गुरुवार, 7 जुलाई 2022

वक्त की हर शै गुलाम!

वक्त की हर शै गुलाम!


सिग्मंड फ्रायड 

विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड ने मानव मस्तिष्क के कई गहरे राज़ उज़ागर किये और उनके मनोविश्लेषण के आधार पर मानव के मन-मस्तिष्क सम्बंधी असंख्य अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने में मदद मिलती रही है।

फ्रायड की तरह ही प्रतिभाशाली उनका एक भांजा एडवर्ड लुइस बर्नेस (Edward Louis Bernays) भी था। जिसे 'लाइफ' पत्रिका द्वारा 20वीं सदी के सौ सबसे प्रभावशाली अमेरिकियों में से एक नामित किया गया था। उसने मामा फ्रायड के मूल मनोवैज्ञानिक सिद्धांत—'व्यक्ति अपने अवचेतन में तर्कहीन शक्तियों द्वारा प्रभावित रहता है' को जनसंपर्क, विज्ञापन तथा मार्केटिंग का गुरुमंत्र बनाकर दुनिया को पब्लिक रिलेशन यानी पीआर का ऐसा विचार दिया जो वर्तमान समय की कॉरपोरेट व्यावसायिक विज्ञापन तथा चुनावी रणनीति का प्रमुख हिस्सा बन गया है।


एडवर्ड लुइस बर्नेस


एडवर्ड लुइस बर्नेस ने क्रिस्टलाइजिंग पब्लिक ओपिनियन (1923) तथा प्रोपेगैंडा (1928) जैसी किताबें लिखकर तहलका मचा दिया था। इसके बाद उसकी पब्लिक रिलेशन्स (1945) और द इंजीनियरिंग ऑफ कंसेंट (1955) भी अच्छी-खासी लोकप्रिय हुईं।

उसने कहा था, "यदि हम भीड़ के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और उद्देश्य को समझ लें तो उस भीड़ से उसके जाने बिना बड़ी आसानी से अपने हिसाब से काम करवा सकते हैं।" 
(प्रोपेगैंडा—1928)

बर्नेस का कहना था, "लोकतंत्र में भीड़ के सामूहिक चैतन्य और तार्किकता की आदतों और राय को जोड़तोड़ कर जो इसे फ़ेरबदल कर दे, वह आसानी से उस भीड़ पर या उस देश पर राज कर सकता है।"

उसके अनुसार 'हमारी रुचियां, हमारा स्वाद, हमारे विचार, हमारी सोच सब कुछ बहुत कम लोगों द्वारा नियंत्रित होता है, जिन्हें हम जानते भी नहीं। ये ही वे लोग हैं जो भीड़ की लगाम अपने हाथ में रखते हैं।' 

वह जनता को तर्कहीन झुंड बताता था। इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य की बारीकियां अपनाते हुए आज पीआर एजेंसियों के माध्यम से विज्ञापन चलाकर जहां कॉरपोरेट जगत द्वारा बाजार पर तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता पर कब्जा किया जाता है क्योंकि जिस प्रोडक्ट या विचार को लोगों के अवचेतन में घुसाना हो, उसे बर्नेस के सिद्धांत की मदद से बड़ी आसानी से घुसाया जा सकता है।

इसी फॉर्मूले को अपना कर अमेरिकी पीआर कंपनी एप्को (APCO) वर्ल्डवाइड ने दुनियाभर में अनेक हथियार सौदागरों, तानाशाहों की छवि चमकदार बनाकर उनकी मदद की। यही वह अमेरिकी एजेंसी थी जिसे स्वघोषित हिंदू राष्ट्रवादी ने 2006 में खुद को भारत का सर्वेसर्वा बनाने के लिए 11 हजार करोड़ रुपए का ठेका दिया था और जो आज इस भीड़ के मस्तिष्क पर पूरी तरह नियंत्रण कर चुका है। तभी तो जब कहा गया कि '70 साल में कुछ भी नहीं किया गया' तो जैविक रोबोट्स बन चुकी भीड़ ने चिल्लाते हुए दोनों हाथ उठाकर समर्थन किया।

बर्नेस के अनुसार भेड़ों के झुंड में तब्दील हो गई इस भीड़ ने खुद विचार करना छोड़ दिया है। इसीलिए उसे अपने हानि-लाभ का हिसाब लगाने की जरूरत भी महसूस नहीं होती। न ही उसे ऐसी स्थिति में कोई फर्क पड़ता है। वह अवचेतन तर्कहीन विश्वास (Unconscious Irrational Belief—UIB) वाली मानव कमज़ोरी द्वारा नियंत्रित हैं। भेड़ों के इस रेहड़ का गड़रिया चाहे तो उनके घर बिकवा दे, उन्हें सड़क पर नंगा दौड़ा दे, उन्हें भूखा-प्यासा मार दे, वे फ़िर भी मंत्रमुग्ध ही रहेंगे।

दुनिया ऐसी स्थिति को हिटलर के जर्मनी में देख चुकी है जहां प्रोफेसरों, वकीलों, डॉक्टरों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने आंखें और दिमाग की खिड़कियां बंद कर नाज़ियों की मानवता विरोधी नीतियों, कार्यक्रमों तथा आदेशों का सोचे-समझे बिना ही समर्थन और पालन किया। 

उन्होंने इंसानों को भेड़ और जॉम्बी की मिश्रित नस्ल में परिवर्तित कर दिया था। तभी तो वहां होलोकास्ट जैसे राक्षसी कुकर्म किए जा सके। 

आज कमोवेश भारत में भी वैसी ही स्थिति बना दी गई है। आज यहां भी भेड़ों का अपने गड़रिये के पीछे आँख बंद कर चलना और मालिक के खिलाफ कुछ कहने वाले को मारने दौड़ना आम बात हो गई है।

यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है जिसमें अभी भी इनके समक्ष दूर-दूर तक कोई नहीं है। इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में इन्हें हरा पाना बहुत कठिन लग रहा है लेकिन चूंकि समय किसी का भी एक जैसा नहीं रहता तो नाज़ियों के इन मानसपुत्रों की भी वैसी ही दशा होना असम्भव नहीं है। समय का इंतजार करना होगा जब भारत में भी न्यूरेमबर्ग जैसा ट्रायल शुरू किया जायेगा। 

वक्त किसी का भी गुलाम नहीं होता, यह मूर्ख भेड़ नहीं समझतीं क्योंकि उन्हें उस पीड़ा के दौर से गुज़र कर अपने कुकर्मों का प्रायश्चित करना पड़ता है जो उन्होंने खुद चुना है। ■


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