एकाकीपन में कटती-खटती जिंदगियां
एक बार यह जरा गौर से देखिये आपके आस-पास कितने घरों में अगली पीढ़ी वाले बच्चे रह रहे हैं? कितने बाहर निकलकर बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं? कितने संयुक्त परिवार आपके गाँव-मुहल्ले में अब भी बचे हुए हैं और आपके देखते-देखते कितने बिखर गए?
एक बार उन गली-मुहल्लों में पैदल निकलिए जहां से आप दोस्तों के संग स्कूल जाते समय या मौज-मस्ती करते हुए निकलते थे। हर घर की ओर आपको एक डरावना सन्नाटा मिलेगा, न बच्चों का शोर और न ही कोई दूसरे किस्म की आवाज़। बस किसी-किसी घर की खिड़की, बरामदे या सूने आँगन से नैराश्य में डूबी दो-चार जोड़ी बूढ़ी आँखें आते-जाते लोगों को ताकती जरूर मिल जायेंगी। पहले की तरह घरों के निकट मवेशी तो शायद ही बँधे मिलें।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते गाँवों या सुनसान पडते मुहल्लों के पीछे कारण क्या हैं?
वैश्विक पूंजीवाद और तद्ज्जनित उपभोक्तावादी दौड़ वाले आज के दौर में हर इंसान चाहता है कि उसके कम बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें-लिखें। इसमें गलत कुछ नहीं है।
उनको लगता है कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या बच्चा बिगड़ सकता है। बस यहीं से बच्चों के बाहर निकल कर बड़े शहरों के होस्टलों में जाने का सिलसिला शुरू जाता है।
यह और बात है कि महानगरों और छोटे शहरों में भी उसी क्लास की किताबें या उसका पाठ्यक्रम एक ही जैसा होता है फिर भी अविभावकों पर बच्चों को किसी बड़े शहर में पढ़ने भेजने का एक मानसिक और सामाजिक दबाव-सा आ जाता है।
हालांकि दूर शहर भेजने पर भी मुश्किल से कुछ ही बच्चे कंप्टीशन से अच्छे स्कूलों में जगह पाने मे सफल हो पाते हैं। फिर मजबूर होकर माँ-बाप बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल, बिज़नेस मैनेजमेंट या फिर किसी अच्छे कोर्स में दाखिला कराते हैं।
कई साल बाहर पढ़ते-पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच-बस जाते हैं। उनका गाँव-कस्बों और अपनी लोक-संस्कृति से जुड़ाव घटता जाता है। नौकरी भी आमतौर से बाहर ही मिलती है और घर-परिवार से कटने तथा खुलापन मिलने से अक्सर बच्चे बाहर ही शादी भी कर लेते हैं। ऐसे में बच्चे कुछ गलत न कर बैठें इस भय से या अपनी इज्जत बचाने के लिए माँ-बाप को तो शादी के लिए हां करना ही होता है।
बच्चे अब गिने-चुने मौकों और त्यौहारों पर घर आते हैं माँ-बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु। धीरे-धीरे यह रस्मी आना-जाना भी कम होता जाता है।
माँ-बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं। दो-तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। यूंही एक-एक करके साल बीतते जाते हैं। माँ-बाप बूढ़े होकर पड़ोसियों या दूर के रिश्तेदारों पर आश्रित होते जाते हैं। इधर बच्चे लोन लेकर या बचत करके बड़े शहरों में अपना मकान या फ्लैट ले लेते हैं। जिसकी किश्त चुकाने का दबाव कर्ज चुकता होने तक उनका पीछा नहीं छोड़ता।
अब अपना फ्लैट होने पर गांव-मुहल्ले में शादी-ब्याह और त्योहारों पर भी आना-जाना बंद। बस किसी जरूरी शादी-ब्याह में या परिजन की मृत्यु पर ही आते-जाते हैं। यदि ऐसे ही किसी मौके पर गाँव-मुहल्ले वाला कोई पूछ भी ले कि भाई अब कम आते-जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का वास्ता देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे-बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं। अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ-बाप को साथ में रखा जाये। कोई बच्चा 'बागवान' फिल्म की तरह माता-पिता को आधा-आधा रखने को भी तैयार नहीं। इसलिए मजबूरी में बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकान में अथवा किसी शहर के वृद्धाश्रम में आजीवन कारावास भोगते हुए।
अब घर खाली-खाली, मकान खाली-खाली और धीरे-धीरे मुहल्ला खाली-खाली हो रहा है। ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये 'भू माफियाओं' की गिद्ध जैसी निगाहें इन खाली होते मकानों पर पड़ती हैं। वे इन बच्चों को घुमा-फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं। उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है। एक प्लॉट भी लिया जा सकता है।
साथ ही साथ ये किसी बड़े व्यापारी को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं। बेटे-बहू भी माँ-बाप को बड़े शहर में रहकर आराम से मज़े लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को राज़ी कर ही लेते हैं।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं या निकलने के लिए पर तौल रहे हैं।
अब, बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं, अब वे वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है। यहां इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, जिम नहीं हैं, पार्क नहीं हैं, हॉबी क्लासेज नहीं हैं, इंजीनियरिंग या मेडिकल की कोचिंग नहीं हैं, मॉल नहीं हैं, बडे़ अस्पताल नहीं हैं, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है। आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?
