बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

हिन्दुओं पर चितपावनों का वर्चस्व स्थापित करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

हिन्दुओं पर चितपावनों का वर्चस्व स्थापित करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इस्राइल से यहूदियों के जत्थे भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कोंकण (सह्याद्रि क्षेत्र, महाराष्ट्र) में आकर बस गये थे। यहां आने के बाद वे हिन्दू बन गये और उन्हें चितपावन ब्राह्मण कहा जाने लगा। इसके बावजूद भी स्थानीय ब्राह्मणों ने उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हुए उनसे छुआछूत जारी रखा। इसके चलते चितपावन ब्राह्मण बन गये चतुर यहूदियों ने अपने भविष्य की चिंता करते हुए वहां से पलायन कर कोल्हापुर, सतारा आदि देसी रियासतों की राजधानी के आसपास बसना शुरू किया और येन-केन-प्रकारेण सत्ता के शीर्ष तक अपनी पहुंच बनाई।
इसी बीच सन 1720 में बालाजी विश्वनाथ की मृत्युपरांत उनके 19 वर्षीय ज्येष्ठ पुत्र बाजीराव को पेशवा (मंत्री) नियुक्त किया गया जिसने आगे चलकर अनेक लड़ाइयां जीतीं और मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान बना दिया। बतौर पेशवा बालाजी की नियुक्ति से पहले तक पेशवा वंशानुगत पदवी नहीं थी लेकिन वर्चस्ववादी यहूदी डीएनए वाले बालाजी के बाद यह एक तरह से विरासती हो गई। इसी से इस्राइली यहूदियों से चितपावन बने इन ब्राह्मणों की पेशवाओं के जमाने में पौ बारह थी। उन्होंने ऊंचे-ऊंचे शासकीय पद हथिया कर स्वयं को मराठी मूल के कुलीन ब्राह्मणों से भी उच्च श्रेणी पर स्थापित करने को हरसंभव हथकंडा अपनाया।
यदि न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे की किताब ‘द मिसलेनियस रायटिंग्जस’
(पृष्ठ―350-352) देखें तो उससे उत्तर पेशवाई शासनकाल में हुई जातिभेद में वृद्धि और अन्य जातियों की अपेक्षा प्रत्यक्ष शासन में ब्राह्मणों को दी गई प्रभुता की जानकारी मिलती है। लेखक के मुताबिक 'सतारा से पुणे राजधानी आने पर 1760 के बाद के काल में कीर्तिशाली फौजी सरदारों में ब्राह्मण लोग ही प्रमुख रूप से झलकने लगे। प्रभु, शेणवी आदि सफेदपोश ब्राह्मणेतरों का पुणे दरबार में टिकना मुश्किल हो गया। फलतः सभी वर्गों में अशान्ति फैल गई।… शिवाजी, राजाराम और शाहू के शासन काल में समाज के ये वर्ग एकता से रहे थे...। पेशवाई में ब्राह्मणों को लगने लगा कि अब हम सचमुच ही राजा हैं। ब्राह्मणों को स्वतंत्र रियासतें मिलने लगीं, कानून के बंधन उनके लिए शिथिल किये जाने लगे। ...ज्ञान हो या न हो, ब्राह्मणों के लिए सरकार ने दक्षिणा और भोजन के लिए भरपूर प्रावधान किया। अतः पुणे शहर ब्राह्मण भिखारियों का बड़ा केन्द्र बन गया। तीस से चालीस हजार ब्राह्मण सतत अनेक दिनों तक पकवानों के भोजन करते रहते थे।'
पेशवाई शासनकाल में चितपावनों ने न केवल ऊंचे सरकारी पद और जागीरें हासिल कीं बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी कफी उन्नति की, जो कि पूंजी की प्रचुरता के कारण स्वाभाविक ही था। इसके पश्चात अंग्रेजी राज में भी इनकी स्थिति पूर्ववत बनी रही। समाज में अपने वर्चस्व तथा कुलीनता के मद में चूर चितपावन ब्राह्मणों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस का जो विरोध किया उसका एक प्रमुख कारण उसकी हिन्दुओें में व्याप्त पैठ तथा मुसलमानोें, दलितों व आदिवासियों के साथ भेदभाव समाप्त करने पर जोर देना भी था।
गांधी जी की हत्या का असली कारण―
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सही मायने में जनांदोलन तब बना जब 9 जनवरी, 1915 को 46 वर्ष की उम्र में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे। उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर एक वर्ष शान्तिपूर्ण बिना किसी आंदोलन के व्यतीत किया। इस दौरान उन्होंने भारत की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए पूरे भारत का भ्रमण किया। फिर 1916 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की। फरवरी 1916 में गाँधी जी ने पहली बार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मंच पर भाषण दिया। जिसकी चर्चा पूरे भारत में हुई। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अजमाए सत्याग्रह का यहां भी बखूबी प्रयोग किया। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने किसी दल का समर्थन न करके भारतीय राजनीति को समझने का प्रयास किया। गांधी जी की विशेष भूमिका वाला सत्याग्रह आंदोलन 1917 में चम्पारण जिले में हुआ और फिर स्वाधीनता आंदोलन की कमान संभाली।
