किसका और कैसा लोकतंत्र?
अभी चार दिन पहले हमने देश का 63वाँ गणतंत्र दिवस मनाया, पिछले सालों की तरह इस बार भी यही देखने में आया कि आम आदमी के लिए इसका कोई मतलब नहीं रह गया है; क्योंकि वह जब देखता है कि उससे ऊंची पायदान पर बैठे लोग ही इस देश की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं तो उसका मन निराशा, कडुवाहट, आक्रोश, घृणा और इसी तरह के अनेक नकारात्मक विचारों से भर जाता है।
देश की अधिसंख्य गरीब जनता को उसके पेट की आग इस तरह के आयोजनों से अलग रखती है। उसकी दिलचस्पी सिर्फ जिंदा-भर रहने के लिए जैसे-तैसे कर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने तक ही रहती है। वैसे भी जब देश का तंत्र चलाने में उसे किसी भी तरह प्रत्यक्ष भागीदार नहीं बनाया गया है तो उसके लिए तो यह सब व्यर्थ की बातें हैं। उसकी ज़रूरत का ध्यान आज किसे है? अपनी चिंता उसे स्वयं करनी है। वह देख रहा है कि आये दिन अनेक लोग भूख, गरीबी, कुपोषण आदि से असमय काल के गाल में चले जा रहे हैं। अगर उनकी चिंता किसी को होती तो वे इस तरह क्यों मारे जाते?
गणतंत्र के इस पर्व पर हमने विचार किया कि देश के कर्णधारों को यहाँ के बहुसंख्यक किसानों और खेती-किसानी से जुड़े अन्य लोगों की चिंता नहीं है। पिछले 65 वर्षों में सरकारें एक के बाद दूसरी आती रहीं, लेकिन खेत-खलिहानों पर निर्भर हमारे किसान-मजदूरों के उदास चहरे और भी रुंआसे हो गये। किसी भी सरकार ने उनके चेहरों पर रौनक लौटाने की पूरी ईमानदारी से कोशिश ही नहीं की। आज सरकारी संस्था नेशनल सेम्पल सर्वे के ही आंकड़े गवाही देते हैं कि पिछले दस सालों में देश भर में पांच लाख से अधिक किसानों ने आर्थिक संकट के कारण आत्महत्या कर ली। शायद पूरी दुनिया में ऐसा उदाहरण कहीं और देखने को नहीं मिलेगा। यह हाल तब है जब हम एक कृषि प्रधान देश हैं और यहाँ के 72 फीसदी लोग खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। सरकारों की उपेक्षा के कारण कृषि-कर्म आज घाटे का सौदा बन गया है। दुनिया के सभी विकसित देशों की सरकार अपने किसानों को अनेक तरह की सुविधाएँ तथा संरक्षण देती हैं; परंतु इस मामले में हम फिसड्डी ही रहे। यहाँ तक कि हमारी सरकारें किसानों को 'अप्रशिक्षित श्रमिक ' मानती रहीं। यही नहीं यहाँ खेती-बाड़ी को अभी तक आर्थिक दृष्टि से किया जाने वाला व्यवसाय या उद्योग भी नहीं माना जाता। पूरी दुनिया में अपने छोटे-से-छोटे श्रम या सेवा का मूल्य वसूलने का अधिकार प्रत्येक मेहनतकश को मिला हुआ है लेकिन भारतीय किसान को उसके कठोर परिश्रम से उत्पन्न फसल की वाजिब कीमत दिलाने का महत्वपूर्ण काम भी हमारी सरकारें नहीं कर पायीं।
सरकार से लेकर योजना आयोग, भारतीय रिजर्व बैंक, बड़े-बड़े अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी आदि सभी का ध्यान मुद्रास्फीति, सेंसेक्स और जीडीपी की तरफ लगा रहता है परंतु सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने में जिस वर्ग की प्रमुख भूमिका निश्चित की जानी थी, वह किसान-मजदूर वर्ग अब तक पूरी तरह उपेक्षित ही रहा। देश पर हुकूमत चलाने वाले दो प्रमुख वर्गों--राजनीतिबाजों और नौकरशाहों को उद्योगपतियों-पूजीपतियों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित-साधन से ही फुर्सत नहीं है। राजनीतिबाजों का काम केवल लोगों को बरगलाना और कम-से-कम समय में सत्ता का अधिक-से-अधिक सुख बटोर लेना भर रह गया है। जबकि नौकरशाह खुद को देश का असली शासक-वर्ग मानने का दंभ पाले हुए है।
आज देश की हालत देखते हुए ऐसा लगता है कि जिनके कंधों पर देश व समाज को उन्नति के पथ पर आगे ले जाने का दायित्व है वे बहुत ही गैर जिम्मेदार, लापरवाह तथा अयोग्य हैं। उन्हें राष्ट्र-हित से अधिक अपनी चिंता रहती है। देश की बहुसंख्यक आबादी जो गांवों में रहती है, उसकी आशाएं, अपेक्षाएं तथा आकांक्षाएं क्या हैं, इसकी तरफ कौन देखे, और शायद इसकी ज़रूरत भी उन्हें महसूस नहीं होती। देश का 'तंत्र' चलाने वाले अपने स्वार्थ से आगे की सोच ही नहीं पाते। उन्हें अपनी तिजौरियां भरने के अलावा और कुछ नहीं सूझता। उनका चिंतन सिर्फ एक-दो प्रतिशत अमीर लोगों के हित-साधन तक ही सीमित रहता