रूस-यूक्रेन युद्ध सिर्फ आइसबर्ग की चोटी है
दुनिया आज परमाणु अस्त्रों की प्रेतछाया में जिस रूस-यूक्रेन युद्ध को दम साधे देख रही है, वह सिर्फ एक आइसबर्ग की चोटी की तरह है। जिसका एक छोटा-सा हिस्सा दिखाई दे रहा है जबकि सतह के भीतर बहुत कुछ अदृश्य है।
आगे बढ़ने से पहले थोड़ा पीछे चलते हैं। तो हो सकता है कि आपने 'इलुमिनाटी' का जिक्र जरूर सुना होगा। यह एक अत्यंत गुप्त संगठन है। दुनियाभर के हर धर्म, देश और धंधे की बड़ी-बड़ी हस्तियां इसकी सदस्य हैं। कहा जाता है कि दुनिया में जितने भी अमीर हैं उनमें से 70% लोग इस संगठन से जुड़े हुए हैं और माना जाता है कि इसका संचालन जर्मन मूल के यहूदियों का परिवार Rothschild और Rockefeller करते हैं। हालांकि आज तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया है कि इस संगठन को कौन चलाता है और इसका मुखिया कौन है?
चित्र—इलुमिनाटी का चिह्न बनाती दुनिया की कुछ मशहूर हस्तियां
इसके सदस्यों में दुनियाभर के सभी देशों के बड़े-बड़े पूंजीपति, नेता, सेलिब्रिटी, धर्मगुरु, एक्टर, एक्ट्रेस, बिजनेसमैन, बैंकर, क्रिकेटर आदि के अलावा लगभग सभी क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियां विभिन्न सम्प्रदायों के धर्मगुरु, इमाम, फादर, पास्टर, मुफ्ती, मुल्ला, मौलवी, मसीह, माजदा आदि शामिल हैं।
इस संगठन पर अक्सर राजनीतिक शक्ति और प्रभाव हासिल कर एक नई विश्व व्यवस्था स्थापित करने के लिए समाज के प्रभावशाली लोगों, बुद्धिजीवियों, सरकार और बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए वैश्विक स्तर पर घटनाओं तथा विश्व मामलों को नियंत्रित करने की साजिश रचने का आरोप लगाया जाता है। इसी क्रम में व्यापक रूप से ज्ञात और विस्तृत षड्यंत्रकारी के रूप में इलुमिनाटी को दर्जनों उपन्यासों, फिल्मों, टेलीविजन शो, कॉमिक्स, वीडियो गेम और संगीत वीडियो में प्रछन्न रूप में शक्ति के तार और लीवर खींचने वाले के रूप में चित्रित किया गया है।
विश्व का सबसे गुप्त और खतरनाक संगठन—
संगीत की दुनिया में सबसे ज्यादा मशहूर माइकल जैकसन भी इस संगठन के सदस्य थे। यह बात उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह दी थी। उसके दूसरे ही दिन उनकी मृत्यु रहस्यमय ढंग से हो गई। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की 22 नवंबर, 1963 को हुई हत्या के पीछे भी इसी संगठन का हाथ माना जाता है। जो अब भी अमेरिकी राजनीति के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है। सालों से खुफिया एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि उस हत्याकांड में किसका हाथ था लेकिन अब तक कुछ पता नहीं चल सका है। दरअसल, कैनेडी की हत्या से ठीक पहले एक संदिग्ध महिला दिखी थी, जिसके हाथ में खुफिया कैमरानुमा पिस्टल था। हत्या के साथ ही वह औरत जैसे आई थी, वैसे ही गायब हो गई। आज तक यह पता नहीं लग सका कि वह महिला कौन थी और कहां से आई थी। कई संगठनों को यकीन है कि गुप्त संगठन इलुमिनाटी ही इसके पीछे है और वह रहस्यमयी महिला इसी से जुड़ी हुई थी।
इस संगठन की कार्यप्रणाली अत्यंत गोपनीय है। इससे जुड़े लोग चिह्नों और संकेतों के माध्यम से इसका अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार-प्रसार करते हैं और कभी किसी से इस संगठन का सदस्य बनने के लिए नहीं कहते।
