मंगलवार, 9 नवंबर 2021

अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के कदम

 अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के कदम

हाल ही में दो जेनेटिक इंजीनियरों ने अपनी नई पुस्तक 'द डेथ ऑफ डेथ' के प्रेजेंटेशन के दौरान दावा किया कि 25 साल बाद मनुष्य के लिए मरना स्वैच्छिक और उम्र बढ़ने से रोकना चिकित्सा योग्य हो जाएगा। इनका कहना है कि अमर रहना एक वास्तविक और वैज्ञानिक संभावना है, जो मूल रूप से सोचे जाने की तुलना में बहुत पहले आ सकती है। 

(फोटो साभार―सोशल मीडिया)

वेनेजुएला में जन्मे जोस लुई कोरडैरो और कैंब्रिज के गणितज्ञ डेविड वुड का कहना है कि 2045 के आस-पास इंसानों की मौत केवल हादसों से होगी न कि किसी प्राकृतिक कारण या बीमारी से। 

इनका कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बुढ़ापे को किसी बीमारी के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। नई आनुवंशिक परिवर्तन तकनीकों में प्रमुख नैनो टेक्नोलॉजी से इस प्रक्रिया में खराब जीन को स्वस्थ जीन में बदला जाएगा, शरीर से मृत कोशिकाओं को खत्म करना, नष्ट हो गई कोशिकाओं को ठीक करना, स्टेम सेल से इलाज और महत्वपूर्ण अंगों को 3डी में प्रिंट करना शामिल है। 

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी में पदस्थ कोरडैरो का कहना है, 'उसने न मरने का फैसला किया है और 30 साल बाद वह आज के मुकाबले ज्यादा युवा होगा।'

बुढ़ापा यानी कि एजिंग, डीएनए के सिरे पर मौजूद टेलोमर्स (Telomeres) का परिणाम है, जो क्रोमोसोम्स में होते हैं। बढ़ती उम्र के साथ ये छोटे, कमजोर और क्षतिग्रस्त होने लगते हैं, इसे रोकने के लिए टेलोमर्स को लंबा करना होता है।

इन दोनों इंजीनियरों के अनुसार वे गैरकानूनी तरीके से दो साल पहले से इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और इनकी पहली मरीज एलिजाबेथ पैरिस हैं, जिन्होंने उम्र बढ़ने के लक्षणों को रोकने का इलाज करने में रुचि दिखाई।

वुड ने बताया कि उनका इलाज काफी जोखिम भरा और गैरकानूनी था, लेकिन अभी उस इलाज का कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखाई दिया है और उनके खून में टेलोमर्स का स्तर पहले की तुलना में आज भी 20 साल पूर्व की स्थिति में है।

लेकिन अमरत्व की ओर बढ़ते विज्ञान के इस कदम से मरण की प्राकृतिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होगी जिससे अनेक प्रकार के सामाजिक, आर्थिक व अन्य प्रकार के संकट पैदा हो जायेंगे क्योंकि पुराने मरेंगे नहीं और नये जन्म लेते जायेंगे तो लगातार बढ़ती जनसंख्या का बोझ धरती के संसाधनों पर पड़े बिना नहीं रहेगा। प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो जायेंगे। सरकारों द्वारा की जाने वाली भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, परिवहन आदि सम्बंधी व्यवस्थाएं कम पड़ती जायेंगी। हिंसा और शोषण की प्रवृत्ति में भयानक वृद्धि होगी। 

ऐसे में इस वैज्ञानिक खोज का लाभ उठाने वाला कोई भी व्यक्ति धरती पर मौजूद रहेगा भी कि नहीं? इस प्रश्न का उत्तर आज ही ढूँढना होगा। खुद समस्या खड़ी कर समाधान भावी पीढ़ी पर छोड़ देना बुद्धिमानी नहीं, बल्कि मूर्खता होगी। वैसे मूर्खता के इस स्वर्णकाल में शायद यह सवाल उठाना भी अपने आप में मूर्खता ही कही जायेगी। 

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