महात्मा गांधी की हत्या की छ: बार कोशिश की गई थी
यह पूरी तरह झूठ है कि गांधी जी को देश का विभाजन कर पाकिस्तान बनाने, उसे स्वंतत्रता के बाद 55 करोड़ रुपये देने और उसके पूर्वी तथा पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने के लिए भारत के बीच से कम 10 मील (16 किमी.) चौड़ा कॉरिडोर देने पर सहमत होने के कारण नाथूराम गोडसे द्वारा मार दिया गया था। यह केवल उसे गांधी जी की हत्या के लिए उकसाने वाले हिंदूवादी गिरोहों का प्रोपैगेंडा के अलावा कुछ भी नहीं है।
वस्तुतः महात्मा गांधी आधुनिक भारत के आध्यात्मिक ज्ञान सम्पन्न ऋषि थे। उनकी जीवन-यात्रा एक खुली किताब है जिसके हर पृष्ठ पर आपको एक विलक्षण व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।
उन्होंने 1915 में दक्षिण अफ्रीका को अलविदा कह कर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। एक वर्ष तक देश का भ्रमण कर अंग्रेजी शासन के अन्याय, उत्पीड़न, लोगों की बदहाली और सामाजिक वर्गभेद का गहन अध्ययन करने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
देश को आजाद कराने का विरोध करने वालों को गांधी जी के विचार, व्यवहार, कार्यशैली तथा पुरजोर कोशिश पसंद नहीं थी तो उनको ख़तम करने की योजनाबद्ध तरीके से लगातार छः कोशिशें की गईं। जिसकी कमान हिंदू महासभा अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने संभाल रखी थी।
पहली कोशिश (1934)—
गांधी जी को मार डालने की 6 बार कोशिश की गई। जिसमें से पहली बार 1934 में तब जब पूना की नगरपालिका द्वारा गांधी जी के सार्वजनिक सम्मान समारोह में शामिल होने आए गांधी की कार को बम धमाके से उड़ा दिया गया था। बम फटने से नगरपालिका अधिकारी और दो पुलिसवालों सहित सात लोग घायल हुए लेकिन गांधी जी इसलिए बच गए क्योंकि बम फेंकने वाले ने गांधी जी की कार के आगे वाली कार पर भूलवश हमला किया था।
दूसरी कोशिश (1944)—
आगा खान महल की लंबी कैद में अपने पुत्रवत् महादेव देसाई व बा को खो कर गांधीजी जब रिहा किए गए तो वे बीमार और बेहद कमजोर थे। इसलिए बापू को राजनीतिक गहमागहमी से दूर आराम के लिए पुणे के निकट पंचगनी ले जाया गया। पुणे के नजदीक बीमार गांधी का ठहरना विनायक के चेलों को उनकी हत्या का अवसर लगा और फिर 22 जुलाइ को युवक नाथूराम गोडसे मौका देखकर गांधीजी की तरफ छुरा लेकर झपटा लेकिन भिसारे गुरुजी ने उस दबोच लिया और उसके हाथ से छुरा छीन लिया। गांधीजी ने उसको छोड़ देने का निर्देश देते हुए कहा कि उसे कहो कि वह मेरे पास आकर कुछ दिन रहे ताकि मैं जान सकूं कि उसे मुझसे शिकायत क्या है। नाथूराम इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
तीसरी कोशिश (1944)—
मुहम्मद अली जिन्ना और सांप्रदायिक हिन्दू विभाजन की बातों को हवा देने में जुटे थे। गांधीजी इस पूरे मुद्दे पर जिन्ना से सीधे बातचीत करने सेवाग्राम से बम्बई को चले। इसी बीच सावरकर के हत्यारे गिरोह ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी सूरत में गांधीजी को जिन्ना से बात करने मुंबई नहीं जाने देंगे। उनकी एक टोली पुणे से वर्धा आ पहुंची और उसने सेवाग्राम आश्रम को घेर लिया। पुलिस ने ग.ल. थत्ते व अन्य को गिरफ्तार कर छुरे और तलवारें बरामद कीं। इस षड्यंत्र में माधव सदाशिव गोलवलकर भी शामिल था जो वर्धा में मौजूद रहकर स्वयं यह खुराफात करवा रहा था।
चौथी कोशिश (1946)—
पंचगनी और वर्धा की विफलता से परेशान होकर इन लोगों ने तय किया कि गांधीजी को मारने के क्रम में यदि कुछ दूसरे भी मरते हों तो मरें। इसीलिए 30 जून को उस रेलगाड़ी को पलटने की कोशिश हुई जिससे गांधीजी मुंबई से पुणे जा रहे थे। करजत स्टेशन के पास पहुंचते-पहुंचते रात गहरी हो चली थी लेकिन सावधान ड्राइवर ने देख लिया कि ट्रेन की पटरियों पर बड़े-बड़े पत्थर डाले गए हैं ताकि गाड़ी पलट जाए। इमर्जेंसी ब्रेक लगाकर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी।नुकसान इंजन को हुआ और गांधी जी बच गए।
