यह आलेख जरूर पढ़ा जाना चाहिए, ताकि हम ऐसे खतरों से सावधान रहें
जर्मनी में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आये हिटलर के शासन केे दौरान 1939 में घर-घर में रेडियो निःशुल्क रखवा दिये गये। फ्री का रेडियो मिला, जनता बड़ी खुश हुई। उस समय घरों में रेडियो होना वैसे ही हुआ करता था, जैसे आज के वक्त में 45 इंच का स्मार्ट एलईडी टीवी। हिटलर का सूचना एवं प्रसारण मंत्री जोसेफ गोएबल्स जिसे कालांतर में प्रोपेगेंडा मिनिस्टर भी कहा गया, उसकी रणनीति के तहत जर्मनी के घर-घर में रेडियो पहुंच गया। जनता अपने पसंदीदा गायकों के गाने रेडियो में सुनती। कभी अपने काम करते हुए तो कभी पिकनिक मनाते हुए। सब खुश थे।
छः माह बाद सरकार की तरफ से फरमान जारी हुआ कि दफ्तर-फैक्ट्रियों की शिफ्ट समाप्ति के समय शाम पांच बजे से सात बजे तक अनिवार्य रूप से हिटलर का भाषण सुना जाये। इसके तीन महीने बाद हिटलर के विशेष सैैन्य दस्ते ‘एसएस’ ने मोहल्ला समिति बनाई। जिसमें उस समय बेरोजगार हिटलर-समर्थक युवा थे। इन युवाओं को काम दिया गया कि मोहल्ले भर में मौजूद घरों की शाम पांच से सात बजे तक निगरानी की जाये कि लोग हिटलर का भाषण सुन रहे हैं या नहीं। बहरहाल, इन युवाओं की खुफिया सूचना पर कई जर्मनवासी परिवार समेत जेल गये। इससे दहशत में आया पूरा देश रेडियो पर भाषण सुनने लगा।
रेडिया में हिटलर युद्ध की जरूरत, महज आठ प्रतिशत यहूदियों के सम्पूर्ण खात्मे की अनिवार्यता, महिलाओं को नौकरी छोड़ पांच सुनहरे बालों वाले आर्यन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन के रूप से लोन की प्रासंगिकता आदि पर भाषण होते थे। कुछ ही साल में पूरा जर्मनी दुनिया को हिटलर की नजरों से देखने लगा। हर तरफ हिटलर ही हिटलर। हिटलर जब चाहे किसी की भी मॉब लिचिंग करवा देता। उस समय के पोस्टरों में न तो हिटलर की पार्टी का नाम होता था और न ही देश का नाम। केवल हिटलर की फोटो हुआ करती थी। पूरा जर्मनी हिटलरवादी हो गया। इस तरह जर्मनी के सूचना एवं प्रसारण मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने दुनिया की सबसे नायाब और सफल सूचना क्रांति को अंजाम दिया।
इसके लगभग सत्तर साल बाद नाजी जर्मनी के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए जम्बू द्वीप के एक अन्य देश में फासीवादी सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आई। एक साल के शासन के बाद ही पूूरे देश में निःशुल्क रूप से मोबाइल सिम जनता को बांटे गये। इंटरनेट डेटा लगभग फ्री कर दिया गया। शिक्षा, चिकित्सा, आवास, रोजगार तथा अन्य अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के संघर्ष मेंं दिन-रात परिश्रम करते हुए अपनी गरीबी से लड़ रही जनता के हाथ में स्मार्ट फोन आ जाता है। उसके बाद ह्वट्सऐप्प, ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब आदि जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स के जरिये सरकार की युद्धोन्माद और धार्मिक अलगाववाद की नीतियां घर-घर सीधे पहुंचने लगती हैं। फेक न्यूज़ के कारखानों में बेरोजगार युवकों की भर्ती होती है। युवा, महिलायें, छात्र और बुजुर्ग अपने जरूरी सवालों को छोड़कर युद्ध तथा सांप्रदायिक उन्माद फैलाना ही देशसेवा समझने लगे। लोगों के पास अब केवल खोखला राष्ट्रवाद और धार्मिक विद्वेष ही चर्चा के विषय थे। वे अपनी रोजी-रोटी, शिक्षा-चिकित्सा, व्यापार, खेती आदि जैसी निहायत जरूरी बातों को भुलाकर या तो सत्ता के पक्षधर बन गये थे या फिर चुपचाप रहकर अपने अच्छे दिन लौट आने का इंतजार करते। कुछ तो सत्ताधारियों के झंडाबरदार हो गये। रेडियो, अखबार, टेलिविजन, यूट्यूब, शोसल मीडिया तथा अन्य सभी संचार-साधनों में सर्वत्र सरकार के महिमा-मंडन वाले विज्ञापन दिखाये जाने शुरू हो जाते हैं। महज तीन साल में लोगों के दिमाग में इतना सांंप्रदायिक कचरा और युद्ध-उन्माद कूट-कूट कर भर दिया जाता है कि अगले चुनाव में उस गरीब देश के बुनियादी मुद्दे गायब हो जाते हैं।
हिटलर के जर्मनी या जर्मनी के हिटलर का आगे जाकर क्या हाल हुआ था, वह इतिहास की किताबों में दर्ज है। जिसे आज खुद जर्मनवासी नहीं पढ़ना चाहते लेकिन उन्हें पढ़ाया जाता है, उसी प्रकार जैसे बीमार को ठीक करने के लिए कड़वी दवा दी जाती है। इतिहास की कड़वी और काली तारीखें भविष्य को एक बेहतर समाज में सुधारने का औषधीय गुण जो रखती हैं।
काश इतिहास में कभी सोने की चिड़िया कहाने वाले जम्बू द्वीप के उस देश के भले और भोले मानसों को यह बात समय रहते समझ आ जाती तो वे झूठ-कपट, छल-प्रपंच के मायावी जाल से मुक्त होकर अपने अच्छे दिन खुद ही लाने को एकजुट हो जाते।
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