मनुस्मृति के मुद्रण का इतिहास
संस्कृत साहित्य का देवनागरी लिपि में सर्वप्रथम मुद्रण कविकुल गुरु कालिदास के संस्कृतग्रंथ ऋतुसंहार का ईस्वी सन् 1791 में होने का प्रमाण मिलता है। उससे पहले पालि व संस्कृत का सभी साहित्य या तो मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा या फिर हस्तलिखित पांडुलिपि में संग्रहित कर रखा गया।
पांडुरंग वामन काणे ने 'धर्मशास्त्र का इतिहास' नामक ग्रंथ में लिखा है कि मनुस्मृति का भारत में सर्वप्रथम मुद्रण 1813 में कोलकाता में हुआ था। काणे ने मनुस्मृति के उक्त मुद्रण के बाद इसके अनगिनत संस्करण प्रकाशित होने की बात भी लिखी है। उसके बाद इसका पुनर्मुद्रण 1830 में कोलकाता से ही किया गया।
इसके 28 वर्ष बाद मनुस्मृति का एक संस्करण ईस्वी सन् 1858 में मुम्बई में सदाशिव शेटहे के छापेख़ाने में भी मुद्रित हुआ था। उसके भी ठीक 28 वर्ष बाद 1886 ई. में नारायण विश्वनाथ मांडलीक ने सात व्याख्याओं के साथ मनुस्मृति को 'मानवधर्मशास्त्रम्' नाम से प्रकाशित किया था।
इसी बीच जूलियस जॉली ने मेधातिथि, गोविन्दराज, नारायण, राघवानंद, नंदन और एक अज्ञातनामा कश्मीरी पंडित की तीन अध्याय तक की मनुस्मृति की व्याख्याओं का संक्षिप्त संग्रह 1885-89 ई. में एसियाटिक सोसाइटी से प्रकाशित करवाया था।
नारायणराम आचार्य द्वारा संशोधित और 'निर्णय सागर मुद्रणालय' से मन्वर्धमुक्तावली सहित 1946 ई. में प्रकाशित मनुस्मृति अत्यंत प्रसिद्ध और प्रचलित है।
इसके उपरांत हिंदुओं द्वारा एक आचार-संहिता के रूप में मान्य इस ग्रंथ के अनेक संस्करण आये परंतु उन सबमें श्लोकों की संख्या अलग-अलग है।
नारदीयमनुस्मृति के वृद्धपाठ में सुमति भार्गव द्वारा मनुस्मृति का 4,000 श्लोकों में संक्षिप्तीकरण किये जाने का उल्लेख मिलता है परंतु आधुनिक इतिहासकारों द्वारा वर्तमान मनुस्मृति को उतना प्राचीन नहीं माना जाता। अतः इस समय उपलब्ध मनुस्मृति में 2,684 श्लोक ही मिलते हैं।
पांडुरंग वामन काणे ने 'धर्म शास्त्र का इतिहास' नामक ग्रंथ में कहा है कि मनुस्मृति की रचना ईस्वी पूर्व दूसरी शताब्दी तथा ईसा के उपरांत दूसरी शताब्दी के बीच कभी हुई होगी। संभवतः ईस्वी पूर्व दूसरी शताब्दी एवं ईसा के उपरांत दूसरी शताब्दी के बीच भृगु ने मनुस्मृति का संशोधन किया। तभी यह कृति प्राचीन ग्रंथ के संक्षिप्त तथा परिवर्तित रूप में उपलब्ध हुई। ■
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