 25, हाथरस गैंग रैप के बाद विरोध-प्रदर्शन करने वाले 22 और पुलवामा हमले के बाद 27 अलग-अलग लोगों के ऊपर राजद्रोह कानून के तहत मुकदमे दर्ज किये गए हैं। पिछले कुछ सालों में राजद्रोह के जो 405 मामले दर्ज हुए हैं उनमें सबसे ज़्यादा 96% मुकदमे 2014 के बाद के हैं।
यहां पर जस्टिस डीवाइ. चन्द्रचूड द्वारा इस मुद्दे पर कहे गए शब्द प्रासंगिक हैं कि 'हर सत्ता विरोधी काम राजद्रोह नहीं होता, इसलिए वक्त आ गया है कि अब हमें यह तय कर लेना चाहिए कि क्या राजद्रोह है और क्या नहीं।'
उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला के खिलाफ़ दर्ज एक मामले में कहा था, “ऐसे किसी भी विचार की अभिव्यक्ति, जो कि सरकार के विचारों से असहमत और अलग हो, उसे राजद्रोह नहीं कहा जा सकता है।"
यदि सरकार की नीतियों, योजनाओं तथा अन्य कार्यों की आलोचना या विरोध व्यक्त करना राजद्रोह माना जाता तो वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत इन तमाम सत्ताधारियों में से अधिकांश लोग इस कानून के तहत मुकदमे झेल रहे होते। जो पहले आये दिन किसी न किसी बहाने धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, बंद आदि करते रहे थे।
पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह का केस—
कोविड-19 संक्रमण रोकने और उसके रोगियों के इलाज की समुचित व्यवस्था करने में सरकार की लापरवाही की आलोचना करने के लिए एनडीटीवी के पत्रकार विनोद दुआ, किसान आंदोलन में ग्रेटा थनबर्ग टूलकिट प्रकरण में गिरफ्तार दिशा रवि, इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, नेशनल हैराल्ड की वरिष्ठ सलाहकार संपादक मृणाल पांडे, क़ौमी आवाज़ के संपादक ज़फ़र आग़ा, द कारवां पत्रिका के संपादक और संस्थापक परेश नाथ, द कारवां के संपादक अनंत नाथ और इसके कार्यकारी संपादक विनोद के. जोस के ख़िलाफ़ राजद्रोह क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया।
इनमें से अधिकांश के विरुद्ध आरोप लगाया गया था कि 'इन लोगों ने जानबूझकर गुमराह करने वाले और उकसाने वाली ग़लत ख़बरें प्रसारित कीं और अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया। सुनियोजित साज़िश के तहत ग़लत जानकारी प्रसारित की गई।'
जबकि इस तर्क के आधार पर तो देश के सारे गोदी मीडिया को जेल में बंद कर दिया जाना चाहिए जो दिन-रात देश को गुमराह करने के लिए झूठ और साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली सामग्री परोस कर देश को कमजोर कर रहा है।
सरकार की आलोचना करने के लिए पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह का मामला दर्ज करने से संविधान प्रदत्त विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी का अतिक्रमण होता है। इस तरह सरकार अपने आलोचकों और विरोधियों को मुंह बंद रखने के लिए इस कानून की आड़ ले रही है।
इस मामले में ज्य़ादा चिंताजनक यह है कि इस कानून के अंतर्गत एक बार गिरफ्तार हुए व्यक्ति के लिए जल्दी बेल हासिल कर पाना मुश्किल होता है, क्योंकि ऐसे मामलों की सुनवाई की प्रक्रिया काफ़ी लंबे वक्त तक चलती है। जिससे बेगुनाह लोग परेशान होते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभी केवल स्थगित किया है, इसलिए इसकी वैधता समाप्त नहीं हुई है और यह कानून पूर्ववत बना हुआ है। फिर भी इस पर सरकार बेचैन है और देश के सर्वोच्च न्यायालय को 'लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए तथा कोर्ट को सरकार और विधायिका का सम्मान करना चाहिए' जैसी असंवैधानिक 'हिदायत' दी गई है। इससे पहले भी भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने सबरीमाला प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए 27 अक्टूबर, 2018 को कहा था कि अदालतों को ऐसे फैसले देने से बचना चाहिए जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता है। भाजपा की ऐसी धारणा उसके तानाशाही रवैये और न्यायालय के प्रति असम्मान की भावना को ही प्रकट करती है।
शायद इसीलिए 2014 में केंद्रीय सत्ता पर भाजपा के आरूढ़ होने के बाद राजद्रोह कानून के अंतर्गत दर्ज हुए मुकदमों में जैसे बाढ़ ही आ गई है। और, इसीलिए वह चाहती है कि यह काला कानून हर हाल में बचा रहे ताकि उसके द्वारा अपने आलोचकों और विरोधियों का उत्पीड़न किया जा सके।
वे अपना अलोकतांत्रिक चेहरा छिपाने के लिए प्रतिप्रश्न उठा रहे हैं कि इस कानून को जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने क्यों नहीं हटाया? इस पर उनसे पूछा जा सकता है कि इन नेताओं ने तो अनुच्छेद 370 को भी नहीं हटाया था तो भाजपाई सरकार ने उसे क्यों हटा दिया? हालांकि इस कानून की धारा 124A का गैरजरूरी इस्तेमाल सिर्फ इंदिरा के शासनकाल में ही हुआ था।
अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह सम्बंधी कानून की इस धारा को लेकर संशोधनवादी रुख अपनाया है, तो आशा की जानी चाहिए कि वह जुलाइ में होने वाली सुनवाई के बाद भी कायम रहेगा; क्योंकि सत्ताधारियों द्वारा अपनी गलत नीतियों और फैसलों की पर्देदारी के लिए इस कानून का दुरुपयोग बहुत तेजी से किया जाने लगा है। वे ऐसा करके पत्रकारों, लेखकों, विपक्षी नेताओं और लोकतंत्र के पक्षधर सामान्य नागरिकों को आतंकित कर रहे हैं।
लोकतंत्र विरोधी यह प्रवृत्ति ऐसे में और भी अधिक खतरनाक होने की सम्भावना बढ़ जाती है जब सरकार पेगासस जैसे अति गोपनीय जासूसी हथियार से लैस है। जिसका इस्तेमाल देश के न्यायाधीशों, पत्रकारों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए किया गया है। इन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर डराने से देश में तानाशाही और तज्जनित अराजक तत्वों को बढ़ावा मिल रहा है।
देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए इस कानून को ख़त्म कर लोगों को सही तरीके से विचारों की अभिव्यक्ति और जनांदोलनों की आज़ादी मिलेगी। विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता ही एक स्वस्थ लोकतंत्र का पहला गुण है। इसके बिना लोकतंत्र की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। ■

