—रामाशीष यादव
हिंदुओं द्वारा श्रीराम का जन्मदिन राम नवमी के नाम से मनाया जाता है। यह दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को पड़ता है। इस तिथि को श्रीराम जन्मदिन कब से मनाया जा रहा है और श्रीराम का जन्म कब हुआ था, आइए इस विषय पर अब तक उपलब्ध तथ्यों/साक्ष्यों पर विचार करते हैं। क्या दशरथ पुत्र राम ऐतिहासिक व्यक्ति थे?
1. परम्परागत रूप से श्रीराम का जन्म त्रेता युग में हुआ माना जाता है। ग्रंथों में युग की परिभाषा विभिन्न प्रकार से मिलती है। एक युग पांच वर्ष से लेकर लाखों वर्ष तक को कहा गया है। पौराणिक साहित्य में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक चतुर्युगी में 43,20.000 वर्ष होते हैं जिनमें कलियुग के 4,32,000 वर्ष, द्वापर के 8,64,000 वर्ष होते हैं। राम का जन्म त्रेता के अंत में हुआ माना जाता है। कलयुग के 5,100 वर्ष, द्वापर के 8,64,000 वर्ष तथा राम के जीवन के 11,000 वर्ष मिलाकर 8,80,100 वर्ष होते हैं। इस तरह राम जन्म आज से 8,80,100 वर्ष पूर्व हुआ होगा। हलांकि बाल्मीकि रामायण में एक स्थान पर एक हजार वर्ष को टीका लिखने वाले ने एक हजार दिन माना है और उससे "बहुत दिन से" अर्थ लगाते हैं।
2. डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक (वास्तव रामायण-मराठी) का कहना है कि वाल्मीकि रामायण में एक स्थल पर विंध्याचल तथा हिमालय की ऊंचाई समान बताई गई है। विंध्याचल की ऊंचाई आजकल 2,467 फीट है तथा यह प्राय: स्थिर है जबकि हिमालय की ऊंचाई 29,029 फीट है। विशेषज्ञों की मान्यतानुसार हिमालय एक सौ वर्षों में तीन फीट बढ़ता है। अत: इस गणना के अनुसार हिमालय को इतना बढ़ने में 8,85,400 वर्ष लगे होंगे। लेकिन डॉ. वर्तक स्वयं ही लिखते हैं कि इसकी पुष्टि और किसी स्रोत से नहीं हो पाती है। जब मैं पांचवी कक्षा में था तब एवरेस्ट की ऊंचाई 29,002 फीट पढ़ाया गया था। अब साठ वर्ष में 27 फीट की बढ़ोत्तरी हुई है या कि नापने में गलती थी/है। यदि नापने की गलती है तो वृद्धि का सिद्धांत भी त्रुटि से परे कैसे हो सकता है? इस विषय पर और अध्ययन की आवश्यकता लग रही है।
3. अब आइये प्रचलित वाल्मीकि रामायण के अंत: साक्ष्य के अनुसार इस समस्या पर विचार करते हैं। बालकाण्ड के सर्ग 18 के श्लोक 8-10 तक राम जन्म की जानकारी दी गई है। इस जानकारी के अनुसार, "यज्ञ समाप्ति के पश्चात छः ऋतुएं बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वशु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौसल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्व लोक वंदित राम को जन्म दिया।उस समय पांच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान पर विद्यमान थे।"
प्राय: सभी विद्वानों के अनुसार यह पांच उच्च ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र थे। इसका आधार सिर्फ राम जन्म सम्बंधी श्लोक न होकर अन्य भाइयों के जन्म सम्बंधी श्लोक को मिला जुलाकर है। इन्हीं श्लोकों के आधार पर राम जन्म तिथि निकालने का बहुत सारे लोगों ने प्रयास किया है। आइये इन तिथियों को समझते हैं—
4. डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक (उपरोक्त) ने उक्त श्लोकों के आधार पर राम जन्म की तिथि ईपू. 4-12-7323 (दिन में 1:30 बजे से 3:00 बजे) निकाली है। प्रो. तोबयस के अनुसार यह तिथि 10-01-5114 ईपू. 12:25 मिनट है। वर्ष 2004 में 'आई सर्वे' के एक शोध दल ने 'प्लेनेटेरियम गोल्ड' सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके जन्मतिथि 10-01-5114 सिद्ध किया है लेकिन यह तिथि इसलिए संदेहास्पद है क्योंकि उक्त सॉफ्टवेयर 3000 ईपू. से पहले का सही ग्रह गणित करने में सक्षम नहीं है। इस गणना द्वारा प्राप्त ग्रह-स्थिति में शनि वृश्चिक में था अर्थात उच्च (तुला) में नहीं था। चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र में न हो कर पुष्य के द्वितीय चरण में ही था और तिथि भी अष्टमी ही थी। बाद में एक विशेषज्ञ द्वारा 'ejplde431' सॉफ्टवेयर से गणना करने पर नवमी तिथि की पुष्टि होती है परंतु शनि वृश्चिक में ही आता है तथा चन्द्रमा पुष्य के चतुर्थ चरण में। (2013 से पूर्व 3000 ईपू. से पहले ग्रह गणित करने का सॉफ्टवेयर उपलब्ध ही नहीं था)। अत: 10-01-5114 ईपू. की तिथि वस्तुत: राम की जन्मतिथि सिद्ध नहीं हो पाती है। ऐसी स्थिति में अब डॉ. वर्तक द्वारा पहले ही परिशोधित तिथि सॉफ्टवेयर द्वारा प्रमाणित हो जाये तभी राम जी का वास्तविक जन्मदिन प्राय: सर्वमान्य हो पायेगा अथवा प्रमाणित न हो पाने की स्थिति में नवीन तिथि के शोध का रास्ता खुलेगा अथवा हिन्दू धर्म ग्रंथों में वर्णित तिथि ही सर्वमान्य प्रमाण हो सकती है, इत्यादि। इन सब तिथियों में से किस एक को सही माना जाय तो क्यों?
