गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

 कोरी विचारधाराएं नर्क बन जाती हैं!

रूसी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर लियोनिदोविच चिझेव्स्की पिछली सदी के महानतम वैज्ञानिकों में से एक हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी चिझेव्स्की न केवल एक प्रतिभाशाली आविष्कारक थे, बल्कि कॉस्मोबोलॉजी और हेलिओबोलॉजी के संस्थापक भी थे, जिन्होंने विश्व इतिहास की नई दार्शनिक समझ भी प्रस्तुत की थी।

(फोटो साभार―Prabook)

26 जनवरी, 1897 को एक फौजी अधिकारी के परिवार में जन्मे चिझेव्स्की ने अपनी युवावस्था में ही एक अद्भुत खोज की, जिसे सूर्य और पृथ्वी के पारस्परिक सम्बंध में बड़ी खोज कहा गया। चिझेव्स्की ने अपने इस अत्यंत महत्वपूर्ण शोध में बताया कि सूर्य में प्रत्येक 11 वर्ष के अंतराल पर आण्विक विस्फोट होते हैं और सूर्य पर जब-जब यह क्रिया घटती है, तब-तब पृथ्वी पर बड़ी क्रांतियां घटती हैं। चिझेव्स्की पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बताया कि पृथ्वी पर जीवन सूर्य की गतिविधि के साथ एक तरह से जुड़ा हुआ है, यह ब्रह्मांडीय बल है जो जीवमंडल में जीवन की प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है। सूर्य में 11 वर्ष की अवधि में दोहराई जाने वाली ये घटनाएं हमारे ग्रह पर प्रजनन की तीव्रता और जीवों की वृद्धि-दर को प्रभावित करती हैं। पृथ्वी पर जीवन का विकास स्थलीय और ब्रह्मांडीय कारकों की पारस्परिक प्रक्रियाओं का परिणाम है; लौकिक दुनिया और स्थलीय जीवमंडल की दुनिया एक साथ जुड़ी हुई है। ये विचार पहली बार 1915 में चिज़ेव्स्की द्वारा व्यक्त किए गए थे।
उन्होंने अपनी बात सिद्ध करने के लिए पिछले कई सौ वर्षों का ब्यौरा प्रस्तुत किया। भारत में तो पहले ही इस पर बहुत काम हुआ और हम मानते रहे हैं कि सुदूर अंतरिक्ष में घटित होने वाली खगोलीय घटनाएं पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं की कारक बनती हैं। चिझेव्स्की ने अपने इस शोध को 'हेलिओबायोलॉजी' कहा था। इसे आसान भाषा में सूर्य का जीव-जगत पर पड़ने वाला प्रभाव या इनका अंतर्सम्बंध कह सकते हैं। चिझेव्स्की का शोध विज्ञान की कसौटी पर खरा था। उनके शोध को बड़ी मान्यता मिली। उनको कई विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के लिए बुलाया गया। अमेरिका ने भी बुलाया। उनको 1939 में अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस ऑफ बायोलॉजिकल फिजिक्स एंड स्पेस बायोलॉजी का मानद सदस्य चुना गया। विद्वानों का मानना है कि वे सोवियत यूनियन में नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले व्यक्ति हो सकते थे लेकिन तब तक बहुत समय नष्ट हो चुका था और उनका शोध आगे न बढ़ सका। लेकिन उनके अपने देश रूस में क्या हुआ? वह समय था जब सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन का शासन था। कम्युनिस्ट सोवियत का विचार था कि क्रांतियां आर्थिक असमानता के चलते होती हैं। इसलिए उन्हें चिझेव्स्की का यह शोध हजम न हुआ। खुद को विज्ञानवादी कहने वाले कम्युनिस्टों ने चिझेव्स्की के विज्ञान पर विचार किया ही नहीं। उसका अध्ययन करने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
(फोटो साभार―wikipedia.org)

मार्क्स की थ्योरी को वैज्ञानिक बताने वाले उसके अनुयायियों को कुछ और कहां दिखता है। उनकी मान्यता है कि 'कार्ल मार्क्स ज्ञान की सर्वसत्ता हैं। उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता है। वही ध्रुवसत्य है।' इसी ग्रंथि के चलते स्टालिन ने सीधे कहा, "तुम्हारा शोध 1905 व 1917 में हुई हमारी क्रांति की अवधारणा के अनुकूल नहीं है। इसे बदल दो। हम अपनी व्याख्याएं संपादित नहीं कर सकते। न ही उससे इतर कोई तथ्य या व्याख्या स्वीकार कर सकते हैं।" चिझेव्स्की ने मना कर दिया। नतीजतन 1942 में चिझेव्स्की को गिरफ्तार कर लिया गया। तानाशाह स्टालिन उन्हें निश्चित ही मार देता, परंतु चिझेव्स्की के पिता रूसी सेना की आर्टिलरी के प्रमुख जनरल थे। इसलिए रहम करके जान बख़्श दी गई और उन्हें 8 साल जेल में बिताने पड़े। इस तरह इतने सालों तक उन्होंने अपने शोध की कीमत जेल में रहकर चुकाई। विचारधारा के कोरे अनुयायियों की वर्चस्ववादी सोच ने ज्ञान को ढांपने का प्रयास किया। इसीलिए कोरी विचारधारा नर्क है। बंधे-बंधाये विचार रूढ़िवाद और नर्क का मार्ग हैं क्योंकि विचारधारा का रूढ़िवाद ज्ञान के कपाट का उद्घाटन नकार देता है। सतत प्रवहमान नदी पोखर बन जाती है। विचारों से चित्त बनता है। चित्त से कर्म की प्रेरणा होती है और कर्म से व्यक्तित्व का निर्माण होता है लेकिन क्या मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसका अस्तित्व है? या जीवनी-शक्ति का महत्व अधिक है? जीवन तो प्रकृति प्रदत्त है, विचारधारा कृत्रिम और मानव समाज द्वारा विकसित है। विचारधारा के अंधेपन में जीवन को नकार देना त्रासदी है। ज्ञान को नकार देना आपदा है। विचार तो नाव की तरह होते हैं, जहां तक उनकी आवश्यकता हो वहीं प्रयोग करके, फिर वहीं छोड़ देना यथेष्ठ है। उसे अकारण बोझ की तरह ढोने का कोई मतलब नहीं। और कम से कम ज्ञान-विज्ञान को कोरी विचारधाराओं से बरी रखने से ही मानवजाति का भला हो सकता है।

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