शनिवार, 10 जुलाई 2021

क्या भारत में लोकतंत्र समाप्ति की ओर बढ़ रहा है?

क्या भारत में लोकतंत्र समाप्ति की ओर बढ़ रहा है?

ईसा मसीह ने कहा था कि सूई के छेद में से ऊँट तो निकल सकता है, लेकिन स्वर्ग के दरवाज़े से मुनाफ़ाख़ोर का निकलना असम्भव है। 

उनकी इसी शिक्षा से प्रभावित कैथोलिक ईसाइयों ने सदियों तक व्यापार ही नहीं किया, क्योंकि बिना मुनाफ़ा व्यापार सम्भव नहीं था। लंबे समय के बाद सामाजिक परिवर्तनों के कारण जब ईसाइयों ने व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेना प्रारंभ किया, तब जॉन कालविन ने यह विचार दिया कि यदि समाज के हित के लिए मुनाफ़ा कमाया जाये तो वह पाप नहीं है।

इसके फलस्वरूप कुछ ही समय में ईसा मसीह के अनुयाई ईसा के उपदेश को भूल गये। नौबत यहां तक आ पहुंची कि ईसा ने पाखंड और रूढ़ियों में जकड़े समाज की जिस सामूहिक चेतना को जगाया था उसने एक अलग 'धर्म' का रूप धारण कर उसके एक प्रतीक चर्च को सामाजिक-राजनीतिक विचारों का केंद्र बना लिया। 

आगे चलकर चर्च इतना शक्तिशाली होता गया कि उसने एक तरफ राजसत्ता को अपने प्रभाव-क्षेत्र में ले लिया तो दूसरी ओर तथाकथित 'धर्म' के नाम पर लोगों को परलोक में उत्तम स्थान प्राप्त करने का लालच देकर धन लेकर रसीदें जारी की जाने लगीं। चर्च के पास अकूत दौलत इकट्ठा होती गई। कालांतर में संत ईसा के वास्तविक मानव धर्म से बहुत दूर उसकी जगह राजसत्ताएं हड़पने का खेल शुरू हो गया, उसके लिए युद्ध लड़े जाने लगे और यह तथाकथित नया धर्म तथा उसके नाम पर बना चर्च दोनों भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये। फिर सर्वत्र अराजकता फैल गई।

इसी क्रम में ईसा की चौथी शताब्दी से 12वीं शताब्दी के मध्य चर्च की संपूर्ण विधि-व्यवस्था को संचालित करने वाले संहिताबद्ध कानूनों (कैनन लॉ)  का विकास हुआ। चूंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और व्यवस्थाएं भी बदलती रहती हैं, इसलिए बदलाव के बीज उसके भीतर ही जन्म लेते हैं। शायद इसीलिए 16वीं शताब्दी में एक जर्मन भिक्षुक और धर्मशास्त्री मार्टिन लूथर द्वारा प्रोटेस्टेंट सुधार शुरू किया गया। जिसने ईसाई धर्म को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने कैथोलिक चर्च की सबसे पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाते हुए 95 सुधारों की सूची प्रस्तुत कर दी। जिसके फलस्वरूप 1530 ई. में प्रोटेस्टेंट धर्म के सिद्धांतों को निर्दिष्ट एकीकृत रूप दिया गया।

इससे लोगों के बीच वैचारिक क्रांति रेनेसां (पुनर्जागरण) काल प्रारंभ हुआ। मार्टिन लूथर के सुधारवादी आंदोलन में परंपराओं के नाम पर ईसाई मत में जड़ जमा चुकी रूढ़ियों को नकारने और धर्मशास्त्र (बाइबल) को ही उद्घाटित सत्य का असली स्रोत मानने वाले उदार ईसाई पुरोहित, सामंत और जनता मार्टिन लूथर के साथ हो गई और चर्च की सत्ता का विरोध (प्रोटेस्ट) करने वाले एक नये सुधारवादी ईसाई समुदाय प्रोटेस्टेंट का जन्म हुआ।

यह पुनर्जागरण (रेनेसां) व्यावहारिक रूप से मानव समाज की बौद्धिक चेतना और तर्कशक्ति का उदय था। इसके प्रभाव से मनुष्य तथाकथित धार्मिक पाखंडों की सीमाओं से ऊपर उठकर स्वतंत्र रूप से आलोचनात्मक चिंतन करने लगा।

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व्यापक सामाजिक समर्थन से धर्म के नाम पर बनी सामाजिक व्यवस्थाएं तथा राजसत्ताएं मदांध होती हैं। वे न्याय, नैतिकता, उचित-अनुचित का भेद,  पारस्परिक सौहार्द्र, समता और सहिष्णुता जैसे मानवीय मूल्यों की परवाह नहीं करतीं। स्थापित मूल्यों की अवहेलना उनका स्वभाव बन जाता है। उनकी चेतना और संवेदनशीलता यहां तक कुंद हो जाती है कि वे गरीबों, शोषितों, वंचितों तथा जनसामान्य को इन्सान मानने से ही इंकार कर देती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य अधिकाधिक शक्ति हासिल कर धार्मिक और राजनीतिक सत्ता का उपभोग करना रह जाता है। इसके लिए वे साम, दाम, दंड और भेद की विनाशकारी नीति पर चलते हुए पूरे समाज को अपने नियंत्रण में लेने का हरसंभव उपाय करते हैं। इससे लोगों का जीवन दुखों से भर जाता है और चहुं ओर अव्यवस्था व अराजकता फैल जाती है।

