'द कश्मीर फाइल्स' दंगाई मानसिकता को बढ़ावा देने वाली एक घटिया हरकत है
'द कश्मीर फाइल्स' फिल्म पर चर्चाओं का दौर जारी है, जिसे कुछ लोग ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित बता रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है।
यह बड़ी विचित्र बात है कि जो कश्मीरी पंडित सदैव से ही जम्मू कश्मीर की राजनीति, प्रशासन और अर्थतंत्र पर प्रभावी रहे वे देश की राजनीति में रासस-भाजपा के ताकतवर बनते ही इस स्तर तक कमजोर हो गये कि उन्हें कोई संघर्ष किये बिना ही अपने पूर्वजों की विरासत छोड़कर कैसे भागना पड़ा।
यह समझना होगा कि जब भी किसी पर संकट आता है तो वह उससे मुक्त होने के लिए अपने स्तर से यथाशक्ति संघर्ष और प्रतिरोध करता है। अपनी क्षमता कम आंककर दूसरों की मदद लेता है। पुलिस, प्रशासन और सरकार पर दबाव डालता है। देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे जनांदोलन चलते रहते हैं। खेती-किसानी पर आंच आई तो किसान 13 महीनों तक अनेक तरह की मुसीबत झेलते हुए भी देश की राजधानी के सीमाद्वारों पर पड़े रहे।
जम्मू-कश्मीर में आज भी जाट, गुर्जर और बीस हजार से भी अधिक सिख खेती कर रहे हैं। जिन्होंने आज तक दिल्ली आकर पीड़ित होने का रोना-धोना नहीं किया है।
सारा देश और दुनिया जानती है कि देश के बारह राज्यों में 1967 के बाद आदिवासियों की पुश्तैनी जमीनों को हथियाने के लिए उनको चुन-चुनकर मारा जा रहा है। उन्हें माओवादी, नक्सली और विकास के मार्ग में रोड़ा बताते हुए जेलों में सड़ाया जा रहा है। जबकि सारा खेल राजनीतिक दलों को भारी चंदा और बड़े-बड़े राजनेताओं व पुलिस-प्रशासन के उच्च पदस्थ अधिकारियों को मोटी रकम चढ़ाकर आदिवासियों की जमीन, जंगल पर कब्जा कर व्यावसायिक लाभ लेने के लिए बड़े पूंजीपतियों का है। वे ही अपने हितलाभ के नियम-कानून बनवाकर आदिवासियों को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर रहे हैं।
ऊपर से पीढ़ियों से जंगलों के बीच तमाम तरह के साधनों से विहीन होते हुए भी खुद में मगन रहने वाले आदिवासियों को एक तरफ पुलिस-प्रशासन और दूसरी ओर माओवादियों के आतंक का शिकार होना पड़ता है। वे दो पाटों के बीच में पिस रहे हैं। इसके बावजूद भी आदिवासियों का उत्पीड़न उनका नरसंहार कभी चर्चा का विषय नहीं बनता। उनके विस्थापन के दर्द और पुनर्वास की योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर कोई विमर्श नहीं होता।
जबकि दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों को देखें तो वे 1989 तक बहुत खुश थे और हर क्षेत्र में अग्रणी बने हुए थे। वहां सबकुछ वे ही संचालित कर रहे थे। अल्पसंख्यक होते हुए भी प्रशासन, अर्थतंत्र, राजनीति सब पर उनका ही वर्चस्व बना हुआ था।
अचानक 2 दिसम्बर, 1989 को दिल्ली में रासस-भाजपा समर्थित वीपी. सिंह की सरकार आ गई और राज्य सरकार को बर्खास्त करके जगमोहन को राज्यपाल बना दिया गया। उसके बाद ही एक निश्चित योजना के तहत कश्मीरी पंडितों पर जुल्म शुरू कराया गया।
