बुधवार, 14 जुलाई 2021

साल 2100 आते-आते भारत बूढ़ों का देश बन जायेगा!

साल 2100 आते-आते भारत बूढ़ों का देश बन जायेगा!


सरकार जनसंख्या नीति के तहत दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को मिलने वाली सारी सुविधाएं खत्म करने का कानून लाने जा रही है। इसको लेकर राजनीतिक हलकों में ही नहीं, बल्कि जनसामान्य में भी तरह-तरह की चर्चा जोरों पर है लेकिन तथ्य क्या कहते हैं, इस पर गौर करना जरूरी है। 

सन् 1800 में पूरी दुनिया की आबादी एक अरब के आसपास थी, जो 2019 आते-आते बढ़कर 7.67 अरब हो गई। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट में पिछले साल छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की करीब 7.8 अरब मौजूदा आबादी साल 2100 में बढ़कर करीब 8.8 अरब हो जाएगी लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उसमें साल 2100 तक दुनिया की आबादी करीब 10.9 अरब होने का अनुमान लगाया गया था।

चीन द्वारा 11 मई, 2021 को जारी जनगणना के सरकारी आंकड़ों के अनुसार उसकी आबादी 1.41 अरब के पार पहुंच गई है। इससे यह भी पता चलता है कि बीते दशकों में चीन की आबादी सबसे धीमी गति से बढ़ी है। चीनी सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों में उसकी औसत वार्षिक वृद्धि दर 0.53% थी जो साल 2000 से 2010 के बीच 0.57% की दर से नीचे रही। चीन में जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर चिंताजनक स्तर पर पहुंच जाने एक बड़ा कारण उसकी विवादास्पद 'वन चाइल्ड पॉलिसी' है।वहां बूढ़ों की जनसंख्या बढ़ने और नौजवानों की आबादी में कमी के कारण 2016 में इस नीति को समाप्त कर दिया गया। 

जनसंख्या वृद्धि दर सम्बंधी आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट 'वर्ल्डोमीटर' के अनुसार भारत की जनसंख्या 2021 में लगभग 1.39 अरब हो चुकी है। यह संख्या चीन से सिर्फ दो करोड़ ही कम है। 

इंस्टिट्यूट फॉर हेल्थ मेटरिक्स एंड इवाल्यूशन (Institute for Health Metrics and Evaluation―IHME) के क्रिस्टोफर मुरी के अनुसार वर्ष 2035 तक दुनिया में प्रजनन दर 2.1 प्रतिशत से काफी कम होने के कारण जापान, थाइलैंड, इटली, स्पेन जैसे देशों की जनसंख्या आधी रह जाएगी। इससे इन देशों की अर्थव्यवस्था को संकट का सामना करना पड़ेगा। 

विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी देश की प्रजनन दर 2.1 प्रतिशत हो तभी वहां जनसंख्या स्थिर रह सकती है। भारत की 2020 तक औसत प्रजनन दर 2.2 प्रतिशत रही है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की एग्ज़िक्यूटिव डायेरक्टर पूनम मुतरेज़ा के अनुसार भारत के अधिकांश हिस्सों में प्रजनन दर में तेज़ी से गिरावट आ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा के अलावा अन्य राज्यों में प्रजनन दर नकारात्मक है। इनकी प्रजनन दर में अनुमान से कहीं ज़्यादा तेज़ी से गिरावट आ रही है।

इसका मतलब साफ है कि जनसंख्या को नियंत्रित करने के सरकारी प्रयासों के बिना ही इसकी वृद्धि में स्वत: कमी आती जा रही है। यदि इसके बावजूद भी सरकार जनसंख्या वृद्धि दर कम करने की जिद पर ही अड़ी रहती है तो अगले 20-25 सालों में ही भारत में युवाओं की संख्या कम और बूढ़ों की अधिक होगी, जैसा कि चीन में देखा गया। 

