बुधवार, 9 मार्च 2022

मनुस्मृति शूद्रों की पशुवत जीवन संहिता है

 

मनुस्मृति शूद्रों की पशुवत जीवन संहिता है


मनुस्मृति का विवेचनात्मक ढंग से अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि यह एक विवादास्पद रचना है जिसे किसी मनु नामधारी व्यक्ति ने लिखा था। हालांकि यह कहा जाता है कि यह वेदों की तरह ईश्वरीय वाणी है लेकिन यह सिर्फ एक मनगढ़ंत कहानी के अलावा कुछ भी नहीं है क्योंकि इसके अनेक प्रमाण इसमें ही अंतर्निहित हैं।

हिंदुओं की आचार संहिता बताये जाते रहे इस ग्रंथ की रचना सम्भवतः ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शताब्दी में की गई होगी।

यह सोचने को बाध्य करता है कि

यह: कश्चित्कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः।
सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि :
                                                        (2/7)
अर्थात्किसी का जो कोई भी धर्म मनु ने बताया है, वह सब वेद में बताया गया है, क्योंकि मनु संपूर्ण वेदों के ज्ञान से पूर्ण हैं।

इस तरह स्वयं को 'संपूर्ण वेदों के ज्ञान से पूर्ण' की गर्वोक्ति सामान्यतः लोक-शिष्टाचार के विरुद्ध है। यही नहीं

वेद: स्मृति: सदाचार: स्वस्य प्रियमात्मन:
एतच् चतुर्विधं प्राहु: साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।
                                                   (2/12)
अर्थात्वेद, स्मृति, सदाचार और [वैकल्पिक धार्मिक विधानों में] अपने मन की परितुष्टि इन चार प्रकार के लक्षणों को धर्मज्ञ मुनिजन धर्म का प्रत्यक्ष लक्षण बताते हैं।

अब यदि मान लिया जाये कि मनुस्मृति ईश्वरीय वाणी है तो फिर स्वयं ईश्वर को अपनी बात कहने के लिए धर्मज्ञ मुनिजनों का आश्रय लेना क्यों आवश्यक हुआ होगा?

इस चर्चित पुस्तक में जगह-जगह पर जहां परस्पर विरोधी बातें लिखी गई हैं, वहीं ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के प्रति सदाशयता और शूद्रों स्त्रियों के प्रति अमानवता का भी समावेश किया गया है। यदि सभी जीव-जंतुओं में परमेश्वर का वास है तो फिर इस ईश्वरीय वाणी में यह भेदभाव क्यों है? उसे तो सबके लिए एक समान होना चाहिए।

यह समझा जा सकता है कि ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मण/क्षत्रिय राजवंशों के प्रभुत्व वाले कालखंड में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों से इतर अनार्य शूद्रजनों को युद्ध में परास्त कर या फिर अन्य उपायों से अपना अधीनस्थ बनाया गया। यह पुस्तक बताती है कि उस काल में भी शूद्रजन कहीं-कहीं सत्ता में थे या फिर आर्य राजाओं के सेनापति न्यायाधीश जैसे उच्च पदों पर आसीन थे। इसका प्रमाण मनुस्मृति में ही उपलब्ध है

शूद्रराज्ये निवसेन् नाऽधार्मिकजनाऽऽवृते।
पाषण्डिगणाऽऽक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर् नृभि:।।
                                                                (4/61)
अर्थात्शूद्रों द्वारा शासित राज्य में निवास करे, अधार्मिक जनों से घिरे हुए जनपद में भी निवास करे।

जिस देश में धर्म की विवेचना शूद्र करें, वह कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है

यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम्।
तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरवि पश्यत:।।
                                                        (8/21)

आत्मश्लाघा से भरे मनुस्मृति के लेखक के भीतर अनार्य शूद्रों के प्रति क्रोध और घृणा का भाव इस स्तर तक पैठा हुआ है कि वह जहां एक ओर किसी भी अपराध के लिए ब्राह्मणों को मृत्युदंड से मुक्त रखता है, वहीं दूसरी तरफ शूद्रों को छोटे-मोटे अपराध के लिए भी कठोर पाशविक दंड देने की संस्तुति करता है। कुछ उदाहरण देखिये

शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दंडमर्हति।
वैश्योऽध्यर्धशतं द्वै वा शूद्रस्तु वधमर्हति।।
                                                (8/267)
अर्थात्ब्राह्मण को कटु वचन कहने वाले क्षत्रिय को 100 पण तथा वैश्य को 150/200 पण का दंड देने को बाध्य किया जाना चाहिए, परन्तु शूद्र को प्राणदंड देना चाहिए।

