गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

यह आलेख जरूर पढ़ा जाना चाहिए, ताकि हम ऐसे खतरों से सावधान रहें

यह आलेख जरूर पढ़ा जाना चाहिए, ताकि हम ऐसे खतरों से सावधान रहें
जर्मनी में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आये हिटलर के शासन केे दौरान 1939 में घर-घर में रेडियो निःशुल्क रखवा दिये गये। फ्री का रेडियो मिला, जनता बड़ी खुश हुई। उस समय घरों में रेडियो होना वैसे ही हुआ करता था, जैसे आज के वक्त में 45 इंच का स्मार्ट एलईडी टीवी। हिटलर का सूचना एवं प्रसारण मंत्री जोसेफ गोएबल्स जिसे कालांतर में प्रोपेगेंडा मिनिस्टर भी कहा गया, उसकी रणनीति के तहत जर्मनी के घर-घर में रेडियो पहुंच गया। जनता अपने पसंदीदा गायकों के गाने रेडियो में सुनती। कभी अपने काम करते हुए तो कभी पिकनिक मनाते हुए। सब खुश थे।
छः माह बाद सरकार की तरफ से फरमान जारी हुआ कि दफ्तर-फैक्ट्रियों की शिफ्ट समाप्ति के समय शाम पांच बजे से सात बजे तक अनिवार्य रूप से हिटलर का भाषण सुना जाये। इसके तीन महीने बाद हिटलर के विशेष सैैन्य दस्ते ‘एसएस’ ने मोहल्ला समिति बनाई। जिसमें उस समय बेरोजगार हिटलर-समर्थक युवा थे। इन युवाओं को काम दिया गया कि मोहल्ले भर में मौजूद घरों की शाम पांच से सात बजे तक निगरानी की जाये कि लोग हिटलर का भाषण सुन रहे हैं या नहीं। बहरहाल, इन युवाओं की खुफिया सूचना पर कई जर्मनवासी परिवार समेत जेल गये। इससे दहशत में आया पूरा देश रेडियो पर भाषण सुनने लगा।
रेडिया में हिटलर युद्ध की जरूरत, महज आठ प्रतिशत यहूदियों के सम्पूर्ण खात्मे की अनिवार्यता, महिलाओं को नौकरी छोड़ पांच सुनहरे बालों वाले आर्यन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन के रूप से लोन की प्रासंगिकता आदि पर भाषण होते थे। कुछ ही साल में पूरा जर्मनी दुनिया को हिटलर की नजरों से देखने लगा। हर तरफ हिटलर ही हिटलर। हिटलर जब चाहे किसी की भी मॉब लिचिंग करवा देता। उस समय के पोस्टरों में न तो हिटलर की पार्टी का नाम होता था और न ही देश का नाम। केवल हिटलर की फोटो हुआ करती थी। पूरा जर्मनी हिटलरवादी हो गया। इस तरह जर्मनी के सूचना एवं प्रसारण मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने दुनिया की सबसे नायाब और सफल सूचना क्रांति को अंजाम दिया।