गांधी जी ने जिस तरह देश की आजादी के लिए समाज के सभी वर्गों, खास तौर पर दलितों, की हिस्सेदारी को आवश्यक समझते हुए उन्हें एकत्र करना शुरू किया, उससे महाराष्ट्र तक ही सीमित चितपावनों के एक वर्ग को अपना वर्चस्व स्थापित करने लिए खतरा महसूस हुआ। इससे उन्होंने स्वराज्य आंदोलन से न केवल खुद को अलग करना शुरू कर दिया, बल्कि उन्होंने पूरी ताकत के साथ हिंदुओं को संगठित करने की ओर ध्यान लगाना चालू कर दिया। जल्दी ही इसी की परिणति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के रूप में हुई।
गांधी और कांग्रेस को अपने वर्चस्व के लिए खतरा समझने के कारण ही 1925 में इन चितपावन ब्राह्मणों के द्वारा हिटलर और मुसोलिनी की नीतियों के आधार पर 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' नामक घोर साम्प्रदायिक संगठन को जन्म दिया गया। इसके साथ ही गांधी जी को रास्ते से हटाने की दुरभिसंधियां शुरू होने लगीं।
गांधी जी की हत्या के छः प्रयास―
महात्मा गांधी पर पहली बार 25 जून, 1934 को पुणे में रेल के फाटक पर बम से हमला किया गया। उस हमले में गांधी की कार की गलत पहचान के कारण वे बच गए। गांधी जी पर दूसरा हमला 1944 में पंचगनी में छुरे से किया गया लेकिन छुरे वाला युवक पकड़ लिया गया। फिर 1944 में गांधी और जिन्ना की बंबई में होने वाली वार्ता के अवसर पर गांधी पर हमले की कोशिश हुई, वह भी नाकाम रही। महाराष्ट्र के नेरूल के पास 1946 में गांधी जिस रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे, उसकी पटरियां उखाड़ दी गईं। ट्रेन उलट गई, इंजन कहीं टकरा गया लेकिन गांधी को उसमें कोई खरोंच तक नहीं आई। चितपावनों के गढ़ महाराष्ट्र में किये गये इन चार हमलों में गांधी जी को कोई नुकसान पहुंचाने में असफल रहने के बाद उन पर दिल्ली में 1948 में दो बार हमले हुए। पहले मदनलाल ने बम फेंका लेकिन वह फूटा नहीं और लोग पकड़े गए। फिर छठी और अंतिम बार 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर गांधी जी की हत्या कर दी।
चितपावनों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ―
संघ के मूल में चितपावन ब्राह्मणों का जो वर्चस्ववादी विचार काम कर रहा था, वह आज तक बरकरार है, जिसे संघ के अब तक हुए सभी 6 सरसंघचालकों की यह सूची स्पष्ट करती है―
1―डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार (1925-1940 कुल 15 वर्ष)
2―माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (1940-1973 कुल 37 वर्ष)
3―मधुकर दत्तात्रेय देवरस (1973-1993 कुल 20 वर्ष)
4―प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' (1993-2000 कुल 7 वर्ष)
5―कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन (2000-2009 कुल 9 वर्ष)
6―मोहनराव मधुकरराव भागवत (2009... अब तक 11 वर्ष)
इनमें से एकमात्र प्रो. राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ही गैर-ब्राह्मण (उत्तर प्रदेश मेें शाहजहाँपुर के राजपूत) थे जिनका कार्यकाल सबसे कम केवल सात वर्ष का रहा। इसके अलावा केसी. सुदर्शन रायपुर (छत्तीसगढ़) के एक कन्नड़ भाषी ब्राह्मण थे। ये संघ के नौ साल तक सरसंघचालक रहे। इस प्रकार संघ के 95 वर्ष के इतिहास में कुल मिलाकर केवल 16 वर्षों के लिए ही कोई गैर-चितपावन ब्राह्मण संघ का सरसंघचालक बनाया गया और इस पर भी गैर-ब्राह्मण केवल 7 साल रहा।
इस हिसाब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा हिन्दुओं का जातीय आधार पर किया जा रहा विभाजन एकदम स्पष्ट हो जाता है। जिसमें चितपावन ब्राह्मणों का अन्य हिन्दुओं पर वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है। चितपावन ब्राह्मणों के इस संगठन को यदि देश के अधिकांश लोग 'मनुवादियों का संगठन' कहते हैं तो इसका कारण इसकी अपनी सामाजिक विभाजनकारी मूल अवधारणा, समसामयिक विचार तथा कार्यशैली ही उत्तरदायी है।

