गुरुवार, 28 जुलाई 2022

सावधान! कहीं भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं हम?

सावधान! कहीं भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं हम? 

महाभारत युद्ध के विभिन्न कारण गिनाए जा सकते हैं लेकिन उसका वास्तविक बीजारोपण चार पीढ़ी पहले तभी हो गया था, जब महाराज शांतनु को घर में पुत्रवधू लानी चाहिए थी लेकिन उस आयु में वे पुत्र की वंशवृद्धि में रुकावट बनकर खुद की दूल्हन ले आये। तो परिणाम विनाशकारी महायुद्ध के रूप में सामने आया।

अफ्रीका में 07 जून, 1893 को गांधी जी को ट्रेन से उतारे जाने की घटना ने कालांतर में ऐसे व्यापक बदलावों की नींव रखी कि भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में लोकतंत्र की बयार बहने लगी। 

मुहम्मद अली जिन्ना के मछली व्यवसायी हिंदू पितामह प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर पर उनके शाकाहारी सजातीयों द्वारा दबाव डालकर धंधा बंद कराने के बावजूद भी उनका बहिष्कार कर दिया गया तो वे पाला बदल कर मुसलमान बन गए और आगे चलकर उनका पोता भारत के विभाजन का कारण बना।

बोस्निया-हर्जेगोविना के ऑस्ट्रो-हंगेरियन प्रांत की यात्रा के दौरान 28 जून, 1914 को आर्क ड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड की हत्या का दुष्परिणाम प्रथम विश्व युद्ध के महाविनाश के रूप में दुनिया को भोगना ही नहीं पड़ा बल्कि उसने विश्व-व्यवस्था की नई परिपाटी को जन्म दिया।

जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम के कारण ही परमाणु बम बनाने की तकनीक का आविष्कार अमेरिका भाग गए जर्मन यहूदियों द्वारा ही हुआ। 

भारत में कारतूसों में पशुओं की चर्बी होने की अफवाह से सैनिकों में भड़के आक्रोश ने यहां ब्रिटिश राज की चूलें ऐसी हिला दीं कि अंततः उन्हें यह देश छोड़कर स्वदेश लौट जाना पड़ा।

★★★

ये चंद उदाहरण अंग्रेजी की एक थ्योरी 'बटरफ्लाइ इफेक्ट' को रेखांकित करते हैं। इसका मतलब है कि पृथ्वी के किसी एक हिस्से में किसी तितली के हफ्तों पहले पंख फड़फड़ाने से किसी दूसरे हिस्से में तूफान आ सकता है। हालांकि यह एक दार्शनिक विचार है लेकिन वास्तविकता में इसका अर्थ होता है कि अतीत में हुए किसी नगण्य से कार्य/घटना का परिणाम आगे चलकर बड़े बदलाव के रूप में सामने आता है। इसे गणित में 'केऑस थ्योरी' कहा जाता है। 

भारतीय दर्शन में जिस कर्मफल सिद्धांत का वर्णन है उसके अनुसार मनुष्य द्वारा किये जाने वाले सभी कर्मों को परिणाम की दृष्टि से तीन वर्गों में बांटा जा सकता है। एक, ऐसे कर्म जो तत्काल नतीजा देते हैं; दूसरा, जिनका प्रतिफल एक लगभग निश्चित समय-सीमा में प्राप्त होता है और तीसरी श्रेणी में ऐसे कर्म आते हैं जिनका परिणाम मिलने की समय-सीमा, मात्रा, माध्यम और स्वरूप का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। 

यदि न्यूटन का गति का तीसरा नियम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सच है तो फिर मनुष्य का कोई भी कर्म निष्फल नहीं हो सकता है। प्रकृति उसके अनुरूप सूक्ष्म अथवा व्यापक प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करती है; मनुष्य चाहे उसे समझ सके या नहीं।

बहरहाल, आज देश में बहुसंख्यकवाद की जो आंधी चल रही है, उसमें इतिहास के झूठ-सच को आधार बनाकर अल्पसंख्यक मुसलमानों से बदला लेने की कोशिश में लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी अपनी महती भूमिका निभा रहा है।

यहां पर सोचने की जरूरत है कि क्या पीढ़ियों पुराने अच्छे-बुरे का हिसाब वर्तमान के साथ किया जा सकता है? यदि हां, तो फिर तो दुनिया के अनेक देशों के नक्शे ही बदलने पड़ेंगे। और, यह भी समझना होगा कि हम कालचक्र को पीछे की ओर धकेलते हुए कितनी लंबी दूरी तय करेंगे। आखीरकार सीमारेखा कहीं तो खींचनी होगी या फिर पौराणिक कथाओं को ही इतिहास मानकर पूर्व पाषाण काल और उससे भी पहले आदिम युग तक में हुई 'गलतियों/भूलों' को सुधारते जायेंगे?

बहरहाल, आज देश में पूरी तैयारी और ताकत के साथ झूठ-कपट और छल-प्रपंच का मायाजाल फैलाकर जैसा वातावरण बनाया जा रहा है, वह एक व्यापक परिवर्तन का ऐसा बीजारोपण हो सकता है जो निकट भविष्य में 'बटरफ्लाइ इफेक्ट' का एक और उदाहरण बने।

सोचिए, और इत्मीनान से सोचिये कि कहीं हम भीषण भविष्य की नींव तो नहीं रख रहे हैं? साथ ही यह भी याद रखना होगा कि समय न तो किसी का इंतजार करता है और न ही किसी को माफ करता है। अलबत्ता हर पीढ़ी के अच्छे-बुरे कर्मों का प्रतिफल आने वाली पीढ़ियों को जरूर मिलता है, कम से कम यह तो इतिहास बताता ही है। तो क्या हम इतिहास से कुछ सीखने और सकारात्मक कार्य करने की कोशिश करेंगे? ■


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