इस 'बग्यूव' से देश की जनता दुर्दशा भोग रही है
मैं तब शायद चौथी-पांचवीं कक्षा में पढ़ता था, हमारे पिताजी को एक बार घर लौटने में देर हो गई। जाड़ों के मौसम में रात के नौ बज गए होंगे। अकेले थे दाहिने हाथ की उंगलियों में सुतली से बंधी तम्बाकू की दो सेर वाली पिंडी फंसी हुई थी और बायें हाथ में एक झोले में एक मोटी-सी पुस्तक थी। रास्ते में एक नाले के किनारे घात लगाकर बैठे गुलदार ने अचानक पिताजी पर पीछे से हमला कर दिया। उसके दोनों पंजे पिताजी के दोनों कंधों पर थे और थूथन बायें कान पर। बस, पिताजी ने दायां मुक्का पूरी ताकत से उसके थूथन पर दे मारा।
इस घटनाक्रम में उल्लेखनीय बात यह थी कि पिताजी जरा भी नहीं घबराये। हालांकि उनके दोनों कंधों पर गुलदार के नाखूनों के गहरे घाव थे और उसके नाखूनों से कोट कंधों से नीचे तक फट गया था।
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में एक शब्द प्रचलित है—बग्यूव! कहा जाता है कि जब बाघ किसी मनुष्य या पशु पर हमला करता है तो भय के मारे उसकी बुद्धि काम नहीं करती और वह बाघ के आगे समर्पण कर देता है, बदहवासी की इसी मनोदशा को 'बग्यूव' कहा जाता है।
आज ठीक ऐसी ही 'बग्यूव' जैसी दुर्दशा देश की जनता की हो गई लगती है।
आज आसुरी शक्तियां इस देश को हर तरह से तहस-नहस करने में जुटी हुई हैं, जिसे सभी देशवासी देख व समझ रहे हैं लेकिन इसका प्रतिकार करने के बजाय उन्हीं विनाशकारी लोगों के हाथों में खुद को सौंप दिया है।
जनता यह बात बिल्कुल भूल चुकी है कि उसने 2014 में तत्कालीन सत्ता को उखाड़ फेंक कर जिस आशा और विश्वास के साथ जिनके हाथों में देश की बागडोर सौंपी थी, वे उसकी पूर्ति कर भी रहे हैं या नहीं। लोगों का इस स्तर तक मतिहरण हो गया है कि वे सत्ताधारियों से सवाल पूछने की बजाय विपक्ष से पूछ्ते हैं। जबकि वे देख रहे हैं कि रोजी-रोटी, शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, रोजगार आदि तमाम जन-सरोकारों को बड़े सुनियोजित तरीके से हवा में उड़ाया जा रहा है।
आप सत्ताधारियों
के साथ खड़े होकर चाहते हैं कि विपक्ष आपकी आवाज बुलंद करे? वाह! खाने को लड़का और लड़ने को भतीजा? विपक्ष को शक्तिविहीन कर चाहते हैं कि वह आपकी लड़ाई लड़े!! धन्य हैं आप!!!
इसी सोच के कारण जनता एक ओर लगातार बढ़ती महंगाई व बेरोजगारी से त्रस्त है तो दूसरी तरफ सत्ताधारियों की गुंडागर्दी और टैक्स वसूली से परेशान है। देश में संवैधानिक संस्थाओं ने भी सत्ता के आगे घुटने टेक दिये हैं। न्यायिक व्यवस्था और सेना का भी राजनीतिकरण किया जा रहा है। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता समाप्त है। वह देख रहा है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में आचार संहिता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं फिर भी इसे वह चुपचाप अपना मौन समर्थन दे रहा है।
यह बाघ आदमखोर हो चुका है और लोग 'बग्यूव' से सम्मोहित होकर अपना अस्तित्व ही खतरे में डाल कर उसके आगे लम्बलेट हो रहे हैं। ■
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