ट्रेड यूनियन नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हृदयनाथ वांचू का कहना था कि 'यहां खुला दमन है। बीजेपी और आरएसएस लॉबी खुलेआम कह रही है कि जगमोहन को उन्होंने भेजा है। कश्मीर पर सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। विपक्ष को खत्म कर दिया गया है। मध्यमार्गियों के खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं।'
राज्यपाल जगमोहन ने कश्मीर आते ही कुछ दिनों के भीतर ही कश्मीरी पंडितों का घाटी छोड़कर पलायन शुरू हो गया; क्योंकि जगमोहन ने पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रेरित ही नहीं किया बल्कि उन्हें अन्यत्र चले जाने के लिए संसाधन भी उपलब्ध कराए।
अनंतनाग के तत्कालीन कमिश्नर आइएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्ला कहते हैं कि उन्होंने राज्यपाल जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से एक अपील करने को कहा था कि वे यहां सुरक्षित महसूस करें और सरकार उनको पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी लेकिन जगमोहन ने मना ही नहीं कर दिया बल्कि इसकी जगह अपने प्रसारण में उन्होंने कहा कि पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैंप बनाए जा रहे हैं जो पंडित डर महसूस करें वे इन कैंपों में जा सकते हैं। जो कर्मचारी घाटी छोड़कर जाएंगे उन्हें तनख्वाह मिलती रहेंगी। जाहिर सी बात है कि उनकी ऐसी बातों ने पंडितों को पलायन के लिए प्रेरित किया।
दरअसल, जगमोहन को घाटी में हिंदू-मुसलमान वैमनस्य बढ़ाने के लिए ही भेजा गया था। ताकि वहां से पंडितों की मारकाट और पलायन कराने के बाद सारे देश और दुनिया में हो-हल्ला मचाकर हिंदुत्व की भावना को वोट में तब्दील किया जा सके।
यही कारण था कि राज्यपाल जगमोहन ने पंडितों के भारी संख्या में सामूहिक पलायन की 20-21 जनवरी, 1990 को हुई शुरुआत पर चुप्पी साध ली और फिर देश भर में भाजपा समर्थित केंद्र सरकार की थुक्का फजीहत होने के डेढ़ महीने बाद 7 मार्च को पंडितों से कश्मीर छोड़कर न जाने की अपील की।
18 सितंबर, 1990 को स्थानीय उर्दू अखबार 'अफसाना' में छपे एक पत्र में के. एल. कौल ने लिखा—'पंडितों से कहा गया था कि उन्हें मुफ्त राशन, घर, नौकरियां आदि सुविधाएं दी जाएंगी। उन्हें यह भी कहा गया कि नरसंहार खत्म हो जाने के बाद उन्हें वापस लाया जाएगा। हालांकि यह वादे पूरे नहीं किए गए।'
इसके बाद रासस-भाजपा ने अपनी पूर्व योजनानुसार मुसलमानों को विलेन साबित करने के लिए कश्मीरी पंडितों के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर खूब उछालना शुरू कर दिया।
उधर जगमोहन को भाजपा ने पुरस्कार स्वरूप 1996, 1998 और 1999 में नई दिल्ली से तीन बार लोकसभा सदस्य बनाया। अटल बिहारी वाजपेई ने 1998 में संचार, शहरी विकास और पर्यटन सहित विभिन्न विभागों का मंत्री बनाकर उपकृत किया। भाजपा के एहसान तले दबे जगमोहन ने 2019 में अनुच्छेद 370 और 35A को रद्द करने के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए भाजपा के आउटरीच अभियान में भाग लिया।
कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे को निपटाने के लिए सालाना खरबों के पैकेज दिए और जितने भी कश्मीरी पंडित पलायन करके आये उनको एलीट क्लास में स्थापित कर दिया।
