आज़ादी की लड़ाई में दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों का योगदान मिटाया जा रहा है
संघ वर्षों से कहता रहा है कि देश का इतिहास वामपंथियों, विदेशियों और काग्रेंस के लोगों द्वारा लिखा गया है जो झूठा है। अब केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद उस इतिहास को बदला जा रहा है। आजादी के साझा संघर्ष को भी सवर्ण-दलित एंगल दिया जा रहा है।
जलियांवाला बाग में अंग्रेजों की करतूत के निशान मिटाते हुए उसके ऐहासिक स्वरूप को बदलने के बाद गांधी जी के साबरमती आश्रम को पिकनिक स्पॉट में बदलने पर जोरों से काम चल ही रहा है तो उधर 1922 के चौरी-चौरा कांड के शहीदों के नामों में साम्प्रदायिक तथा जातीय आधार पर उलट-फेर कर दिया गया है।
चौरी-चौरा घटना के कुछ शहीदों के नामों में फेरबदल और उम्र क़ैद पाने वाले 14 स्वतंत्रता सेनानियों में से सिर्फ़ सवर्ण जाति से जुड़े एक व्यक्ति की प्रतिमा स्मारक में स्थापित की गई है। इस पर सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या ये स्वतंत्रता संग्राम में दलितों और पिछड़ों के योगदान को धीरे-धीरे मिटाने की कोशिश है?
स्मारक में पुरानी तख़्ती की जगह लगाई गई नई तख़्ती में कई नामों में फेरबदल साफ़ नज़र आता है―
1―पुरानी पट्टिका के 'श्री लौटू पुत्र शिवनन्दन कहार' में से 'कहार' शब्द नई तख़्ती से ग़ायब है।
2―'श्री रामलगन पुत्र शिवटहल लोहार' अब शहीद रामलगन पुत्र शिवटहल के नाम से दिख रहे हैं।
3―शहीद लाल मुहम्मद के पिता हकीम फकीर का नाम अब महज़ 'हकीम' रह गया है।
4―लाल मुहम्मद को लाल अहमद और शिवनन्दन को नई तख़्ती में शिवचरन अंकित किया गया है।
5―आजीवन कारावास पाने वाले 14 में से सिर्फ़ एक व्यक्ति, द्वारिका प्रसाद पांडेय पुत्र नेपाल पांडेय की ही प्रतिमा लगाई गई है।
लाल मुहम्मद को 3 जुलाइ, 1923 को रायबरेली जेल में फ़ांसी दी गई थी। उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 4 फ़रवरी, 1922 में चौरी-चौरा की उस घटना के लिए ज़िम्मेदार पाया था जिसमें पुलिस थाने में आग लगा दी गई थी और 23 पुलिसवालों की मौत हो गई थी। इसके लिए कुल 19 लोगों को फ़ांसी और 14 को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।
हालांकि, स्मारक में हुए बदलाव से जुड़े लोगों ने आरोपों को ग़लत बताते हुए कहा है कि 'ग़लती सुधार के लिए आवेदन दिया गया है।' स्मारक समिति के संयोजक हालांकि यह जोड़ना नहीं भूलते कि शहीदों या परिवार के लोगों के नाम से जाति का नाम हटा देने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है लेकिन जबसे उनसे यह पूछा गया कि घटना से जुड़े सवर्ण लोगों के सरनेम क्यों नहीं हटाए गए तो उनके पास कोई उचित जवाब नहीं था।
लेखक और इतिहासकार सुभाष चंद्र कुशवाहा ने चौरी चौरा पर 'चौरी-चौरा : विद्रोह, स्वाधीनता आंदोलन' नाम की पुस्तक लिखी है जो साल 2014 में प्रकाशित हुई थी।
