सौहार्द्र की सौंधी महक विभाजक रेखा की मोहताज नहीं हो सकती
वातानुकूलित टीवी स्टूडियो में बैठे गला फाड़ चीखते-चिल्लाते युद्ध-पिपासु एंकरों, 'धर्म' से अछूते धर्मांध कठमुल्लों, वोटजुगाडू राजनीतिक गिद्धों की दुनिया से एकदम अलग मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत सीमा पर अपनी-अपनी सरकारों की तरफ से तैनात सैनिकों का अपना अलग ही संसार होता है। वे इन लोगों की कल्पना से भी परे परस्पर सौहार्द्रपूर्ण ढंग से मिलते हैं, एक-दूसरे का हालचाल जानते-समझते हैं। छोटी-छोटी बहुत मामूली चीजों का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं। और इन्हीं सौहार्द्रपूर्ण क्षणों में जन्म लेती हैं कुछ ऐसी कल्पनातीत सचमुच की कहानियां जो अपने पीछे सम्बंधों की खुशबू हवाओं में ऐसी बिखेरती हैं कि हर सुनने महसूस करने वाला कह उठता है वाह!
मेरे गांव का एक नौजवान तीन-चार साल पहले भारतीय थल सेना में अपनी सेवाओं के दौरान जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में सीमा पर तैनात था। वहां उसकी मुलाकातें सीमा के उस पार के अपने समकक्ष से अक्सर ही हुआ करती थीं। आये दिन की भेंट-मुलाकात कुछ आगे बढ़ीं तो इन दोनों के बीच संवाद भी होने लगा। फिर धीरे-धीरे पारिवारिक व्यवसाय तथा घर में कौन-कौन हैं जैसी निजी सूचनाओं का भी आदान-प्रदान होने लगा। इसी बीच एक दिन उस पाकिस्तानी जवान ने पूछा―"तुम्हारे इलाके में धान होता है?"
इसने जवाब दिया―"हां, खूब होता है।"
अगला प्रश्न हुआ―"छुट्टी कब जाना है?"
बोला―"दो महीने बाद।"
उसने कहा―"मैं इसी हफ्ते डेढ़ महीने के लिए जा रहा हूं। जब तक मैं न लौटूं, रुकना।"
अब बारी इसकी था―"क्या बात है?"
उसने लापरवाही से जवाब दिया―"कोई खास बात नहीं, अगर जरूरी न हो और रुक सको तो बेहतर होगा।"
इसने सिर्फ हूं-हां में उत्तर दिया और बातों का सिलसिला दूसरे विषयों की तरफ मुड़ गया।
लगभग सात-आठ हफ्तों के बाद चिर-शत्रु समझे जाने वाले भारत-पाकिस्तान के ये दोनों सैनिक एक बार फिर आमने-सामने थे। हाय-हलो के बाद भारतीय जवान ने पूछा―"छुट्टी काट आये?"
उसने हां में सिर हिलाया तो इसने फिर सवाल किया―"कब लौटे?"
उत्तर मिला―"यहां तो कल ही पहुंचा हूं। तुम्हारी छुट्टी का क्या हुआ? कब जाना है?"
इसने कहा―"छुट्टी तो पहले से ही मंजूर है, मैं बस तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था, क्योंकि तुमने रुकने को कहा था।"
वह मुस्कुराते हुए बोला―"मुझे याद है। मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया हूं। कल मिलते हैं।"
अगले दिन पाकिस्तान का वह सैनिक हाथ में एक छोटा-सा थैला लिये फिर मिला और बोला―"तूने बताया था कि तेरे गांव में धान की फसल बहुत अच्छी होती है तो मैं तेरे वास्ते अपने घर से बासमती धान का बीज लाया हूं।" यह कहते हुए उसने थैला इसकी तरफ उछाल दिया।
गांव लौटने पर इस फौजी जवान ने उस पाकिस्तानी बासमती के बीज की कुछ पौध अपने खेत में लगाई और कुछ गांव के दूसरे किसानों को दे दी। पकने पर उस बासमती ने ऐसी खुशबू सारे इलाके में फैलाई कि जो भी उधर से गुजरता वाह-वाह करता। दूर से ही मालूम हो जाता कि आसपास कहीं बासमती का खेत है।
काश, अपने वातानुकूलित टीवी स्टूडियो में बैठे गला फाड़ चीखते-चिल्लाते युद्ध-पिपासु एंकरों, 'धर्म' से अछूते धर्मांध कठमुल्लों, वोटजुगाडू राजनीतिक गिद्धों को जरा भी यह समझ आती कि 1947 में भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांकन करने वाले ब्रिटिश अधिकारी सर सिरिल रैडक्लिफ़ की अध्यक्षता में 8 जुलाइ को भारत पहुंचे सीमा आयोग द्वारा सिर्फ़ 5 सप्ताह के भीतर जो सीमा-रेखा का निर्धारण किया गया और जिसने 88 करोड़ लोगों के बीच 1,75,000 वर्ग मील (4,50,000 वर्ग किमी) क्षेत्र को न्यायोचित (?) रूप से विभाजित करने के अपने अधिकार का प्रयोग किया था, उससे भले ही बंटवारा हो गया लेकिन पारस्परिक सौहार्द्र की सौंधी महक को किसी विभाजक रेखा का मोहताज कभी नहीं बनाया जा सकता।


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