इस संगठन की स्थापना जर्मनी के रहने वाले प्रोफेसर एडम विशॉप्ट (1748-1830) ने बेवेरिया शहर में की थी और इसे 'परफेक्टिबिलिस्ट' नाम दिया गया। एडम का मानना था कि चर्च और कैथोलिक विचारों के कारण समाज खुलकर नहीं जी पा रहा है। इसीलिए उन्होंने हर तरह की धार्मिक बंदिशों से मुक्त एक संगठन तैयार करने के बारे में सोचा। इसी के साथ गुप्त संगठन इलुमिनाटी की नींव रखी गई। माना जाता है कि मई 1776 में प्रोफेसर एडम के नेतृत्व में इसके सदस्यों की पहली बैठक हुई, जिसमें यूनिवर्सिटी के 5 लोग शामिल थे। जल्द ही इसके सदस्य बढ़ते चले गए और साल 1784 में इसके लगभग 3000 सदस्य हो चुके थे। इसके एक शुरुआती कर्मठ सदस्य और कानून के छात्र मैसेनहौसेन के नाम पर इन लोगों को फ्रीमेसनरी कहा जाने लगा।
चित्र—प्रोफेसर एडम विशॉप्ट
इसकी शुरुआती अवधि के दौरान इसके सदस्यों में प्रभावशाली बुद्धिजीवियों और प्रगतिशील राजनेताओं को शामिल किया गया जिनके तीन स्तर—नौसिखिए, मिनरवल और इल्यूमिनेटेड मिनरवल थे। संगठन का लक्ष्य अंधविश्वास, अश्लीलता, सार्वजनिक जीवन पर धार्मिक प्रभाव और राज्य सत्ता के दुरुपयोग रोकना था। इसके लोगों का मानना था कि दुख में खुदकुशी सही चुनाव है। इलुमिनाटी के सदस्य गलती करने वालों को मौत की सजा देने पर यकीन रखते थे। साथ ही यह कि धर्म पर यकीन करने वाले मूर्ख हैं और उन्हें सजा मिलनी चाहिए।
बाद में यह अपने लक्ष्य से भटककर समाज में शक्तिशाली बनने की ओर चल पड़ा। इसका नाम 'The order of Illuminati' रखा गया। इसके सदस्य शैतान लुसिफर की पूजा करने लगे। आज भी इस संगठन से जुड़ने के लिए अपनी आत्मा को शैतान लुसिफर को सौंपना पड़ता है। माना जाता है कि ऐसा करने वाले अपने काम में सफल होते हैं और अन्य लोगों के मुकाबले वे अपने जीवन में बहुत जल्दी सफलता प्राप्त कर बहुत अमीर और ताकतवर बन जाते हैं। इसीलिए अत्यंत महत्वाकांक्षी लोग इसके सदस्य बन जाते हैं।
इलुमिनाटी समुदाय का चिह्न एक त्रिकोणीय पिरामिड है जिसके ऊपर शैतान की एक आंख बनी हुई है।
इलुमिनाटी का एजेंडा 2030—
इनकी दुरभिसंधियों का शिकार भारत अकेला देश नहीं है। आज मोदी जी जो कुछ भी बोलते और करते हैं वह संरा (UNO) के 17 सूत्रीय नई विश्व-व्यवस्था के निर्धारित कार्यक्रम का ही हिस्सा होता है। वह चाहे किसानों की आय दोगुनी करने वाली बात हो या निजीकरण की सूनामी हो, बड़े-बड़े पूंजीपतियों के बैंक ऋण का एनपीए हो, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के बजट में लगातार कटौती हो, हर मुद्दे पर मोदी जी सिर्फ और सिर्फ उसी विश्व-व्यवस्था के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं।
हालांकि एजेंडा 2030 में दुनिया के तमाम देश जुड़े हैं लेकिन आश्चर्यजनक है कि मोदी सरकार उस एजेंडे के अंतर्गत तय किये गए टाइम टेबल से पहले ही सारे लक्ष्य पूरा करने में जुटी हुई दिखती है। याद कीजिये इन्होंने ज्यादातर लक्ष्य 2022 के लिए निश्चित किये हुए हैं।
इलुमिनाटी द्वारा नियंत्रित वैश्विक बाज़ारी ताकतों के दबाव से ही इस सरकार को कृषि क्षेत्र की सब्सिडी चुभ रही थी। इसीसे सरकार को विवादास्पद कृषि कानून लाने पड़े क्योंकि इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण सब्सिडी कृषि क्षेत्र की थी जिसे खत्म किये बिना इन अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का लक्ष्य पूरा हो ही नहीं सकता था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत खाद्य पदार्थों, दवाइयों और उपभोक्ता वस्तुओं का बड़ा उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों है। यह वैश्विक बाज़ारी ताकतों के लिए सोने का अंडा देने वाली स्थिति थी, तो वे इसे हाथ से कैसे जाने देतीं।