यदि देश की प्रजनन दर 2.1 प्रतिशत के आसपास रहती है तो साल 2100 आते-आते भारत की जनसंख्या 109 करोड़ के करीब होगी। जिसमें युवाओं की वर्तमान संख्या 74 करो़ड़ से घटकर लगभग 57 करोड़ ही रह जाएगी, यानी मौजूदा से करीब 25% कम।

लैंसेट की रिपोर्ट बताती है कि 2035 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, दूसरे नंबर पर अमेरिका और तीसरे नंबर पर भारत होगा लेकिन यदि विकास दर और रोज़गार की उपलब्धता वर्तमान की तरह ही बनी रहती है तो हम तीसरे नंबर पर कतई नहीं पहुँच पाएंगे। यदि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि नहीं होती है तो देश को भयंकर गरीबी का सामना करना पड़ेगा।



सरकार की जनसंख्या नीति को लेकर विपक्ष तथा अन्य लोगों का कहना है कि इसके पीछे सत्ताधारी वर्ग की साम्प्रदाकिता सोच है। तो यदि आंकड़ों के आइने में देखा जाये तो 2001 से 2011 के बीच हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 19. 92 प्रतिशत से घटकर 16.96 पर आ गई। यानी यह 3.16 प्रतिशत कम हुई, जबकि मुसलमानों में यह वृद्धि दर 29.5 से घटकर 24.6 प्रतिशत करीब 5 प्रतिशत कम रही अर्थात मुस्लिम समुदाय की वृद्धि दर बहुत तेजी से कम हुई।

आंकड़े बताते हैं कि दो से ज़्यादा बच्चों वाले जोड़ों में 83% हिंदू और 13% मुसलमान हैं, अन्य समुदायों के लोग केवल 4% हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि जैसे-जैसे देश में शिक्षा का प्रसार हुआ है, वैसे-वैसे देश की जनसंख्या-वृद्धि दर भी कम हुई है। देश में मुसलमानों सहित अन्य सभी समुदायों में पिछले तीस सालों (1992-93) से जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट जारी है। अत: स्पष्ट है कि जनसंख्या वृद्धि का सम्बंध सम्प्रदाय से अधिक आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति से है। 


संसार में बढ़ती जनसंख्या तथा जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। ख़ास तौर पर वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है। पूंजीवादी और विकसित देशों के दबाव में तैयार संयुक्त राष्ट्र संघ के एजेंडा 21 के तहत 2030 से 2050 तक दुनिया की आबादी कम करने की योजना है।

भारत में पिछले दस सालों में जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ने की अपेक्षा लगातार घटते जाने के कारण हैं―शादी करने की उम्र में बढ़ोत्तरी, दो बच्चों के बीच अंतराल रखना। ज्यादा बच्चों के कारण होने वाली आर्थिक परेशानियों को लेकर, खास तौर पर गरीब तबकों में, भी जागरूकता आई है। गरीब भी बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहते हैं क्योंकि इस पर काफ़ी खर्च आ रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा से जिंदा रहने भर का संघर्ष बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे तमाम कारणों से प्रजनन दर में गिरावट आ रही है। इससे चीन की तरह 2040 के बाद हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा बुजुर्ग होने लगेगा। जिसका राष्ट्रीय उत्पादकता पर सीधा असर पड़ेगा।

अत: यही कहा जा सकता है कि जिस तरह चीन ने अपनी भारी जनसंख्या को काम पर लगा कर न सिर्फ अपनी राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि कर ली, बल्कि निर्यातोन्मुखी नीतियों को अपना कर वैश्विक स्तर पर अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों के सामने गंभीर चुनौतियां भी पेश कर बहुत तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थ-व्यवसथा बनने की राह पर है। 

लेकिन क्या हम अपने इस पड़ोसी देश से कुछ सीखेंगे या सिर्फ वोट की राजनीति ही करते रहेंगे? 

रविवार, 11 जुलाई 2021

स्त्री विरोधी क्यों है आरएसएस?

स्त्री विरोधी क्यों है आरएसएस?