इस्रायली यहूदियों के भारत आगमन और उसके बाद के घटनाक्रम पर इस लिंक पर विस्तारपूर्वक लिखा है― https://www.encyclopedia.com/humanities/encyclopedias-almanacs-transcripts-and-maps/chitpavan-brahman?fbclid=IwAR2bIUvKMiWvcQLD2IDx2yAQkGqiXBmKjVM0WkiefSUYGouXpHti4fjWdeo

सौहार्द्र की सौंधी महक विभाजक रेखा की मोहताज नहीं हो सकती

 सौहार्द्र की सौंधी महक विभाजक रेखा की मोहताज नहीं हो सकती

वातानुकूलित टीवी स्टूडियो में बैठे गला फाड़ चीखते-चिल्लाते युद्ध-पिपासु एंकरों, 'धर्म' से अछूते धर्मांध कठमुल्लों, वोटजुगाडू राजनीतिक गिद्धों की दुनिया से एकदम अलग मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत सीमा पर अपनी-अपनी सरकारों की तरफ से तैनात सैनिकों का अपना अलग ही संसार होता है। वे इन लोगों की कल्पना से भी परे परस्पर सौहार्द्रपूर्ण ढंग से मिलते हैं, एक-दूसरे का हालचाल जानते-समझते हैं। छोटी-छोटी बहुत मामूली चीजों का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं। और इन्हीं सौहार्द्रपूर्ण क्षणों में जन्म लेती हैं कुछ ऐसी कल्पनातीत सचमुच की कहानियां जो अपने पीछे सम्बंधों की खुशबू हवाओं में ऐसी बिखेरती हैं कि हर सुनने महसूस करने वाला कह उठता है वाह!
मेरे गांव का एक नौजवान तीन-चार साल पहले भारतीय थल सेना में अपनी सेवाओं के दौरान जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में सीमा पर तैनात था। वहां उसकी मुलाकातें सीमा के उस पार के अपने समकक्ष से अक्सर ही हुआ करती थीं। आये दिन की भेंट-मुलाकात कुछ आगे बढ़ीं तो इन दोनों के बीच संवाद भी होने लगा। फिर धीरे-धीरे पारिवारिक व्यवसाय तथा घर में कौन-कौन हैं जैसी निजी सूचनाओं का भी आदान-प्रदान होने लगा। इसी बीच एक दिन उस पाकिस्तानी जवान ने पूछा―"तुम्हारे इलाके में धान होता है?"
इसने जवाब दिया―"हां, खूब होता है।"
अगला प्रश्न हुआ―"छुट्टी कब जाना है?"
बोला―"दो महीने बाद।"
उसने कहा―"मैं इसी हफ्ते डेढ़ महीने के लिए जा रहा हूं। जब तक मैं न लौटूं, रुकना।"
अब बारी इसकी था―"क्या बात है?"
उसने लापरवाही से जवाब दिया―"कोई खास बात नहीं, अगर जरूरी न हो और रुक सको तो बेहतर होगा।"
इसने सिर्फ हूं-हां में उत्तर दिया और बातों का सिलसिला दूसरे विषयों की तरफ मुड़ गया।

                                                चित्र―हमारे खेतों में लहलहाती धान की फसल

लगभग सात-आठ हफ्तों के बाद चिर-शत्रु समझे जाने वाले भारत-पाकिस्तान के ये दोनों सैनिक एक बार फिर आमने-सामने थे। हाय-हलो के बाद भारतीय जवान ने पूछा―"छुट्टी काट आये?"
उसने हां में सिर हिलाया तो इसने फिर सवाल किया―"कब लौटे?"
उत्तर मिला―"यहां तो कल ही पहुंचा हूं। तुम्हारी छुट्टी का क्या हुआ? कब जाना है?"
इसने कहा―"छुट्टी तो पहले से ही मंजूर है, मैं बस तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था, क्योंकि तुमने रुकने को कहा था।"
वह मुस्कुराते हुए बोला―"मुझे याद है। मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूं। कल मिलते हैं।"
अगले दिन पाकिस्तान का वह सैनिक हाथ में एक छोटा-सा थैला लिये फिर मिला और बोला―"तूने बताया था कि तेरे गांव में धान की फसल बहुत अच्छी होती है तो मैं तेरे वास्ते अपने घर से बासमती धान का बीज लाया हूं।" यह कहते हुए उसने थैला इसकी तरफ उछाल दिया।
गांव लौटने पर इस फौजी जवान ने उस पाकिस्तानी बासमती के बीज की कुछ पौध अपने खेत में लगाई और कुछ गांव के दूसरे किसानों को दे दी। पकने पर उस बासमती ने ऐसी खुशबू सारे इलाके में फैलाई कि जो भी उधर से गुजरता वाह-वाह करता। दूर से ही मालूम हो जाता कि आसपास कहीं बासमती का खेत है।
काश, अपने वातानुकूलित टीवी स्टूडियो में बैठे गला फाड़ चीखते-चिल्लाते युद्ध-पिपासु एंकरों, 'धर्म' से अछूते धर्मांध कठमुल्लों, वोटजुगाडू राजनीतिक गिद्धों को जरा भी यह समझ आती कि 1947 में भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांकन करने वाले ब्रिटिश अधिकारी सर सिरिल रैडक्लिफ़ की अध्यक्षता में 8 जुलाइ को भारत पहुंचे सीमा आयोग द्वारा सिर्फ़ 5 सप्ताह के भीतर जो सीमा-रेखा का निर्धारण किया गया और जिसने 88 करोड़ लोगों के बीच 1,75,000 वर्ग मील (4,50,000 वर्ग किमी) क्षेत्र को न्यायोचित (?) रूप से विभाजित करने के अपने अधिकार का प्रयोग किया था, उससे भले ही बंटवारा हो गया लेकिन पारस्परिक सौहार्द्र की सौंधी महक को किसी विभाजक रेखा का मोहताज कभी नहीं बनाया जा सकता।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