कश्मीरी विस्थापित पंडितों को मिलने वाला प्रतिमाह मुआवजा भारत में अब तक किसी विस्थापन के लिए दिए गए मुआवजे से अधिक है। समय-समय पर इसे बढ़ाया भी गया। आखिरी बार उमर अब्दुल्ला के शासनकाल में 2008 में आतंकवाद में मारे गए लोगों को 5 लाख रुपए की सहायता तथा क्षतिपूरक नौकरी का आदेश दिया गया। फिर 2015 में नकद राहत प्रति व्यक्ति ₹1500 से बढ़ाकर ₹2500 कर दी गई। एक परिवार के लिए अधिकतम राशि ₹10000 तय की गई। कश्मीरी विस्थापितों के लिए 3000 नौकरियां और आवास देने के लिए 200 करोड़ का पैकेज अनुमोदित किया गया।
वे साल में एक बार जंतर-मंतर पर आते, रासस-भाजपा के सहयोग से सरकार को ब्लैकमेल करते और हफ्ता वसूली कर वापस लौट जाते।
उधर, आदिवासी अपनी पीढ़ियों की संजोई विरासत को बचाने के लिए चूहों की तरह घेरेबंदी कर आये दिन मारे जा रहे हैं लेकिन न तो कभी संज्ञान लिया जाता और न ही इनके लिए भी कश्मीरी पंडितों की तरह पैंशन आदि की व्यवस्था की जरूरत महसूस की जाती।
आज देश के किसानों को विभिन्न तरीकों से कमजोर किया जा रहा है, उनकी जमीनें कब्जियाने के लिए तरह-तरह के नये-नये नियम-कानून लादे जा रहे हैं लेकिन कोई चर्चा नहीं होती।
आये दिन कश्मीरी पंडितों की हिमायत लेकर धरना-प्रदर्शन करने वाले 8 साल से केंद्र में प्रचंड बहुमत की सरकार चला रहे हैं, कश्मीर से पौने तीन साल पहले 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू कश्मीर को दो भागों में विभाजित कर चुके हैं लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापिसी को लेकर कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं।
और, कश्मीरी पंडितों की यह हफ्तावसूली गैंग घरवापसी की बातें भुलाकर धरने-प्रदर्शन से हटकर अब फिल्मों के सहारे पूरे देश को इमोशनल ब्लैकमेल करके वसूली का नया तरीका ईजाद कर चुकी है। हफ्ता-वसूली और इमोशनल अत्याचारों का यह धंधा कब तक चलाया जाएगा? पंडितों के लिए आंसू बहाने वालों की यह केंद्र सरकार संरक्षण दे रही है, वहां चप्पे-चप्पे पर सैन्यबल तैनात है तो डर किससे है? कश्मीर घाटी में सिख, जाट, गुज्जर आज भी रह-रहे हैं उन्होंने कभी असुरक्षा को लेकर रोना-धोना नहीं किया है। तो फिर पंडितों को ही खतरा क्यों महसूस होता है?
1995 के बाद आज तक लाखों किसान व्यवस्था की दरिंदगी से तंग आकर आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन पिछले 25 सालों में एक बार भी राष्ट्रीय मीडिया में विमर्श का विषय नहीं बना और केंद्र सरकार कभी भी उनकी समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर उचित समाधान की ओर बढ़ती दिखाई नहीं दी।
भागलपुर, पूर्णिया, गोधरा, मुजफ्फरनगर के दंगों से भी पलायन हुआ और सैंकड़ों नागरिक मारे गए। आज तो सत्ताधारी वर्ग ही दंगा भड़काने की पूरी कोशिश कर रहा है क्योंकि उनकी राजनीतिक खेती साम्प्रदायिक रक्तपात और शवों के खाद-पानी से लहलहाती है। जबकि देश के हर नागरिक की मौत का संज्ञान लिया जाना चाहिए।
सारत: 'द कश्मीर फाइल्स' वास्तविक घटनाओं, उनके मूल कारणों और तज्जनित परिस्थितियों के समाधान पर कोई चर्चा न कर केवल दंगाई मानसिकता को बढ़ावा देने वालों के हितलाभ को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्म और एक घटिया हरकत है। ■


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