"बलात्कार जैसी घटनाएं ग्रामीण भारत में नहीं, बल्कि इंडिया में ज्यादा होती हैं" या फिर "सभी भारतीयों का डीएनए एक है" जैसे विवादास्पद बयानों के लिए चर्चित संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों इंदौर में हुए एक कार्यक्रम में कहा था कि 'पति की देखभाल के लिए पत्नी एक करार से बंधी होती है। यदि पत्नी इसका उल्लंघन करती है तो पति उसे छोड़ सकता है।'

क्या सचमुच हिंदुओं के सोलह संस्कारों में से एक वैवाहिक संस्कार के समय ऐसी कोई अनिवार्य वचनबद्धता का समावेश है? हां, अवश्य है और यह वचनबद्धता ही वर-वधू के वैवाहिक जीवन की आधारशिला है। इसमें कन्या वर की वामांगी अर्थात पत्नी का स्थान ग्रहण करने से पहले वर से सात वचन (संकल्प) प्राप्त करती है जो दोनों परिवारों की सूत्रबद्धता से लेकर दैनिक व्यवहार, गृहस्थाश्रम के संचालन, संतति व परिवार के पालन-पोषण, सामाजिक दायित्वों के निर्वहन तथा नैतिक व धर्म के पालन से सम्बंधित होते हैं। 

इसी प्रकार वर भी वधू से इन्हीं से मिलते-जुलते सात वचन (संकल्प) प्राप्त करता है। इस प्रकार उभयनिष्ठ सहमति के बाद ही कन्या का पिता/पालक/संरक्षक उसे वर के वामांग में प्रतिष्ठापित करता है।

यह प्रकिया सात चरणों में अग्नि और उपस्थित समाज को साक्षी मानकर सम्पन्न की जाती जिसे 'सप्तपदी' कहा गया है। आजकल की चलताऊ भाषा में इसे 'सात फेरे' जैसे अत्यंत संकुचित भाव वाले सतही कार्यक्रम में बदल दिया गया है। जबकि इन सात वचनों के बिना हिंदू विवाह संपूर्ण नहीं माना जाता है।


इस तरह हिंदुओं का जो दाम्पत्य जीवन स्त्री-पुरुष की समानता पर आधारित है उसे वर्तमान संघ प्रमुख द्वारा सिर्फ पुरुषवादी नजरिए से देखना न तो हिंदू परंपराओं के अनुसार है और न ही आधुनिक संदर्भ में मानवाधिकारवादी सोच के अनुकूल।


यदि गहराई से विचार किया जाए तो उनका यह कथन उनके परमपूज्य गुरुजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर की उसी ख़ब्त की अगली कड़ी है जिसमें उन्होंने कहा है कि 'किसी भी जाति की विवाहित महिला की पहली संतान नंबूदरी ब्राह्मण से होनी चाहिए और उसके बाद ही वह अपने पति से संतानोत्पत्ति कर सकती है'। (ऑर्गनाइज़र, 2 जनवरी, 1961)


ऐसा कहते हुए गोलवलकर स्त्रियों को सिर्फ बच्चे पैदा करने वाली मशीन तथा उस पर पुरुषों का नैसर्गिक वर्चस्व का अधिकार मानते हैं। चाहे वह उनकी अपनी मां, बहन, पत्नी या पुत्री ही क्यों न हो। इसके साथ ही वे हिंदुओं को नस्लीय आधार पर श्रेष्ठ तथा निम्नस्तरीय दो अलग-अलग रूपों में विभाजित मानते हैं और यह भी आवश्यक समझते है कि निचले स्तर के हिंदुओं का पशुओं की तरह नस्ल सुधार उच्चवर्गीय नंबूदरी ब्राह्मणों के माध्यम से होना चाहिए। उनके लिए स्त्री की अस्मिता का जरा भी मूल्य और महत्व नहीं है; वे सिर्फ नस्ल सुधार की सामग्री हैं।