महात्मा गांधी की हत्या की छ: बार कोशिश की गई थी

महात्मा गांधी की हत्या की छ: बार कोशिश की गई थी

यह पूरी तरह झूठ है कि गांधी जी को देश का विभाजन कर पाकिस्तान बनाने, उसे स्वंतत्रता के बाद 55 करोड़ रुपये देने और उसके पूर्वी तथा पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने के लिए भारत के बीच से कम 10 मील (16 किमी.) चौड़ा कॉरिडोर देने पर सहमत होने के कारण नाथूराम गोडसे द्वारा मार दिया गया था। यह केवल उसे गांधी जी की हत्या के लिए उकसाने वाले हिंदूवादी गिरोहों का प्रोपैगेंडा के अलावा कुछ भी नहीं है। 

वस्तुतः  महात्मा गांधी आधुनिक भारत के आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न ऋषि थे। उनकी जीवन-यात्रा एक खुली किताब है जिसके हर पृष्ठ पर आपको एक विलक्षण व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।

उन्होंने 1915 में दक्षिण अफ्रीका को अलविदा कह कर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। एक वर्ष तक देश का भ्रमण कर अंग्रेजी शासन के अन्याय, उत्पीड़न, लोगों की बदहाली और सामाजिक वर्गभेद का गहन अध्ययन करने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
देश को आजाद कराने का विरोध करने वालों को गांधी जी के विचार, व्यवहार, कार्यशैली तथा पुरजोर कोशिश पसंद नहीं थी तो उनको ख़तम करने की योजनाबद्ध तरीके से लगातार छः कोशिशें की गईं। जिसकी कमान हिंदू महासभा अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने संभाल रखी थी।