उक्त तिथियां आर्यों के भारत में प्रवेश करने से पूर्व की हैं। जब आर्यों ने भारत में प्रवेश ही नहीं किया था तो आर्य परिवार से सम्बंधित माने जाते दशरथनन्दन राम का जन्म भारत में कैसे हुआ, यह यक्ष प्रश्न है?
5. अब चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी की बात की जाए। देश में प्राय:नवरात्रि मनाने की परंपरा है। यह सुर-असुर विवाद के कारण हुए युद्ध के कारण मनाया जाता है। ऋग्वेद में सुर शब्द ही नहीं है। इसका अर्थ है कि यह सुर-असुर का झगड़ा बहुत बाद का लग रहा है। यह युद्ध दो वर्गों के बीच की लड़ाई थी, जब एक ही असुर वर्ग के लोग दो अलग-अलग विचारधारा में बँट गये होंगे। वैसे भयंकर सुरापायी को सुर कहा जाता था और जो सुरा नहीं पीते थे उन्हें असुर, इस आशय के कई श्लोक मिल जाते हैं। इस मामले के विस्तार में नहीं जा रहा हूं फिर भी आजकल इस पर कुछ मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। अष्टमी को कन्याओं को भोजन कराया जाता है लेकिन मैं एक दूसरी बात बताना चाहता हूं। मेरा गांव बिहार की सीमा से ज्यादा दूर नहीं है। अतः बिहार की तमाम परम्पराओं को स्वत: ही वहां मान्यता मिल जाती है। मेरे गांव और आसपास के बहुत सारे गांवों में अष्टमी के दिन सायंकाल एक जगह एकत्र होकर (अधिकतर किसी धार्मिक स्थल पर जो हर गांव में होता ही है) पूजा करते हैं और वह भी गेहूं के आटे से परांठेनुमा रोटी बनाकर। ये पराठें उस समय नास्ते का काम देते हैं। उसके बाद देर रात तक पूरी और खीर बनता है और पूजा-पाठ करके फिर लोग खाना खाते हैं। अगले दिन अर्थात नवमी के दिन कोई खास कार्यक्रम नहीं होता बल्कि खाना भी देर रात वाला ही काम आता है। उस दिन पहले कुछ लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे परंतु अब वह परंपरा समाप्त हो गयी प्रतीत होती है। मैं अष्टमी की बात करना चाहता हूं। अष्टमी को राम नवमी के ऊपर महत्व देने का कारण समझ में नहीं आया। फिर मैंने अभी कुछ दिन पहले हिन्दू पंचांग देखा कि अष्टमी के बारे में वहां क्या बताया गया है? वैसे तो इसमें कई बातें दी गई हैं परंतु मेरा ध्यान 'अशोकाष्टमी' की तरफ गया। यह अशोकाष्टमी क्या है? कहीं यह सम्राट अशोक का जन्मदिन तो नहीं है? यह बहुत संभव है। इस तिथि का अशोक के वृक्ष से कोई मतलब तो नहीं दिखता भले निकालने वाले निकाल लें।जिस तरह मनाने का तरीका है वह जन्मदिन वाला ही है अर्थात खीर-पूड़ी बनाना और देर रात तक बनाना खाना।
6. राम को विष्णु का अवतार मानकर पूजा कबसे प्रारंभ हुई? इस विषय में सत्यकेतु विद्यालंकार की पुस्तक 'प्राचीन भारत' के पृष्ठ 101 में लिखा है—"गुप्त युग में राम को भगवान विष्णु का अवतार मानकर पूजा करने की प्रवृत्ति इस समय तक प्रचलित नहीं हुई थी। कृष्ण की पूजा का उल्लेख इस युग के बहुत से शिलालेखों में पाया जाता है पर राम की पूजा के सम्बंध में कोई ऐसा निर्देश इस युग के अवशेषों में उपलब्ध नहीं होता, यद्यपि राम के परम पावन चरित्र के कारण उसमें भगवान के अंश का विचार इस समय में विकसित होना आरंभ हो गया था। कालीदास ने इसका निर्देश किया है पर राम की पूजा भारत में छठी सदी के बाद में ही शुरू हुई।"
गुप्त युग से पूर्व शिव प्रमुख देवता/ईश्वर थे परन्तु गुप्त युग में कृष्ण प्रमुख देवता/ईश्वर हो गए। इससे स्पष्ट है कि राम की पूजा छठी सदी या उसके बाद ही प्रमुख रूप से आरंभ हो पाई।