मंगलवार, 10 मई 2022

श्रीलंका में गृह युद्ध का खतरा; भारत के लिए सबक

 श्रीलंका में गृह युद्ध का खतरा; भारत के लिए सबक

➤12 से ज्यादा मंत्रियों के घर फूंके, 
➤प्रधानमंत्री आवास में गोलीबारी,
➤एक सांसद की मौत,
➤एक पूर्व मंत्री को कार सहित झील में फेंका गया
➤पूरे देश में कर्फ्यू लगाया गया

महिंदा राजपक्षे

तमिलों के विरुद्ध जातीय भेदभाव तथा कोविड महामारी, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) की ऋण सम्बंधी शर्तों और सत्तालोलुप शासकों की गुमराह नीतियों से तबाह हो चुके श्रीलंका में कल सोमवार को प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे द्वारा विपक्ष के दबाव में इस्तीफा देने के बाद नाराज हुए उनके समर्थकों ने राजधानी कोलंबो में हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है। जिसके बाद उनके विरोधी भी उग्र हो गए। जब राजपक्षे के समर्थकों ने कोलंबो छोड़कर जाने की कोशिशें कीं तो उनकी गाड़ियों को जगह-जगह निशाना बनाया गया। हिंसक प्रदर्शनों के बीच सोमवार को पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया है।