पहली कोशिश (1934)—
गांधी जी को मार डालने की 6 बार कोशिश की गई। जिसमें से पहली बार 1934 में तब जब पूना की नगरपालिका द्वारा गांधी जी के सार्वजनिक सम्मान समारोह में शामिल होने आए गांधी की कार को बम धमाके से उड़ा दिया गया था। बम फटने से नगरपालिका अधिकारी और दो पुलिसवालों सहित सात लोग घायल हुए लेकिन गांधी जी इसलिए बच गए क्योंकि बम फेंकने वाले ने गांधी जी की कार के आगे वाली कार पर भूलवश हमला किया था।
दूसरी कोशिश (1944)—
आगा खान महल की लंबी कैद में अपने पुत्रवत् महादेव देसाई व बा को खो कर गांधीजी जब रिहा किए गए तो वे बीमार और बेहद कमजोर थे। इसलिए बापू को राजनीतिक गहमागहमी से दूर आराम के लिए पुणे के निकट पंचगनी ले जाया गया। पुणे के नजदीक बीमार गांधी का ठहरना विनायक के चेलों को उनकी हत्या का अवसर लगा और फिर 22 जुलाइ को युवक नाथूराम गोडसे मौका देखकर गांधीजी की तरफ छुरा लेकर झपटा लेकिन भिसारे गुरुजी ने उस दबोच लिया और उसके हाथ से छुरा छीन लिया। गांधीजी ने उसको छोड़ देने का निर्देश देते हुए कहा कि उसे कहो कि वह मेरे पास आकर कुछ दिन रहे ताकि मैं जान सकूं कि उसे मुझसे शिकायत क्या है। नाथूराम इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
तीसरी कोशिश (1944)—
मुहम्मद अली जिन्ना और सांप्रदायिक हिन्दू विभाजन की बातों को हवा देने में जुटे थे। गांधीजी इस पूरे मुद्दे पर जिन्ना से सीधे बातचीत करने सेवाग्राम से बम्बई को चले। इसी बीच सावरकर के हत्यारे गिरोह ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी सूरत में गांधीजी को जिन्ना से बात करने मुंबई नहीं जाने देंगे। उनकी एक टोली पुणे से वर्धा आ पहुंची और उसने सेवाग्राम आश्रम को घेर लिया। पुलिस ने ग.ल. थत्ते व अन्य को गिरफ्तार कर छुरे और तलवारें बरामद कीं। इस षड्यंत्र में माधव सदाशिव गोलवलकर भी शामिल था जो वर्धा में मौजूद रहकर स्वयं यह खुराफात करवा रहा था।
चौथी कोशिश (1946)—
पंचगनी और वर्धा की विफलता से परेशान होकर इन लोगों ने तय किया कि गांधीजी को मारने के क्रम में यदि कुछ दूसरे भी मरते हों तो मरें। इसीलिए 30 जून को उस रेलगाड़ी को पलटने की कोशिश हुई जिससे गांधीजी मुंबई से पुणे जा रहे थे। करजत स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चली थी लेकिन सावधान ड्राइवर ने देख लिया कि ट्रेन की पटरियों पर बड़े-बड़े पत्थर डाले गए हैं ताकि गाड़ी पलट जाए। इमर्जेंसी ब्रेक लगाकर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी।नुकसान इंजन को हुआ और गांधी जी बच गए।
इसका जिक्र अपनी प्रार्थना सभा में करते हुए गांधीजी ने कहा, ‘‘मैं सात बार मारने के ऐसे प्रयासों से बच गया हूं। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूं. मैं तो 125 साल जीने की आशा रखता हूं।’’ इस पर पुणे से निकलने वाले अख़बार ‘हिंदू राष्ट्र’ के संपादक नाथूराम गोडसे ने जवाब दिया, ‘‘लेकिन आपको इतने साल जीने कौन देगा।’’
पांचवीं कोशिश (1948)—
गांधी जी को मार डालने को पर्दे के पीछे लगातार षड्यंत्रों और योजनाओं का दौर चलता रहा। सावरकर अब तक की अपनी हर कोशिश की विफलता से खिन्न भी था और अधीर भी। लंदन में मदन लाल धींगरा जब हत्या की ऐसी ही एक कोशिश में विफल हुए थे, तब भी सावरकर ने उन्हें चेतावनी दी थी, ‘‘अगर इस बार विफल रहे तो फिर मुझे मुंह न दिखाना।’’ हत्या सावरकर के तरकश का अंतिम और ज़रूरी हथियार थी। इसे कब और किसके लिए इस्तेमाल करना है यह फैसला हमेशा उसका ही होता था। वह ऐसा शातिर था कि हत्या के लिए सदैव दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर दागता था।
गांधीजी अपनी हत्या की इन कोशिशों का मतलब समझ रहे थे लेकिन वे लगातार एक से बड़े दूसरे खतरे में उतरते भी जा रहे थे। उनके पास निजी खतरों का हिसाब लगाने का न समय था और न ही खतरों में उतरने के सिवा उनके पास कोई विकल्प ही था। हत्यारों में इतनी हिम्मत थी ही नहीं कि वे भी उन खतरों में उतरकर गांधीजी का मुकाबला करते।
इसी दौर में मुस्लिम लीगियों व हिंदू महासभाइयों की फैलाई सांप्रदायिकता के दावानल में धधकते देश के भीतर शांति, सद्भावना और अहिंसा का भाव भरते अकेले गांधी कभी यहां, तो कभी वहां भागते फिरते पंजाब जाने के रास्ते में दिल्ली पहुंचे। जहां की हालत बेहद खराब थी। 'अगर दिल्ली हाथ से गई तो देश की आज़ादी भी दांव पर लग सकती है' यह सोचकर गांधीजी ने हालात काबू में आने तक दिल्ली में ही रुकने का फैसला किया और कहा—"मैं दिल्ली छोड़कर नहीं जाऊंगा।" उधर सावरकर के हत्यारे गिरोह ने कहा—"हम आपको दिल्ली से जिंदा वापस नहीं निकलने देंगे।"
सांप्रदायिक मारकाट के खिलाफ थे गांधीजी
13 से 19 जनवरी तक गांधीजी का आमरण उपवास चला था। उसकी पीड़ा ने लोगों में प्रायश्चित जगाया और दिल्ली में चल रही अंधाधुंध हत्याओं व लूट-पाट में कमी आई। समाज के सभी संप्रदायों, सगठनों ने गांधीजी को वचन दिया कि वे दिल्ली का मन फिर नहीं बिगड़ने देंगे। ऐसा कहने वालों में सावरकर-गैंग भी शामिल था, जो उसी वक़्त हत्या की योजना पर भी काम कर रहा था। सावरकर ने इस बार बहुत सोच-विचार कर गांधी जी को मारने के लिए विभाजन के शरणार्थी मदन लाल पाहवा का कंधा चुना। मदनलाल पाहवा का साथ देने के लिए आप्टे, गोडसे, करकरे, दिगम्बर बड़गे और शंकर किश्तिया को पहले से ही तैयार किया गया था। प्लान था कि बम फेंका जाएगा, फिर भगदड़ का फायदा उठाकर किश्तिया गांधी को गोली मारेगा।
20 जनवरी, 1948 की शाम को भी रोज की तरह बिरला भवन में प्रार्थना थी। गांधी जी अपनी क्षीण आवाज़ में इन सारी बातों का जिक्र कर ही रहे थे कि मदनलाल पाहवा ने उन पर बम फेंका। बम फटा भी लेकिन निशाना चूक गया। जिस दीवार की आड़ से उसने बम फेंका था, उससे गांधी जी के बैठने की दूरी का ठीक अंदाजा वह नहीं लगा पाया। प्लान फेल हुआ। मदन लाल पाहवा पकड़ा गया, बाकी भाग गए। सभी का हिन्दू महासभा और संघ से जुड़ाव पाया गया लेकिन मास्टरमाइंड बच गया। गांधी जी एक बार फिर बच गए।
छठी कोशिश (30 जनवरी, 1948)—
उसके 10 दिन बाद, छठे प्रयास में बापू नहीं बच सके। गोडसे ने पैर छूकर सर उठाया और गुलामी से अपने ही उद्धारकर्ता को उसकी अनन्य सेवा, समर्पण और सदाशयता के पुरस्कार स्वरूप तीन गोलियां उस महामानव के वक्षस्थल में उतार दीं।

