बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

हिन्दुओं पर चितपावनों का वर्चस्व स्थापित करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

हिन्दुओं पर चितपावनों का वर्चस्व स्थापित करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इस्राइल से यहूदियों के जत्थे भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कोंकण (सह्याद्रि क्षेत्र, महाराष्ट्र) में आकर बस गये थे। यहां आने के बाद वे हिन्दू बन गये और उन्हें चितपावन ब्राह्मण कहा जाने लगा। इसके बावजूद भी स्थानीय ब्राह्मणों ने उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हुए उनसे छुआछूत जारी रखा। इसके चलते चितपावन ब्राह्मण बन गये चतुर यहूदियों ने अपने भविष्य की चिंता करते हुए वहां से पलायन कर कोल्हापुर, सतारा आदि देसी रियासतों की राजधानी के आसपास बसना शुरू किया और येन-केन-प्रकारेण सत्ता के शीर्ष तक अपनी पहुंच बनाई।
इसी बीच सन 1720 में बालाजी विश्वनाथ की मृत्युपरांत उनके 19 वर्षीय ज्येष्ठ पुत्र बाजीराव को पेशवा (मंत्री) नियुक्त किया गया जिसने आगे चलकर अनेक लड़ाइयां जीतीं और मराठा साम्राज्य को भारत में सर्वशक्तिमान बना दिया। बतौर पेशवा बालाजी की नियुक्ति से पहले तक पेशवा वंशानुगत पदवी नहीं थी लेकिन वर्चस्ववादी यहूदी डीएनए वाले बालाजी के बाद यह एक तरह से विरासती हो गई। इसी से इस्राइली यहूदियों से चितपावन बने इन ब्राह्मणों की पेशवाओं के जमाने में पौ बारह थी। उन्होंने ऊंचे-ऊंचे शासकीय पद हथिया कर स्वयं को मराठी मूल के कुलीन ब्राह्मणों से भी उच्च श्रेणी पर स्थापित करने को हरसंभव हथकंडा अपनाया।
यदि न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे की किताब ‘द मिसलेनियस रायटिंग्जस’
(पृष्ठ―350-352) देखें तो उससे उत्तर पेशवाई शासनकाल में हुई जातिभेद में वृद्धि और अन्य जातियों की अपेक्षा प्रत्यक्ष शासन में ब्राह्मणों को दी गई प्रभुता की जानकारी मिलती है। लेखक के मुताबिक 'सतारा से पुणे राजधानी आने पर 1760 के बाद के काल में कीर्तिशाली फौजी सरदारों में ब्राह्मण लोग ही प्रमुख रूप से झलकने लगे। प्रभु, शेणवी आदि सफेदपोश ब्राह्मणेतरों का पुणे दरबार में टिकना मुश्किल हो गया। फलतः सभी वर्गों में अशान्ति फैल गई।… शिवाजी, राजाराम और शाहू के शासन काल में समाज के ये वर्ग एकता से रहे थे...। पेशवाई में ब्राह्मणों को लगने लगा कि अब हम सचमुच ही राजा हैं। ब्राह्मणों को स्वतंत्र रियासतें मिलने लगीं, कानून के बंधन उनके लिए शिथिल किये जाने लगे। ...ज्ञान हो या न हो, ब्राह्मणों के लिए सरकार ने दक्षिणा और भोजन के लिए भरपूर प्रावधान किया। अतः पुणे शहर ब्राह्मण भिखारियों का बड़ा केन्द्र बन गया। तीस से चालीस हजार ब्राह्मण सतत अनेक दिनों तक पकवानों के भोजन करते रहते थे।'
पेशवाई शासनकाल में चितपावनों ने न केवल ऊंचे सरकारी पद और जागीरें हासिल कीं बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी कफी उन्नति की, जो कि पूंजी की प्रचुरता के कारण स्वाभाविक ही था। इसके पश्चात अंग्रेजी राज में भी इनकी स्थिति पूर्ववत बनी रही। समाज में अपने वर्चस्व तथा कुलीनता के मद में चूर चितपावन ब्राह्मणों ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस का जो विरोध किया उसका एक प्रमुख कारण उसकी हिन्दुओें में व्याप्त पैठ तथा मुसलमानोें, दलितों व आदिवासियों के साथ भेदभाव समाप्त करने पर जोर देना भी था।
गांधी जी की हत्या का असली कारण―
भारत का स्वतंत्रता आंदोलन सही मायने में जनांदोलन तब बना जब 9 जनवरी, 1915 को 46 वर्ष की उम्र में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे। उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर एक वर्ष शान्तिपूर्ण बिना किसी आंदोलन के व्यतीत किया। इस दौरान उन्होंने भारत की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए पूरे भारत का भ्रमण किया। फिर 1916 में अहमदाबाद में साबरमती आश्रम की स्थापना की। फरवरी 1916 में गाँधी जी ने पहली बार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मंच पर भाषण दिया। जिसकी चर्चा पूरे भारत में हुई। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अजमाए सत्याग्रह का यहां भी बखूबी प्रयोग किया। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने किसी दल का समर्थन न करके भारतीय राजनीति को समझने का प्रयास किया। गांधी जी की विशेष भूमिका वाला सत्याग्रह आंदोलन 1917 में चम्पारण जिले में हुआ और फिर स्वाधीनता आंदोलन की कमान संभाली।