धू-धू कर जलता महिंदा राजपक्षे का घर

दूसरी तरफ प्रदर्शनकारी विरोधी गुटों ने महिंदा राजपक्षे के हंबनटोटा स्थित पुश्तैनी घर को आग के हवाले कर दिया। उधर हजारों प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 'टेम्पल ट्री' का मेन गेट तोड़ दिया और यहां खड़े ट्रक में आग लगा थी। इसके बाद आवास के अंदर गोलीबारी भी की गई। अब तक 12 से ज्यादा मंत्रियों के घर जलाए जा चुके हैं। 

पूर्व मंत्री जॉनसन फर्नांडो को कार सहित झील में फेंक दिया गया

वहीं, राजधानी कोलंबो में पूर्व मंत्री जॉनसन फर्नांडो को कार सहित झील में फेंक दिया गया। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि कभी भी खुलकर गृहयुद्ध भड़क सकता है। 

श्रीलंकाई सांसद अमरकीर्ति अथुकोरला की मौत की खबर भी आई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमरकीर्ति ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग कर दी थी और बाद में भीड़ से बचने के लिए वे एक बिल्डिंग में छिप गए। यहीं से उनका शव बरामद हुआ है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि उनकी मौत किस वजह से हुई है।

पृष्ठभूमि―
जब अंग्रेजों ने भारतीय महाद्वीप पर क़ब्ज़ा किया तो उन्होंने इस पूरे इलाक़े को एक संयुक्त प्रशासनिक इकाई बना दिया जिसमें शामिल चारों तरफ से समुद्र से घिरे एक बड़े भूभाग यानी द्वीप को सीलोन नाम दिया। अंग्रेज आए तो उनके साथ ही ईसाई मिशनरियों का भारी संख्या में आना शुरू हुआ। सीलोन का उत्तरी तटवर्ती इलाका जाफ़ना भारत के नज़दीक था। अत: मिशनरी सबसे पहले यहीं पहुंचे। उन्होंने ईसाई मत का प्रचार-प्रसार के साथ ही इस क्षेत्र में अनेक कॉन्वेंट स्कूल और कॉलेजों की स्थापना की। जिसका लाभ यहां रहने वाले तमिलों को मिला। वे शिक्षित ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ी भाषा में भी निपुण हो गए। उच्च शिक्षा हासिल करने तथा अंग्रेज़ी भाषा के कारण अंग्रेजी प्रशासन की सिविल सेवाओं तथा अन्य नौकरियों में तमिलों को प्राथमिकता मिली। 

किसी भी संस्कृति की मुख्य इकाई भाषा है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विस्तार में इसकी प्रमुख भूमिका रही है। इस उपमहाद्वीप के बहुत से आपसी झगड़े भाषा-विवाद की देन हैं। 

आज़ श्रीलंका में तमिलों की आबादी लगभग 15% और सिंहलों की आबादी लगभग 70-75% के आसपास है। तब भी क़रीब-क़रीब यही अनुपात था। खेती के लिए उपयुक्त दक्षिणी क्षेत्र में सिंहल रहते थे। शुरुआत में जनसंख्या में अधिक होने के बावजूद भी सरकारी नौकरियों में तमिलों के बढ़ते प्रभुत्व से सिंहलों को कुछ ख़ास फ़र्क पड़ता नहीं दिखाई दिया लेकिन हालात तब बदले जब फ़रवरी 1948 में श्रीलंका ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त हो गया। आज़ादी के साथ ही देश में आई लोकतांत्रिक व्यवस्था। अब बहुसंख्यक सिंहलों के विचारों में बदलाव आ गया। सरकार ने सिंहलों को लाभ पहुंचाने वाली नीतिया बनाईं। इस दिशा में सबसे पहले वर्ष 1956 में सिंहल भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा दिया गया। जो इससे पहले अंग्रेज़ी को मिला हुआ था और जिसका फ़ायदा तमिलों को होता था।