पूरी दुनिया इस ख़बर को सुनकर अवाक रह गई थी। अगले दिन बापू की शव-यात्रा में समाज के हर वर्ग के करीब दस लाख लोगों ने भाग लिया था।


रविवार, 4 अक्टूबर 2020

हिटलर जब सत्ता में आया, 30 जनवरी, 1933 का वह मनहूस दिन

हिटलर जब सत्ता में आया, 30 जनवरी, 1933 का वह मनहूस दिन

दुनिया भर में कौन जानता था कि 30 जनवरी, 1933 का दिन जर्मनी को बर्बरता व दूसरे विश्वयुद्ध की आग में धकेलने वाला मनहूस दिन साबित होगा। इसी दिन अडोल्फ हिटलर को राष्ट्रपति पॉल फॉन हिंडेनबर्ग ने चांसलर नियुक्त कर उसके लक्ष्य पर पहुंचा दिया था। तब किसी को भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन हिटलर आतंक का पर्याय बनकर जर्मनी को तहस-नहस कर देगा।

हिटलर समर्थकों ने नवनियुक्त राइषचांसलर का जोरदार स्वागत किया। चांसलर कार्यालय की एक खिड़की से लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हिटलर ने नाजी प्रोपेगैंडा प्रमुख गोएबेल्स की मदद से एक बड़े समारोह की योजना बनाई। वह नाटकीय तरीके से जर्मनी में 'महान चमत्कार की रात' के रूप में अपनी नई शुरुआत दिखाना चाहता था। वह शहर में मशाल लिए लोगों की एक माला सी बनाकर ऐसी भव्य तस्वीर तैयार करना चाहता था, जो दर्शकों को प्रभावित कर सके।

बड़े स्वांग का खेल—

उस दिन बर्लिन के ब्रांडेनबुर्ग गेट पर मायूसी का माहौल था। इसी बीच जोसेफ गोएबेल्स के स्वयंसेवकों ने नाज़ी संगठन एसए के सदस्यों को जमा करना शुरू किया। शाम तक इसके 20,000 सदस्य वहां जुट गए और फिर उन्होंने मशाल जुलूस निकाला लेकिन आम लोगों ने उस स्वांग को बर्बाद कर दिया। पैदल चलने वाले बिना सोचे-समझे एसए की कतारों में घुसते रहे और वैसी तस्वीर नहीं बनने दी। इससे गोएबेल्स बहुत निराश हुआ लेकिन उसने यह तस्वीर बाद में बनवाई।

(फोटो—एडॉल्फ हिटलर अपने सहयोगियों के साथ 1936 में

बर्लिन ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह के दौरान)