इस तरह के विचारों द्वारा गोलवलकर ने मध्यकाल से प्रचलित उसी जातीय तथा पुरुषवादी मानसिकता का पृष्ठपोषण किया जिसमें सामंतों व अन्य तथाकथित श्रेष्ठिवर्ग द्वारा अधिकारपूर्वक निम्न जातियों की दूल्हन की प्रथम रात्रिकालीन सहवास का अमानवीय अधिकार अपने लिए सुरक्षित कर लिया गया था। 

यह आश्चर्यजनक है कि संघियों के 'परमपूज्य गुरुजी' गोलवलकर ने यह विचार अपने अज्ञानी और गँवार स्वयंसेवकों की भीड़ के बीच नहीं, बल्कि अहमदाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों की एक सभा में भाषण देते हुए व्यक्त किये थे। और, बात वहीं पर खत्म नहीं हुई, बल्कि इस गुरुवाणी को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने बड़ी शान और श्रद्धापूर्वक अपने एक लेख 'क्रॉस ब्रीडिंग में हिन्दू प्रयोग' शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित किया। (संदर्भ—उपरोक्त)

माधव सदाशिव गोलवलकर की एक विवादास्पद पुस्तक है—वी ऑर ऑवर नेशनवुड डिफाइंड। जो लेखक की गर्हित और कुंठित मानसिकता का ही एक प्रतिबिंब है। इसे भारत पब्लिकेशंस, महल, नागपुर ने 1939 में प्रकाशित किया था और इसकी 18 पृष्ठ लंबी-चौड़ी भूमिका एम.एस. अणे द्वारा लिखी गई है। यह पुस्तक 1947 के बाद से अप्राप्य है।

गांधी जी की हत्या के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा संघ पर प्रतिबंध लगाने से तज्जनित परिस्थितियों में घिरकर चौंकन्ने और रंग बदलने में गिरगिट को बहुत पीछे छोड़ते हुए संघ ने गोलवलकर की इस विवादास्पद पुस्तक को इसी किताब में मौजूद अनेक प्रमाणों के होते हुए भी उनके द्वारा लिखा गया मानने से इंकार कर दिया। यही नहीं संघ द्वारा अपने परमपूज्य गुरुदेव की नाक बचाने की अनेक असफल कोशिशें की जाती रही हैं। 

संघ के वैचारिक डीएनए में स्त्रियों के प्रति दोयम दर्जे और पशुवत उपभोग की वस्तु वाले विचार के शामिल होने का ही दुष्परिणाम है कि मोदी के भारतीय राजनीति का शिखर पुरुष बनने के बाद भाजपा शासित राज्यों में महिलाओं के प्रति अपराधों में न केवल बाढ़ आई है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में बलात्कारियों और यौन-अपराधियों के समर्थन में प्रदर्शन किये गये, उनके जमानत पर रिहा होने के बाद उन्हें फूल-मालाओं से लादकर स्वागत सत्कार किया गया। कुलदीप सैंगर, चिन्मयानंद, कठुआ आदि इस तरह के ज्वलंत उदाहरण हैं।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए कहा था कि वे 'श्रीगुरुजी द्वारा गढ़े हुए स्वयंसेवक हैं और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर ही कार्यरत हैं' तो स्वाभाविक रूप से गुरु के गुणावगुण चेले में आने ही थे। अब जब संघ के सिद्धांतकार और उसे वर्तमान स्वरूप में गढ़ने वाले माधव सदाशिव गोलवलकर के विचार स्त्रियों के प्रति इतने निम्नस्तरीय हों तो उनका वह स्त्री-विरोध संघियों के वैचारिक डीएनए में शामिल होना ही चाहिए। 

इसी घृणित मानसिकता के कारण मोदी ने बंगाल चुनाव में 'दीदी ओ दीदी' कहकर ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाते हुए एक बार फिर साबित किया है तो कोई आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि वे इससे पहले 'डेढ़ करोड़ की गर्लफ्रेंड', 'जर्सी गाय' और 'फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को लड़कियां सप्लाइ करती हैं' जैसी बातें कहकर अपने संघी संस्कारों से सिंचित अति तुच्छ मानसिकता का परिचय देते रहे थे।