इसके लगभग सत्तर साल बाद नाजी जर्मनी के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए जम्बू द्वीप के एक अन्य देश में फासीवादी सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आई। एक साल के शासन के बाद ही पूूरे देश में निःशुल्क रूप से मोबाइल सिम जनता को बांटे गये। इंटरनेट डेटा लगभग फ्री कर दिया गया। शिक्षा, चिकित्सा, आवास, रोजगार तथा अन्य अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के संघर्ष मेंं दिन-रात परिश्रम करते हुए अपनी गरीबी से लड़ रही जनता के हाथ में स्मार्ट फोन आ जाता है। उसके बाद ह्वट्सऐप्प, ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब आदि जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिये सरकार की युद्धोन्माद और धार्मिक अलगाववाद की नीतियां घर-घर सीधे पहुंचने लगती हैं। फेक न्यूज़ के कारखानों में बेरोजगार युवकों की भर्ती होती है। युवा, महिलायें, छात्र और बुजुर्ग अपने जरूरी सवालों को छोड़कर युद्ध तथा सांप्रदायिक उन्माद फैलाना ही देशसेवा समझने लगे। लोगों के पास अब केवल खोखला राष्ट्रवाद और धार्मिक विद्वेष ही चर्चा के विषय थे। वे अपनी रोजी-रोटी, शिक्षा-चिकित्सा, व्यापार, खेती आदि जैसी निहायत जरूरी बातों को भुलाकर या तो सत्ता के पक्षधर बन गये थे या फिर चुपचाप रहकर अपने अच्छे दिन लौट आने का इंतजार करते। कुछ तो सत्ताधारियों के झंडाबरदार हो गये। रेडियो, अखबार, टेलिविजन, यूट्यूब, शोसल मीडिया तथा अन्य सभी संचार-साधनों में सर्वत्र सरकार के महिमा-मंडन वाले विज्ञापन दिखाये जाने शुरू हो जाते हैं। महज तीन साल में लोगों के दिमाग में इतना सांंप्रदायिक कचरा और युद्ध-उन्माद कूट-कूट कर भर दिया जाता है कि अगले चुनाव में उस गरीब देश के बुनियादी मुद्दे गायब हो जाते हैं।
हिटलर के जर्मनी या जर्मनी के हिटलर का आगे जाकर क्या हाल हुआ था, वह इतिहास की किताबों में दर्ज है। जिसे आज खुद जर्मनवासी नहीं पढ़ना चाहते लेकिन उन्हें पढ़ाया जाता है, उसी प्रकार जैसे बीमार को ठीक करने के लिए कड़वी दवा दी जाती है। इतिहास की कड़वी और काली तारीखें भविष्य को एक बेहतर समाज में सुधारने का औषधीय गुण जो रखती हैं।
काश इतिहास में कभी सोने की चिड़िया कहाने वाले जम्बू द्वीप के उस देश के भले और भोले मानसों को यह बात समय रहते समझ आ जाती तो वे झूठ-कपट, छल-प्रपंच के मायावी जाल से मुक्त होकर अपने अच्छे दिन खुद ही लाने को एकजुट हो जाते।

