यह खबर ताजा है कि अब सरकार सेना में 'अग्निपथ भर्ती योजना' के तहत तीन वर्ष के लिए सैनिकों को संविदा पर भर्ती करने जा रही है। इन्हें 'अग्निवीर' कहा जायेगा। बताया जा रहा है कि इससे सशत्र बलों की औसत उम्र में कमी आयेगी और साथ ही रिटायरमेंट बैनिफिट्स व पैंशन का 'बोझ' भी सरकार पर नहीं पड़ेगा। तीन साल बाद अपनी जरूरत को देखते हुए सेना इन अग्निवीरों में से कुछ को सेना की स्थाई सेवा में भी शामिल कर सकेगी। तीन साल बाद सेना से निकलकर ये अग्निवीर कॉरपोरेट क्षेत्र में भी नौकरी कर सकेंगे। कहा जा रहा है कि इस 'अग्निपथ भर्ती योजना' के लिए सेना के तीनों अंगों ने उच्चाधिकारियों को अपनी तरफ से संस्तुतियां दे दी हैं।
अब यह समझना बेहद जरूरी है कि इस 'अग्निपथ भर्ती योजना' के निहितार्थ क्या हैं, क्योंकि यह रासस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के उस खतरनाक खेल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है जो बहुत पहले ही शुरू हो चुका है।
कैसे? आइये देखते हैं―
पहले थोड़ा इतिहास में जाकर देखते हैं, जब कथित रामजन्मभूमि स्थल पर मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया गया था, तब हिंदुओं के लिए उस अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर पर पूजा-अर्चना के लिए चारों पीठों में से किसी एक भी शंकराचार्य को आमंत्रित ही नहीं किया गया। उनकी जगह पर सरसंघचालक मोहन भागवत स्वयं बैठ गये थे। क्यों? क्या सरसंघचलक शंकराचार्य से भी अधिक पूजनीय और समस्त हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करता है? नहीं। तो फिर शंकराचार्य को उपेक्षित कर मोहन भागवत क्यों बैठ गये?
इसका एकमात्र कारण है रासस की अपने सरसंघचालक को 1979 के ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह हिंदुओं की धार्मिक आस्था और राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने की योजना। जिसके आधे हिस्से में रासस अपने जेबी संगठन भाजपा के जरिये केंद्र व कुछेक राज्यों की सरकार का पर्दे के पीछे से संचालन कर ही रहा है। तो इसका दूसरा आधा भाग था अयोध्या वाली पूजा-प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में शंकराचार्य के स्थान पर मोहन भागवत का बैठ जाना।
अब आगे देखिये―
रासस ने अपनी दूरगामी योजना के तहत ही सबसे पहले केंद्र सरकार के उच्च प्रशासनिक स्तर पर संयुक्त सचिव और उससे नीचे के पदों पर निजी क्षेत्र से अपने स्वयंसेवकों की सीधे-सीधे नियुक्ति कराने का रास्ता खुलवा दिया। अब वे अधिकारी आजीवन रासस के प्रति वफादार रहेंगे और सरकारी सेवाओं के दौरान समय-समय पर सरकार की नीतियों, निर्णयों, योजनाओं और कार्यक्रमों को रासस के अनुसार संचालित करेंगे। रासस के वित्तपोषक पूंजीपतियों का हित-लाभ करेंगे। रासस का कृपापात्र होने से वे सदैव मुख्य प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से चुने गये ऐसे अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सिरदर्द पैदा करते रहेंगे जो रासस से असहमत हों।
रासस के ऐसे कृपापात्र अधिकारी धीरे-धीरे जिला व तहसील स्तर पर डीएम और एसडीएम के पदों पर भी बैठाये जायेंगे। तो दूसरी तरफ सेना के खर्चे पर प्रशिक्षित और वहां तीन साल तक नौकरी कर चुके 'अग्निवीरों' की भारी तादात निजी सुरक्षा ऐजेंसियों के नाम पर कॉरपोरेट घरानों के पास मौजूद होगी ही जो ठीक हिटलर की एस.एस. की तरह डीएम और एसडीएम के मार्फत जनता को नियंत्रित करने का काम करेगी।
इस तरह सत्ता पर आधिपत्य जमाने का रासस का कार्य पूरा होने के बाद अगले चरण में―सबसे पहले साम्प्रदायिक दंगे करवा कर मुस्लिम आबादी, विरोधी नेताओं तथा बुद्धिजीवियों का सफाया शुरू किया जायेगा। इस काम में रासस के कृपापात्र आइएएस, आइपीएस अधिकारी स्थानीय स्तर पर व्यवस्था को पंगु कर सहयोग करेंगे। वे यातायात, दूर संचार और खाद्य आपूर्ति सेवाओं को कठिन बना देंगे। इसके साथ ही लोगों का ध्यान बंटाने और उन्हें चुप कराने के लिए सीमा पर सैनिक हलचल तेज कर दी जायेगी।
इतना सब करने के बाद रासस के सरसंघचालक को 1979 के ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह हिंदुओं की धार्मिक आस्था और देश की राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनने से कौन रोक सकेगा?
इसके बाद संविधान को निलंबित/संशोधित या पूर्णतया समाप्त कर दिया जायेगा। न्यायालयों का संचालन तालिबानी और शिया अदालतों की तरह मनुस्मृति के आधार पर किया जायेगा। समाज में वर्ण-व्यवस्था कठोरतापूर्वक लागू की जायेगी। दलितों, बौद्धों और स्त्रियों की दशा दोयम दर्जे के नागरिकों जैसी होगी। जनता के लिए 'सम्राट' की आज्ञा सर्वोपरि होगी।
और यह सब आपकी आंखों के सामने होगा क्योंकि इसकी सहमति आपने ही दे रखी है। और, 2024 में भी जनता को सद्बुद्धि आ जायेगी, इसकी सम्भावना कम से कम मुझे तो नहीं दिखाई दे रही है, अपनी आप जानें। ■

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