इस पूरी शोषणकारी व्यवस्था को समझने के लिए दुनिया के वर्तमान परिदृश्य को भी समझना जरूरी है जिसने अमेरिका के नेतृत्व में दुनियाभर में उपभोक्तावाद को बढ़ावा देकर अपनी तिजोरियां भरने का इंतजाम किया। जहां संसार की सबसे धनाढ्य यहूदी लॉबी का दुनिया में सबसे अधिक धनोपार्जन करने वाले व्यापार—हथियार व सैन्य साजो-सामान, फार्मा, तेल, मोटरकार व वायुयान निर्माण तथा बैंकिंग जैसे उद्योगों पर कब्जा है। यही नहीं वे हॉलीवुड के फिल्म उद्योग और समाचार माध्यमों पर भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। इनकी माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, पेप्सी, एप्पल आदि जैसी दिग्गज कंपनियों और मीडिया घरानों की बदौलत ही अमेरिका दुनिया पर राज करता है।
लेकिन इसी बीच चीन बहुत तेजी से परिदृश्य में उभर आया और उसने सारे समीकरण उलट-पलट कर दिए। आज चीन दुनिया की बड़ी फैक्ट्री बन चुका है और बड़ी ताकत भी। इसके साथ ही उसने दुनिया का थानेदार बने घूमने वाले अमेरिका के सामने जबरदस्त चुनौती पेश कर दी है। इससे सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया फिर से दो ध्रुवीय हो गई है।
एक खेमा अमेरिकी नेतृत्व में इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व अन्य नाटो देशों का है तो चीन, रूस, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान तथा कुछ अन्य मुस्लिम देशों का है। भविष्य में इसमें काफी बदलाव भी हो सकते हैं, क्योंकि सबसे पहले आर्थिक फायदे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। गुट निरपेक्ष आंदोलन के नेपथ्य में चले जाने पर भी एक तीसरा खेमा बचा है जिसके बारे में यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है।
इलुमिनाटी समूह उपरोक्त वैश्विक संस्थाओं तथा आर्थिक ताकत के बल पर दुनियाभर में सरकार बनाने, चलाने और उन्हें गिराने का खेल खेलता आया है। इसके लिए यह अपने विभिन्न मुखौटों का इस्तेमाल करता है। यदि इतिहास में अधिक पीछे न भी जाकर केवल सत्तर-अस्सी साल के कालखंड पर निगाह डालें तो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लड़े गये सभी छोटे-बड़े युद्धों के बीच प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अमेरिका की मौजूदगी का कारण समझना आसान हो जाता है। क्या वर्तमान रूस-यूक्रेन युद्ध का कारण अमेरिका नहीं है?
चित्र—रॉथ्सचाइल्ड परिवार
एजेंडा 2030 पर सारे देश अपनी घरेलू नीतियों में संतुलन बैठा रहे हैं—
चर्चित एजेंडा 2030 पर भारत ही नहीं बल्कि बहुत सारे देशों ने दस्तखत किए हुए हैं, इसीलिए ये सभी इस एजेंडे के साथ अपनी घरेलू नीतियों में संतुलन बैठा रहे हैं या इसकी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शायद इस 17 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने में भारत की सरकार सबसे आगे है जो समय से पहले इस चार्टर को देश में लागू करने में जुटी हुई है। सम्भवतः इसका एक कारण आरएसएस का अमेरिकी तथा इस्राइली यहूदियों से प्रेम है।
इसी जल्दबाजी में जनजातीय क्षेत्रों की ज़मीन का मसला हाइकोर्ट के एकतरफा निर्णय से सलटा लिया गया है और बिना किसी दबाव के देश के जल-जंगल-जमीन, खनिज सम्पदा, समुद्र, पहाड़, नदी, तालाब, आकाश, पाताल, मानव संसाधन यानी सबकुछ चंदा देने वाले प्रमुख पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है।
ऐसा केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे संसार में किया जा रहा है। जिसका नियंत्रण अमेरिका और उसके मित्र देशों के हाथों में है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि इलुमिनाटी समूह आदमखोर बन गये भूखे शेर की तरह है जिसके सामने तीसरी दुनिया के देशों की स्थिति खूंटे से बंधी बकरी जैसी बना दी गई है। ■
(आप चाहें तो इस लेख को निम्नलिखित लिंक पर जाकर भी पढ़ सकते हैं—
https://janchowk.com/beech-bahas/russia-ukrane-war-is-just-a-tip-of-iceberg/




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