संघियों का एक बड़ा आदर्श-पुरुष विनायक दामोदर सावरकर भी महिलाओं के प्रति कुंठाग्रस्त था। उसने शिवाजी महाराज के सैनिकों द्वारा युद्ध में पकड़ी गई मुस्लिम स्त्रियों का बलात्कार न कर उनको ससम्मान लौटाने को अनुचित बताया है। वह इतना नीच आदमी था कि इससे भी बढ़कर उसने रावण द्वारा देवी सीता को अशोक वाटिका में सकुशल रखने को ही अनुचित बताया है।

संघ के जेबी संगठन भाजपा नेता उत्तर प्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री ने मुस्लिम महिलाओं को कब्र से भी निकाल कर उनके बलात्कार करने की बात कही है।

भाजपा सांसद साक्षी ने कहा कि हिंदुओं को दस-दस बच्चे पैदा करने चाहिए।

कुल मिलाकर देखा जाये तो इसमें जरा सा भी संदेह नहीं होना चाहिए कि संघ की मूल फासिस्ट सोच ही स्त्री विरोधी है। तभी तो मोहन भागवत ने हिंदुओं के वैवाहिक संस्कार की गर्हित एवं एकांगी व्याख्या करने का दुस्साहस किया।

शनिवार, 10 जुलाई 2021

क्या भारत में लोकतंत्र समाप्ति की ओर बढ़ रहा है?

क्या भारत में लोकतंत्र समाप्ति की ओर बढ़ रहा है?

ईसा मसीह ने कहा था कि सूई के छेद में से ऊँट तो निकल सकता है, लेकिन स्वर्ग के दरवाज़े से मुनाफ़ाख़ोर का निकलना असम्भव है। 

उनकी इसी शिक्षा से प्रभावित कैथोलिक ईसाइयों ने सदियों तक व्यापार ही नहीं किया, क्योंकि बिना मुनाफ़ा व्यापार सम्भव नहीं था। लंबे समय के बाद सामाजिक परिवर्तनों के कारण जब ईसाइयों ने व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेना प्रारंभ किया, तब जॉन कालविन ने यह विचार दिया कि यदि समाज के हित के लिए मुनाफ़ा कमाया जाये तो वह पाप नहीं है।

इसके फलस्वरूप कुछ ही समय में ईसा मसीह के अनुयाई ईसा के उपदेश को भूल गये। नौबत यहां तक आ पहुंची कि ईसा ने पाखंड और रूढ़ियों में जकड़े समाज की जिस सामूहिक चेतना को जगाया था उसने एक अलग 'धर्म' का रूप धारण कर उसके एक प्रतीक चर्च को सामाजिक-राजनीतिक विचारों का केंद्र बना लिया। 

आगे चलकर चर्च इतना शक्तिशाली होता गया कि उसने एक तरफ राजसत्ता को अपने प्रभाव-क्षेत्र में ले लिया तो दूसरी ओर तथाकथित 'धर्म' के नाम पर लोगों को परलोक में उत्तम स्थान प्राप्त करने का लालच देकर धन लेकर रसीदें जारी की जाने लगीं। चर्च के पास अकूत दौलत इकट्ठा होती गई। कालांतर में संत ईसा के वास्तविक मानव धर्म से बहुत दूर उसकी जगह राजसत्ताएं हड़पने का खेल शुरू हो गया, उसके लिए युद्ध लड़े जाने लगे और यह तथाकथित नया धर्म तथा उसके नाम पर बना चर्च दोनों भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये। फिर सर्वत्र अराजकता फैल गई।