ऐसे घटाटोप अंधेरे में से ही परिवर्तनकारी शक्तियों का अभ्युदय होता है जिन्हें शोषित और पीड़ित आमजन का भरपूर सहयोग सहज ही मिलने से जनक्रांति जन्म लेती है। जो शक्तिशाली वर्ग को उखाड़ फेंककर नई व्यवस्था का निर्माण करती है।

ऐसे ही संघर्ष और चिंतनशील लोगों के प्रयासों और अनुभव से लोकतांत्रिक व्यवस्था का उदय हुआ। जिसके विविध रूप अनेक देशों में प्रचलित हैं। 

सामान्यतः लोकतंत्र में चुनावी प्रतिस्पर्धा एक सामान्य प्रक्रिया है। जिसके अंतर्गत सभ्य समाज में सामूहिक रूप से उन्नति की ओर बढ़ने के लिए मुद्दों को लेकर विमर्श किया जाता है, प्रत्याशी अपने विचार और योजनाओं का खाका पेश करते हुए मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इसी आधार पर लोग अपना वोट देकर बहुमत से प्रतिनिधि चुनते हैं।

चुनाव के बाद भी समाज अपने निर्वाचित प्रतिनिधि तथा सत्ता प्रतिष्ठान के कामकाज पर नजर रखता है, उनके गुण-दोष पर खुली बहस होती है। सुझाव लिये-दिये जाते हैं। यह क्रम सतत चलता रहता है। तभी देश और समाज उन्नति की राह पर आगे बढ़ता चला जाता है। यही एक सफल लोकतंत्र की आधारशिला भी है और पहचान भी।

भारत में लोकतंत्र बहुत तेजी से असफलता की ओर बढ़ रहा है। खास तौर पर प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति का शिखर पुरुष बनने के बाद जहां एक ओर संवैधानिक व्यवस्था को लगातार किनारे किया जाता रहा है, वहीं दूसरी तरफ जनता को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए तरह-तरह के उपाय किये जाते रहे हैं। 

ऐसा लगता है कि मुट्ठी भर शासकों ने लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है। चुनाव, विधाई संस्थाएं, न्यायालय, प्रशासन, समाचार माध्यम आदि सभी की पवित्रता को पद-दलित कर इनकी स्वायत्तता पर अधिकार जमा लिया गया है। नागरिक अधिकार निलंबित हैं। लोकतांत्रिक सरकार का लोक-कल्याणकारी स्वरूप गायब है और उसके स्थान पर अधिनायकवाद हावी हो गया है। जनता द्वारा निर्वाचित सरकार जनता के प्रति उत्तरदाई नहीं दिखाई देती। सबकुछ चंद लोगों द्वारा निर्धारित और नियंत्रित है।

उत्तर प्रदेश का ताजा उदाहरण हमारे सामने है। जहां हो रहे पंचायत के चुनाव में सत्ताधारी वर्ग द्वारा नियम, कानून, व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों की जैसे अर्थी ही निकाल दी गई है। देशभक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मुखौटा लगाये लोगों ने सामाजिक मान-मर्यादा तथा परंपराओं की धज्जियां उड़ा दीं हैं।

कल तक न्याय की बात करने वाले देश-प्रदेश की सत्ता पर कब्जा करने के बाद अन्याय, आतंक और दानवता का तांडव करते हुए ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य के पद हथियाने को पूरी तरह गुंडागर्दी पर उतर आये। लोगों को चुनाव का नामांकन करने से बलपूर्वक रोका गया, विपक्षी महिलाओं का चीरहरण, पत्रकारों के साथ मारपीट, प्रत्याशियों को मतगणना स्थल से बाहर कर सत्ताधारी दल के प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया। सबसे दुखदाई यह है कि पुलिस-प्रशासन के अधिकारी ऐसे कुकृत्यों में असामाजिक तत्वों के क्रीतदास बनकर उन्हें सहयोग करते रहे। पीड़ितों की कहीं कोई सुनवाई नहीं। यह सिर्फ एक बानगी है। 

सत्ता का अति-केंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति सामने है। सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किये जाते। यहां तक कि सभी छोटे-बड़े मामलों में सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है।

ऐसी स्थिति में शंका होती है कि आगे 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे भी या नहीं। हालांकि इसकी खुली घोषणा 2019 में भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज कर चुके हैं कि भारत में 2019 के बाद कोई चुनाव नहीं होगा। उधर 2016 में भाजपा के वयोवृद्ध नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भी पहले ही कहा था कि भारत में आपातकाल की स्थिति अभी भी बनी हुई है।

बहरहाल, भारत एक बडे़ बदलाव के मुहाने पर खड़ा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि यह नैराश्यपूर्ण परिदृश्य जल्दी ही बदलेगा और फिर जो भी होगा, वह भारतीय जन-गण-मन के लिए सुखद और कल्याणकारी होगा।


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