है। देश के बहुसंख्यक समाज―गाँव-गरीब के लिए क्या, कैसे और कितना हो रहा है, यह कौन देखेगा? आज गाँव का पढ़ा-लिखा समाज अपने घर-गाँव को छोड़ कर शहरों में ही रहना पसंद करता है। ऐसी दशा में गाँव की बदहाली निश्चित है। इसमें उसका भी कोई दोष नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर नियोजन में सारी सुविधाएँ शहरों को केंद्र में रख कर बनाई जाती हैं। इसलिए विकास की दौड़ में गाँव लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। फलस्वरूप लोगों का शहरों की तरफ पलायन भी उसी दर से बढ़ रहा है और शहर स्लम के रूप में लगातार तब्दील होते जा रहे हैं।
अब तक सरकारें और उनको चलाने वाले लोग अपने तात्कालिक (चुनावी) लाभ को ध्यान में रख कर काम करते रहे और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में दीर्घकालीन लाभ की दृष्टि से काम अपेक्षाकृत कम हुआ। सरकारों की नज़र में 'लोक-कल्याण से अधिक लोक-रंजन' महत्वपूर्ण हो गया। उनके कर्ता-धर्ता सबकुछ चुनावी गणित को ध्यान में रख कर ही करने लगे। सारा जोर किसी तरह चुनाव जीत कर पांच साल तक कुर्सी से चिपके रहने का जुगाड़ कर लेने तक ही सीमित रह गया। उसके लिए अपराध व अपराधी का भी सहारा लेने की ज़रूरत पड़ने लगी। इसीलिए आज देश में लोकतंत्र बेचारा बन आंसू बहा रहा है।
आज गाँव से लेकर देश की ऊंची-से-ऊंची पंचायत तक में देश की तरक्की के लिए कितना काम हो रहा है? हमारे माननीय लोग सप्ताह-महीने-साल में कितना समय आपस में मिल-जुल कर देश व समाज की उन्नति के लिए निर्णय लेने में लेते हैं? संसद में ही अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब सदन चलाने को आवश्यक कोरम-भर ही जुटाने की चिंता करनी पड़ती है। यही नहीं चालू सदन में ही माननीयों के ऊंघते-सोते दृश्य भी खूब देखने को मिलते हैं। जब देश व समाज उनकी चिंता और चिंतन में कहीं है ही नहीं तो यही तो होगा, जो हो रहा है।
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है कि "देश में भूख और सामाजिक पिछड़ेपन पर बहस होनी चाहिए; भारत अभी भूख, कुपोषण, महिला साक्षरता, मृत्यु-दर आदि मामलों में बंगलादेश और अफ्रीका से भी पिछड़ गया है।" उनकी यह बात कितने अर्थशास्त्रियों, जनप्रतिनिधियों, समाजशास्त्रियों, योजनाकारों, बुद्धिजीवियों आदि को प्रेरित कर पाएगी, यह समझना अभी मुश्किल है।
अमर्त्य सेन का यह कहना एकदम सही है कि "लाभान्वितों का वर्ग भारत में अमेरिका की तरह एक प्रतिशत नहीं है, जैसा कि वहाँ 'वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा करने' के आंदोलन में दिखाई पड़ा है, बल्कि यहाँ यह वर्ग देश की आबादी के कम-से-कम 20 फीसदी लोगों का है, जो पर्याप्त संसाधनों का स्वामी है और खुल कर मौज उड़ा रहा है। 20 प्रतिशत लोगों का यह वर्ग पर्याप्त रूप से मुखर है और भारतीय राजनीति में निर्णायक दखल रखने वाला है; क्योंकि यह वोट बटोरने के खेल में बड़ा खिलाड़ी है। आज दुनिया में हमारी स्थिति लगातार खराब होती जा रही है, आर्थिक वृद्धि को प्राथमिकता देने वाली हमारी ख़राब राजनीतिक-आर्थिक रणनीति जारी ही रहेगी और मानवीय क्षमताओं में विस्तार का मुद्दा पीछे छूटता चला जायेगा। जबकि सच्चाई यही है कि आर्थिक वृद्धि के लिए मानवीय क्षमताओं के विस्तार का प्रश्न भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
भले ही आज अरब-खरब पतियों के मामले में अपनी मुंबई विश्व में पांचवें स्थान पर है लेकिन यह भी एक बड़ी विडंबना है कि उसी मुंबई में एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है। जहां का नारकीय जीवन जगजाहिर है। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि देश को आर्थिक व सामाजिक रूप से उन्नत बनाने के लिए गाँव के गरीब किसानों, मजदूरों तथा खेती-किसानी को केंद्र में रख कर दीर्घकालिक और व्यापक लाभ की ठोस नीतियां बनानी होंगी और योजनाओं के क्रियान्वयन में अधिक-से अधिक लोगों का योगदान लेना होगा। इसके साथ ही ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन में आम आदमी की अधिक-से-अधिक भागीदारी हो सके यह भी सुनिश्चित करना होगा।
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