अब मैं मौत बन गया हूं, दुनिया का विनाशक

अब मैं मौत बन गया हूं, दुनिया का विनाशक

―जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर



आज 22 अप्रैल है, परमाणु बम के जनक जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्मदिन। वे 1904 में आज ही के दिन अमेरिका में जन्मे थे। ओपेनहाइमर सितंबर 1911 में स्कूल में दाखिल हुए। उनकी अध्ययन तथा स्मरण शक्ति इतनी प्रबल थी कि वे सिर्फ 10 साल की उम्र में ही भौतिकी, खनिज और रसायन शास्त्र का अध्ययन कर रहे थे। इसी बीच न्यूयॉर्क मिनरलॉजिकल क्लब के साथ उनका पत्राचार विद्वतापूर्ण और इतना उच्च स्तरीय था कि उन्हें सिर्फ बारह वर्ष की अल्पावस्था में एक व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया।
रॉबर्ट ने पढ़ाई-लिखाई में बहुत जल्दी प्रगति की और 192

1 में हाइस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें हॉर्वर्ड कॉलेज में भर्ती कराया गया। अपनी डिग्री पूरी करने के बाद जे. जे. थॉमसन के तहत पोस्ट ग्रेजुएट लैब के काम को पूरा करने के लिए ओपेनहाइमर कैंब्रिज, ब्रिटेन में स्थानांतरित हुए लेकिन बीमार पड़ गए और उन्हें हार्वर्ड में अध्ययन स्थगित करने के लिए मजबूर होना पड़ा। महीनों तक बिस्तर पर पड़ा रहने के बाद उनके माता-पिता ने उन्हें 1922 की गर्मियों में स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त करने न्यू मैक्सिको भेज दिया। उन्होंने 1927 में गौटिंगेन विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी पूरी की।
ओपेनहाइमर कण भौतिकी, खगोल भौतिकी और क्वांटम यांत्रिकी सहित भौतिक विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला पर काम करते थे। कहा जाता है कि उनके पास लंबे समय तक भौतिकी के एक ही क्षेत्र में काम करने के लिए बहुत अधिक धैर्य नहीं था। जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में एक अमेरिकी सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी और भौतिकी के प्रोफेसर थे लेकिन वे परमाणु बम के जनक के रूप में अधिक विख्यात हैं।
2 अगस्त, 1939 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा था जो रूजवेल्ट को दो माह बाद 11 अक्टूबर को मिला। पत्र में संभावना व्यक्त की गई थी कि जर्मनी अपने परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। इससे रूजवेल्ट को परमाणु हथियार विकसित करने के लिए एक अमेरिकी कार्यक्रम शुरू करने की प्रेरणा मिली। इस परियोजना में अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा शामिल थे। परियोजना को 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' नाम दिया गया। ओपेनहाइमर को 1942 में इस प्रोजेक्ट की गुप्त हथियार प्रयोगशाला का प्रमुख वैज्ञानिक निदेशक बनाया गया। दुनिया का पहला परमाणु बम बनाने की इस परियोजना का अनुसंधान और विकास वाला हिस्सा लॉस एलामोस में था।
जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने लॉस एलामोस में काम करने के लिए दुनिया के कुछ अच्छे वैज्ञानिकों की भर्ती की, जिनमें रिचर्ड फेनमैन और एनरिको फर्मी भी शामिल थे। वहां के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने पहले परमाणु परीक्षण विस्फोट का नेतृत्व किया, जिसे 'ट्रिनिटी' नाम दिया गया था। इनकी टीम ने जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद न्यू मैक्सिको में 16 जुलाइ, 1945 को पहला परमाणु परीक्षण 'ट्रिनिटी टेस्ट' किया। इसे देखते हुए ओपेनहाइमर ने बाद में एक टिप्पणी में भगवद्गीता का यह श्लोक उद्धृत करते हुए कहा कि 'अब मैं मौत बन गया हूं, दुनिया का विनाशक'―
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासस्तस्य महात्मनः॥11/12॥
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।...
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनिकेषु ययोधाः॥11/32॥
द्वितीय विश्वयुद्ध की चरमावस्था में 6 अगस्त, 1945 को जापान के हिरोशिमा पर ‘लिटिल ब्वॉय’ और तीन दिन बाद 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर ‘फैट मैन’ नामक परमाणु बम गिराये जाने के साथ ही इस परियोजना का अंत हो गया। उसी वर्ष अक्टूबर में ओपेनहाइमर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। युद्ध की समाप्ति पर राष्ट्रपति ट्रूमैन ने 1946 में लॉस एलामोस टीम के निदेशक के रूप में ओपेनहाइमर की भूमिका के लिए उनको 'मेडल ऑफ मेरिट' से सम्मानित किया और उन्हें नव-निर्मित युनाइटेड स्टेट्स एटॉमिक इनर्जी कमीशन का मुख्य सलाहकार बनाया। उन्होंने अपनी उस हैसियत का उपयोग परमाणु अप्रसार, सोवियत संघ के साथ परमाणु हथियारों की दौड़ रोकने तथा परमाणु ऊर्जा के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के लिए किया। यहां अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1947 से 1952 तक सेवा दी और इसी बीच अक्टूबर 1949 में हाइड्रोजन बम के विकास का विरोध किया।
ओपेनहाइमर ने भौतिकी में व्याख्यान और लेखन का काम जारी रखा। उन्हें राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने 1963 में सम्मानित किया।
अधिक धूम्रपान के कारण गले के कैंसर से ओपेनहेमर की 18 फरवरी, 1967 को 62 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई।

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