सावरकर का हिंदुत्व
आज विनायक दामोदर सावरकर की शिक्षा और उनके हिंदुत्व को समझने की बहुत जरूरत है क्योंकि उनका हिंदुत्व मर्यादा, सिद्धांत, आदर्श, नैतिकता, परंपरा, मानवीय मूल्य, नियम, कानून, संविधान जैसे सामाजिक समरसता के मूलभूत तत्वों और इतिहास का दुश्मन है।
सावरकर का ऐसा हिंदुत्व सनातन धर्म और इसके महान गुणों को कलंकित करने वाला है लेकिन आज सत्ता के मद में चूर एक वर्ग द्वारा देश में ऐसे ही हिंदुत्व की वकालत की जा रही है तो क्या हिंदुओं को मर्यादा, आदर्श, नैतिकता, परंपरा, मानवीय मूल्य, सिद्धांत, नियम, कानून, संविधान को भुला देना चाहिए? क्या हजार-पांच सौ साल पहले की सच्ची-झूठी कहानियों पर विश्वास कर उनका प्रतिशोध वर्तमान पीढ़ी से लिया जाना चाहिए?
सावरकर के अनुसार रावण का कहना था कि पराई स्त्रियों से बलात्कार करना राक्षसों का धर्म है। वे छत्रपति शिवाजी को भी इस बात के लिए ताना मारते हैं कि उन्होंने युद्ध में जीती गई मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार नहीं कराया।
मुस्लिम स्त्रियों को सम्मान सहित उनके परिवार को वापस करने की शिवाजी की उदारता को सावरकर सद्गुण की जगह दुर्गुण मानते हैं।
सावरकर का हिंदुत्व रावण की बुराइयों को अपनाने का न्योता देता है और शिवाजी की अच्छाइयों को कमजोरी मानता है।
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प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक—6 स्वर्णिम पृष्ठ के 150वें पृष्ठ पर यह उद्धरण देखिए—
'४४१. रावण द्वारा सीता का अपहरण किये जाने के बाद जब श्रीराम ने आक्रमण किया, तब प्रत्यक्ष युद्ध से पहले रावण को उसके कुछ हित-चिंतक उपदेश करने लगे कि देखो, तुम्हारे इस अन्यायी कृत्य से हमारे राक्षस राज्य पर इस युद्ध का भयंकर संकट आया है। पर-स्त्री का अपहरण करना अधर्म है, इसलिए तुम यह अधर्म मत करो। सीता को सम्मानपूर्वक रामचंद्र को लौटा दो।'
'यह सुनकर रावण ने क्रोधित होकर उत्तर दिया—"क्या कह रहे हैं आप? पर-स्त्रियों का अपहरण उनके साथ बलात्कार करना अधर्म है? अरे महाशय! 'राक्षसानां परो धर्मः परदारविघर्षणम्।
(अर्थात्—दूसरों की स्त्रियों का अपहरण कर उनके साथ बलात्कार करना ही तो हम राक्षसों का परमधर्म है।)"
यहां सावरकर रावण के हवाले से दूसरों की स्त्री से बलात्कार करने वाले राक्षसों का धर्म अपनाने की सिफारिश करते हैं। आगे चलकर वह इसी पुस्तक में पृष्ठ 153 पर शिवाजी का उदाहरण देते हैं—
'४४८. शत्रुस्त्री-दाक्षिण्य जैसी राष्ट्रघातक और कुपात्र प्रयुक्त प्रवृत्तियों की घटनाओं के ऐसे हजारों उदाहरणों में से दो प्रमुख उदाहरण देना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। छत्रपति शिवाजी महाराज ने कल्याण के सूबेदार की मुसलिम बहू को बेटी मानकर सालंकृत पति के पास सम्मानपूर्वक भेज दिया और पराभूत पुर्तगाली किलेदार की शत्रु-स्त्री को भी चिम्माजी अप्पा (पेशवा) ने उसी प्रकार सम्मानपूर्वक उसके पति के पास वापस भेज दिया।
इन दोनों घटनाओं का गौरवास्पद उल्लेख हम आज भी सैकड़ों बार बड़े अभिमानपूर्वक करते हैं; परंतु शिवाजी महाराज अथवा चिम्माजी अप्पा को उन पराजित मुसलिम स्त्रियों का सम्मान करते समय थोड़ा भी स्मरण नहीं हुआ कि महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी आदि मुसलिम सुलतानों ने दाहिर की राजकन्याओं, कर्णवती के राजा कर्ण की पत्नी कमलादेवी, कन्या देवलदेवी आदि हजारों हिंदू राजकन्याओं पर किये हुए बलात्कार और लाखों हिंदू स्त्रियों पर भयंकर अत्याचार किये गये थे। यह क्या आश्चर्य की बात नहीं है?'
सावरकर आगे लिखते हैं—'हे शिवाजी अथवा हे चिमाजी अप्पा! आप हमारे ऊपर मुस्लिम सरदार और सुल्तानों द्वारा किए हुए अत्याचार और बलात्कारों को कदापि मत बोलिये। आप उन मुस्लिम अत्याचारियों के मन में ऐसी दहशत ऐसा आतंक उत्पन्न करें कि हिंदुओं की विजय होते ही उनकी मुस्लिम स्त्रियों की भी वैसे ही दुर्दशा की जायेगी जैसी उन्होंने हमारी की थी।'
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यहां एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इतिहास में ठीक वैसा ही नहीं हुआ जैसा सावरकर लिख रहे हैं। वे जानबूझकर मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ खलनायक के तौर पर पेश कर रहे हैं, जबकि अपवाद हिंदू और मुस्लिम दोनों तरफ से थे।
लेकिन स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि किसी शत्रु-स्त्री का बलात्कार न करने की परंपरा हिंदुओं का एक दुर्गुण है। और इस दुर्गुण के लिए वे रावण की तारीफ कर रहे हैं, जबकि यह दुर्गुण न निभाने के कारण छत्रपति शिवाजी की आलोचना कर रहे हैं।
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ऐसे भ्रष्टबुद्धि और विकृत मानसिकता से ग्रस्त लोगों के पदचिह्नों पर चलने वाले ये स्वघोषित 'धर्म-रक्षक' इस देश को गौरवान्वित नहीं कर सकते। उनकी सोच विकृत है। वे हर अच्छी चीज को तहस-नहस करना अपना धर्म समझते हैं क्योंकि वे चीजों को एकांगी दृष्टि से देखते हैं। जबकि इतिहास को समझने के लिए तत्कालीन समाज और परिस्थितियों के गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है। ■

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