चौरी-चौरा की घटना की याद में गोरखपुर शहर (उप्र) से क़रीब 26 किलोमीटर दूर 1993 में स्मारक तैयार हुआ था, जिसका पिछले दो सालों में सौंदर्यीकरण करवाए जाने के बाद साल 2021 जनवरी को लोकार्पण हुआ था। साल 2021 को चौरी-चौरा घटना के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।
आजीवन कारावास पाने वाले 14 में से सिर्फ़ एक व्यक्ति, द्वारिका प्रसाद पांडेय पुत्र नेपाल पांडेय की ही प्रतिमा लगाए जाने को लेकर भी विवाद है। जबकि डुमरी खुर्द निवासी बिक्रम अहीर को इसी घटना के लिए फ़ांसी दी गई थी।
उनके पड़पोते शरदानंद यादव कहते हैं, "सेशन कोर्ट ने जिन 172 लोगों को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी, उसे देखिए और बताइए कि उसमें अपर कास्ट के कितने लोग हैं। यह ज़मींदारी प्रथा के सताए हुए किसानों और मज़दूरों का आंदोलन था। सरकार उन लोगों के योगदान को धीर-धीरे मिटा देना चाहती है।"
लाल मुहम्मद जिन्हें 3 जुलाइ, 1923 को फ़ांसी हुई थी, उनके पोते मैनुद्दीन ने दादा और परदादा के नामों को 'सुधरवाने के लिए' मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है।
मैनुद्दीन कहते हैं, "स्मारक में लगी मूर्तियों में हमारी पहचान को छिपा दिया गया है। हम फक़ीर बिरादरी के हैं लेकिन अब उसे बदल दिया गया है।"
वे कहते हैं, "जिन्होंने हिंदुस्तान के लिए इतना बड़ा काम किया, अगर आप उन्हें पहचान नहीं दे सकते हैं तो कम से कम उनकी पहचान को तो न ख़राब किया जाये।"
ज़िला स्वतंत्रता संग्राम शहीद स्मारक समिति के संयोजक और फ़ांसी की सज़ा पाने वाले मेघू तिवारी के पौत्र रामनारायण त्रिपाठी कहते हैं, 'कुछ लोग हैं जो चौरी-चौरा आंदोलन को दलितों का आंदोलन बताने के लिए व्याकुल हैं।' त्रिपाठी के अनुसार उन्होंने ही 'शहीदों की सूची' सम्बंधित विभाग को भेजी थी। नामों को उल्टा-सीधा कर दिया गया है जिसके लिए उन्होंने डीएम कार्यालय में आवेदन दे रखा है लेकिन उसमें कुछ प्रशासनिक वजहों से देरी हो गई है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे प्रो. आनंद कुमार सीधे तौर पर कहते हैं कि "स्मारक पर किसी सरकारी बाबू या वोट के ज़रिए पांच साल के लिए चुने गए किसी 'राजा-रानी' की तुलना में शहीदों के वंशजों का ज़्यादा अधिकार है और अगर वे चाहते हैं कि शहीदों के नाम से जातीय पहचान न मिटाई जाए तो उसे नहीं मिटाया जाना चाहिए। शहीदों की स्मृति की रक्षा की ज़िम्मेदारी समाज की है लेकिन वे किस रूप में याद किए जाएं यह उनके परिवार की प्राथमिकता है।"
चौरी-चौरा कांड―
पुलिस ने 228 लोगों के ख़िलाफ़ गोरखपुर के सेशन कोर्ट में आरोप पत्र दाख़िल किया था, जिनमें से दो की जेल में मौत हो गई थी और एक व्यक्ति के सरकारी गवाह बन जाने के बाद 225 लोगों पर मुक़दमा चला।
सेशन कोर्ट जज एच.ई. होत्म्स ने 9 जनवरी, 1923 को 172 लोगों को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी जिसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश एडवर्ड ग्रीमवुड मीयर्स और सर थियोडोर पिगॉट की बेंच ने इस मामले में 30 अप्रैल 1923 को दिये फ़ैसले में 14 लोगों को उम्रक़ैद और 19 को फ़ांसी की सज़ा सुनाई थी।


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