सिंहल तुष्टिकरण और अंधराष्ट्रवाद से उपजा असंतोष―
श्रीलंका की राजनीति में अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन का अंत होने के साथ ही जातीय राष्ट्रवाद और अर्थशास्त्र में सिंहल कल्याणवाद का मिश्रण शुरू हो गया। तब से ही बहुसंख्यक सिंहलों का कहना था कि तमिल लोग श्रीलंकाई न होकर भारतीय हैं और उन्हें यह देश छोड़कर भारत चला जाना चाहिये। जातीय-राष्ट्रवाद को सिंहली पहचान दिलाने के लिए उकसाया गया। इसके फलस्वरूप वहां सिंहलों और तमिलों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष की शुरुआत वर्ष 1956 में तब हुई जब श्रीलंका के राष्ट्रपति ने सिंहली को आधिकारिक भाषा बनाया और तमिलों के खिलाफ बड़े पैमाने पर भेदभाव किया जाने लगा। यह भेदभाव निरंतर जारी रहा। बौद्ध समुदाय को राज्य में प्राथमिक स्थान दिया गया और राज्य द्वारा नियोजित उच्च शिक्षण संस्थानों में की जाने वाली भर्ती में तमिलों की संख्या को सीमित कर दिया गया। फलस्वरूप तमिल सरकारी नौकरी से बेदख़ल हो गए। हालांकि बाद में सरकारी स्तर पर इस भेदभाव को कम कर दिया गया, लेकिन इसने जातीय अंधराष्ट्रवाद को सशक्त बनाया और बड़ी संख्या में तमिल भाषी आबादी को असुरक्षित छोड़ दिया गया। 

वेलुपिल्लई प्रभाकरन

तमिलों के प्रति भाषा तथा जातीय घृणा आधारित भेदभाव की उत्पत्ति आंशिक रूप से बौद्ध धर्मगुरुओं के तुष्टिकरण के कारण हुई, जो विशेष रूप से सिंहली हैं। सिंहलियों द्वारा जारी बहुमुखी उत्पीड़न के जवाब में तमिलों ने अहिंसक विरोध के माध्यम से आंदोलन को जारी रखा, हालांकि 1970 के दशक में तमिल अलगाववाद और उग्रवाद के प्रति रुझान बढ़ा जिसने वर्ष 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरन के नेतृत्व में लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम (LTTE) जैसे आतंकवादी संगठन को जन्म दिया। आगे चलकर 23 जुलाइ, 1983 से देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया। भारत ने श्रीलंका के इस गृह युद्ध को ख़त्म करने में सक्रिय भूमिका निभाई और श्रीलंका के संघर्ष को एक राजनीतिक समाधान प्रदान करने के लिए 29 जुलाइ, 1987 को भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर किये गये। लंबे संघर्ष और लाखों लोगों के मारे जाने के बाद वर्ष  2009 में लिट्टे (LTTE) के साथ गृह युद्ध समाप्त हुआ। 

भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर 29 जुलाइ, 1987

भारी नुकसान झेलने के बाद गृह युद्ध समाप्त हो तो गया लेकिन श्रीलंका के प्रशासन से लेकर विभिन्न व्यवसायों में पहले रही तमिलों की विशेषज्ञता वाली महत्वपूर्ण भूमिका के विपरीत अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति के कारण देश की अर्थ-व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने में ढाई दशक लग गए। एक मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए तकनीकी विशेषज्ञता के नुकसान का प्रभाव धीमा और प्राय: अदृश्य होता है, लेकिन इसका प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, जिसे हम भारत में भी होता हुआ देख सकते हैं। 

सामाजिक संघर्ष से अर्थ-व्यवस्था हुई खोखली―
गृहयुद्ध या वैसी ही स्थिति अथवा राजनीतिक नेतृत्व की अक्षमता व अनिश्चितता के वातावरण में विदेशी निवेश रुकने की संभावना बढ़ जाती है। निजी निवेशक भी अराजकता के समय में अपना पैसा लगाने के प्रति अनिच्छुक होते हैं। 

ऐसे ही तमाम कारकों के चलते श्रीलंका में विदेशी पूंजी निवेश घटता गया। जिस पर रूस-यूक्रेन युद्ध और कोविड ने निर्णायक मुहर लगा दी क्योंकि इससे मुख्यत: रूस और यूक्रेन पर आधारित पर्यटन व्यवसाय तथा उस पर आधारित उद्योग-धंधे ठप हो गए। जबकि श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन की 10% हिस्सेदारी है। यही नहीं रूस श्रीलंकाई चाय का दूसरा सबसे बड़ा बाजार भी है। 

