सोमवार, 23 अगस्त 2021

क्या अमेरिकी प्रभुत्व खत्म हो रहा है?

 क्या अमेरिकी प्रभुत्व खत्म हो रहा है?

'द इंडियन एक्सप्रेस' में प्रताप भानु मेहता लिखते हैं कि अमेरिका आज एक ऐसी स्थिति में फंस गया है, जहां से वह न तो खुद को संभाल सकता है और न ही उबर सकता है। अफगानिस्तान के संदर्भ में रणनीतिकार और 'न्यूयॉर्क टाइम्स' जैसे अखबार भी यही मानते हैं कि पूरी अमेरिकी कवायद ने अपनी अहमियत ही खो दी।
शासक अक्सर नुकसान को बहुत कम कर आंकते हैं। इराक, लीबिया, वियतनाम, अफगानिस्तान, सोमालिया, लेबनान तक लंबी फेहरिस्त है, जहां अमेरिका को नुकसान झेलना पड़ा है। ईरान से चिली तक बगावतें हुई हैं। कोलंबिया, इक्वाडोर, ग्वाटेमाला, लाओस, होन्डुरास, अल सल्वाडोर हर देश मे हिंसा हुई है। सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान तक ने अमेरिकी मकसद को नुकसान पहुंचाया है। सवाल यह है कि क्या अमेरिकी हस्तक्षेप से कोई मकसद हासिल हुआ या हिंसा में कमी आयी? जवाब है―नहीं। अफगानिस्तान में लंबा वक्त गुजार चुकीं एक पत्रकार लिजे पूछती हैं―“कोई ऐसा युद्ध है जहां हम हारे न हों?"
ईरान, वियतनाम हर जगह अमेरिका सटीक अनुमान लगाने में विफल रहा। वहीं पुतिन के नेतृत्व में रूस ने खुद को भूमध्यसागर क्षेत्र तक प्रभावशाली बनाए रखने में सफलता हासिल की है। सोवियत संघ के पतन के बाद चीन ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को प्रभावहीन करके वह मध्य एशिया तक जा पहुंचा है और अफ़ीकी महाद्वीप तक जल्दी ही पहुंचने वाला है।
लेखक इस ओर भी इशारा करते हैं कि आज हर देश का कारोबार अमेरिका के मुकाबले चीन के साथ ज्यादा है। अमेरिका, जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया क्वाड के कम से कम दो देश—भारत और ऑस्ट्रेलिया आर्थिक और सामरिक नजरिए से चीन की तपिश के शिकार हैं। भारत के लिए तो यह चुनौती आगे अभी और भयावह रूप में सामने आ सकती है।
भारत वैश्विक स्तर पर हर क्षेत्र में निरंतर कमजोर होता गया है और सत्ताधारी वर्ग इस सबसे लापरवाह बना हुआ है। उसे गांव की रामलीला कमेटी व ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव को युद्ध की तरह जीत लेने की खब्त सवार है। असहमति या विरोध की एक आवाज उठते ही उसे कुचले को पूरी ताकत झौंक दी जाती है, देशहित जाये भाड़ में।
'अबकी बार ट्रंप सरकार' जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की मूर्खता ने भारत को कहीं का नहीं छोड़ा। ऐसे में यदि चीन के साथ सीमाओं पर तनाव बढ़ता है तो विश्व-बिरादरी में हमारे साथ कौन खड़ा होगा यह आज कोई नहीं कह सकता। क्या ऐसी स्थिति पहले भी कभी आई थी?

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