गांधी जी ने जिस तरह देश की आजादी के लिए समाज के सभी वर्गों, खास तौर पर दलितों, की हिस्सेदारी को आवश्यक समझते हुए उन्हें एकत्र करना शुरू किया, उससे महाराष्ट्र तक ही सीमित चितपावनों के एक वर्ग को अपना वर्चस्व स्थापित करने लिए खतरा महसूस हुआ। इससे उन्होंने स्वराज्य आंदोलन से न केवल खुद को अलग करना शुरू कर दिया, बल्कि उन्होंने पूरी ताकत के साथ हिंदुओं को संगठित करने की ओर ध्यान लगाना चालू कर दिया। जल्दी ही इसी की परिणति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के रूप में हुई।
गांधी और कांग्रेस को अपने वर्चस्व के लिए खतरा समझने के कारण ही 1925 में इन चितपावन ब्राह्मणों के द्वारा हिटलर और मुसोलिनी की नीतियों के आधार पर 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' नामक घोर साम्प्रदायिक संगठन को जन्म दिया गया। इसके साथ ही गांधी जी को रास्ते से हटाने की दुरभिसंधियां शुरू होने लगीं।
गांधी जी की हत्या के छः प्रयास―
महात्मा गांधी पर पहली बार 25 जून, 1934 को पुणे में रेल के फाटक पर बम से हमला किया गया। उस हमले में गांधी की कार की गलत पहचान के कारण वे बच गए। गांधी जी पर दूसरा हमला 1944 में पंचगनी में छुरे से किया गया लेकिन छुरे वाला युवक पकड़ लिया गया। फिर 1944 में गांधी और जिन्ना की बंबई में होने वाली वार्ता के अवसर पर गांधी पर हमले की कोशिश हुई, वह भी नाकाम रही। महाराष्ट्र के नेरूल के पास 1946 में गांधी जिस रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे, उसकी पटरियां उखाड़ दी गईं। ट्रेन उलट गई, इंजन कहीं टकरा गया लेकिन गांधी को उसमें कोई खरोंच तक नहीं आई। चितपावनों के गढ़ महाराष्ट्र में किये गये इन चार हमलों में गांधी जी को कोई नुकसान पहुंचाने में असफल रहने के बाद उन पर दिल्ली में 1948 में दो बार हमले हुए। पहले मदनलाल ने बम फेंका लेकिन वह फूटा नहीं और लोग पकड़े गए। फिर छठी और अंतिम बार 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर गांधी जी की हत्या कर दी।
चितपावनों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ―
संघ के मूल में चितपावन ब्राह्मणों का जो वर्चस्ववादी विचार काम कर रहा था, वह आज तक बरकरार है, जिसे संघ के अब तक हुए सभी 6 सरसंघचालकों की यह सूची स्पष्ट करती है―
1―डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार (1925-1940 कुल 15 वर्ष)
2―माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (1940-1973 कुल 37 वर्ष)
3―मधुकर दत्तात्रेय देवरस (1973-1993 कुल 20 वर्ष)
4―प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' (1993-2000 कुल 7 वर्ष)
5―कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन (2000-2009 कुल 9 वर्ष)
6―मोहनराव मधुकरराव भागवत (2009... अब तक 11 वर्ष)
इनमें से एकमात्र प्रो. राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया ही गैर-ब्राह्मण (उत्तर प्रदेश मेें शाहजहाँपुर के राजपूत) थे जिनका कार्यकाल सबसे कम केवल सात वर्ष का रहा। इसके अलावा केसी. सुदर्शन रायपुर (छत्तीसगढ़) के एक कन्नड़ भाषी ब्राह्मण थे। ये संघ के नौ साल तक सरसंघचालक रहे। इस प्रकार संघ के 95 वर्ष के इतिहास में कुल मिलाकर केवल 16 वर्षों के लिए ही कोई गैर-चितपावन ब्राह्मण संघ का सरसंघचालक बनाया गया और इस पर भी गैर-ब्राह्मण केवल 7 साल रहा।
इस हिसाब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा हिन्दुओं का जातीय आधार पर किया जा रहा विभाजन एकदम स्पष्ट हो जाता है। जिसमें चितपावन ब्राह्मणों का अन्य हिन्दुओं पर वर्चस्व स्थापित किया जा रहा है। चितपावन ब्राह्मणों के इस संगठन को यदि देश के अधिकांश लोग 'मनुवादियों का संगठन' कहते हैं तो इसका कारण इसकी अपनी सामाजिक विभाजनकारी मूल अवधारणा, समसामयिक विचार तथा कार्यशैली ही उत्तरदायी है।

इस्रायली यहूदियों के भारत आगमन और उसके बाद के घटनाक्रम पर इस लिंक पर विस्तारपूर्वक लिखा है― https://www.encyclopedia.com/humanities/encyclopedias-almanacs-transcripts-and-maps/chitpavan-brahman?fbclid=IwAR2bIUvKMiWvcQLD2IDx2yAQkGqiXBmKjVM0WkiefSUYGouXpHti4fjWdeo

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