इसी क्रम में ईसा की चौथी शताब्दी से 12वीं शताब्दी के मध्य चर्च की संपूर्ण विधि-व्यवस्था को संचालित करने वाले संहिताबद्ध कानूनों (कैनन लॉ)  का विकास हुआ। चूंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और व्यवस्थाएं भी बदलती रहती हैं, इसलिए बदलाव के बीज उसके भीतर ही जन्म लेते हैं। शायद इसीलिए 16वीं शताब्दी में एक जर्मन भिक्षुक और धर्मशास्त्री मार्टिन लूथर द्वारा प्रोटेस्टेंट सुधार शुरू किया गया। जिसने ईसाई धर्म को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने कैथोलिक चर्च की सबसे पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाते हुए 95 सुधारों की सूची प्रस्तुत कर दी। जिसके फलस्वरूप 1530 ई. में प्रोटेस्टेंट धर्म के सिद्धांतों को निर्दिष्ट एकीकृत रूप दिया गया।

इससे लोगों के बीच वैचारिक क्रांति रेनेसां (पुनर्जागरण) काल प्रारंभ हुआ। मार्टिन लूथर के सुधारवादी आंदोलन में परंपराओं के नाम पर ईसाई मत में जड़ जमा चुकी रूढ़ियों को नकारने और धर्मशास्त्र (बाइबल) को ही उद्घाटित सत्य का असली स्रोत मानने वाले उदार ईसाई पुरोहित, सामंत और जनता मार्टिन लूथर के साथ हो गई और चर्च की सत्ता का विरोध (प्रोटेस्ट) करने वाले एक नये सुधारवादी ईसाई समुदाय प्रोटेस्टेंट का जन्म हुआ।

यह पुनर्जागरण (रेनेसां) व्यावहारिक रूप से मानव समाज की बौद्धिक चेतना और तर्कशक्ति का उदय था। इसके प्रभाव से मनुष्य तथाकथित धार्मिक पाखंडों की सीमाओं से ऊपर उठकर स्वतंत्र रूप से आलोचनात्मक चिंतन करने लगा।

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व्यापक सामाजिक समर्थन से धर्म के नाम पर बनी सामाजिक व्यवस्थाएं तथा राजसत्ताएं मदांध होती हैं। वे न्याय, नैतिकता, उचित-अनुचित का भेद,  पारस्परिक सौहार्द्र, समता और सहिष्णुता जैसे मानवीय मूल्यों की परवाह नहीं करतीं। स्थापित मूल्यों की अवहेलना उनका स्वभाव बन जाता है। उनकी चेतना और संवेदनशीलता यहां तक कुंद हो जाती है कि वे गरीबों, शोषितों, वंचितों तथा जनसामान्य को इन्सान मानने से ही इंकार कर देती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य अधिकाधिक शक्ति हासिल कर धार्मिक और राजनीतिक सत्ता का उपभोग करना रह जाता है। इसके लिए वे साम, दाम, दंड और भेद की विनाशकारी नीति पर चलते हुए पूरे समाज को अपने नियंत्रण में लेने का हरसंभव उपाय करते हैं। इससे लोगों का जीवन दुखों से भर जाता है और चहुं ओर अव्यवस्था व अराजकता फैल जाती है।

ऐसे घटाटोप अंधेरे में से ही परिवर्तनकारी शक्तियों का अभ्युदय होता है जिन्हें शोषित और पीड़ित आमजन का भरपूर सहयोग सहज ही मिलने से जनक्रांति जन्म लेती है। जो शक्तिशाली वर्ग को उखाड़ फेंककर नई व्यवस्था का निर्माण करती है।

ऐसे ही संघर्ष और चिंतनशील लोगों के प्रयासों और अनुभव से लोकतांत्रिक व्यवस्था का उदय हुआ। जिसके विविध रूप अनेक देशों में प्रचलित हैं। 

सामान्यतः लोकतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा एक सामान्य प्रक्रिया है। जिसके अंतर्गत सभ्य समाज में सामूहिक रूप से उन्नति की ओर बढ़ने के लिए मुद्दों को लेकर विमर्श किया जाता है, प्रत्याशी अपने विचार और योजनाओं का खाका पेश करते हुए मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इसी आधार पर लोग अपना वोट देकर बहुमत से प्रतिनिधि चुनते हैं।