ऋग्वेद में राम को एक स्थल पर राम असुर कहा गया है। आजकल जो अर्थ असुर से लगाया जाता है वह वैदिक काल में नहीं था। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि ऋग्वेद में सुर शब्द ही नहीं है जबकि सुर और असुर एक-दूसरे के विपरीत माने जाते हैं। वैदिक काल में देवताओं को भी असुर की श्रेणी में रखा गया है। सुर-असुर का विभाजन बाद के दिनों का लगता है।
अतः वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा राम कथा सम्बंधी गाथाएं प्रसिद्ध हो चुकी थीं, इसका निर्देश विस्तृत वैदिक साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता है। अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम रामायण के पात्रों के नामों से मिलते हैं; इससे इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये नाम प्राचीन काल में भी प्रचलित थे।"
वैदिक साहित्य की रचना ईपू. 1700 से लेकर आगे गौतम बुद्ध के पूर्व तक मानी जाती है। अतः राम जन्म तिथि के बारे में वैदिक साहित्य से कोई अटकल लगाना खतरे से खाली नहीं है।
8. बाल काण्ड और उत्तर काण्ड बहुत बाद में वाल्मीकि रामायण में जोड़े गये हैं। बाल काण्ड के बारे में अनुमान है कि वह ईपू. 100 के आसपास वाल्मीकि रामायण में जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि सम्पूर्ण बालकाण्ड एक बार में जोड़ा गया है। इसे भी कई बार में जोड़ा गया है।जिन श्लोकों के आधार पर राम जन्म की गणना की जा रही है, वे श्लोक रामायण के तीन पाठों में से सिर्फ एक पाठ (दक्षिणात्य पाठ) में ही पाये जाने के कारण प्रक्षिप्त माने जाते हैं। अब ये देखना दिलचस्प है कि यह श्लोक कब रामायण में जोड़ा गया।
प्रस्तुत श्लोक में कर्क राशि का वर्णन है।सात वार तथा 12 राशियों का विचार विदेशी है। राशियों का प्रचलन बेबीलोनी (खाल्दियाई) ज्योतिष में हुआ था।खाल्दियाई राशि नामों को, साथ में फलित ज्योतिष को भी, यूनानियों ने अपनाया।सेल्यूकी साम्राज्य के दौरान बाद में शकों के साथ भारत में खाल्दियाई-यूनानी ज्योतिष (साथ में फलित ज्योतिष, राशि चक्र तथा सात वारों) को प्रवेश मिला।
कुछ प्राचीन आख्यानों से स्पष्ट है कि भारत में खाल्दियाई-यूनानी ज्योतिष का आगमन, फलित ज्योतिष भी, शकद्वीपी ब्राह्मणों के जरिए हुआ। वराहमिहिर (ईसा की छठी शताब्दी) संभवतः शकद्विपी शक ब्राह्मण थे। आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) को भी यूनानी ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था। (देखें गुणाकर मुले की पुस्तक 'आकाश दर्शन')।
अतः स्पष्ट है कि वार और राशि का प्रवेश भारत में बाद में हुआ है और इसके प्रचलित होने में समय लगा होगा। फादर कामिल बुल्के का अनुमान है कि यह श्लोक पांचवीं सदी ईस्वी अथवा इसके बाद का प्रक्षेप है।
निष्कर्ष तो यही निकलता है कि राम जन्म की यह तिथि संदिग्ध है।
जहां तक राम की ऐतिहासिकता की बात है, श्रीलंका, जिसे वाल्मीकि रामायण में लंका लिखा गया है, के प्राचीन ऐतिहासिक पुस्तकों महावंस और दीप वंस में कहीं भी दशरथनन्दन राम और रावण का नाम नहीं मिलता है। इस तरह न राम और न रावण ही ऐतिहासिक व्यक्ति सिद्ध हो पाते हैं। प्रक्षेपण का यह हाल है कि रावण को बौद्धों ने बौद्ध धर्म का सिद्ध कर दिया और गौतम बुद्ध को लंका में जाकर रावण को उपदेश देना बता दिया। दरअसल सिंहल द्वीप को लंका नाम संभवतः बौद्धों का ही दिया गया लगता है।
इसी के साथ राम नवमी की सभी को अनन्त शुभकामनाएं क्योंकि भारत का संविधान सभी धर्मों को मानने के लिए छूट देता है। हालांकि साथ में वैज्ञानिक/तर्क के विकास की भी बात करता है। ■
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