इस प्रकार रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण भी श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बड़ी डांवाडोल हो गई। इससे विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आई जो 2019 में 7.5 बिलियन डॉलर से जुलाइ 2021 में घटकर सिर्फ 2.8 बिलियन डॉलर ही रह गया। 

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सामाजिक संघर्ष किसी भी देश की उत्पादकता और विकास में बाधा डालते हैं और इससे अंततोगत्वा आर्थिक-शैक्षिक गतिविधियां तथा विकास प्रभावित होता है। श्रीलंका का वर्तमान संकट सतह पर तो आर्थिक दिखाई देता है, लेकिन इसके मूल में लंबे समय तक चलाया गया जातीय घृणा व विद्वेष का सामाजिक संघर्ष है जो बहुसंख्यक पहचान की शॉर्टकट राजनीति द्वारा बढ़ाए गए हैं। 

जब जातीय तथा साम्प्रदायिक कल्याणवाद को भारी कराधान तथा ऋण लेकर वित्त-पोषित किया जाता है, तो आने वाली पीढ़ियों को इस विभाजन का बहुत पीड़ादायक भुगतान करना पड़ता है।

अगस्त 2020 में जब दो तिहाई पूर्ण बहुमत के साथ महिंदा राजपक्षे ने सत्ता संभाली तो उनसे पूछा गया था कि वे हुकूमत का कैसा मॉडल अपनायेंगे तो उनका उत्तर था कि वे चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी और भारत की भाजपा जैसी नीतियां लागू करेंगे। आज दो साल पूरे होने से पहले ही आजादी के बाद सबसे जर्जर आर्थिक स्थिति में फंसे श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे सत्ताच्युत होकर गंभीर संकटों का सामना कर रहे हैं।    

भारत के संदर्भ में श्रीलंका की दशा एक चेतावनी के रूप में देखी जानी चाहिए, खास तौर पर हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करने वाले दक्षिणपंथी समूहों द्वारा। सीरिया, इराक, अफगानिस्तान के बाद अब श्रीलंका की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से सीखने की जरूरत हैं जिन्हें बहुसंख्यकों के वर्चस्ववाद, अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा, द्वेष और हिंसा ने कहां से कहां ले जाकर पटक दिया है। ■


मंगलवार, 3 मई 2022

सावधान! कहीं आपके बच्चे को जॉम्बी तो नहीं बनाया जा रहा है!

सावधान! कहीं आपके बच्चे को जॉम्बी तो नहीं बनाया जा रहा है!



इन बच्चों को ग़ौर से देखिए और शांत चित्त से सोचिये कि ये किन घरों के बच्चे हैं, क्या है इनकी उम्र? कोई इनको जोशीले नारे लगाने के लिए 300-500/₹ देकर ऐसे जुलूसों में लाता है और फिर हाथों में हथियार थमाकर ऐसी उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनाकर भेज देता है, जिसका नेतृत्व सिखा-पढ़ाकर तैयार किये गये विवेकहीन लोग कर रहे होते हैं। जो अपनी 'सौंपी गई जिम्मेदारी' पूरी कर ठीक समय पर मौक़े से खिसक लेते हैं और मारपीट, तोड़फोड़, आगजनी, दंगा-फसाद, हत्या के संगीन मामले दर्ज होते हैं ऐसे कम उम्र मासूमों पर।

इनके घर वालों को तो शायद अंदाजा भी नहीं होगा कि उनके नौनिहाल इतनी कच्ची उम्र में पढ़ना-लिखना छोड़कर शातिर फ़ासिस्टों के हाथ लग चुके हैं।