जाने-अनजाने अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों, अपनी लोक-संस्कृति से नाता टूट रहा है, बडे़-बड़े घरों का सिर्फ एक कमरा आबाद रहता है, बूढ़े माता-पिता की जिंदगी तक। बाद में उस मकान में या तो एक बड़ा ताला पड़ जाता है या मकान का मालिक बदल जाता है।
पुराने लोगों के मन के किसी कोने में होता है कि भले ही बेटा कहीं फ्लैट खरीद ले, मगर अपने रिटायरमेंट के बाद रहे अपने उसी छोटे शहर या गाँव में अपने लोगों के बीच में। पर जैसे ही मन की बात रखते हैं, पड़ोसी समझाने आ जाते हैं कि अरे पागल हो गये हो, यहां क्या रखा है? वे भी गिद्ध की तरह मकान हथियाने का इंतज़ार करते हैं, बस सीधे कह नहीं सकते।
अब ये मॉल, ये बड़े स्कूल, ये बड़े टॉवर वाले फ्लैट सिर्फ इनसे तो ज़िन्दगी नहीं चलती। एक वक्त जब बुढ़ापा आता है तब उस समय आपको अपनों की ज़रूरत होती है। आपको ये अपने छोटे शहरों या गांवों में मिल सकते हैं, फ्लैटों की सोसाइटियों में नहीं।
बडे़ शहरों में देखा जाता है कि वहां शव चार कंधों पर नहीं बल्कि एक खुली गाड़ी में पीछे शीशे की केबिन में ले जाए जाते हैं सीधे शमशान या कब्रिस्तान। थोड़ी देर साथ देने की औपचारिकता निभाने को एक-दो रिश्तेदार बस और सब खत्म।
ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जा रही जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं।
आज जहां एक तरफ गाँव सूने हो रहे हैं, छोटे शहर कराह रहे हैं, बड़े घरों के कमरे एक-एक करके खाली होते जा रहे हैं तो दूसरी ओर नगरों-महानगरों में बढ़ती भीड़-भाड़ और तेज रफ्तार जिंदगी के कारण जीवन के सुख-चैन में लगातार कमी होती जा रही है।
वे बहुत भाग्यशाली हैं जो आज के दौर में भी अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों और अपनी लोक-संस्कृति से जुडे़ हुए हैं क्योंकि सच पूछिए तो जिंदगी का असली आनंद अपनों के साथ जीने में ही है। अपनों से दूर एकाकी समय तो दूर अस्पताल में भर्ती रोगी, संन्यासी, पागल, जेल में बंद कैदी या फिर पशु-पक्षी भी काट ही लेते हैं।
रीति-रिवाजों से जिंदगी रंगीन और रौशन रहती है। जिंदगी जिंदादिली से आबाद रहती है, एकाकी और सूनी-सूनी जिंदगी जीये तो क्या जीये।
(सभी फोटो साभार―गूगल)
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