यदि शूद्र तिरस्कारपूर्वक ब्राह्मण के नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, तब उसके मुख में दस अंगुल लंबी लोहे की जलती हुई कील डालनी चाहिए

नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वत:
निक्षेप्योऽयोममय: शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाऽङ्गुल:।।
                                                                (8/271)

यदि शूद्र अभिमान से ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उसके मुँह और कान में राजा खौलता हुआ तेल डलवा दे

धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वत:
तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोते पार्थिव:।।
                                                    (8/272)

शूद्र जिस-जिस अंग से ब्राह्मण को मारे, उसे कटवा दिया जाना चाहिए। यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए (8/279-280)

यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे, उसके ऊपर पेशाब कर दे तब उसके होठों को और लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे

अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृप:
अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्धयतो गुदम्।।
                                            (8/282)

यह स्मृतिकार शूद्रों की हत्या को कुत्ता, बिल्ली, नेवला, मेंढक, कौआ आदि की हत्या से ज्यादा महत्व नहीं देता। उसका कहना है

मार्जारनकुलौ हत्वा चाषं मंडूकमेव च।
श्वगोधोलूककाकांश्च शूद्रहत्याव्रतं चरेत्।
(11/131)

अर्थात्बिल्ली, नेवला, नीलकंठ पक्षी, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है।

शूद्रजनों को सहस्त्राब्दियों तक शिक्षा से वंचित रखे जाने का 'ईश्वरीय ज्ञान' इसी ग्रंथ में वर्णित है। जिसे ' शूद्राय मति दानं' और ' चाऽस्योपदिशेद्धर्मं' (4/80) कहकर वर्जित कर दिया गया है। इस 'देवाज्ञा' का पालन नहीं करने वाले ब्राह्मण को नरक में डूबना पड़ता है

यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवाऽऽदिशति व्रतम्।
सोऽसंवृतं नाम तम: सह तैनेव मज्जति।।
                                                    (4/82)

जबकि अत्यंत धनाभाव में मरते हुए भी राजा को चाहिए कि वह वेद पढ़ने वाले ब्राह्मण से कोई कर ले और इसके राज्य में निवास करता हुआ वेदपाठी ब्राह्मण वृत्ति के अभाव से पीड़ित रहे

म्रियमाणोऽप्याददीत राजा श्रोत्रियात्करम्।
क्षुधाऽस्य संसीदेच् छ्रोत्रियो विषये वसन्।।
                                                            (7/133)

जिस राजा के राज्य में वेदाध्ययन करने वाला ब्राह्मण वृत्ति के अभाव से पीड़ित होता है, उसका वह राज्य भी शीघ्र ही वृत्ति के अभाव से पीड़ित होता है (7/134)

मनुस्मृति का लेखक शूद्रों को धन-सम्पत्ति धारण का अधिकार नहीं देता (8/417-418)

एक ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुस्मृति के प्रारम्भिक चरणों का लेखक शूद्रों से इस स्तर तक घृणा करता हुआ नहीं दिखाई देता है। वह कहता है

श्रद्दधान: शुभां विद्यामाददीताऽवरादपि।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि।।
                                                    (2/238)

अर्थात्श्रद्धावान मनुष्य लोकोपकारक उत्तम विद्या नीच से भी ले ले, शूद्रजन से परमधर्म को ग्रहण कर ले और निकृष्ट कुल से भी स्त्री रत्न लेना चाहिए।

उसका यह विचार निश्चित रूप से मानवीय मूल्यों को पुष्ट करता है

यदि त्वतिथिधर्मेण क्षत्रियो गृहमाव्रजेत्।
भुक्तवत्सु विप्रेषु कामं तमपि भोजयेत्।।
                                                        (3/111)

अर्थात्यदि वैश्य या शूद्र अतिथि रूप में ब्राह्मण के घर जायें तो उन्हें धर्मपूर्वक भृत्यों के साथ भोजन कराना चाहिए।

कुल मिलाकर यह पुस्तक ईश्वरीय वाणी के बहाने एक ऐसे पतनशील मानव समाज का निर्माण करने की संस्तुति करती है जिसमें कुछ लोग धर्माधारित श्रेष्ठ जातियों के रूप में फूले-फलें तथा शूद्र कहलाने वाले तिरस्कारपूर्वक पशुवत जीवन बिताने को विवश किये जायें।

 

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