■ काल-चिंतन ■
हमारे जन्मने और मरने की फलश्रुति क्या है?
आज दुनिया एक नये वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए सबके मंगल की कामनाएं व्यक्त कर रहे हैं। हालांकि मैं स्वयं भी इस भीड़ में शामिल हूं लेकिन फिर थोड़ा दार्शनिक ढंग से सोच रहा हूं कि इसमें नया जैसा क्या है? अन्य दिनों की तरह आज भी एक सामान्य दिन ही तो है और इसमें नयापन कुछ भी तो दिखाई नहीं दे रहा है। यह बस नित्य-निरंतर परिवर्तनशील प्रकृति का परिणाम भर ही तो है।
यह परिवर्तन कैसे होता है? हमारा यह ब्रह्मांड एक लगभग अनंत सृष्टि का एक छोटा-सा हिस्सा है जिसकी उत्पत्ति किसी वृहदाकार श्याम-विवर (ब्लैक होल) में आंतरिक दबाव बढ़ जाने के कारण हुए महाविस्फोट (बिग बैंग) से छिटके द्रव्य तथा ऊर्जा से हुई है। इस घटना में द्रव्य के बड़ी तीव्रता से छिटकने की गति को 'समय' कहा जा सकता है। इस द्रव्य से निर्मित ब्रह्मांड तथा उसमें स्थित समस्त पिंड— ग्रह-उपग्रह, तारे और आकाशगंगाएं तभी से अपनी धुरी पर चक्राकार और बाहर की ओर निरंतर गतिमान हैं। इनके चक्राकार घूमने को घूर्णन कहा जाता है।
उसी द्रव्य से निर्मित हमारी आकाशगंगा के एक छोटे-से कोने में स्थित नक्षत्र-समूह में मौजूद एक तारे के टूटने से निर्मित हमारी पृथ्वी अपने तारे—सूर्य की परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी धुरी पर चक्राकार घूम रही है। सूर्य के परिभ्रमण में इसे लगभग एक वर्ष या 365.14 दिन का समय लगता है और यह अपनी धुरी (अक्ष) पर एक चक्कर पूरा करने में 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09 सेकेंड का समय लेती है। इसका यह घूर्णन पश्चिम से पूरब की ओर होता है जिसे पृथ्वी की दैनिक गति कहते हैं। इसी से दिन और रात होते हैं। प्रकृति का यह कालक्रम सतत चलता रहता है।
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चूंकि हमारा ब्रह्मांड चक्राकार घूम रहा है तो इसके घूर्णन की गति ही समय है और वैज्ञानिकों ने इसे मापने की ईकाई सेकेंड निर्धारित की है। इससे बड़े मापक मिनट, घंटे, दिन, हफ्ते, पखवाड़े, महीने और साल हैं।
सूर्य के प्रकाश के एक अणु—फोटोन को पृथ्वी तक आने में 8 मिनट 19.005 सेकेंड का समय लगता है और एक फोटोन को जितनी दूरी तय करने में एक वर्ष का समय लगता है उसे एक प्रकाश वर्ष (Lightyear) कहा जाता है। यानी यह लगभग 950 खरब (9.5 ट्रिलियन) कि.मी. है। सूर्य हमसे 0.0000158125 प्रकाश वर्ष दूर है।
हमारी आकाशगंगा में ही ऐसे असंख्य पिंड (ग्रह-उपग्रह) मौजूद हैं जिन तक हमारे तारे यानी सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंचता और यही स्थिति अन्य तारों की है जिनकी रोशनी हम तक नहीं आती। इसका अभिप्राय यह है कि इस ब्रह्मांड में पृथ्वी का अस्तित्व क्या है इसे समझने की जरूरत है!
अब दूसरे नजरिये से देखते हैं। वर्तमान समय में विश्व की कुल जनसंख्या सितंबर 2021 में 7.9 अरब हो गई थी। यानी इस कालखंड में लगभग आठ अरब लोग एकसाथ इस धरती पर रहते हैं। यदि यह हिसाब लगायें कि जब से पृथ्वी पर मनुष्य जाति का विकास हुआ है, तब से लेकर अब तक कुल मिलाकर कितने लोग यहां आये और कितने अभी और जन्म लेंगे, तो इस अपार जनसमूह में एक व्यक्ति की हैसियत क्या है, तो बुद्धि चकरा जाती है।
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ब्रह्मांड का सभी दिशाओं में अभी भी विस्तार हो रहा है। एक समय इसे भी खत्म होना है। इसकी ऊर्जा का क्षय होते ही यह विखंडित हो जाएगा।
इस प्रकार नश्वर सृष्टि का यह क्रम चलता रहता है जिसका एक निश्चित डिजाइन और प्रक्रिया है। इसी के तहत हर पिछली घटना भावी घटनाओं की आधारशिला होती है। पृथ्वी पर जीव-जंतुओं, वनस्पतियों की उत्पत्ति, विकास और क्षय होता है तो विविध प्रकार की परिघटनाएं भी जन्म लेती हैं जिनका धरती के प्राणियों, जलवायु तथा पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी की आंतरिक तथा बाह्य परिस्थितियों और अन्य ग्रह-उपग्रहों के साथ इसके सम्बंधों के कारण जो कुछ भी यहां घटता है, वह ब्रह्मांड की नियामक प्रक्रिया का हिस्सा है। समय के अदृश्य पर्दे की ओट से प्रति-पल पूर्व निर्धारित अदृष्ट प्रकट होता रहता है।
हमें लगता है कि यह अभी-अभी हमारे सामने घट रहा है लेकिन वस्तुत: ऐसा होता नहीं। वह तो किसी मूवी की तरह पहले ही तैयार हो गया था, बस सामने आने की देर थी।
ऐसे परिवर्तनशील तथा नश्वर संसार में सामान्यतः मनुष्य अज्ञान व अहंकारवश स्वयं को कर्ता समझता है क्योंकि जीवन में जब तक कोई चीज हमारे नियंत्रण में है तो ऐसा महसूस होता है कि मैं ही उसे कर रहा हूं। धरती पर फैली विसंगतियों तथा अशांति के पीछे भी मूल कारण यही है। जबकि वास्तविकता यह है कि सब कुछ प्रकृति के नियमों के तहत संचालित हो रहा है। यह गुत्थी बेहद उलझी हुई है।
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अपनी सुविधानुसार काल-गणना और समय-विभाजन के लिए दुनिया की तमाम विकसित सभ्यताओं ने अपने-अपने कैलेंडर बनाये हैं। इसी के अनुरूप ग्रेगोरियन केलैंडर का साल 2021 कल अर्द्धरात्रि को समाप्त हो गया और नया वर्ष 2022 का प्रवेश हो गया है। इस समयांतराल में हमने क्या खोया और क्या पाया, इसका हिसाब लगाये बिना यह देखना होगा कि यदि सबकुछ प्रकृति के सुनिश्चित डिजाइन के अनुसार ही हो रहा है तो फिर हमारा कर्तव्य-कर्म क्या है और क्या है हमारे जन्मने और मरने की फलश्रुति? इसे वैज्ञानिक संसाधनों और सिद्धांतों की अपेक्षा आध्यात्मिक योग-साधना से सरलतापूर्वक अनुभव किया जा सकता है।
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