इसका जिक्र अपनी प्रार्थना सभा में करते हुए गांधीजी ने कहा, ‘‘मैं सात बार मारने के ऐसे प्रयासों से बच गया हूं। मैं इस प्रकार मरने वाला नहीं हूं. मैं तो 125 साल जीने की आशा रखता हूं।’’ इस पर पुणे से निकलने वाले अख़बार ‘हिंदू राष्ट्र’ के संपादक नाथूराम गोडसे ने जवाब दिया, ‘‘लेकिन आपको इतने साल जीने कौन देगा।’’
पांचवीं कोशिश (1948)—
गांधी जी को मार डालने को पर्दे के पीछे लगातार षड्यंत्रों और योजनाओं का दौर चलता रहा। सावरकर अब तक की अपनी हर कोशिश की विफलता से खिन्न भी था और अधीर भी। लंदन में मदन लाल धींगरा जब हत्या की ऐसी ही एक कोशिश में विफल हुए थे, तब भी सावरकर ने उन्हें चेतावनी दी थी, ‘‘अगर इस बार विफल रहे तो फिर मुझे मुंह न दिखाना।’’ हत्या सावरकर के तरकश का अंतिम और ज़रूरी हथियार थी। इसे कब और किसके लिए इस्तेमाल करना है यह फैसला हमेशा उसका ही होता था। वह ऐसा शातिर था कि हत्या के लिए सदैव दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर दागता था।
गांधीजी अपनी हत्या की इन कोशिशों का मतलब समझ रहे थे लेकिन वे लगातार एक से बड़े दूसरे खतरे में उतरते भी जा रहे थे। उनके पास निजी खतरों का हिसाब लगाने का न समय था और न ही खतरों में उतरने के सिवा उनके पास कोई विकल्प ही था। हत्यारों में इतनी हिम्मत थी ही नहीं कि वे भी उन खतरों में उतरकर गांधीजी का मुकाबला करते।
इसी दौर में मुस्लिम लीगियों व हिंदू महासभाइयों की फैलाई सांप्रदायिकता के दावानल में धधकते देश के भीतर शांति, सद्भावना और अहिंसा का भाव भरते अकेले गांधी कभी यहां, तो कभी वहां भागते फिरते पंजाब जाने के रास्ते में दिल्ली पहुंचे। जहां की हालत बेहद खराब थी। 'अगर दिल्ली हाथ से गई तो देश की आज़ादी भी दांव पर लग सकती है' यह सोचकर गांधीजी ने हालात काबू में आने तक दिल्ली में ही रुकने का फैसला किया और कहा—"मैं दिल्ली छोड़कर नहीं जाऊंगा।" उधर सावरकर के हत्यारे गिरोह ने कहा—"हम आपको दिल्ली से जिंदा वापस नहीं निकलने देंगे।"
सांप्रदायिक मारकाट के खिलाफ थे गांधीजी—
13 से 19 जनवरी तक गांधीजी का आमरण उपवास चला था। उसकी पीड़ा ने लोगों में प्रायश्चित जगाया और दिल्ली में चल रही अंधाधुंध हत्याओं व लूट-पाट में कमी आई। समाज के सभी संप्रदायों, सगठनों ने गांधीजी को वचन दिया कि वे दिल्ली का मन फिर नहीं बिगड़ने देंगे। ऐसा कहने वालों में सावरकर-गैंग भी शामिल था, जो उसी वक़्त हत्या की योजना पर भी काम कर रहा था। सावरकर ने इस बार बहुत सोच-विचार कर गांधी जी को मारने के लिए विभाजन के शरणार्थी मदन लाल पाहवा का कंधा चुना। मदनलाल पाहवा का साथ देने के लिए आप्टे, गोडसे, करकरे, दिगम्बर बड़गे और शंकर किश्तिया को पहले से ही तैयार किया गया था। प्लान था कि बम फेंका जाएगा, फिर भगदड़ का फायदा उठाकर किश्तिया गांधी को गोली मारेगा।
20 जनवरी, 1948 की शाम को भी रोज की तरह बिरला भवन में प्रार्थना थी। गांधी जी अपनी क्षीण आवाज़ में इन सारी बातों का जिक्र कर ही रहे थे कि मदनलाल पाहवा ने उन पर बम फेंका। बम फटा भी लेकिन निशाना चूक गया। जिस दीवार की आड़ से उसने बम फेंका था, उससे गांधी जी के बैठने की दूरी का ठीक अंदाजा वह नहीं लगा पाया। प्लान फेल हुआ। मदन लाल पाहवा पकड़ा गया, बाकी भाग गए। सभी का हिन्दू महासभा और संघ से जुड़ाव पाया गया लेकिन मास्टरमाइंड बच गया। गांधी जी एक बार फिर बच गए।
छठी कोशिश (30 जनवरी, 1948)—
उसके 10 दिन बाद, छठे प्रयास में बापू नहीं बच सके। गोडसे ने पैर छूकर सर उठाया और गुलामी से अपने ही उद्धारकर्ता को उसकी अनन्य सेवा, समर्पण और सदाशयता के पुरस्कार स्वरूप तीन गोलियां उस महामानव के वक्षस्थल में उतार दीं।



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