क्या पूंजीवाद कभी खत्म होगा और समाजवाद आयेगा?
आज दुनिया भर के मजदूरों को समर्पित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने वाला 'मई दिवस' है। इसकी शुरुआत 1886 में शिकागो में तब हुई थी, जब वहां मजदूर एक दिन में काम के आठ घंटे निर्धारित करने की मांग कर रहे थे। भारत में पूंजीपतियों के पोषक और उनसे पोषित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जेबी संगठन भारतीय जनता पार्टी की सरकार आज एक दिन में काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 करने जा रही है। यही नहीं भाजपा के राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा इसी 19 मार्च को संविधान की प्रस्तावना में 42वें संविधान संशोधन के जरिये सम्मिलित 'समाजवाद' शब्द को ही हटाने का प्रस्ताव लाये। हालांकि उस पर चर्चा नहीं हो पाई लेकिन संभवतः उस पर आगामी सत्र में चर्चा हो और उसे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाये। यदि ऐसा किया गया तो यह देश के बहुसंख्यक मजदूर-किसान वर्ग के लिए बहुत ही चिंताजनक होगा।
दरअसल, पूंजीवाद अपनी शोषणकारी प्रवृत्ति के कारण अमानवीय है। वह न केवल मनुष्यों का, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का भी समाज के चंद शक्तिशाली बन गये लोगों द्वारा नृशंस दोहन का वीभत्स चेहरा है। जो समानता, लोकतंत्र, विश्व-बंधुत्व और न्याय की भावना के विरुद्ध है।
अब से 134 साल पहले श्रमिक वर्ग के सामने जैसी गंभीर चुनौतियां थीं, आज ये उससे भी अधिक विकराल रूप में सामने खड़ी हैं। क्योंकि तब का पूंजीपति वर्ग मानवता के अधिक निकट था। वे मजदूरों की बातों पर विचार करते थे, तभी तो उनकी मांगों पर अमल करते हुए वैश्विक स्तर पर काम के घंटे निर्धारित हो सके। श्रम कानून बने और श्रम न्यायालय गठित हुए। समाचार माध्यमों में मजदूरों की समस्याओं को जगह दी गई। जबकि वर्तमान समय में हालात पहले से भी बदतर होते जा रहे हैं। अखबार, टीवी चैनल व अन्य संचार सांधनों पर पूंजीपतियों ने कब्जा कर लिया है, जिससे गांव, गरीब, मजदूर, किसान को चर्चा से गायब कर दिया गया है।
ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या भारत सामूहिक चेतना के इस घटाटोप अंधकार में श्रमिक क्रांति के मुहाने पर खड़ा है? क्या उम्मीद की जा सकती है कि जल्दी ही श्रमिक-किसान वर्ग संगठित होकर आन्दोलन की राह पकड़ेंगे? क्या पूंजीवाद कभी खत्म होगा और समाजवाद आयेगा?