हिटलर सत्ता में कैसे आया—

देखा जाए तो वाइमार गणतंत्र का  पतन ही हिटलर के उत्थान का कारण बना। जो 1918 में गणतंत्र बनने के बाद से ही पैदाइशी गड़बड़ी से जूझ रहा था। वह लोकतांत्रिक लोगों से वंचित लोकतंत्र था। नए गणतंत्र को उद्यमियों, नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के अलावा आबादी के बड़े हिस्से ने अस्वीकार कर दिया था। इसकी शुरुआत से ही सत्ता पर कब्जे की वामपंथी और दक्षिणपंथी कोशिशें लोगों को परेशान कर रही थीं। पहले पांच सालों में उग्र दक्षिणपंथी पृष्ठभूमि के हत्यारों द्वारा खूब की गई हत्याएं देश को हैरानी में डालती रहीं। उनमें कम्युनिस्ट रोजा लक्जेमबर्ग और यहूदी विदेश मंत्री वाल्टर राथेनाऊ भी थे।

इससे वाइमार गणतंत्र की राजनीति अस्थिरता के भँवर में फँस गई और 14 साल में 12 सरकारें बनीं। संसद में मौजूद 17 पार्टियों में बहुत-सी संविधान विरोधी थीं। बढ़ते राजनीतिक व आर्थिक संकट के साथ लोकतांत्रिक पार्टियों में लोगों का भरोसा खत्म होता गया तो उग्रपंथी पार्टियों का समर्थन बढ़ता गया। दक्षिणपंथी नाजी पार्टी और वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टियां आमने-सामने थीं। 1930 में जर्मनी गृहयुद्ध के कगार पर था। नाजियों और कम्युनिस्टों के बीच खुला संघर्ष शुरू हो गया। 1929 की विश्वव्यापी मंदी ने हालत और भी खराब कर दी। 1932 में औपचारिक रूप से 56 लाख लोग बेरोजगार थे।

ताकतवर नेता पॉल फॉन हिंडेनबुर्ग—

बहुत से जर्मन इस हालत में देश को संकट से निकालने के लिए एक ताकतवर नेता को चाहने लगे। राष्ट्रपति पॉल फॉन हिंडेनबुर्ग ऐसे ताकतवर शख्स थे और वे बहुत से लोगों के लिए सम्राट जैसे थे। वैसे भी वाइमार संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का पद बहुत शक्तिशाली था। वह संसद भंग कर सकता था और अधिनियम के जरिए कानून लागू कर सकता था। इन अधिकारों का हिंडेनबुर्ग ने अक्सर इस्तेमाल भी किया लेकिन अब 85 साल के बूढ़े हिंडेनबुर्ग जर्मनी के रक्षक की भूमिका निभाने की हालत में नहीं रह गए थे।

वे कई अस्थिर सरकारों के बाद राष्ट्रवादी अनुदारवादी ताकतों की स्थिर सरकार बनाना चाहते थे। शुरू में वे हिटलर को चांसलर बनाने के पक्ष में नहीं थे और उसे बोहेमिया का कॉरपोरल कहते थे क्योंकि हिंडेनबुर्ग स्वयं पहले विश्व युद्ध में लड़ने वाले जनरल फील्ड मार्शल थे, जबकि हिटलर एक साधारण सैनिक था।

इस पर भी 1933 आते-आते हिंडेनबुर्ग ने अपनी राय बदल ली। उनके विश्वासपात्रों ने उन्हें बताया कि वे हिटलर को नियंत्रण में रखेंगे। पीपुल्स पार्टी के अल्फ्रेड हुगेनबर्ग के कहने पर नाजी पार्टी को कैबिनेट में सिर्फ दो सीटें दी गईं। बदले में हिटलर और उसके समर्थकों ने शुरू में जानबूझकर नरमी दिखाई और ज्यादा हो-हल्ला नहीं किया।

अपने ही परीलोक को नर्क बना दिया—

30 जनवरी, 1933 को हिटलर और उसके साथियों का एक सपना पूरा हो गया था। गोएबेल्स ने खुश होकर अपनी डायरी में लिखा था, "हिटलर राइषचांसलर बन गए हैं। हम परीलोक में हैं।" बिना सोचे-समझे गणतंत्र की कब्र खोदने वाले को देश का चांसलर बना दिया गया था। उसने अपनी जीवनी माइन कॉम्प्फ में अपनी योजनाएं साफ कर दी थीं। उसने लिखा था कि 'यहूदियों को मिटा दिया जाएगा और तलवार की मदद से नया इलाका जीता जाएगा।'



(फोटो—जोजफ गोयबल्स, 1933-35 जर्मनी का प्रोपेंगैंडा मंत्री)

यह इतिहास का बहुत बड़ा मजाक है कि हिटलर की नियुक्ति संविधान सम्मत तरीके से हुई थी। हिंडेनबुर्ग ने हिटलर को चांसलर पद की शपथ दिलाने के बाद कहा था, "अब श्रीमान भगवान की मदद से आगे बढ़ें।" वे 1934 में मरने से खुद यह नहीं देख पाए कि हिटलर जर्मनी को नरसंहार और विश्व युद्ध की ओर ले गया।