जबकि वे खुद के अपने बच्चों को समाज में ऊंचा मुकाम हासिल करने के लिए उच्च स्तरीय शिक्षा दिलवा रहे हैं। इसके लिए उन्हें विदेशों के प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों में दाखिला दिलाया गया है। जहां से वे जब पढ़-लिखकर बाहर निकालेंगे तो उनके पास एक अत्यंत महत्वपूर्ण डिग्री और महत्वाकांक्षा होगी, जिसके बल पर वे सरकारी या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद प्राप्त कर लेंगे या विधायक-सांसद बनेंगे या फिर अरबों-खरबों रुपए वाला अपना कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान चलायेंगे। दूसरी तरफ ये बच्चे कहां होंगे?
हम प्रायः पढ़ते-सुनते रहते हैं कि कश्मीरी तथा तालिबानी नेताओं के बच्चे विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने भेज दिये जाते हैं लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि हमारे देश के हिंदू अतिवादी रासस-भाजपाई नेताओं के बच्चे क्या करते हैं?
● कभी सुना कि आडवाणी के घर का कोई बच्चा किसी मस्जिद पर भगवा झंडा लहराता पकड़ा गया?
● आदित्यनाथ के भतीजे-भांजे को इसी तरह हाथ में त्रिशूल-तलवार लहराते जयश्री राम का शोर मचाते किसी ने देखा?
● केशव प्रसाद मौर्य के बेटे को ऐसी उपद्रवी भीड़ में कहीं देखा?
● स्मृति ईरानी, वरुण गांधी, रवि शंकर प्रसाद आदि के बच्चे शाखा जाते हैं क्या?
● सुशील कुमार मोदी के बच्चे ऐसे जुलूसों में क्यों नजर नहीं आते?
● मनोहर लाल खट्टर, वसुंधरा राजे, राम माधव, मोहन भागवत के परिवार से भी कभी कोई बच्चा किसी उग्र प्रदर्शन में नजर आया?
● नरेंद्र मोदी के घर के कितने लोग सड़क पर हिंदूवादी भीड़ में निकलते हैं?
● रमन सिंह के बच्चे बिना किसी हिन्दू आंदोलन से जुड़े सांसद बन जाते हैं।
● विनय कटियार का बेटा क्या किसी उन्मादी भीड़ में था?
● कल्याण सिंह की बहू, बेटी, नाती सब सांसद-विधायक बन गये जो कभी सड़कों पर उतरे ही नहीं।
● क्या कभी राजनाथ सिंह के बेटे ने इसी तरह हाथ में त्रिशूल-तलवार लहराते हुए जुलूस में भाग लिया?
● मुरली मनोहर जोशी की दोनों बेटियां क्या करती हैं?
● अमित शाह के बेटे को आप सब जानते ही हैं।
ऐसे लोगों की बहुत बड़ी लिस्ट है, जिनको आप खुद भी जानते हैं।

सोचिये कि, राजस्थान के न्यायालय भवन पर भगवा झंडा फहराने से लेकर बाबरी मस्जिद के गुम्बद तक चढ़े और मर रहे, गिरफ्तार हो रहे, लाठी और गोली खा रहे नौजवानों में इनके परिवार से कौन था? और आप अपने बच्चों को इनके और इनकी विचारधारा के हाथों इस्तेमाल होने दे रहे हैं।




थोड़ा दिमाग लगाइए, ये सिर्फ यूज़ एंड थ्रो की राजनीति है मितरों, अपने बच्चों को ऐसी भीड़ का हिस्सा बनने से रोकिए! उन्हें इस ज़हर से बचाइये!! रासस-भाजपा कार्यकर्ता बन चुके टीवी को घर से निकाल फैंकिये। उसका रीचार्ज बंद कर अपने घर में उग्रवादी पैदा होने से रोकिये। इनके रीचार्ज और बिजली पर आप अपनी जेब खाली करके उन धनपशुओं की तिजौरियां भर रहे हैं जो सत्ताधारियों को मोटी रकम भेंट चढ़ाकर आपको और देश को लूट रहे हैं।
ध्यान दीजिये अपने बच्चों का, कहीं वे किसी उग्रवादी बर्बर गिरोह के हाथों की कठपुतली तो नहीं बन रहे हैं ! यदि आप सजग नहीं रहे तो ये कल को आपके बच्चे को मानव बम बनाकर अपना मक़सद पूरा कर रहे होंगे। ■

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव

मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...