चुनाव के बाद भी समाज अपने निर्वाचित प्रतिनिधि तथा सत्ता प्रतिष्ठान के कामकाज पर नजर रखता है, उनके गुण-दोष पर खुली बहस होती है। सुझाव लिये-दिये जाते हैं। यह क्रम सतत चलता रहता है। तभी देश और समाज उन्नति की राह पर आगे बढ़ता चला जाता है। यही एक सफल लोकतंत्र की आधारशिला भी है और पहचान भी।

भारत में लोकतंत्र बहुत तेजी से असफलता की ओर बढ़ रहा है। खास तौर पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति का शिखर पुरुष बनने के बाद जहां एक ओर संवैधानिक व्यवस्था को लगातार किनारे किया जाता रहा है, वहीं दूसरी तरफ जनता को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए तरह-तरह के उपाय किये जाते रहे हैं। 

ऐसा लगता है कि मुट्ठी भर शासकों ने लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है। चुनाव, विधाई संस्थाएं, न्यायालय, प्रशासन, समाचार माध्यम आदि सभी की पवित्रता को पद-दलित कर इनकी स्वायत्तता पर अधिकार जमा लिया गया है। नागरिक अधिकार निलंबित हैं। लोकतांत्रिक सरकार का लोक-कल्याणकारी स्वरूप गायब है और उसके स्थान पर अधिनायकवाद हावी हो गया है। जनता द्वारा निर्वाचित सरकार जनता के प्रति उत्तरदाई नहीं दिखाई देती। सबकुछ चंद लोगों द्वारा निर्धारित और नियंत्रित है।

उत्तर प्रदेश का ताजा उदाहरण हमारे सामने है। जहां हो रहे पंचायत के चुनाव में सत्ताधारी वर्ग द्वारा नियम, कानून, व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों की जैसे अर्थी ही निकाल दी गई है। देशभक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मुखौटा लगाये लोगों ने सामाजिक मान-मर्यादा तथा परंपराओं की धज्जियां उड़ा दीं हैं।

कल तक न्याय की बात करने वाले देश-प्रदेश की सत्ता पर कब्जा करने के बाद अन्याय, आतंक और दानवता का तांडव करते हुए ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य के पद हथियाने को पूरी तरह गुंडागर्दी पर उतर आये। लोगों को चुनाव का नामांकन करने से बलपूर्वक रोका गया, विपक्षी महिलाओं का चीरहरण, पत्रकारों के साथ मारपीट, प्रत्याशियों को मतगणना स्थल से बाहर कर सत्ताधारी दल के प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया। सबसे दुखदाई यह है कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारी ऐसे कुकृत्यों में असामाजिक तत्वों के क्रीतदास बनकर उन्हें सहयोग करते रहे। पीड़ितों की कहीं कोई सुनवाई नहीं। यह सिर्फ एक बानगी है। 

सत्ता का अति-केंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति सामने है। सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किये जाते। यहां तक कि सभी छोटे-बड़े मामलों में सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है।

ऐसी स्थिति में शंका होती है कि आगे 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे भी या नहीं। हालांकि इसकी खुली घोषणा 2019 में भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज कर चुके हैं कि भारत में 2019 के बाद कोई चुनाव नहीं होगा। उधर 2016 में भाजपा के वयोवृद्ध नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी पहले ही कहा था कि भारत में आपातकाल की स्थिति अभी भी बनी हुई है।

बहरहाल, भारत एक बडे़ बदलाव के मुहाने पर खड़ा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह नैराश्यपूर्ण परिदृश्य जल्दी ही बदलेगा और फिर जो भी होगा, वह भारतीय जन-गण-मन के लिए सुखद और कल्याणकारी होगा।


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मनुष्य की यात्रा और वर्तमान पड़ाव  वैज्ञानिकों द्वारा किये गये जीनोम-अध्ययन से पता चलता है कि वर्तमान मानव (Homo Sapiens) लगभग 2 लाख वर्ष पू...