हिटलर ने बहुत ही जल्द दिखा दिया कि उसे घेरने, कमजोर या नियंत्रित करने का इरादा कितना बचकाना था। उसके चांसलर बनने के कुछ ही दिनों के अंदर पूरे देश में नाजियों के एसए संगठन के गुंडों का आतंक शुरू हो गया। कम्युनिस्टों, सोशल डेमोक्रैटों और ट्रेड यूनियनिस्टों पर अत्याचार शुरू हुए। कुछ ही दिनों बाद देश मे विभिन्न जगहो पर यातना-शिविर बने जहां एसए के लोग यहूदियों, कम्यूनिस्टों और अपने विरोधियों को यातनाएं देते थे। 

इस तरह कुछ ही महीनों के अंदर हिटलर ने वाइमार लोकतंत्र की कब्र खोदकर उसके ऊपर अपनी तानाशाही कायम कर ली और वह जर्मनी का सर्वेसर्वा बन गया। कालान्तर में उसके अहंकार ने जर्मनी को विश्वयुद्ध जैसे भयंकर तबाही के तूफान में फंसा दिया। जिसका अंत देश के विभाजन में हुआ। 

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

जब आगंतुक भी मौजूद रहकर ऑपरेशन होते हुए देख सकते थे

जब आगंतुक भी मौजूद रहकर ऑपरेशन होते हुए देख सकते थे

1945 में ली गई यह ऐतिहासिक तस्वीर बताती है कि उन दिनों मरीजों के ऑपरेशन करने की व्यवस्था कुछ ऐसी थी। जिसमें ऑपरेशन रूम एक थिएटर की तरह बनाए जाते थे। कमरे के आसपास एक बड़ी गैलरी होती थी, जहां आगंतुक भी मौजूद रहकर ऑपरेशन होते हुए देख सकते थे।

इस तस्वीर को देखकर समझा जा सकता है कि नीचे ऑपरेशन चल रहा है और ऊपर बालकनी से छात्र और नर्स ठीक ऐसे देख रही हैं, जैसे थिएटर में मूवी देख रहे हों।
संभवत: यही कारण है कि हम आज भी ऑपरेशन रूम को 'ऑपरेशन थिएटर' कहते हैं। क्या आपने पहले कभी सोचा था कि जिस कमरे में ऑपरेशन किया जाता है उसे ऑपरेशन थिएटर क्यों कहा जाता है?
सर्जरी के वर्तमान समय की शुरुआत में यह एक सार्वजनिक घटना थी। जो कोई भी व्यक्ति चारों ओर पड़े हुए मानव के आंतरिक अंगों वाले खुले दृश्य को सहन कर सकता था, उसे ऑपरेशन कक्ष में सर्जरी देखने की अनुमति दी जाती थी। कल्पना कीजिए कि लीवर ट्रांसप्लांट या किसी अन्य सर्जरी प्रक्रिया को देखने की अनुमति दी जाए तो वहां सभी तरह के बैक्टीरिया का संक्रमण भी हो सकता था। जो आज काफी अवास्तविक लगता है।
यह संज्ञाहरण (एनस्थीसिया) के पहले वाला समय था। वहां कुछ लोगों को केवल इसलिए प्रवेश करने की अनुमति दी जाती थी ताकि वे रोगी को शांत करने में मदद कर सकें। कितना दर्दनाक होता होगा वह दृश्य, जब रोगी के होश में रहते ही उसका पित्ताशय निकाल दिया जाता था। इससे पहले कम से कम एक वरिष्ठ व्यक्ति को बताया जाता था कि उसकी जिम्मेदारी सर्जरी के दौरान रोगी को मजबूती से पकड़े रखने की होगी।
उस समय भी पुरुष-सत्तात्मक नियम बहुत अधिक प्रमुख थे। सन 1870 तक महिलाओं को ऑपरेशन थियेटर में मरीजों के रूप में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी लेकिन महिला नर्सों को केवल मरीज की सहायता के लिए इजाजत प्रदान की जाती थी। नर्सों को रोगियों को तैयार करने, सर्जरी के दौरान सहायता करने और सर्जरी के अंत तक वहां ठहरने की अनुमति नहीं दी जाती थी। सन 1920 के दशक तक नर्सों को उपकरणों को शल्यकों को देने और संज्ञाहरण का संचालन करने की अनुमति नहीं दी गई थी। तब तक कमरे में कम से कम एक वरिष्ठ व्यक्ति इन कर्तव्यों का पालन करता था।
वर्ष 1870 तक चिकित्सा समुदाय को ऑपरेटिंग कमरे में स्टेराइल प्रोटोकॉल की संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण प्रकृति के बारे में पता था। जब 1945 में यह तस्वीर ली गई थी, तब ऑपरेटिंग रूम में स्टेराइल वातावरण रहता था और दर्शकों को दूर रखा जाता था।

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